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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

६३- अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन

अध्याय ६१ ]पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन२८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शिष्टाचारविनाशं च शिष्टद्वेषं शिशोर्वधम्।<br>शास्त्रस्तेयं धर्मनाशं दशमं परिकीर्तितम्॥ १०<br><br>षडङ्गनिधनं घोरं षाड्गुण्यप्रतिषेधनम्।<br>एकादशममेवोक्तं नरकं सद्भिरुत्तमम्॥ ११<br><br>सत्सु नित्यं सदा वैरमनाचारमसत्क्रिया।<br>संस्कारपरिहीनत्वमिदं द्वादशमं स्मृतम्॥ १२करना नवाँ नरक कहा जाता है। शिष्टाचारका नाश, शिष्टजनोंसे विरोध, नादान बालककी हत्या, शास्त्रग्रन्थोंकी चोरी तथा स्वधर्मका नाश करना दसवाँ नरक कहा जाता है। षडङ्गनिधन अर्थात् छः अङ्गोंवाली वेद-विद्याको नष्ट करना और षाड्गुण्य अर्थात् सन्धि-विग्रह, यान, आसन-द्वैधीभाव, समाश्रय (राजनीति-गुणों)-का प्रतिषेध ग्यारहवाँ घोर नरक कहा गया है। सज्जनोंसे सदा वैर-भाव, आचारसे रहित रहना, बुरे कार्यमें लगे रहना एवं संस्कार-विहीनताको बारहवाँ नरक कहा गया है॥ ९—१२॥
हानिर्धर्मार्थकामानापवर्गस्य हारणम्।<br>संभेदः संविदामेतत् त्रयोदशममुच्यते॥ १३<br><br>कृपणं धर्महीनं च यद् वर्ज्यं यच्च वह्निदम्।<br>चतुर्दशममेवोक्तं नरकं तद् विगर्हितम्॥ १४<br><br>अज्ञानं चाप्यसूयत्वमशौचमशुभावहम्।<br>स्मृतं तत् पञ्चदशममसत्यवचनानि च॥ १५<br><br>आलस्यं वै षोडशममाक्रोशं च विशेषतः।<br>सर्वस्य चाततायित्वमावासेष्वग्निदीपनम्॥ १६धर्म, अर्थ एवं सत्कामनाकी हानि, मोक्षका नाश एवं इनके समन्वयमें विरोध उत्पन्न करनेको तेरहवाँ नरक कहा जाता है। कृपण, धर्महीन, परित्याज्य एवं आग लगानेवालेको चौदहवाँ निन्दित नरक कहते हैं। विवेकहीनता, दूसरेके गुणमें दोष निकालना, अमङ्गल करना, अपवित्रता एवं असत्य वचन बोलनेको पंद्रहवाँ नरक कहते हैं। आलस्य करना, विशेष रूपसे क्रोध करना, सभीके प्रति आततायी बन जाना एवं घरमें आग लगाना सोलहवाँ नरक कहलाता है॥ १३—१६॥
इच्छा च परदारेषु नरकाय निगद्यते।<br>ईर्ष्याभावश्च सत्येषु उद्वृत्तं तु विगर्हितम्॥ १७<br><br>एतैस्तु पापैः पुरुषः पुन्नामाद्यैर्न संशयः।<br>संयुक्तः प्रीणयेद् देवं संतत्या जगतः पतिम्॥ १८<br><br>प्रीतः सृष्ट्या तु शुभया स पापाद् येन मुच्यते।<br>पुन्नामनरकं घोरं विनाशयति सर्वतः॥ १९<br><br>एतस्मात् कारणात् साध्य सुतः पुत्रेति गद्यते।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि शेषपापस्य लक्षणम्॥ २०परस्त्रीकी कामना, सत्यके प्रति ईर्ष्या रखना, निन्दित एवं उद्दण्ड व्यवहार करना नरक देनेवाला कहा गया है। इन पुन्नाम आदि पापोंसे युक्त पुरुष (भी) निस्संदेह 'पुत्र' के द्वारा जगत्पति जनार्दनको प्रसन्न कर सकता है। पापहारी सुसन्ततिसे प्रसन्न होकर भगवान् जनार्दन पुन्नामके घोर नरकको पूर्णतया नष्ट कर देते हैं। साध्य! इसीलिये सुतको 'पुत्र' कहा जाता है। अब इसके बाद मैं शेष पापोंका लक्षण बतलाता हूँ॥ १७—२०॥
ऋणं देवर्षिभूतानां मनुष्याणां विशेषतः।<br>पितॄणां च द्विजश्रेष्ठ सर्ववर्णेषु चैकता॥ २१<br><br>ओंकारादपि निर्वृत्तिः पापकार्यकृतश्च यः।<br>मत्स्यादश्च महापापमगम्यागमनं तथा॥ २२<br><br>घृतादिविक्रयं घोरं चण्डालादिपरिग्रहः।<br>स्वदोषाच्छादनं पापं परदोषप्रकाशनम्॥ २३<br><br>मत्सरित्वं वाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथा परम्।<br>टाकित्वं तालवादित्वं नाम्ना वाचाऽप्यधर्मजम्॥ २४द्विजश्रेष्ठ! देवऋण, ऋषिऋण, प्राणियोंके ग्रहण—विशेषतः मनुष्यों एवं पितरोंका ऋण, सभी वर्णोंको एक समझना, ॐकारके उच्चारणमें उपेक्षा-भाव रखना, पापकामोंका करना, मछली खाना तथा अगम्या स्त्रीसे संगत होना—ये महापाप हैं। घृत-तैल आदिका बेचना, चाण्डाल आदिसे दान लेना, अपना दोष छिपाना और दूसरेका दोष प्रकट करना—ये घोर पाप हैं। दूसरेका उत्कर्ष देखकर जलना, कड़वी बात बोलना, निर्दयपना, नाम कहनेसे भी अधर्मजनक टाकिता और तालवादिता,
२८४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

| दारुणत्वमधार्मिक्यं नरकावहमुच्यते।<br>एतैश्च पापैः संयुक्तः प्रीणयेद् यदि शङ्करम्॥ २५<br><br>ज्ञानाधिकमशेषेण शेषपापं जयेत् ततः।<br>शारीरं वाचिकं यत् तु मानसं कायिकं तथा॥ २६<br><br>पितृमातृकृतं यच्च कृतं यच्चाश्रितैर्नरैः।<br>भ्रातृभिर्बान्धवैश्चापि तस्मिञ्जन्मनि धर्मज॥ २७<br><br>तत्सर्वं विलयं याति स धर्मः सुतशिष्ययोः।<br>विपरीते भवेत् साध्य विपरीतं पदक्रमः॥ २८<br><br>तस्मात् पुत्रश्च शिष्यश्च विधातव्यौ विपश्चिता।<br>एतदर्थमभिध्याय शिष्याच्छ्रेष्ठतरः सुतः।<br>शेषात् तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः॥ २९ | भयङ्करता तथा अधार्मिकताके कार्य नरकके कारण हैं। इन पापोंसे युक्त मनुष्य (भी) यदि परमज्ञानी शङ्करको (अपनी आराधनासे) संतुष्ट कर लेता है तो शेष पापोंको वह पूर्णरूपसे जीत लेता है। धर्मपुत्र! उस जन्ममें किये गये (अपने) सभी कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म तथा माता-पिता एवं आश्रितजनों और भाइयों एवं बान्धवोंद्वारा किये गये कर्म भी विलीन हो जाते हैं। साध्य! सुत और शिष्यका यही धर्म है। इसके विपरीत होनेपर विपरीत गति प्राप्त होती है, अतएव विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि पुत्र और शिष्यकी (परम्परा) बनाये रखे। इसी अभिप्रायकी दृष्टिसे शिष्यकी अपेक्षा पुत्र अत्यन्त श्रेष्ठ होता है कि शिष्य केवल शेष पापोंसे मुक्त करता है और पुत्र सम्पूर्ण पापोंसे बचा लेता है॥ २१—२९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पितामहवचः श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः।<br>त्रिः सत्यं तव पुत्रोऽहं देव योगं वदस्व मे॥ ३०<br><br>तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि।<br>दास्येते च ततः सूनुर्दायादो मेऽसि पुत्रक॥ ३१<br><br>सनत्कुमारः प्रोवाच दायादपरिकल्पना।<br>येयं हि भवता प्रोक्ता तां मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३२<br><br>तदुक्तं साध्यमुख्येन वाक्यं श्रुत्वा पितामहः।<br>प्राह प्रहस्य भगवाञ्शृणु वत्सेति नारद॥ ३३ | पुलस्त्यजी बोले—पितामहकी बात सुनकर साध्य तपोधन सनत्कुमारने कहा—देव! मैं तीन बार सत्यका उच्चारण करके कहता हूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ। अतः मुझे आप योगका उपदेश दीजिये। तब महायोगी पितामहने उनसे कहा—पुत्र! तुम्हारे माता-पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे (स्वत्वप्राप्तिमें अधिकृत) ‘दायाद’ (भागीदार) पुत्र हो जाओगे। सनत्कुमारने कहा—भगवन्! आपने जो यह ‘दायाद’ शब्द कहा है उसका अर्थ क्या है? (कृपया) उसकी विवेचना कीजिये। नारदजी! भगवान् पितामह साध्य-प्रधान सनत्कुमारका वचन सुनकर हँसते हुए बोले—वत्स! सुनो॥ ३०—३३॥ | | ब्रह्मोवाच<br>औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च।<br>गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवास्तु षट्॥ ३४<br><br>अमीषु षट्सु पुत्रेषु ऋणपिण्डधनक्रियाः।<br>गोत्रसाम्यं कुले वृत्तिः प्रतिष्ठा शाश्वती तथा॥ ३५<br><br>कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा।<br>स्वयंदत्तः पारशवः षडदायादबान्धवाः॥ ३६<br><br>अमीभिर्ऋणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते।<br>नामधारका एवेह न गोत्रकुलसंमताः॥ ३७ | ब्रह्माने कहा—औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध—ये छः बान्धव दायाद अर्थात् (दायभागके अधिकारी) होते हैं। इन छः पुत्रोंसे ऋण, पिण्ड, धनकी क्रिया, गोत्रसाम्य, कुलवृत्ति और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है। (इसके अतिरिक्त) कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त और पारशव—ये छः दायाद-बान्धव कहे जाते हैं। इनके द्वारा ऋण एवं पिण्ड आदिका कार्य नहीं होता। ये केवल नामधारी होते हैं। ये गोत्र एवं कुलसे सम्मत नहीं होते॥ ३४—३७॥ |

