भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

११४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ ददस्व मां नाथ तपस्विनेऽस्मै गुणोपपन्नाय समीहिताय। नेहान्यकामां प्रवदन्ति सन्तो दातुं तथान्यस्य विभो क्षमस्व॥५४ दोनों कपोल-ये चार अङ्ग सुगन्धवाले हैं। उनके नेत्र, मुख-विवर, मुखमण्डल, जिह्वा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर-ये दस अङ्ग कमलके समान हैं। भगवन्! मैंने खूब सोच-विचारकर पृथ्वीपर उस राजपुत्रको पहले ही पतिरूपसे वरण कर लिया है। विभो ! मुझे क्षमा करें। आप गुणोंसे युक्त (मेरी) इच्छाके अनुकूल तथा वाञ्छित उस तपस्वीको मुझे दे दें; क्योंकि सन्तोंका यह कहना है कि अन्यकी कामना करनेवाली कन्याको किसी औरको नहीं देना चाहिये ॥ ५२-५४॥ देवदेव उवाच इत्येवमुक्तः सवितुश्च पुत्र्या ऋषिस्तदा ध्यानपरो बभूव। ज्ञात्वा च तत्रार्कसुतां सकामां मुदा युतो वाक्यमिदं जगाद॥५५ स एव पुत्रि नृपतेस्तनूजो दृष्टः पुरा कामयसे यमद्य। स एव चायाति ममाश्रमं वै ऋक्षात्मजः संवरणो हि नाम्ना ॥५६ अथाजगाम स नृपस्य पुत्र- स्तमाश्रमं ब्राह्मणपुंगवस्य। दृष्ट्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य मूर्ध्ना स्थितस्तवपश्यत् तपतीं नरेन्द्रः ॥५७ दृष्ट्वा च तां पद्मविशालनेत्रां तां पूर्वदृष्टामिति चिन्तयित्वा । पप्रच्छ केयं ललना द्विजेन्द्र स वारुणिः प्राह नराधिपेन्द्रम् ॥ ५८ इयं विवस्वद्दुहिता नरेन्द्र नाम्ना प्रसिद्धा तपती पृथिव्याम्। मया तवार्थाय दिवाकरोऽर्थितः प्रादान्मया त्वाश्रममानिनिन्ये ॥ ५९ तस्मात् समुत्तिष्ठ नरेन्द्र देव्याः पाणिं तपत्या विधिवद् गृहाण। इत्येवमुक्तो नृपतिः प्रहृष्टो जग्राह पाणिं विधिवत् तपत्याः ॥ ६० सा तं पतिं प्राप्य मनोऽभिरामं सूर्यात्मजा शक्रसमप्रभावम्। रराम तन्वी भवनोत्तमेषु यथा महेन्द्रं दिवि दैत्यकन्या॥ ६१ देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ] ने कहा - फिर सूर्यपुत्री तपतीके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी ध्यानमें मग्न हो गये और तपतीको उस कुमारमें आसक्त समझकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने यह बात कही - पुत्रि ! जिस राजपुत्रका तुमने पहले दर्शन किया था और जिसकी कामना तुम आज कर रही हो, वह ऋक्षका पुत्र (राजा) संवरण ही है। वह आज मेरे आश्रममें आ रहा है। उसके पश्चात् वह राजकुमार भी ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीके आश्रममें आया। उस राजाने वसिष्ठको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया; बैठनेपर तपतीको भी देखा। खिले कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस तपतीको देखकर उसने सोचा कि इसे मैंने पहले भी देखा है। (तब) उसने पूछा- ब्राह्मणश्रेष्ठ ! यह सुन्दर स्त्री कौन है? इसपर वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ संवरणसे कहा- ॥ ५५-५८ ॥ 'नरेन्द्र ! पृथ्वीमें तपती नामसे प्रसिद्ध यह सूर्यकी पुत्री है। मैंने तुम्हारे ही लिये सूर्यसे इसकी याचना की थी और उन्होंने तुम्हारे लिये इसे मुझे सौंपा था। मैं तुम्हारे लिये ही इसे आश्रममें लाया हूँ; अतः नरेन्द्र ! उठो एवं विधिवत् इस सूर्यपुत्री तपतीका पाणिग्रहण करो।' [ वसिष्ठजीके ] - ऐसा कहनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तपतीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। सूर्यकी तनया तपती भी इन्द्रके तुल्य प्रभावशाली उस सुन्दर पतिको पाकर [ अत्यन्त] प्रसन्न हुई। वह उत्तम महलोंमें उसके साथ इस प्रकार विहार करने लगी, जैसे इन्द्रको पाकर स्वर्गमें शची विहार करती है ॥ ५९-६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २१ ॥