भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य ११५ बाइसवाँ अध्याय कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य देवदेव उवाच देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ]-ने कहा-उस तस्यां तपत्यां नरसत्तमेन तपतीके गर्भसे मनुष्योंमें श्रेष्ठ संवरणके द्वारा राजलक्षणोंवाला जातः सुतः पार्थिवलक्षणस्तु। एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह जातकर्म आदि संस्कारोंसे स जातकर्मादिभिरेव संस्कृतो संस्कृत होकर इस प्रकार बढ़ने लगा जैसे घीकी आहुति विवर्द्धताज्येन हुतो यथाऽग्निः ॥ १ डालनेसे अग्नि बढ़ती है। देवगण! मित्रावरुणके पुत्र कृतोऽस्य चूडाकरणश्च देवा वसिष्ठजीने उसका (यथासमय) चौल-संस्कार कराया। विप्रेण मित्रावरुणात्मजेन। नवें वर्षमें उसका उपनयन-संस्कार हुआ। फिर वह नवाब्दिकस्य व्रतबन्धनं च ( श्रम-क्रमसे अध्ययन कर) वेद तथा शास्त्रोंका पारगामी वेदे च शास्त्रे विधिपारगोऽभूत् ॥ २ विद्वान् हो गया एवं चौबीस वर्षोंमें तो फिर वह सर्वज्ञ- ततश्रुतुःषड्भिरपीह वर्षैः सा हो गया। पुरुषश्रेष्ठ संवरणका वह पुत्र इस भूभागपर सर्वज्ञतामभ्यगमत् ततोऽसौ। 'कुरु' नामसे प्रसिद्ध हुआ। तब राजा (उस) कल्याणकारी ख्यातः पृथिव्यां पुरुषोत्तमोऽसौ अपने धार्मिक पुत्रको (उपयुक्त अवस्थामें आये हुए) नाम्ना कुरुः संवरणस्य पुत्रः॥ ३ देखकर किसी उत्तम कुलमें उसके विवाहका यत्न ततो नरपतिर्दृष्ट्वा धार्मिकं तनयं शुभम्। दारक्रियार्थमकरोद् यत्नं शुभकुले ततः ॥ ४ करने लगे ॥ १-४॥ सौदामिनीं सुदाम्नस्तु सुतां रूपाधिकां नृपः। राजाने कुरुके लिये सुन्दर स्वरूपवाली सुदामाकी पुत्री सौदामिनीको चुना और सुदामा राजाने भी उसे कुरुको कुरोरर्थाय वृतवान् स प्रादात् कुरवेऽपि ताम् ॥ ५ विधिवत् प्रदान कर दिया। उस राजकुमारीको पाकर वह (कुरु) धर्म और अर्थका (यथावत्) पालन करते स तां नृपसुतां लब्ध्वा धर्मार्थाविरोधयन्। हुए उस तन्वङ्गी अर्थात् कृशाङ्गीके साथ गार्हस्थ्य धर्ममें रेमे तन्व्या सह तया पौलोम्या मघवानिव ॥ ६ वैसे ही रहने लगा, जैसे पौलोमी (शची)-के साथ इन्द्र दाम्पत्य-जीवन व्यतीत करते (हुए रहते) हैं। उसके बाद ततो नरपतिः पुत्रं राज्यभारक्षमं बली। बलवान् राजाने राज्य-भारके वहन करनेमें - राज्यकार्य विदित्वा यौवराज्याय विधानेनाभ्यषेचयत् ॥ ७ संचालनमें - उसे समर्थ जानकर विधिपूर्वक युवराज- पदपर अभिषिक्त कर दिया। तब पिताके द्वारा अपने ततो राज्येऽभिषिक्तस्तु कुरुः पित्रा निजे पदे। राज्यपदपर अभिषिक्त होकर कुरु औरस पुत्रकी भाँति पालयामास स महीं पुत्रवच्च स्वयं प्रजाः ॥ ८ अपनी प्रजाका और पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ५-८ ॥ स एव क्षेत्रपालोऽभूत् पशुपालः स एव हि। (प्रजा और पृथ्वीके पालनमें लगे) वे राजकुमार स सर्वपालकश्चासीत् प्रजापालो महाबलः ॥ ९ कुरु 'क्षेत्रपाल' तथा 'पशुपाल' भी हुए! महाबली वे सर्वपालक एवं प्रजापालक भी हुए। फिर उन्होंने सोचा कि संसारमें यश ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है (उसे प्राप्त करना ततोऽस्य बुद्धिरुत्पन्ना कीर्तिर्लोके गरीयसी। चाहिये); क्योंकि जबतक संसारमें कीर्ति भलीभाँति स्थित यावत्कीर्तिः सुसंस्था हि तावद्वासः सुरैः सह ॥ १० रहती है, तबतक मनुष्य देवताओंके साथ निवास करता है।