अध्याय ६१ ]पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन२८५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत् तस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः।<br>उवाचैषां विशेषं मे ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥ ३८<br><br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्विशेषं शृणु पुत्रक।<br>औरसो यः स्वयं जातः प्रतिबिम्बमिवात्मनः॥ ३९<br><br>क्लीबोन्मत्ते व्यसनिनि पत्त्यौ तस्याज्ञया तु या।<br>भार्या ह्यनातुरा पुत्रं जनयेत् क्षेत्रजस्तु सः॥ ४०<br><br>मातापितृभ्यां यो दत्तः स दत्तः परिगीयते।<br>मित्रपुत्रं मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः॥ ४१सनत्कुमारने उनकी बात सुनकर (पुनः) कहा—ब्रह्मन्! आप इन सभीका विशेष लक्षण मुझे बतलाइये। उसके पश्चात् देवोंके स्वामी ब्रह्माने कहा—पुत्र! इन्हें मैं विशेषरूपसे बतलाता हूँ; सुनो—अपने द्वारा उत्पन्न किया गया पुत्र 'औरस' कहलाता है। यह अपना ही प्रतिबिम्ब होता है। पतिके नपुंसक, उन्मत्त (पागल) या व्यसनी होनेपर उसकी आज्ञासे अनातुरा (कामवासनासे रहित) पत्नी जो पुत्र उत्पन्न करती है, उसे 'क्षेत्रज' कहते हैं। माता-पिता यदि दूसरेको अपने पुत्रको सौंप दें तो वह 'दत्तक' (या गोद लिया हुआ) कहा जाता है। श्रेष्ठजन मित्रके पुत्र और मित्रद्वारा दिये गये पुत्रको 'कृत्रिम पुत्र' कहते हैं॥ ३८—४१॥
न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढकः।<br>बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः॥ ४२<br><br>कन्याजातस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढकः।<br>मूल्यैर्गृहीतः क्रीतः स्याद् द्विविधः स्यात्पुनर्भवः॥ ४३<br><br>दत्त्वैकस्य च या कन्या हृत्वाऽन्यस्य प्रदीयते।<br>तज्जातस्तनयो ज्ञेयो लोके पौनर्भवो मुने॥ ४४<br><br>दुर्भिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः।<br>स स्वयंदत्त इत्युक्तस्तथान्यः कारणान्तरैः॥ ४५वह पुत्र 'गूढ' होता है, जिसके विषयमें यह ज्ञान न हो कि गृहमें किसके द्वारा वह उत्पन्न हुआ है। बाहरसे स्वयं लाये हुए पुत्रको 'अपविद्ध' कहते हैं। कुमारी कन्याके गर्भसे उत्पन्न पुत्रका नाम 'कानीन' होता है। गर्भिणी कन्यासे विवाहके बाद उत्पन्न पुत्रको 'सहोढ' कहते हैं। मूल्य देकर खरीदा हुआ पुत्र 'क्रीत' पुत्र कहलाता है। 'पुनर्भव' पुत्र दो प्रकारका होता है। एक कन्याको एक पतिके हाथमें देकर पुनः उससे छीनकर दूसरे पतिके हाथमें देनेपर जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे 'पौनर्भव' पुत्र कहते हैं। दुर्भिक्ष, व्यसन या अन्य किसी कारणसे जो स्वयंको (किसी दूसरेके हाथमें) समर्पित कर देता है उसे 'स्वयंदत्त' पुत्र कहते हैं॥ ४२—४५॥
ब्राह्मणस्य सुतः शूद्रायां जायते यस्तु सुव्रत।<br>ऊढायां वाप्यनूढायां स पारशव उच्यते॥ ४६<br><br>एतस्मात् कारणात् पुत्र न स्वयं दातुमर्हसि।<br>स्वमात्मानं गच्छ शीघ्रं पितरौ समुपाव्हय॥ ४७<br><br>ततः स मातापितरौ सस्मार वचनाद् विभोः।<br>तावाजग्मतुरीशानं द्रष्टुं वै दम्पती मुने॥ ४८<br><br>धर्मोऽहिंसा च देवेशं प्रणिपत्य न्यषीदताम्।<br>उपविष्टौ सुखासीनौ साध्यो वचनमब्रवीत्॥ ४९सुव्रत! ब्याही गयी या क्वाँरी अविवाहित शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणका जो पुत्र होता है उसका नाम 'पारशव' पुत्र है। पुत्र! इन कारणोंसे तुम स्वयं आत्मदान नहीं कर सकते। अतः शीघ्र जाकर अपने माता-पिताको बुला लाओ। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] मुने! इसके बाद सनत्कुमारने विभु ब्रह्माके कहनेसे अपने माता-पिताका स्मरण किया। नारदमुनि! वे दम्पति पितामहका दर्शन करनेके लिये वहाँ आ गये। धर्म और अहिंसा—दोनों ब्रह्माको प्रणाम कर बैठ गये। उनके सुखसे बैठ जानेपर सनत्कुमारने यह वचन कहा॥ ४६—४९॥

| २८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ | | :--- | :--- |

| सनत्कुमार उवाच<br>योगं जिगमिषुस्तात ब्रह्माणं समचूचुदम्।<br>स चोक्तवान् मां पुत्रार्थे तस्मात् त्वं दातुमर्हसि॥ ५०<br>तावेवमुक्तौ पुत्रेण योगाचार्यं पितामहम्।<br>उक्तवन्तौ प्रभोऽयं हि आवयोस्तनयस्तव॥ ५१<br>अद्यप्रभृत्ययं पुत्रस्तव ब्रह्मन् भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा जग्मतुस्तूर्णं येनैवाभ्यागतौ यथा॥ ५२<br>पितामहोऽपि तं पुत्रं साध्यं सद्विनयान्वितम्।<br>सनत्कुमारं प्रोवाच योगं द्वादशपत्रकम्॥ ५३ | सनत्कुमारने कहा—तात! मैंने योग जाननेके लिये पितामहसे प्रार्थना की थी। उन्होंने मुझसे अपना पुत्र होनेके लिये कहा था। अतः आप मुझे प्रदान कर दें। पुत्रके इस प्रकार कहनेपर उन दोनों योगाचार्योंने पितामहसे कहा—प्रभो! हम दोनोंका यह पुत्र आपका हो। ब्रह्मन्! आजसे यह पुत्र आपका होगा। इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्गसे आये थे उसीसे फिर चले गये। पितामहने भी उस विनयी पुत्र सनत्कुमारको द्वादशपत्रयोगका उपदेश किया (जो आगे वर्णित है—)॥ ५०-५३॥ | | शिखासंस्थं तु ओङ्कारं मेषोऽस्य शिरसि स्थितः।<br>मासो वैशाखनामा च प्रथमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५४<br>नकारो मुखसंस्थो हि वृषस्तत्र प्रकीर्तितः।<br>ज्येष्ठमासश्च तत्पत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम्॥ ५५<br>मोकारो भुजयोर्युग्मं मिथुनस्तत्र संस्थितः।<br>मासो आषाढनामा च तृतीयं पत्रकं स्मृतम्॥ ५६<br>भकारं नेत्रयुगलं तत्र कर्कटकः स्थितः।<br>मासः श्रावण इत्युक्तश्चतुर्थं पत्रकं स्मृतम्॥ ५७ | इन (भगवान् वासुदेव)-की शिखामें स्थित 'ओङ्कार', सिरपर स्थित मेष राशि और वैशाखमास—ये इनके प्रथम पत्रक हैं। मुखमें स्थित 'न' अक्षर और वहींपर विद्यमान वृषराशि तथा ज्येष्ठमास—ये उनके द्वितीय पत्रक कहे गये हैं। दोनों भुजाओंमें स्थित 'मो' अक्षर, मिथुनराशि एवं आषाढ़मास—ये उनके तृतीय पत्रक हैं। उनके नेत्रद्वयमें विद्यमान 'भ' अक्षर कर्कराशि और श्रावणमास—ये चतुर्थ पत्रक हैं॥ ५४-५७॥ | | गकारं हृदयं प्रोक्तं सिंहो वसति तत्र च।<br>मासो भाद्रस्तथा प्रोक्तः पञ्चमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५८<br>वकारं कवचं विद्यात् कन्या तत्र प्रतिष्ठिता।<br>मासश्चाश्वयुजो नाम षष्ठं तत् पत्रकं स्मृतम्॥ ५९<br>तेकारमस्त्रग्रामं च तुलाराशिः कृताश्रयः।<br>मासश्च कार्तिको नाम सप्तमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६०<br>वाकारं नाभिसंयुक्तं स्थितस्तत्र तु वृश्चिकः।<br>मासो मार्गशिरो नाम त्वष्टमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६१ | (उनके) हृदयके रूपमें विद्यमान 'ग'अक्षर, सिंहराशि और भाद्रपदमास—ये पञ्चम पत्रक हैं। (उनके) कवचके रूपमें विद्यमान 'व'अक्षर, कन्याराशि और आश्विनमास—ये षष्ठ पत्रक हैं। (उनके) अस्त्र-समूहके रूपमें विद्यमान 'ते'अक्षर, तुलाराशि और कार्तिकमास—ये सप्तम पत्रक हैं। मुने! (उनके) नाभिरूपसे विद्यमान 'वा'अक्षर वृश्चिकराशि और मार्गशीर्षमास—ये अष्टम पत्रक हैं॥ ५८-६१॥ | | सुकारं जघनं प्रोक्तं तत्रस्थश्च धनुर्धरः।<br>पौषेति गदितो मासो नवमं परिकीर्तितम्॥ ६२<br>देकारश्चोरुयुगलं मकरोऽप्यत्र संस्थितः।<br>माघो निगदितो मासः पत्रकं दशमं स्मृतम्॥ ६३<br>वाकारो जानुयुग्मं च कुम्भस्तत्रादिसंस्थितः।<br>पत्रकं फाल्गुनं प्रोक्तं तदेकादशमुत्तमम्॥ ६४<br>पादौ यकारो मीनोऽपि स चैत्रे वसते मुने।<br>इदं द्वादशमं प्रोक्तं पत्रं वै केशवस्य हि॥ ६५ | (उनके) जघनरूपमें विद्यमान 'सु'अक्षर, धनुराशि और पौषमास—ये नवम पत्रक हैं। (उनके) ऊरु-युगलरूपमें विद्यमान 'दे'अक्षर, मकरराशि और माघमास—ये दशम पत्रक हैं। (उनके) दोनों घुटनोंके रूपमें विद्यमान 'वा'अक्षर, कुम्भराशि और फाल्गुनमास—ये एकादश पत्रक हैं। (उनके) चरणद्वयरूपमें विद्यमान 'य'अक्षर, मीनराशि और चैत्रमास—ये द्वादश पत्रक हैं। ये ही केशवके द्वादश पत्र हैं॥ ६२-६५॥ | | द्वादशारं तथा चक्रं षण्णाभि द्वियुतं तथा।<br>त्रिव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः॥ ६६ | उनका चक्र बारह अरों, बारह नाभियों और तीन व्यूहोंसे युक्त है। इस प्रकारकी उन परमेश्वरकी एक |

अध्याय ६१ ] पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन २८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतत् तवोक्तं देवस्य रूपं द्वादशपत्रकम्।<br>यस्मिञ्ज्ञाते मुनिश्रेष्ठ न भूयो मरणं भवेत्॥ ६७<br><br>द्वितीयमुक्तं सत्त्वाढ्यं चतुर्वर्णं चतुर्मुखम्।<br>चतुर्बाहुमुदाराङ्गं श्रीवत्सधरमव्ययम्॥ ६८<br><br>तृतीयस्तामसो नाम शेषमूर्तिः सहस्रपात्।<br>सहस्रवदनः श्रीमान् प्रजाप्रलयकारकः॥ ६९मूर्ति है। मुनिश्रेष्ठ! मैंने तुमसे भगवान्‌के इस द्वादश-पत्रक (‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस) स्वरूपका वर्णन किया, जिसके जाननेसे पुनः (जन्म-) मरण नहीं होता। उनका द्वितीय सत्त्वमय, श्रीवत्सधारी, अविनाशीस्वरूप चतुर्वर्ण, चतुर्मुख, चतुर्बाहु एवं उदार अङ्गोंसे युक्त है। हजारों पैरों एवं हजारों मुखोंसे सम्पन्न श्रीसंयुक्त तमोगुणमयी उनकी तृतीय शेषमूर्ति प्रजाओंका प्रलय करती है॥ ६६—६९॥
चतुर्थो राजसो नाम रक्तवर्णश्चतुर्मुखः।<br>द्विभुजो धारयन् मालां सृष्टिकृच्चादिपूरुषः॥ ७०<br><br>अव्यक्तात् सम्भवन्त्येते त्रयो व्यक्ता महामुने।<br>अतो मरीचिप्रमुखास्तथान्येऽपि सहस्रशः॥ ७१<br><br>एतत् तवोक्तं मुनिवर्य रूपं<br>विभोः पुराणं मतिपुष्टिवर्धनम्।<br>चतुर्भुजं तं स मुरुर्दुरात्मा<br>कृतान्तवाक्यात् पुनराससाद॥ ७२<br><br>तमागतं प्राह मुने मधुघ्नः<br>प्राप्तोऽसि केनासुर कारणेन।<br>स प्राह योद्धुं सह वै त्वयाद्य<br>तं प्राह भूयः सुरशत्रुहन्ता॥ ७३उनका चतुर्थ रूप राजस है। वह रक्तवर्ण, चार मुख एवं दो भुजाओंवाला एवं माला धारण किये हुए है। यही सृष्टि करनेवाला आदिपुरुष रूप है। महामुने! ये तीन व्यक्त मूर्तियाँ अव्यक्त (अदृश्य तत्त्व)-से उत्पन्न होती हैं। इनसे ही मरीचि आदि ऋषि तथा अन्यान्य हजारों पुरुष उत्पन्न हुए हैं। मुनिवर! तुम्हारे सामने मैंने विष्णुके अत्यन्त प्राचीन और मति-पुष्टिवर्द्धक रूपका वर्णन किया है। [अब आगेकी कथा सुनिये—] दुरात्मा मुरु यमराजके कहनेसे पुनः उन चतुर्भुज (विष्णु)-के पास गया। मुने! मधुसूदनने आये हुए उससे पूछा—असुर! तुम किसलिये आये हो? उसने कहा—मैं तुम्हारे साथ आज युद्ध करने आया हूँ। असुरारि (विष्णु)-ने फिर उससे कहा॥ ७०—७३॥
यदीह मां योद्धुमुपागतोऽसि<br>तत् कम्पते ते हृदयं किमर्थम्।<br>ज्वरातुरस्येव मुहुर्मुहुर्वै<br>तन्नास्मि योत्स्ये सह कातरेण॥ ७४<br><br>इत्येवमुक्तो मधुसूदनेन<br>मुरुस्तदा स्वे हृदये स्वहस्तम्।<br>कथं क्व कस्येति मुहुस्तथोक्त्वा<br>निपातयामास विपन्नबुद्धिः॥ ७५<br><br>हरिश्च चक्रं मृदुलाघवेन<br>मुमोच तद्धृत्कमलस्य शत्रोः।<br>चिच्छेद देवास्तु गतव्यथाभवन्<br>देवं प्रशंसन्ति च पद्मनाभम्॥ ७६<br><br>एतत् तवोक्तं मुरदैत्यनाशनं<br>कृतं हि युक्त्या शितचक्रपाणिना।<br>अतः प्रसिद्धं समुपाजगाम<br>मुरारिरित्येव विभुर्नृसिंहः॥ ७७यदि तुम मेरे साथ युद्ध करनेके लिये आये हो तो ज्वरसे पीड़ितके सदृश तुम्हारा हृदय बारंबार क्यों काँप रहा है? मैं तो कातरके साथ युद्ध नहीं करूँगा। मधुसूदनके इस प्रकार कहनेपर ‘कैसे, कहाँ? किसका?’ इस प्रकार बार-बार कहते हुए बुद्धिहीन मुरुने अपने हृदयपर हाथ रखा। इसे देखकर हरिने आसानीसे (अत्यन्त लाघवतासे) चक्र निकाला और उस शत्रुके हृदय-कमलपर उसे छोड़ दिया (जिससे उसका हृदय विदीर्ण हो गया)। उसके बाद सभी देवता सन्तापरहित होकर भगवान् पद्मनाभ विष्णुकी स्तुति करने लगे। मैंने (ब्रह्माने) तुमसे तीक्ष्ण चक्र धारण करनेवाले विष्णुद्वारा (कौशलसे) किये गये दैत्यके विनाशका वर्णन किया। इसीसे विभु नृसिंह ‘मुरारि’ नामसे प्रसिद्ध हुए॥ ७४—७७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इकसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६१॥

