वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ सम्भूय विन्ध्यं गत्वा च भूयो भूतगणैर्वृता । शुम्भं चैव निशुम्भं च वधिष्यति वरायुधैः ॥ ४ नारद उवाच ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता मृता दक्षात्मजा सती । सा जाता हिमवत्पुत्रीत्येवं मे वक्तुमर्हसि ॥ ५ यथा च पार्वतीकोशात् समुद्भूता हि कौशिकी । यथा हतवती शुम्भं निशुम्भं च महासुरम् ॥ ६ कस्य चेमौ सुतौ वीरौ ख्यातौ शुम्भनिशुम्भकौ। एतद् विस्तरतः सर्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ७ पुलस्त्य उवाच एतत्ते कथयिष्यामि पार्वत्याः सम्भवं मुने । शृणुष्वावहितो भूत्वा स्कन्दोत्पत्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८ रुद्रः सत्यां प्रणष्टायां ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । निराश्रयत्वमापन्नस्तपस्तप्तुं व्यवस्थितः ॥ ९ स चासीद् देवसेनानीर्दैत्यदर्पविनाशनः । शिवरूपत्वमास्थाय सैनापत्यं समुत्सृजत् ॥ १० ततो निराकृता देवाः सेनानाथेन शम्भुना। दानवेन्द्रेण विक्रम्य महिषेण पराजिताः ॥ ११ ततो जग्मुः सुरेशानं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् । श्वेतद्वीपे महाहंसं प्रपन्नाः शरणं हरिम् ॥ १२ तानागतान् सुरान् दृष्ट्वा ततः शक्रपुरोगमान् । विहस्य मेघगम्भीरं प्रोवाच पुरुषोत्तमः ॥ १३ किं जितास्त्वसुरेन्द्रेण महिषेण दुरात्मना। येन सर्वे समेत्यैवं मम पार्श्वमुपागताः ॥ १४ तद् युष्माकं हितार्थाय यद् वदामि सुरोत्तमाः । तत्कुरुध्वं जयो येन समाश्रित्य भवेद्धि वः ॥ १५ उत्पन्न होनेपर भूतगणोंसे आवृत हो वे विन्ध्यपर्वतपर गयीं और उन्होंने (अपने) श्रेष्ठ आयुधोंसे शुम्भ तथा निशुम्भ नामके दानवोंका वध किया ॥ २-४ ॥ नारदजीने कहा- ब्रह्मन् ! आपने पहले यह बात कही थी कि दक्षकी पुत्री सती ही मरकर फिर हिमवान्की पुत्री हुई थीं। (अब) इसे आप विस्तारसे सुनाइये। पार्वतीके शरीर-कोशसे जिस प्रकार वे कौशिकी प्रकट हुईं और फिर उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नामके बड़े असुरोंका जैसे वध किया था - इन सभी बातोंको विस्तारसे कहिये। ये शुम्भ और निशुम्भ नामसे विख्यात वीर किसके पुत्र थे, इसका ठीक-ठीक विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ५-७ ॥ पुलस्त्यजी बोले- मुने ! (अच्छा,) अब मैं फिर आपसे पार्वतीकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यान देकर (सम्बद्ध) स्कन्दके जन्मकी शाश्वत (नित्य, सदा विराजनेवाली) कथा सुनें! सतीके देह त्याग कर देनेपर रुद्र भगवान् निराश्रय विधुर हो गये एवं ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए तपस्या करने लगे। वे शङ्करजी (पहले) दैत्योंके दर्पको चूर्ण करनेवाले देवताओंके सेनानी थे। परंतु अब उन्होंने (रुद्र-रूपका त्याग कर) शिव-स्वरूप धारण कर लिया तथा तपमें लगकर सेनापति (स्थायी)-पदका भी परित्याग कर दिया। फिर तो देवताओंके ऊपर उनके सेनापति शिवसे विरहित हो जानेके कारण दानवश्रेष्ठ महिषने बलपूर्वक आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया ॥ ८-११ ॥ (जब देवसमुदाय पराजित हो गया) तब पराजित हुए देवतालोग शरण-प्राप्तिकी खोजमें देवेश्वर भगवान् श्रीविष्णुके दर्शनार्थ श्वेतद्वीप गये। उस समय भगवान् विष्णु इन्द्र आदि देवताओंको आये हुए देखकर हँसे और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले- मालूम होता है कि आपलोग असुरोंके स्वामी दुरात्मा महिषसे हार गये हैं, जिसके कारण इस प्रकार एक साथ मिलकर मेरे पास आये हैं? श्रेष्ठ देवताओ! अब आपलोगोंकी भलाईके लिये मैं जो बात कहता हूँ, उसे आप सब सुनिये और उसे (यथावत्) आचरण कीजिये। उसके सहारे आपकी निश्चय विजय होगी ॥ १२-१५ ॥