वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १०९ ततोऽस्य शूलेन बिभेद कण्ठं तस्मात् पुमान् खड्गधरो विनिर्गतः ॥ ४८ निष्क्रान्तमात्रं हृदये पदा तं आहत्य संगृह्य कचेषु कोपात्। शिरः प्रचिच्छेद वरासिनाऽस्य हाहाकृतं दैत्यबलं तदाऽभूत् ॥ ४९ सचण्डमुण्डाः समयाः सताराः सहासिलोम्ना भयकातराक्षाः। संताड्यमानाः प्रमथैर्भवन्त्याः पातालमेवाविविशुर्भयार्ताः ॥ ५० देव्या जयं देवगणा विलोक्य स्तुवन्ति देवीं स्तुतिभिर्महर्षे। नारायणीं सर्वजगत्प्रतिष्ठां कात्यायनीं घोरमुखीं सुरूषाम् ॥ ५१ संस्तूयमाना सुरसिद्धसंघै- र्निषण्णभूता हरपादमूले। भूयो भविष्याम्यमरार्थमेव- मुक्त्वा सुरांस्तान् प्रविवेश दुर्गा ॥ ५२ शूलसे उसकी गर्दन काट दीं। उसके कटे कण्ठसे तुरंत तलवार लिये एक पुरुष निकल पड़ा। उसके निकलते ही देवीने उसके हृदयपर चरणसे आघात किया और क्रोधसे उसके बालोंको समेटकर पकड़ लिया तथा अपनी श्रेष्ठ तलवारसे उसका भी सिर काट डाला। उस समय दैत्योंकी सेनामें हाहाकार मच गया। चण्ड, मुण्ड, मय, तार और असिलोमा आदि दैत्य भवानीके प्रमथगणोंद्वारा प्रताडित एवं भयसे उद्विग्न होकर पातालमें प्रविष्ट हो गये। महर्षि नारदजी ! इधर देवीकी विजयको देखकर देवतागण स्तुतियोंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता, क्रोधमुखी, सुरूपा, नारायणी, कात्यायनीदेवीकी स्तुति करने लगे। देवताओं और सिद्धोंद्वारा स्तुति की जाती हुई दुर्गाने 'मैं आप देवताओंके श्रेयके लिये पुनः आविर्भूत होऊँगी' - ऐसा कहकर शिवजीके पादमूलमें लीन हो गयीं ॥ ४८-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह नारद उवाच पुलस्त्य कथ्यतां तावद् देव्या भूयः समुद्भवः। महत्कौतूहलं मेऽद्य विस्तराद् ब्रह्मवित्तम ॥ १ पुलस्त्य उवाच श्रूयतां कथयिष्यामि भूयोऽस्याः सम्भवं मुने। शुम्भासुरवधार्थाय लोकानां हितकाम्यया ॥ २ या सा हिमवतः पुत्री भवेनोढा तपोधना। उमा नाम्ना च तस्याः सा कोशाज्जाता तु कौशिकी ॥ ३ नारदजीने कहा - ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुलस्त्यजी ! अब आप देवीकी उत्पत्तिके विषयमें मुझसे पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उसे सुननेकी मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ १॥ पुलस्त्यजी बोले - मुनिजी ! सुनिये; मैं पुनः लोककल्याणकी इच्छासे शुम्भ नामक असुरके वधके लिये देवीकी जो पुनः उत्पत्ति हुई, उसका वर्णन करता हूँ। भगवान् शङ्करने हिमवान्की जिस तपस्विनी कन्या उमासे विवाह किया था, उन्हींके शरीर-कोश (गर्भ)-से उत्पन्न होनेके कारण वे देवी कौशिकी कहलायीं।