२८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६२

बासठवाँ अध्याय

शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच
ततो मुरारिभवनं समभ्येत्य सुरास्ततः।<br>ऊचुर्देवं नमस्कृत्य जगत्संक्षुब्धिकारणम्॥ १<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्राह गच्छामो हरमन्दिरम्।<br>स वेत्स्यति महाज्ञानी जगत्क्षुब्धं चराचरम्॥ २<br><br>तथोक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>जनार्दनं पुरस्कृत्य प्रजग्मुर्मन्दरं गिरिम्।<br>न तत्र देवं न वृषं न देवीं न च नन्दिनम्॥ ३<br><br>शून्यं गिरिमपश्यन्त अज्ञानतिमिरावृताः।<br>तान् मूढदृष्टीन् संप्रेक्ष्य देवान् विष्णुर्महाद्युतिः॥ ४<br><br>प्रोवाच किं न पश्यध्वं महेशं पुरतः स्थितम्।<br>तमूचुर्नैव देवेशं पश्यामो गिरिजापतिम्॥ ५**पुलस्त्यजी (पुनः) बोले—**उन देवोंने विष्णुभवनमें पहुँचकर उन्हें नमस्कार करनेके बाद जगत्‌के अशान्त होनेका कारण पूछा। भगवान् विष्णुने उनके प्रश्नको सुनकर कहा—हम सभी लोग शिवजीके पास चलें। वे महान् ज्ञानी हैं। इस चराचर जगत्‌के व्याकुल होनेका कारण वे जानते होंगे। वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवगण जनार्दन भगवान्‌को आगे कर मन्दरपर्वतपर गये। (किंतु) वहाँ उन्होंने न तो महादेवको देखा, न वृषको, न देवी पार्वती और न नन्दीको ही। अज्ञानके अन्धकारमें पड़े हुए उन लोगोंने पर्वतको देवशून्य देखा। (फिर तो) महातेजस्वी विष्णुने दर्शन प्राप्त न होनेके कारण चकपकाये हुए देवोंको देखकर कहा—क्या आपलोग सामने स्थित महादेवको नहीं देख रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया—हाँ, हमलोग गिरिजापति देवेशको नहीं देख रहे हैं॥ १–५॥
न विद्मः कारणं तच्च येन दृष्टिर्हता हि नः।<br>तानुवाच जगन्मूर्तिर्यूयं देवस्य सागसः॥ ६<br><br>पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्यः स्वार्थतत्पराः।<br>तेन ज्ञानविवेको वै हतो देवेन शूलिना॥ ७<br><br>येनाग्रतः स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यथ।<br>तस्मात् कायविशुद्ध्यर्थं देवदृष्ट्यर्थमादरात्॥ ८<br><br>तप्तकृच्छ्रेण संशुद्धाः कुरुध्वं स्नानमीश्वरे।<br>क्षीरस्नाने प्रयुञ्जीत सार्द्धं कुम्भशतं सुराः॥ ९हमलोग उस कारणको नहीं जानते, जिससे हमारी देखनेकी शक्ति नष्ट हो गयी है। जगन्मूर्ति (विष्णु)-ने उनसे कहा—आपलोगोंनें देवताओंके साथ अपराध किया है। आपलोग स्वार्थी हैं। आपलोग मृडानीका गर्भ नष्ट करनेके कारण महापापसे ग्रस्त हो गये हैं, इसलिये शूलपाणि महादेवने आपलोगोंके सम्यक् अवबोधको और विचारशक्तिको अपहृत कर लिया है। इस कारण आप सब सामने स्थित (शङ्कर)-को देखकर भी नहीं देख रहे हैं। अतः सब लोग विश्वासके साथ शरीरकी पवित्रता और देवका दर्शन प्राप्त करनेके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतद्वारा पावन होकर स्नान करें। और, हे देवताओ! महादेवको दूधसे स्नान करानेके लिये डेढ़ सौ घड़ोंका प्रयोग करें॥ ६–९॥
दधिस्नाने चतुःषष्टिर्द्वात्रिंशद्धविषोऽर्हणे।<br>पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भाः षोडश कीर्तिताः॥ १०उनके अभिषेकके लिये दहीके चौंसठ, घीके बत्तीस पञ्चगव्यके शुद्ध सोलह घड़ोंका विधान कहा गया है।

६४- चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन

अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २८९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मधुंनोऽष्टौ जलस्योक्ताः सर्वे ते द्विगुणाः सुराः।<br>ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि॥ ११<br><br>अनुलिम्पेत् कुङ्कुमेन चन्दनेन च भक्तितः।<br>बिल्वपत्रैः सकमलैः धत्तूरसुरचन्दनैः ॥ १२<br><br>मन्दारैः पारिजातैश्च अतिमुक्तैस्तथाऽर्चयेत् ।<br>अगुरुं सह कालेयं चन्दनेनापि धूपयेत्॥ १३<br><br>जप्तव्यं शतरुद्रीयं ऋग्वेदोक्तैः पदक्रमैः।<br>एवं कृते तु देवेशं पश्यध्वं नेतरेण च॥ १४<br><br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः केशवमब्रुवन् ।<br>विधानं तप्तकृच्छ्रस्य कथ्यतां मधुसूदन।<br>यस्मिंश्चीर्णे कायशुद्धिर्भवते सार्वकालिकी ॥ १५देवताओ ! मधुका स्नान आठ घड़ोंसे तथा जलका स्नान इन सभीके दुगुने (२४०) घड़ोंसे कहा गया है। उसके बाद भक्तिपूर्वक देवको एक सौ आठ बार गोरोचन, कुङ्कुम और चन्दनका लेपन करनेका विधान है। फिर उन्हें भक्तिसे मलयचन्दन लगाना चाहिये। पूरे खिले हुए कमलोंके सहित बिल्वपत्र, धतूर एवं हरिचन्दनसे उनकी अर्चा होनी चाहिये। पूर्ण खिले हुए मन्दार और हरशृङ्गार चढ़ाकर पूजा करनी चाहिये। फिर अगुरु, केशर या काले चन्दन एवं चन्दनसे धूप दे। उसके बाद ऋग्वेदमें कथित 'पद' और 'क्रम' शैलियोंसे शतरुद्रीका जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे आपलोग देवेश्वरका दर्शन कर सकेंगे; अन्य किसी उपायसे नहीं। वासुदेवके ऐसा कहनेपर देवताओंने केशवसे कहा—मधुसूदन ! आप हमें तप्त-कृच्छ्र (-व्रत)-का विधान (भी) बतलाइये, जिसके करनेसे सदाके लिये कायशुद्धि हो जाती है ॥ १०—१५ ॥
वासुदेव उवाच<br>त्र्यहमुष्णं पिबेदापः त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।<br>त्र्यहमुष्णं पिबेत्सर्पिर्वायुभक्षो दिनत्रयम्॥ १६<br>पला द्वादश तोयस्य पलावष्टौ पयसः सुराः।<br>षट्पलं सर्पिषः प्रोक्तं दिवसे दिवसे पिबेत् ॥ १७वासुदेवने कहा—देवताओ ! (तप्त-कृच्छ्र-व्रतका विधान इस प्रकार है—) तीन दिन बारह पल गरम जल पिये, तीन दिन आठ पल गरम दूध पिये, तीन दिन छः पल गरम घी पिये एवं तीन दिन केवल वायु पीकर रहे ॥ १६-१७ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने सुराः कायविशुद्धये ।<br>तप्तकृच्छ्ररहस्यं वै चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥ १८<br>ततो व्रते सुराश्चीर्णे विमुक्ताः पापतोऽभवन्।<br>विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमथाब्रुवन् ॥ १९<br>क्वासौ वद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठति केशव।<br>यं क्षीराद्यभिषेकेण स्नापयामो विधानतः ॥ २०<br>अथोवाच सुरान्विष्णुरेष तिष्ठति शङ्करः ।<br>मद्देहे किं न पश्यध्वं योगश्रयं प्रतिष्ठितः ॥ २१पुलस्त्यजी बोले—इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने शरीरकी शुद्धिके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतका एकान्त अनुष्ठान किया। उसके बाद उस व्रतका पालन हो जानेपर देवता पापसे छूट गये। पापसे छूटकर देवताओंने देवोंके स्वामी वासुदेवसे कहा—जगन्नाथ ! केशव ! आप कृपया यह बतलाइये कि शम्भु किस स्थानपर अवस्थित हैं? जिन्हें हमलोग दूध आदिके अभिषेकसे विधिपूर्वक स्नान करायें। उसके बाद विष्णुने देवताओंसे कहा—देवताओ ! मेरे शरीरमें ये शङ्कर संयुक्त होकर स्थित हैं। क्या आपलोग नहीं देख रहे हैं? ॥ १८—२१ ॥
तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम् ।<br>सत्यं वद सुरेशान महेशानः क्व तिष्ठति ॥ २२<br>ततोऽव्ययात्मा स हरिः स्वहृत्पङ्कजशायिनम्।<br>दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिङ्गमैश्र्वरम्॥ २३<br>ततः सुराः क्रमेणैव क्षीरादिभिरनन्तरम् ।<br>स्त्रापयाञ्चक्रिरे लिङ्गं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ २४उन लोगोंने विष्णुसे कहा कि हमलोग तो आपमें त्रिपुरनाशक शङ्करको नहीं देख रहे हैं। सुरेशान ! आप सच बतलाइये कि महेश किस स्थानपर स्थित हैं। उसके बाद अव्ययात्मा मुरारि विष्णुने देवताओंको अपने हृदयकमलमें विश्राम करनेवाले शङ्करके लिङ्गका दर्शन करा दिया। उसके बाद देवताओंने क्रमशः दूध आदिसे उस नित्य, स्थिर एवं अक्षय लिङ्गको स्नान कराया।
२९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गोरोचनया त्वालिप्य चन्दनेन सुगन्धिना।<br>बिल्वपत्राम्बुजैर्देवं पूजयामासुरञ्जसा ॥ २५फिर उन लोगोंने गोरोचन और सुगन्धित चन्दनका लेपन कर बिल्वपत्रों और कमलोंसे भक्तिपूर्वक (यथाविधि उन) देवकी पूजा की॥ २२—२५॥
प्रधूप्यागुरुणा भक्त्या निवेद्य परमौषधीः।<br>जप्त्वाऽष्टशतनामानं प्रणामं चक्रिरे ततः ॥ २६<br>इत्येवं चिन्तयन्तश्च देवावेतौ हरीश्वरौ।<br>कथं योगत्वमापन्नौ सत्त्वान्धतमसोद्भवौ ॥ २७<br>सुराणां चिन्तितं ज्ञात्वा विश्वमूर्तिर्बभूविभुः।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वायुधधरोऽव्ययः ॥ २८<br>सार्द्धं त्रिनेत्रं कमलाइकुण्डलं<br>जटागुडाकेशखगर्भभव्ध्वजम् ।<br>समाधवं हारभुजङ्गवक्षसं<br>पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥ २९<br>चक्रासिहस्तं हलशार्ङ्गपाणिं<br>पिनाकशूलाजगवान्वितं च।<br>कपर्दखट्वाङ्गकपालघण्टा-<br>सशङ्खटङ्काररवं महर्षे ॥ ३०<br>दृष्ट्वैव देवा हरिशङ्करं तं<br>नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति।<br>प्रोक्त्वा प्रणामं कमलासनाद्या-<br>श्चकुर्मतिं चैकतरां नियुज्य ॥ ३१उसके बाद देवोंने प्रेमपूर्वक धूप-दानकर परमौषधियों (भङ्ग आदि)-को समर्पित किया। फिर (शङ्करके) एक सौ आठ नामोंका जप करनेके बाद उन्हें प्रणाम किया। सभी देवता यह विचारने लगे कि सत्त्वगुणकी प्रधानतासे विष्णु एवं तमोगुणकी अधिकतासे आविर्भूत शिवमें एकता किस प्रकार हुई? देवताओंके विचारको जानकर अविनाशी व्यापक भगवान् सभी (शुभ) लक्षणोंसे युक्त एवं सब प्रकारके आयुधोंको धारण करनेवाले विश्वमूर्ति हो गये। महर्षे! फिर तो देवताओंने एक ही शरीरमें कानमें सर्पके कुण्डल पहने, सिरपर आपसमें चिपके लंबे बालके जटाजूट बाँधे, गलेमें सर्पके हार लटकाये, हाथमें पिनाक, शूल, आजगव धनुष, खट्वाङ्ग धारण किये तथा घण्टासे युक्त वाघाम्बर धारण करनेवाले त्रिनेत्रधारी वृषभध्वज महादेव और साथ ही कमलके कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीताम्बर पहने, हाथोंमें चक्र, असि, हल, शार्ङ्गधनुष, टंकार-सी ध्वनि करनेवाले शङ्खको लिये गुडाकेश विष्णुको देखा। उसके बाद 'सर्वव्यापी अविनाशी प्रभुको नमस्कार है'—इस प्रकार कहकर ब्रह्मा आदि देवताओंने उन हरि एवं शङ्करको एक रूप (अभिन्न) समझा॥ २६—३१॥
तानेकचित्तान् विज्ञाय देवान् देवपतिर्हरिः।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवत्तूर्णं कुरुक्षेत्रं स्वमाश्रमम् ॥ ३२<br>ततोऽपश्यन्त देवेशं स्थाणुभूतं जले शुचिम्।<br>दृष्ट्वा नमः स्थाणवेति प्रोक्त्वा सर्वे ह्युपाविशन् ॥ ३३<br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिरेहोहि दीयतां वरः।<br>क्षुब्धं जगज्जगन्नाथ उन्मज्जस्व प्रियातिथे ॥ ३४<br>ततस्तां मधुरां वाणीं शुश्राव वृषभध्वजः।<br>श्रुत्वोत्तस्थौ च वेगेन सर्वव्यापी निरञ्जनः ॥ ३५<br>नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यः प्रोवाच प्रहसन् हरः।<br>स चागतः सुरैः सेन्द्रैः प्रणतौ विनयान्वितैः ॥ ३६देवोंके स्वामी भगवान् विष्णु उन देवताओंको समान हृदयवाला समझ उन्हें साथ लेकर शीघ्र अपने आश्रम कुरुक्षेत्रमें चले गये। उसके बाद उन लोगोंने जलके भीतर पवित्र स्थाणुभूत उन देवेश (महादेव)-को देखा। उन्हें देखकर 'स्थाणवे नमः' (स्थाणुको नमस्कार है)—यह कहकर वे सभी (वहीं) बैठ गये। उसके बाद इन्द्रने कहा—जगन्नाथ! अतिथप्रिय! संसार अशान्त हो उठा है। आप (कृपया) बाहर निकलकर यहाँ आइये, यहाँ आइये (और आकर) हमें वर दीजिये। उसके बाद वृषकेतु महादेवने वह मधुर वाणी सुनी। फिर उसे सुनकर वे सर्वव्यापी परमविशुद्ध शङ्कर वेगसे उठ खड़े हुए। उन्होंने हँसते हुए 'सभी देवताओंको नमस्कार है' ऐसा कहा। इन्द्र आदि देवताओंने जलसे ऊपर आये हुए उन शङ्करको और अधिक विनयभावसे प्रणाम किया॥ ३२—३६॥

अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २९१

तमूचुर्देवताः सर्वास्त्यज्यतां शङ्कर द्रुतम्।<br>महाव्रतं त्रयो लोकाः क्षुब्धास्त्वत्तेजसावृताः॥ ३७<br><br>अथोवाच महादेवो मया त्यक्तो महाव्रतः।<br>ततः सुरा दिवं जग्मुर्हृष्टाः प्रयतमानसाः॥ ३८<br><br>ततोऽपि कम्पते पृथ्वी साब्धिद्वीपाचला मुने।<br>ततोऽभिचिन्तयद्रुद्रः किमर्थं क्षुभिता मही॥ ३९<br><br>ततः पर्यचरच्छूली कुरुक्षेत्रं समन्ततः।<br>ददर्शौघवतीतीरे उशनसं तपोनिधिम्॥ ४०<br><br>ततोऽब्रवीत्सुरपतिः किमर्थं तप्यते तपः।<br>जगत्क्षोभकरं विप्र तच्छीघ्रं कथ्यतां मम॥ ४१सभी देवताओेंने उनसे कहा कि शंकर! कृपया महाव्रतको शीघ्र छोड़ दीजिये। आपके तेजसे व्याप्त होकर तीनों लोक क्षुब्ध हो गये हैं। उसके बाद महादेवने कहा कि (लीजिये), मैंने महाव्रतका त्याग कर दिया। तत्पश्चात् देवता प्रसन्न हो गये और शान्तचित्त होकर स्वर्ग चले गये। मुने! तो भी समुद्र, द्वीप और पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही थी। तब (स्वयं) रुद्रने सोचा कि (अब) पृथ्वी क्यों क्षुब्ध हो रही है? फिर त्रिशूल धारण करनेवाले (शङ्कर) कुरुक्षेत्रके चारों ओर विचरण करने लगे। उन्होंने ओघवतीके किनारे (तपस्या करते) तपोनिधि उशनाको देखा। उसके बाद देवाधिदेव शंकरने उनसे कहा—विप्र! आप जगत्को क्षुब्ध करनेवाला तप क्यों कर रहे हैं? उसे मुझे शीघ्र बतलाइये॥ ३७—४१॥
उशना उवाच<br>तवाराधनकामार्थं तप्यते हि महत्तपः।<br>संजीवनीं शुभां विद्यां ज्ञातुमिच्छे त्रिलोचन॥ ४२उशनाने कहा— आपकी आराधना (प्रसन्नता-प्राप्ति)-की इच्छासे मैं महान् तप कर रहा हूँ। त्रिनयन! मैं मङ्गलमयी संजीवनी विद्याको जानना चाहता हूँ॥ ४२॥
हर उवाच<br>तपसा परितुष्टोऽस्मि सुतप्तेन तपोधन।<br>तस्मात् संजीवनीं विद्यां भवाञ्ज्ञास्यति तत्त्वतः॥ ४३<br><br>वरं लब्ध्वा ततः शुक्रस्तपसः संन्यवर्त्तत।<br>तथापि चलते पृथ्वी साब्धिभूभृन्नगावृता॥ ४४<br><br>ततोऽगमन्महादेवः सप्तसारस्वतं शुचिः।<br>ददर्श नृत्यमानं च ऋषिं मङ्कणसंज्ञितम्॥ ४५<br><br>भावेन पोप्लूयति बालवत् स<br>भुजौ प्रसार्यैव ननर्त्त वेगात्।<br>तस्यैव वेगेन समाहता तु<br>चचाल भूभूमिधरैः सहैव॥ ४६महादेवने कहा— तपोधन! मैं भलीभाँति की गयी आपकी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। इसलिये आप संजीवनी विद्याको यथार्थरूपमें जान जायेंगे। शुक्र (शुक्राचार्य) वर पाकर तपस्यासे विरत हो गये। फिर भी सागर, पर्वत, वृक्ष आदिके साथ सारी पृथ्वी काँप रही थी। उसके बाद परमपावन महादेव सप्तसारस्वतमें गये। वहाँ उन्होंने मङ्कण नामके महर्षिको नाचते हुए देखा। वे बालकके समान भाव-विभोर होकर दोनों हाथ फैलाकर वेगसे (उछल-उछलकर) नाच रहे थे। उसके (उछलनेके) वेगसे आहत हो पृथ्वी पर्वतोंसहित बड़े जोरसे काँप रही थी—हिल रही थी॥ ४३—४६॥
तं शङ्करोऽभ्येत्य करे निगृह्य<br>प्रोवाच वाक्यं प्रहसन् महर्षे।<br>किं भावितो नृत्यसि केन हेतुना<br>वदस्व मामेत्य किमत्र तुष्टिः॥ ४७<br><br>स ब्राह्मणः प्राह ममाद्य तुष्टि-<br>र्यैनेह जाता शृणु तद् द्विजेन्द्र।<br>बहून् गणान् वै मम तप्यतस्तपः<br>संवत्सरान् कायविशोषणार्थम्॥ ४८<br><br>ततोऽनुपश्यामि करात् क्षतोत्थं<br>निर्गच्छते शाकरसं ममेह।शंकरने उनके पास जाकर एवं उनका हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा—महर्षे! किस भावनासे प्रभावित होकर एवं किस कारणसे आप नाच रहे हैं? आप (मेरे पास) आकर मुझसे यह बतलाइये कि आपको इस विषयमें क्यों संतुष्टि है? उस ब्राह्मणने कहा—द्विजेन्द्र! आज मुझे जिस कारणसे प्रसन्नता हो रही है, उसे सुनिये। शरीरको दुर्बल करनेके लिये तपस्या करते हुए मेरे अनेक वर्ष बीत गये हैं। अब मैं देखता हूँ कि मेरे हाथके घावसे शाकरस निकल रहा है।
२९२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६२

| तेनाद्य तुष्टोऽस्मि भृशं द्विजेन्द्र<br>येनास्मि नृत्यामि सुभावितात्मा ॥ ४९<br>तं प्राह शम्भुर्द्विज पश्य मह्यं<br>भस्म प्रवृत्तोऽङ्गुलितोऽतिशुक्लम् ।<br>संताडनादेव न च प्रहर्षो<br>ममास्ति नूनं हि भवान् प्रमत्तः ॥ ५० | द्विजेन्द्र ! इसी कारण मुझे बहुत आनन्द मिल रहा है और मैं भावविभोर होकर नृत्य कर रहा हूँ। शम्भुने उनसे कहा—द्विज ! मुझे देखो। चोट करनेसे ही मेरी अङ्गुलिसे अत्यन्त स्वच्छ सफेद भस्म निकल रहा है, परंतु इससे मुझे तो उत्कृष्ट प्रसन्नता नहीं होती। आप निश्चय ही उन्मत्त हो गये हैं ॥ ४७-५० ॥ | | श्रुत्वाऽथ वाक्यं वृषभध्वजस्य<br>मत्वा मुनिर्मङ्कणको महर्षे ।<br>नृत्यं परित्यज्य सुविस्मितोऽथ<br>ववन्द पादौ विनयावनम्रः ॥ ५१<br>तमाह शम्भुर्द्विज गच्छ लोकं<br>तं ब्रह्मणो दुर्गममव्ययस्य ।<br>इदं च तीर्थं प्रवरं पृथिव्यां<br>पृथूदकस्यास्तु समं फलेन ॥ ५२<br>सांनिध्यमत्रैव सुरासुराणां<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणाम् ।<br>सदाऽस्तु धर्मस्य निधानमग्र्यं<br>सारस्वतं पापमलापहारि ॥ ५३<br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च सुवेणुर्विमलोदका ।<br>मनोहरा चौघवती विशाला च सरस्वती ॥ ५४<br>एताः सप्त सरस्वत्यो निवसिष्यन्ति नित्यशः ।<br>सोमपानफलं सर्वाः प्रयच्छन्ति सुपुण्यदाः ॥ ५५ | महर्षे ! शंकरकी बात सुनकर और उसे मानकर मङ्कणक मुनिने नृत्य करना छोड़ दिया और आश्चर्यसहित तथा विनम्र भावसे झुककर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। शम्भुने उनसे कहा—द्विज ! तुम अविनाशी ब्रह्मके दुर्गम लोकको जाओ। और, यह श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकतीर्थके सदृश पृथ्वीमें फल देनेवाला प्रसिद्ध होगा। सुर, असुर, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरलोग सदा यहाँ उपस्थित रहेंगे। यह श्रेष्ठ 'सारस्वत' तीर्थ सदा धर्मका निधान एवं पाप-मलका अपहरण करनेवाला होगा। यहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, सुवेणु, विमलोदका, मनोहरा, ओघवती, विशाला, सरस्वती नामकी सात नदियाँ नित्य निवास करेंगी। ये सभी पुण्य प्रदान करनेवाली नदियाँ यज्ञीय सोमरसके पीनेसे होनेवाले फलको देनेवाली हैं ॥ ५१-५५ ॥ | | भवानपि कुरुक्षेत्रे मूर्तिं स्थाप्य गरीयसीम् ।<br>गमिष्यति महापुण्यं ब्रह्मलोकं सुदुर्गमम् ॥ ५६<br>इत्येवमुक्तो देवेन शङ्करेण तपोधनः ।<br>मूर्तिं स्थाप्य कुरुक्षेत्रे ब्रह्मलोकमगाद् वशी ॥ ५७<br>गते मङ्कणके पृथ्वी निश्चला समजायत ।<br>अथागान्मन्दरं शम्भुर्निजमावसथं शुचिः ॥ ५८<br>एतत् तवोक्तं द्विज शङ्करस्तु<br>गतस्तदासीत् तपसेऽथ शैले ।<br>शून्येऽभ्यगाद् दुष्टमतिर्हि देव्या<br>संयोधितो येन हि कारणेन ॥ ५९ | तुम भी कुरुक्षेत्रमें अत्यन्त उत्तम मूर्ति स्थापित करके परम पवित्र सुदुर्गम ब्रह्मलोकमें जाओगे। महादेवके इस प्रकार कहनेपर जितेन्द्रिय तपस्वी मङ्कणक ऋषि कुरुक्षेत्रमें मूर्ति स्थापित करके ब्रह्मलोक चले गये। मङ्कणक ऋषिके चले जानेपर पृथ्‍वी शान्त हो गयी। महादेव भी अपने पवित्र निवास-स्थान मन्दर-पर्वतपर चले गये। (पुलस्त्यजीने कहा—) द्विज ! मैंने तुमसे यह बतलाया कि उस समय शङ्करके तपस्या-हेतु जानेके कारण शून्य (उनकी उपस्थितिसे रहित) पर्वतपर जाकर दुष्टमति (अन्धक)-ने जिस कारणसे देवीसे युद्ध किया ॥ ५६-५९ ॥ |

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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बासठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६२ ॥


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अध्याय ६३ ] अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन २९३


तिरसठवाँ अध्याय

अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारद उवाच<br>गतोऽन्धकस्तु पाताले किमचेष्टत दानवः।<br>शङ्करो मन्दरस्थोऽपि यच्चकार तदुच्यताम्॥ १नारदजीने पूछा— मुने! अन्धक दानवने पातालमें जाकर क्या किया? शङ्करने मन्दरपर्वतपर रहकर जो कुछ किया उसे भी बतलाइये॥ १॥
पुलस्त्य उवाच<br>पातालस्थोऽन्धको ब्रह्मन् बाध्यते मदनाग्निना।<br>संतप्तविग्रहः सर्वान् दानवानिदमब्रवीत्॥ २<br>स मे सुहृत्स मे बन्धुः स भ्राता स पिता मम।<br>यस्तामद्रिसुतां शीघ्रं ममान्तिकमुपानयेत्॥ ३<br>एवं ब्रुवति दैत्येन्द्रं अन्धके मदनान्धके।<br>मेघगम्भीरनिर्घोषं प्रह्लादो वाक्यमब्रवीत्॥ ४<br>येयं गिरिसुता वीर सा माता धर्मतस्तव।<br>पिता त्रिनयनो देवः श्रूयतामत्र कारणम्॥ ५पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! पातालमें रहता हुआ अन्धक कामाग्निसे दुःखी हो गया; उसका शरीर सन्तप्त होने लगा। उसने सभी दानवोंसे यह कहा— (दानवो!) वही मेरा मित्र, वही मेरा बन्धु, वही भाई और वही पिता है, जो उस पर्वतपुत्रीको मेरे पास शीघ्र ला दे। कामसे अधीर हुए दैत्येन्द्र अन्धकके ऐसा कहनेपर प्रह्लादने बादलके समान गम्भीर शब्दमें कहा— वीर! ये जो गिरिजा हैं, वे धर्मतः तुम्हारी माता हैं और त्रिलोचन शङ्कर तुम्हारे पिता हैं; इसका जो कारण है, उसे तुम सुनो— ॥ २–५ ॥
तव पित्रा ह्यपुत्रेण धर्मनित्येन दानव।<br>आराधितो महादेवः पुत्रार्थाय पुरा किल॥ ६<br>तस्मै त्रिलोचनेनासीद् दत्तोऽन्धोऽप्येव दानव।<br>पुत्रकः पुत्रकामस्य प्रोक्त्वेत्थं वचनं विभो॥ ७<br>नेत्रत्रयं हिरण्याक्ष नर्मार्थमुमया मम।<br>पिहितं योगसंस्थस्य ततोऽन्धमभवत्तमः॥ ८<br>तस्माच्च तमसो जातो भूतो नीलघनस्वनः।<br>तदिदं गृह्यतां दैत्य तवौपयिकमात्मजम्॥ ९दानव! पहले समयमें धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाले पुत्रहीन तुम्हारे पिताने पुत्रकी कामनासे महादेवकी आराधना की थी। दानव! त्रिलोचन शङ्करने पुत्रकी कामनावाले उसको अन्ध पुत्र दिया और यह कहा कि शक्तिशाली हिरण्याक्ष! एक समय मैं योगमें स्थित था और उमाने परिहासार्थ मेरे तीनों नेत्रोंको बन्द कर दिया था। उसके बाद अन्धकारस्वरूप तम उत्पन्न हुआ। उस तमसे नीले मेघके समान शब्द करनेवाला एक भूत (प्राणी) उत्पन्न हुआ। दैत्य! तुम इसे ग्रहण करो। यह तुम्हारे योग्य पुत्र है॥ ६–९॥
यदा तु लोकविद्विष्टं दुष्टं कर्म करिष्यति।<br>त्रैलोक्यजननीं चापि अभिवाञ्छिष्यतेऽधमः॥ १०<br>घातयिष्यति वा विप्रं यदा प्रक्षिप्य चासुरान्।<br>तदास्य स्वयमेवाहं करिष्ये कायशोधनम्॥ ११<br>एवमुक्त्वा गतः शम्भुः स्वस्थानं मन्दराचलम्।<br>त्वत्पिताऽपि सम्भ्यागात् त्वामादाय रसातलम्॥ १२<br>एतेन कारणेनाम्बा शैलेयी भविता तव।<br>सर्वस्यापीह जगतो गुरुः शम्भुः पिता ध्रुवम्॥ १३(किंतु) यह अधम जब संसारके विरोधमें बुरा कर्म करेगा तथा त्रैलोक्य-जननीकी चाह करेगा अथवा असुरोंको भेजकर जब यह विप्रोंका वध करायेगा, तब मैं स्वयं इसके शरीरकी शुद्धि करूँगा। ऐसा कहकर शम्भु अपने स्थान मन्दराचलपर चले गये और तुम्हारे पिता तुमको लेकर रसातलमें चले आये। इसी कारण शैलपुत्री तुम्हारी माता एवं समस्त जगत्के गुरु शम्भु निश्चय ही तुम्हारे पिता हैं॥ १०–१३॥
भवानपि तपोयुक्तः शास्त्रवेत्ता गुणाप्लुत:।<br>नेदृशे पापसंकल्पे मतिं कुर्याद् भवद्विधः॥ १४आप भी तपस्या करनेवाले एवं शास्त्रके ज्ञाता तथा अनेक अलौकिक गुणोंसे भूषित हो। अतः आप-जैसे पुरुषको इस प्रकारके पाप करनेमें मानसिक निश्चय भी

६५- गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त, जाबालिकी जटाओंसे मुक्ति, विश्वकर्माकी शाप-मुक्ति, इन्द्रद्युम्नादिका सप्तगोदावरमें आना, शिव-स्तुति, सप्तगोदावरमें सम्मेलन, कन्याओंका विवाह

२९४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रैलोक्यप्रभुरव्यक्तो भवः सर्वैर्नमस्कृतः।<br>अजेयस्तस्य भार्येयं न त्वमर्होऽमरार्दन ॥ १५<br><br>न चापि शक्तः प्राप्तुं तां भवाच्छैलनृपात्मजाम्।<br>अजित्वा सगणं रुद्रं स च कामोऽद्य दुर्लभः ॥ १६<br><br>यस्तरेत् सागरं दोर्भ्यां पातयेद् भुवि भास्करम्।<br>मेरुमुत्पाटयेद् वापि स जयेच्छूलपाणिनम् ॥ १७नहीं करना चाहिये। हे देवताओंको कष्ट देनेवाले (अमर्दन!), तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले और सबसे वन्दित अव्यक्त भगवान् शङ्कर (सर्वथा) अजेय हैं। उनकी ये भार्या हैं। तुम न तो इनके योग्य हो और न समर्थ ही। गणोंके सहित शङ्करको बिना जीते तुम उस पर्वतराजकी कन्याको प्राप्त करना चाहते हो, सो तो यह मनोरथ पूरा होना कठिन है। शूलपाणि शङ्करको वही जीत सकता है, जो अपनी भुजाओंसे समुद्रको पार कर जाय अथवा सूर्यको पृथ्वीपर गिरा दे या मेरु पर्वतको उखाड़ दे॥ १४-१७॥
उताहोस्विदिमाः शक्त्याः क्रियाः कर्तुं नरैर्बलात्।<br>न च शक्यो हरो जेतुं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ १८<br><br>किं त्वया न श्रुतं दैत्य यथा दण्डो महीपतिः।<br>परस्त्रीकामवान् मूढः सराष्ट्रो नाशमाप्तवान् ॥ १९<br><br>आसीद् दण्डो नाम नृपः प्रभूतबलवाहनः।<br>स च वव्रे महातेजाः पौरोहित्याय भार्गवम् ॥ २०<br><br>ईजे च विविधैर्यज्ञैर्नृपतिः शुक्रपालितः।<br>शुक्रस्यासीच्च दुहिता अरजा नाम नामतः ॥ २१उपर्युक्त सभी कार्य भले ही मनुष्य बलसे कर ले, किंतु शङ्कर नहीं जीते जा सकते; यह मैंने सच-सच कह दिया है। दैत्य! क्या तुमने यह नहीं सुना है कि परस्त्रीकी अभिलाषा करनेवाला दण्ड नामका मूर्ख राजा अपने राष्ट्रके साथ विनष्ट हो गया। (सुनो, प्राचीन कालमें) प्रचुर सेना एवं वाहनोंसे भरा-पूरा दण्ड नामका एक राजा था। उस महातेजस्वीने पुरोहितके स्थानपर शुक्राचार्यको वृत किया था। शुक्राचार्यके निर्देशनमें उस राजाने भाँति-भाँतिके यज्ञोंका अनुष्ठान किया। शुक्राचार्यकी अरजा नामकी एक कन्या थी॥ १८-२१॥
शुक्रः कदाचिदगमद् वृषपर्वाणमासुरम्।<br>तेनार्चितश्चिरं तत्र तस्थौ भार्गवसत्तमः ॥ २२<br><br>अरजा स्वगृहे वह्निं शुश्रूषन्ती महासुर।<br>अतिष्ठत सुचार्वङ्गी ततोऽभ्यगान्नराधिपः ॥ २३<br><br>स पप्रच्छ क्व शुक्रेति तमूचुः परिचारिकाः।<br>गतः स भगवान् शुक्नो याजनाय दनोः सुतम् ॥ २४<br><br>पप्रच्छ नृपतिः का तु तिष्ठते भार्गवाश्रमे।<br>तास्तमूचुर्गुरोः पुत्री संतिष्ठत्यरजा नृप ॥ २५किसी समय शुक्राचार्य वृषपर्वा नामके असुरके पास गये हुए थे। भार्गव वंशमें श्रेष्ठ वे (शुक्र) उससे पूजित-सत्कृत होकर बहुत समयतक वहीं रुके रह गये। महासुर! सुन्दरी अरजा अपने घरमें अग्निकी सेवा-हवनादि कार्य करती हुई रह गयी थी। इतनेमें एक दिन राजा दण्ड वहाँ पहुँच गया। उसने पूछा—शुक्राचार्य कहाँ हैं? घरकी सेविकाओंने उससे कहा—वे भगवान् शुक्र दनुनन्दन (वृषपर्वा)-के यहाँ यज्ञ कराने गये हैं। राजाने पूछा—शुक्राचार्यके आश्रममें (यह) कौन स्त्री रह रही है। उन लोगोंने उत्तर दिया—राजन्! (यह) गुरुजीकी कन्या अरजा है॥ २२-२५॥
तामाश्रमे शुक्रसुतां द्रष्टुमैक्ष्वाकुनन्दनः।<br>प्रविवेश महाबाहुर्ददर्शारजसं ततः ॥ २६<br><br>तां दृष्ट्वा कामसंतप्तस्तत्क्षणादेव पार्थिवः।<br>संजातोऽन्धक दण्डस्तु कृतान्तबलचोदितः ॥ २७<br><br>ततो विसर्जयामास भृत्यान् भ्रातॄन् सुहृत्तमान्।<br>शुक्रशिष्यानपि बली एकाकी नृप आव्रजत् ॥ २८<br><br>तमागतं शुक्रसुता प्रत्युत्थाय यशस्विनी।<br>पूजयामास संहृष्टा भ्रातृभावेन दानव ॥ २९महाबाहु इक्ष्वाकुनन्दन (दण्ड) शुक्राचार्यकी उस कन्याको देखनेके लिये आश्रममें प्रविष्ट हुआ और उसने अरजाको देखा। अन्धक! कालबलसे प्रेरित होकर राजा उसे देखकर तत्काल ही कामसे पीड़ित हो गया। उसके बाद बलवान् राजाने भृत्यों, भाइयों, घनिष्ठ मित्रों एवं शुक्राचार्यके शिष्योंको भी (वहाँसे) हटा दिया और (वहाँ) अकेला आ गया। शुक्राचार्यकी यशस्विनी कन्याने आये हुए उस राजाका भ्रातृभावसे प्रसन्नतापूर्वक स्वागत-सत्कार किया॥ २६-२९॥
अध्याय ६३]अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन२९५
ततस्तामाह नृपतिर्बाले कामाग्नितापितम्।<br>मां समाह्लादयस्वाद्य स्वपरिष्वङ्गवारिणा॥ ३०<br><br>साऽपि प्राह नृपश्रेष्ठ मा विनीनश आतुरः।<br>पिता मम महाक्रोधात् त्रिदशानपि निर्दहेत्॥ ३१<br><br>मूढबुद्धे भवान् भ्राता ममासि त्वनयाप्लुतः।<br>भगिनी धर्मतस्तेऽहं भवाञ्छिष्यः पितुर्मम॥ ३२<br><br>सोऽब्रवीद् भीरु मां शुक्रः कालेन परिधक्ष्यति।<br>कामाग्निर्निर्दहति मामद्यैव तनुमध्यमे॥ ३३उसके बाद राजाने उससे पूछा—बाले! मैं कामाग्निसे संतप्त हूँ। आज तुम अपने आलिङ्गनकूपी जलसे मुझे आनन्दित करो। वह (अरजा) बोली—नरपतिप्रवर! (कामसे) अधीर होकर अपनेको विनष्ट मत करो। मेरे पिता अपने महान् क्रोधसे देवताओंको भी भस्म कर सकते हैं। मूढबुद्धे! तुम मेरे भाई हो। परंतु अनीतिसे ओतप्रोत हो गये हो। मैं धर्मसे तुम्हारी बहन हूँ; क्योंकि तुम मेरे पिताके शिष्य हो। उस (दण्डक)-ने कहा—भीरु! शुक्र (भविष्यमें) किसी समय मुझे जला देंगे; परंतु कृशोदरि! कामकी आग तो मुझे आज ही (अभी) जलाये जा रही है॥ ३०-३३॥
सा प्राह दण्डं नृपतिं मुहूर्तं परिपालय।<br>तमेव याचस्व गुरुं स ते दास्यत्यसंशयम्॥ ३४<br><br>दण्डोऽब्रवीत् सुतन्वङ्गि कालक्षेपो न मे क्षमः।<br>च्युतावसरकर्तृत्वे विघ्नो जायेत सुन्दरि॥ ३५<br><br>ततोऽब्रवीच्च विरजा नाहं त्वां पार्थिवात्मज।<br>दातुं शक्ता स्वमात्मानं स्वतन्त्रा न हि योषितः॥ ३६<br><br>किं वा ते बहुनोक्तेन मा त्वं नाशं नराधिप।<br>गच्छस्व शुक्रशापेन सभृत्यज्ञातिबान्धवः॥ ३७उस (अरजा)-ने राजा दण्डसे कहा—राजन्! एक क्षण प्रतीक्षा करो। तुम उन गुरुसे ही याचना करो। वे तुम्हें निःसन्देह मुझको दे देंगे। दण्डने कहा—सुन्दरि! मैं समयकी प्रतीक्षा करनेमें असमर्थ हूँ। बहुधा अवसर चूक जानेपर कार्यमें विघ्न हो जाया करता है। उसके बाद अरजाने कहा—राजपुत्र! मैं स्वयं अपनेको तुम्हें अर्पित करनेमें समर्थ नहीं हूँ; क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होतीं। अथवा नरपते! तुमसे अधिक कहनेसे क्या (लाभ); (बस मैं इतना ही कहती हूँ कि इस असत् प्रस्तावके कारण—) तुम शुक्राचार्यके शापसे भृत्य, जाति और बन्धुओंके साथ अपना विनाश मत करो॥ ३४-३७॥
ततोऽब्रवीन्ररपतिः सुतनु शृणु चेष्टितम्।<br>चित्राङ्गदाया यद् वृत्तं पुरा देवयुगे शुभे॥ ३८<br><br>विश्वकर्मसुता साध्वी नाम्ना चित्राङ्गदाऽभवत्।<br>रूपयौवनसम्पन्ना पद्महीनेव पद्मिनी॥ ३९<br><br>सा कदाचिन्महारण्यं सखीभिः परिवारिता।<br>जगाम नैमिषं नाम स्नातुं कमललोचना॥ ४०<br><br>सा स्नातुमवतीर्णा च अथाभ्यागान्न्ररेश्वरः।<br>सुदेवतनयो धीमान् सुरथो नाम नामतः।<br>तां ददर्श च तन्वङ्गीं शुभाङ्गो मदनातुरः॥ ४१उसके बाद राजाने कहा—सुन्दरि! प्राचीन कालमें—पवित्र देवयुगमें घटित चित्राङ्गदाका एक वृत्तान्त सुनो। विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामकी एक साध्वी कन्या थी। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न मानो कमलसे रहित कमलिनी थी। कमलके समान नेत्रोंवाली वह किसी समय अपनी सखियोंसे घिरी हुई—सखियोंके साथ नैमिष नामके महारण्यमें स्नान करनेके लिये गयी। वह स्नान करनेके लिये जलमें जैसे ही उतरी, वैसे ही सुदेवके पुत्र बुद्धिमान् राजा सुरथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने उस कृशाङ्गीको देखा। सुन्दर शरीरवाले वे उसे देखकर कामातुर हो गये॥ ३८-४१॥
तं दृष्ट्वा सा सखीराह वचनं सत्यसंयुक्तम्।<br>असौ नराधिपसुतो मदनेन कदर्यते॥ ४२उनको देखकर उस (चित्राङ्गदा)-ने अपनी सखियोंसे सत्य (छिपावरहित) वचन कहा—यह राजपुत्र मेरे ही लिये कामपीड़ित होकर कष्ट पा रहा है। अतः मुझे यह
२९६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मदर्थे च क्षमं मेऽस्य स्वप्रदानं सुरूपिणः।<br>सख्यस्तामब्रुवन् बाला न प्रगल्भाऽसि सुन्दरि॥ ४३<br>अस्वातन्त्र्यं तवास्तीह प्रदाने स्वात्मनोऽनघे।<br>पिता तवास्ति धर्मिष्ठः सर्वशिल्पविशारदः ॥ ४४<br>न ते युक्तमिहात्मानं दातुं नरपतेः स्वयम्।<br>एतस्मिन्नन्तरे राजा सुरथः सत्यवाक् सुधीः ॥ ४५<br>समभ्येत्याऽब्रवीदेनां कन्दर्पशरपीडितः ।<br>त्वं मुग्धे मोहयसि मां दृष्ट्यैव मदिरेक्षणे ॥ ४६उचित (प्रतीत होता) है कि इस सौन्दर्यशाली व्यक्तिको मैं अपनेको समर्पित कर दूँ। उसकी 'बाला' सहेलियोंने उससे कहा कि सुन्दरि! तुम सयानी (वयस्का) नहीं हो। निष्पाप बालिके! स्वयंको दान करनेमें तुम्हें स्वतन्त्रता नहीं है; तुम्हारे पिता परम धार्मिक हैं और सभी शिल्पकर्मोंमें परम निपुण हैं, इसलिये यहाँ तुम्हें अपनेको राजाके लिये (दान) दे देना ठीक नहीं है। इसी बीच कामबाणसे पीड़ित सत्यवक्ता बुद्धिमान् सुरथने उसके पास आकर कहा—मुग्धे! मदिरेक्षणे! तुम अपनी दृष्टिसे ही मुझे मोहित कर रही हो॥ ४२-४६॥
त्वद्दृष्टिशरपातेन स्मरेणाभ्येत्य ताडितः।<br>तन्मां कुचतले तल्पे अभिशायितुमर्हसि ॥ ४७<br>नोचेत् प्रधक्ष्यते कामो भूयो भूयोऽतिदर्शनात् ।<br>ततः सा चारुसर्वाङ्गी राज्ञो राजीवलोचना ॥ ४८<br>वार्यमाणा सखीभिस्तु प्रादादात्मानमात्मना ।<br>एवं पुरा तया तन्व्या परित्रातः स भूपतिः ॥ ४९<br>तस्मान्मामपि सुश्रोणि त्वं परित्रातुमर्हसि ।<br>अरजस्काऽब्रवीद् दण्डं तस्या यद् वृत्तमुत्तरम् ॥ ५०<br>किं त्वया न परिज्ञातं तस्मात् ते कथयाम्यहम्।<br>तदा तया तु तन्वङ्ग्या सुरथस्य महीपतेः ॥ ५१<br>आत्मा प्रदत्तः स्वातन्त्र्यात् ततस्तामशपत् पिता।<br>यस्माद् धर्मं परित्यज्य स्त्रीभावान्मन्दचेतसे ॥ ५२<br>आत्मा प्रदत्तस्तस्माद्धि न विवाहो भविष्यति ।<br>विवाहरहिता नैव सुखं लप्स्यसि भर्तुतः ॥ ५३कामदेवने उपस्थित होकर तुम्हारी दृष्टिरूपी बाणसे मुझे घायल कर दिया है। इसलिये तुम मुझे अपने कुचतलरूपी शय्यापर सुलानेकी योग्या हो। ऐसा न करनेपर बार-बार तुम्हारे देखनेसे तो काम मुझे जला ही डालेगा। उसके बाद उस कमलनयनी सर्वाङ्गसुन्दरीने सखियोंके रोकनेपर भी स्वयंको राजाके प्रति अर्पित कर दिया। इस तरह प्राचीन कालमें उस कृशाङ्गीने उस राजाकी रक्षा की थी। अतः सुश्रोणि! तुम्हें भी मेरी रक्षा करनी चाहिये। शुक्रनन्दिनी अरजाने राजा दण्डसे कहा—क्या तुम उसके आगेकी घटित घटनाको नहीं जानते? (ऐसा ही लगता है;) अतः मैं तुमसे कहती हूँ, (सुनो)। जब उस कृशाङ्गीने स्वयंको राजा सुरथके लिये स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी इच्छासे दान कर दिया, तब पिताने उसको शाप दे दिया। मन्दबुद्धि! यतः तुमने स्त्रीस्वभावके कारण धर्मको छोड़कर (अपनी इच्छासे) स्वयंको प्रदान कर दिया है, अतः तुम्हारा विवाह नहीं होगा। (और तब विवाहसे रहित होनेके कारण) तुम पतिसे सुख नहीं प्राप्त कर सकोगी॥ ४७-५३॥
न च पुत्रफलं नैव पतिना योगमेष्यसि ।<br>उत्सृष्टमात्रे शापे तु ह्यपोवाह सरस्वती ॥ ५४<br>अकृतार्थं नरपतिं योजनानि त्रयोदश।<br>अपकृष्टे नरपतौ साऽपि मोहमुपागता ॥ ५५<br>ततस्तां सिषिचुः सख्यः सरस्वत्या जलेन हि।<br>सा सिच्यमाना सुतरां शिशिरेणाप्यथाम्भसा ॥ ५६<br>मृतकल्पा महाबाहो विश्वकर्मसुताऽभवत् ।<br>तां मृतामिति विज्ञाय जग्मुः सख्यस्त्वरान्विताः ॥ ५७तुम्हें न तो पुत्रफलकी प्राप्ति होगी और न पतिसे संयोग ही होगा। फिर तो शाप देते ही सरस्वती व्यर्थ हुए मनोरथवाले राजाको तेरह योजनतक बहा ले गयी। राजाके (बहकर) दूर चले जानेपर चित्राङ्गदा भी बेहोश हो गयी। महाबाहो! उसके बाद सखियोंने सरस्वतीके जलसे उसको सींचा। सखियोंद्वारा शीतल जलसे भलीभाँति सींचे जानेपर भी वह विश्वकर्माकी पुत्री मरे हुएके समान हो गयी। सखियाँ उसे मरी हुई समझकर शीघ्रतासे कोई

| अध्याय ६३ ] | अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन | २९७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
काष्ठान्याहर्तुमपरा वह्निमानेतुमाकुला।<br>सा च तास्वपि सर्वासु गतासु वनमुत्तमम्॥ ५८<br>संज्ञां लेभे सुचार्वङ्गी दिशश्चाप्यवलोकयत्।<br>अपश्यन्ती नरपतिं तथा स्निग्धं सखीजनम्॥ ५९<br>निपतात सरस्वत्याः पयसि स्फुरितेक्षणा।<br>तां वेगात् काञ्चनाक्षी तु महानद्यां नरेश्वर॥ ६०<br>गोमत्यां परिचिक्षेप तरङ्गकुटिले जले।<br>तयाऽपि तस्यास्तद्भाव्यं विदित्वाऽथ विशांपते॥ ६१<br>महावने परिक्षिप्ता सिंहव्याघ्रभयाकुले।<br>एवं तस्याः स्वतन्त्राया एषाऽवस्था श्रुता मया॥ ६२<br>तस्मान्न दास्याम्यात्मानं रक्षन्ती शीलमुत्तमम्।<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा दण्डः शक्रसमो बली।<br>विहस्य त्वरजां प्राह स्वार्थमर्थक्षयंकरम्॥ ६३काष्ठ लेने एवं कुछ व्याकुल होकर अग्नि लाने चली गयीं। उत्तम वनमें उन सभीके चले जानेपर उसे चेतना प्राप्त हुई; सुन्दर अङ्गोंवाली वह चारों ओर देखने लगी। राजा एवं प्रिय सखियोंको न देखकर चञ्चल नेत्रवाली वह सरस्वतीके जलमें गिर पड़ी। नरेश्वर! काञ्चनाक्षीने वेगपूर्वक उसे महानदी गोमतीकी हिलोरे लेती हुई लहरोंवाले जलमें फेंक दिया। राजन्! उसकी भवितव्यताको जानकर उस (गोमती)-ने भी उसे सिंह एवं व्याघ्रसे पूर्ण वनमें फेंक दिया। इस प्रकार मैंने उसकी स्वतन्त्रताकी इस दुरवस्थाका वर्णन सुना है। अतः मैं अपने उत्तम शीलकी रक्षा करती हुई स्वयंको तुम्हें समर्पित नहीं करूँगी। इन्द्रके तुल्य बलवान् राजा दण्डने उसके उस वचनको सुनकर हँसते हुए उस अरजासे पुरुषार्थको नष्ट करनेवाला अपना अभिप्राय कहा॥ ५८—६३॥
दण्ड उवाच<br>तस्या यदुत्तरं वृत्तं तत्पितुश्च कृशोदरि।<br>सुरथस्य तथा राजंस्तच्छ्रोतुं मतिमादध॥ ६४<br>यदाऽवकृष्टे नृपतौ पतिता सा महावने।<br>तदा गगनसंचारी दृष्टवान् गुह्यकोऽञ्जनः॥ ६५<br>ततः सोऽभ्येत्य तां बालां परिसान्त्व्य प्रयत्नतः।<br>प्राह मा गच्छ सुभगे विषादं सुरथं प्रति॥ ६६<br>ध्रुवमेष्यसि तेन त्वं संयोगमसितेक्षणे।<br>तस्माद् गच्छस्व शीघ्रं त्वं द्रष्टुं श्रीकण्ठमीश्वरम्॥ ६७**दण्डने कहा—**कृशोदरि! उसके पिता तथा राजा सुरथके साथ घटित हुए उसके बादके वृत्तान्तको सुननेके लिये तुम सावधान हो जाओ। राजाके दूर चले जानेपर जब वह महावनमें गिरी, उस समय आकाशमें संचरण करनेवाले अञ्जन नामके गुह्यकने उसे देखा। उसके बाद वह उस बालाके पास गया और प्रयत्नपूर्वक उसे सान्त्वना देते हुए कहा—सुभगे! सुरथके लिये उदास मत होओ। अयि कजरारे नेत्रोंवाली! तुम उससे संयोग अवश्य प्राप्त कर लोगी। अतः तुम शीघ्र भगवान् श्रीकण्ठका दर्शन करनेके लिये चली जाओ॥ ६४—६७॥
इत्येवमुक्ता सा तेन गुह्यकेन सुलोचना।<br>श्रीकण्ठमागता तूर्णं कालिन्द्या दक्षिणे तटे॥ ६८<br>दृष्ट्वा महेशं श्रीकण्ठं स्नात्वा रविसुताजले।<br>अतिष्ठत शिरोनम्रा यावन्मध्यस्थितो रविः॥ ६९<br>अथाजगाम देवस्य स्नानं कर्तुं तपोधनः।<br>शुभः पाशुपताचार्यः सामवेदी ऋतध्वजः॥ ७०<br>ददर्श तत्र तन्वङ्गीं मुनिश्चित्राङ्गदां शुभाम्।<br>रतीमिव स्थितां पुण्यामनङ्गपरिवर्जिताम्॥ ७१उस गुह्यकके ऐसा कहनेपर सुन्दर नेत्रोंवाली वह शीघ्रतापूर्वक कालिन्दीके दक्षिण तटपर स्थित श्रीकण्ठके निकट चली गयी। वह कालिन्दीके जलमें स्नान करके महेश्वर श्रीकण्ठका दर्शन कर दोपहरतक सिर झुकाये स्थित रही। इतनेमें देव श्रीकण्ठके पास शुभ लक्षणोंसे युक्त, पाशुपताचार्य, सामवेदी, तपोधन, ऋतध्वज स्नान करनेके लिये आये। मुनिने कामसे रहित रतिके समान कृशाङ्गी कल्याणकारिणी चित्राङ्गदाको वहाँ देखा॥ ६८—७१॥
तां दृष्ट्वा स मुनिर्ध्यानमगमत् केयमित्युत।<br>अथ सा तमृषिं वन्द्य कृताञ्जलिरुपस्थिता॥ ७२उन मुनिने उसको देखकर ध्यान किया कि यह कौन है। इसके बाद वह उन ऋषिके निकट जाकर उन्हें प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी।

| २९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६३ | | :--- | :--- |

| तां प्राह पुत्रि कस्यासि सुता सुरसुतोपमा।<br>किमर्थमागतासीह निर्मनुष्यमृगे वने॥ ७३<br>ततः सा प्राह तमृषिं यथातथ्यं कृशोदरी।<br>श्रुत्वर्षिः कोपमगमदशपच्छिल्पिनां वरम्॥ ७४<br>यस्मात् स्वतनूजातेयं परदेयाऽपि पापिना।<br>योजिता नैव पतिना तस्माच्छाखामृगोऽस्तु सः॥ ७५ | (ऋषिने) उससे पूछा—पुत्रि! देवकन्याकी भाँति तुम किसकी पुत्री हो? मनुष्य तथा पशुरहित इस वनमें तुम क्यों आयी हो? उसके बाद उस कृशोदरीने उन ऋषिसे सच्ची बात कही। उसे सुनकर ऋषि क्रुद्ध हो गये और शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माको शाप दे दिया—यतः उस पापीने दूसरेके देनेयोग्य भी अपनी इस पुत्रीको पतिसे युक्त नहीं किया, अतः वह शाखामृग (बन्दर) हो जाय॥ ७२—७५॥ | | इत्युक्त्वा स महायोगी भूयः स्नात्वा विधानतः।<br>उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां पूजयामास शङ्करम्॥ ७६<br>सम्पूज्य देवदेवेशं यथोक्तविधिना हरम्।<br>उवाचागम्यतां सुभ्रू सुदतीं पतिलालसाम्॥ ७७<br>गच्छस्व सुभगे देशं सप्तगोदावरं शुभम्।<br>तत्रोपास्य महेशानं महान्तं हाटकेश्वरम्॥ ७८<br>तत्र स्थिताया रम्भोरु ख्याता देववती शुभा।<br>आगमिष्यति दैत्यस्य पुत्री कन्दर्मालिनः॥ ७९ | यह कहनेके बाद उन महायोगीने पुनः विधिपूर्वक स्नान एवं पश्चिम (सायंकालीन) सन्ध्या कर शङ्करजीका पूजन किया। शास्त्रमें कही गयी विधिसे देवेश्वर शङ्करकी पूजा करनेके बाद उन्होंने पतिको चाहनेवाली तथा सुन्दर भौंहों और दाँतोंवाली चित्राङ्गदासे कहा—सुभगे! कल्याण-दायक सप्तगोदावर नामके देशमें जाओ। वहाँ महान् हाटकेश्वर भगवान्‌की पूजा करते हुए निवास करो। रम्भोरु! वहाँपर रहती हुई दैत्य कन्दर्मालीकी प्रसिद्ध देववती नामकी कल्याणकारिणी पुत्री तुम्हारे पास आयेगी॥ ७६—७९॥ | | तथाऽन्या गुह्यकसुता नन्दयन्तीति विश्रुता।<br>अञ्जनस्यैव तत्रापि समेष्यति तपस्विनी।<br>तथाऽपरा वेदवती पर्जन्यदुहिता शुभा॥ ८०<br>यदा तिस्रः समेष्यन्ति सप्तगोदावरे जले।<br>हाटकाख्ये महादेवे तदा संयोगमेष्यसि॥ ८१<br>इत्येवमुक्ता मुनिना बाला चित्राङ्गदा तदा।<br>सप्तगोदावरं तीर्थमगमत् त्वरिता ततः॥ ८२<br>सम्प्राप्य तत्र देवेशं पूजयन्ती त्रिलोचनम्।<br>समध्यास्ते शुचिपरा फलमूलाशनऽभवत्॥ ८३<br>स चर्षिर्ज्ञानसम्पन्नः श्रीकण्ठायतनेऽलिखत्।<br>श्लोकमेकं महाख्यानं तस्याश्च प्रियकाम्यया॥ ८४<br>न सोऽस्ति कश्चित् त्रिदशोऽसुरो वा<br>यक्षोऽथ मर्त्यो रजनीचरो वा।<br>इदं हि दुःखं मृगशावनेत्र्या<br>निर्मार्जयेद् यः स्वपराक्रमेण॥ ८५<br>इत्येवमुक्त्वा स मुनिर्जगाम<br>द्रष्टुं विभुं पुष्करनाथमीड्यम्।<br>नदीं पयोष्णीं मुनिवृन्दवन्द्यां<br>संचिन्तयन्नेव विशालनेत्राम्॥ ८६ | इसके सिवाय वहींपर अञ्जन नामक गुह्यककी प्रसिद्ध नन्दयन्ती नामकी तपस्विनी पुत्री तथा वेदवती नामक पर्जन्यकी कल्याणमयी पुत्री भी आयेगी। जब वे तीनों हाटकेश्वर महादेवके पास सप्तगोदावरमें आयेंगी उस समय तुम उनसे मिलोगी। मुनिके इस प्रकार कहनेपर बाला चित्राङ्गदा वहाँसे शीघ्र सप्तगोदावर नामके तीर्थमें गयी। वहाँ जानेके बाद वह देवाधिदेव त्रिलोचनकी पूजा तथा फल-मूलका भक्षण करती हुई पवित्रतापूर्वक रहने लगी और उन ज्ञानसम्पन्न ऋषिने उसकी हित-कामनासे प्रेरित होकर श्रीकण्ठके मन्दिरमें महान् आख्यानसे युक्त एक श्लोक लिखा—‘ऐसा कोई देवता, असुर, यक्ष, मनुष्य या राक्षस नहीं है, जो अपने पराक्रमसे इस मृगनयनीका दुःख दूर कर सके।' इस प्रकार श्लोक कहने (लिखने)-के बाद उस विशालाक्षीके विषयमें सोच-विचार करते हुए वे मुनि पूज्य विभु पुष्करनाथका दर्शन करनेके लिये मुनिवृन्दसे वन्द्य पयोष्णी नदीके तटपर चले गये॥ ८०—८६॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६३॥

अध्याय ६४] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन २९९

चौंसठवाँ अध्याय

चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन

दण्ड उवाचदण्डने कहा—
चित्राङ्गदायास्त्वरजे तत्र सत्या यथासुखम्।<br>स्मरन्त्याः सुरथं वीरं महान् कालः समभ्यगात्॥ १<br>विश्वकर्माऽपि मुनिना शप्तो वानरतां गतः।<br>न्यपतन्मेरुशिखराद् भूपृष्ठं विधिचोदितः॥ २<br>वनं घोरं सुगुल्माढ्यं नदीं शालूकिनीमनु।<br>शाल्वेयं पर्वतश्रेष्ठं समावसति सुन्दरि॥ ३<br>तत्रासतोऽस्य सुचिरं फलमूलान्यथाश्नतः।<br>कालोऽत्यगाद् वरारोहे बहुवर्षगणो वने॥ ४अरजे! वहाँ वीर सुरथका स्मरण करते हुए आनन्दपूर्वक चित्राङ्गदाका लंबा समय व्यतीत हो गया। मुनिद्वारा शापित हो जानेके कारण विश्वकर्मा भी बन्दर हो गये। होनहारवश वे मेरुकी ऊँची चोटीसे गिरकर पृथ्वीपर आ गये। सुन्दरि! (फिर) वे शालूकिनी नदीके निकट घने झुरमुटोंसे भरे भयङ्कर वनवाले पर्वतश्रेष्ठ शाल्वेयपर रहने लगे। वरारोहे! उस वनमें फल-मूल खाकर रहते हुए उनके बहुत वर्षोंके युग निकल गये॥ १–४॥
एकदा दैत्यशार्दूलः कन्दराख्यः सुतां प्रियाम्।<br>प्रतिगृह्य समभ्यागात् ख्यातां देववतीमिति॥ ५<br>तां च तद् वनमायान्तीं समं पित्रा वराननाम्।<br>ददर्श वानरश्रेष्ठः प्रजग्राह बलात् करे॥ ६<br>ततो गृहीतां कपिना स दैत्यः स्वसुतां शुभे।<br>कन्दरो वीक्ष्य संक्रुद्धः खड्गमुद्यम्य चाद्रवत्॥ ७<br>तमापतन्तं दैत्येन्द्रं दृष्ट्वा शाखामृगो बली।<br>तथैव सह चार्वङ्ग्या हिमाचलमुपागतः॥ ८एक समय कन्दर नामका दैत्य वीर 'देववती' नामसे प्रसिद्ध अपनी प्रिय पुत्रीको साथ लेकर वहाँ आया। उसके बाद पिताके साथ वनमें आ रही उस सुन्दरीको उस वानरश्रेष्ठने देखा, (उसने) बलपूर्वक उसका हाथ पकड़ लिया। शुभे! दैत्य कन्दर अपनी कन्याको बन्दरसे पकड़ी गयी देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और तलवार उठाकर दौड़ पड़ा। बलशाली बन्दर (अपने पीछे) उस दैत्येन्द्रको आते देखकर उस सुन्दरी कन्याको साथ लिये हिमालयपर चला गया॥ ५–८॥
ददर्श च महादेवं श्रीकण्ठं यमुनातीरे।<br>तस्याविदूरे गहनमाश्रमं ऋषिवर्जितम्॥ ९<br>तस्मिन् महाश्रमे पुण्ये स्थाप्य देववतीं कपिः।<br>न्यमज्जत स कालिन्द्यां पश्यतो दानवस्य हि॥ १०<br>सोऽजानन् तां मृतां पुत्रीं समं शाखामृगेण हि।<br>जगाम च महातेजाः पातालं निलयं निजम्॥ ११<br>स चापि वानरो देव्या कालिन्द्या वेगतो हृतः।<br>नीतः शिवीति विख्यातं देशं शुभजनावृतम्॥ १२उसने यमुनाके तटपर महादेव श्रीकण्ठका दर्शन किया। (उसने) उससे थोड़ी दूरपर ऋषियोंसे रहित एक दुर्गम आश्रम भी देखा। उस पवित्र महाश्रममें देववतीको रखकर वह बन्दर दैत्य कन्दरके देखते-देखते कालिन्दी (-के जल)-में डूब गया। उस कन्दरने बन्दरके साथ पुत्रीको (डूबकर) मरी हुई समझ लिया। अतः (निराश होकर) वह महातेजस्वी पातालमें स्थित अपने घरमें चला गया और वेगपूर्वक उस बन्दरको भी देवी कालिन्दी शुभजनोंसे व्याप्त शिवि नामसे प्रसिद्ध स्थानमें बहाकर ले गयी॥ ९–१२॥
ततस्तीर्त्वाऽथ वेगेन स कपिः पर्वतं प्रति।<br>गन्तुकामो महातेजा यत्र न्यस्ता सुलोचना॥ १३उसके बाद महातेजस्वी उस बन्दरने तेजीसे तैरकर उसे पार करनेके बाद उस पर्वतपर जानेकी इच्छा की,

३०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६४ ]


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथापश्यत् समायान्तमञ्जनं गुह्यकोत्तमम्।<br>नन्दयन्त्या समं पुत्र्या गत्वा जिगमिषुः कपिः॥ १४<br><br>तां दृष्ट्वाऽमन्यत श्रीमान् सेयं देववती ध्रुवम्।<br>तन्मे वृथा श्रमो जातो जलमज्जनसम्भवः॥ १५<br><br>इति संचिन्तयन्नेव समाद्रवत सुन्दरीम्।<br>सा तद्भयाच्च न्यपतन्नदीं चैव हिरण्वतीम्॥ १६जहाँ वह सुनयना रखी गयी थी। इसके बाद उसने नन्दयन्ती नामकी पुत्रीके साथ आते हुए श्रेष्ठ गुह्यक अञ्जनको देखा। जानेकी इच्छा करनेवाला वह बन्दर (उसके) निकट गया। उसे देखकर श्रीमान् कपिने सोचा कि सचमुच यह वही देववती है। अतः जलमें डूबनेका मेरा परिश्रम व्यर्थ हो गया। इस प्रकार सोचता हुआ वह बन्दर उस सुन्दरीकी ओर दौड़ा। उसके भयसे वह कन्या हिरण्वती नदीमें कूद पड़ी॥ १३—१६॥
गुह्यको वीक्ष्य तनयां पतितामापगाजले।<br>दुःखशोकसमाक्रान्तो जगामाञ्जनपर्वतम्॥ १७<br><br>तत्रासौ तप आस्थाय मौनव्रतधरः शुचिः।<br>समास्ते वै महातेजाः संवत्सरगणान् बहून्॥ १८<br><br>नन्दयन्त्यपि वेगेन हिरण्वत्याऽपवाहिता।<br>नीता देशं महापुण्यं कौशलं साधुभिर्युतम्॥ १९<br><br>गच्छन्ती सा च रुदती ददृशे वटपादपम्।<br>प्ररोहप्रावृततनुं जटाधरमिवेश्वरम्॥ २०कन्याको नदीके जलमें कूदती हुई देखकर गुह्यक दुःख और शोकसे विह्वल होता हुआ अञ्जनपर्वतपर चला गया। वह महातेजस्वी वहाँ पवित्रतापूर्वक मौन-व्रत धारण करके बहुत वर्षोंतक तप करता रहा। हिरण्वती भी (जलधाराके) वेगसे नन्दयन्तीको भी बहा ले गयी और सज्जनोंसे सेवित महापवित्र कोशल देशमें उसे पहुँचा दिया। जाते समय रोती हुई उसने जटा-धारी शङ्करकी भाँति बरोहोंसे घिरी हुई जड़वाले एक वटवृक्षको देखा॥ १७—२०॥
तं दृष्ट्वा विपुलच्छायं विशश्राम वरानना।<br>उपविष्टा शिलापट्टे ततो वाचं प्रशश्रुवे॥ २१<br><br>न सोऽस्ति पुरुषः कश्चिद् यस्तं ब्रूयात् तपोधनम्।<br>यथा स तनयस्तुभ्यमुद्वद्धो वटपादपे॥ २२<br><br>सा श्रुत्वा तां तदा वाणीं विस्पष्टाक्षरसंयुताम्।<br>तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव समन्तादवलोकयत्॥ २३<br><br>ददृशे वृक्षशिखरे शिशुं पञ्चाब्दिकं स्थितम्।<br>पिङ्गलाभिर्जटाभिस्तु उद्वद्धं यत्नतः शुभे॥ २४वह सुमुखी घनी छायावाले उस वृक्षको देखकर एक पत्थरपर बैठ गयी और विश्राम करने लगी। उसके बाद उसने यह वाणी सुनी—'क्या कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो उस तपोधन (ऋतध्वज)-से कहे कि तुम्हारा वह पुत्र वटवृक्षमें बँधा हुआ है।' उसने उस समय सुस्पष्ट अक्षरोंसे युक्त उस वाणीको सुनकर चारों ओर ऊपर-नीचे देखा। शुभे! (तब) उसने वृक्षकी सबसे ऊँची चोटीपर यत्नपूर्वक पिङ्गलवर्णकी जटाओंसे बँधे पाँच वर्षके एक बालकको देखा॥ २१—२४॥
तं विद्रुवन्तं दृष्ट्वैव नन्दयन्ती सुदुःखिता।<br>प्राह केनासि बद्धस्त्वं पापिना वद बालक॥ २५<br><br>स तामाह महाभागे बद्धोऽस्मि कपिना वटे।<br>जटास्वेवं सुदुष्टेन जीवामि तपसो बलात्॥ २६<br><br>पुरोन्मत्तपुरेत्येव तत्र देवो महेश्वरः।<br>तत्रास्ति तपसो राशिः पिता मम ऋतध्वजः॥ २७<br><br>तस्यास्मि जपमानस्य महायोगं महात्मनः।<br>जातोऽलिवृन्दसंयुक्तः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २८अत्यन्त दुःखित होती हुई नन्दयन्तीने उस बोलनेवालेको ऊपर देखकर कहा—अरे बालक! बतलाओ, किस पापीने तुम्हें बाँधा है? उस बालकने उससे कहा—महाभागे! एक महादुष्ट बन्दरने मुझे जटाओंद्वारा इस वटमें बाँध दिया है। मैं अपने तपोबलसे ही जी रहा हूँ। पहले उन्मत्तपुरमें देव महेश्वर प्रतिष्ठित थे। वहाँ तपके राशिस्वरूप (महातपस्वी) मेरे पिता ऋतध्वज निवास करते थे। महायोगका जप-तप कर रहे उन महात्माका मैं सभी शास्त्रोंमें निपुण एवं भौंरोंके समूहसे युक्त पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २५—२८॥

अध्याय ६४ ] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन ३०१

ततो मामब्रवीत् तातो नाम कृत्वा शुभानने।<br>जाबालीति परिख्याय तच्छृणुष्व शुभानने॥ २९<br>पञ्चवर्षसहस्राणि बाल एव भविष्यसि।<br>दशवर्षसहस्राणि कुमारत्वे चरिष्यसि॥ ३०<br>विंशतिं यौवनस्थायी वीर्येण द्विगुणं ततः।<br>पञ्चवर्षशतान् बालो भोक्ष्यसे बन्धनं दृढम्॥ ३१<br>दशवर्षशतान्येव कौमारे कायपीडनम्।<br>यौवने परमान् भोगान् द्विसहस्रसमास्तथा॥ ३२शुभानने! पिताजीने मेरा नाम जाबालि रखकर मुझसे जो कुछ कहा, उसे सुनो। उन्होंने कहा—तुम पाँच हजार वर्षोंतक बालक रहोगे एवं दस हजार वर्षोंतक कुमार रहोगे। बीस वर्षोंतक तुम्हारा पराक्रमपूर्ण यौवन रहेगा और उसके बाद उसके दुगुने समयतक बुढ़ापेकी स्थिति रहेगी। बाल्यावस्थामें पाँच सौ वर्षोंतक तुम्हें दृढ़ बन्धन भोगना पड़ेगा। उसके बाद एक हजार वर्षोंतक कुमारावस्थामें तुम्हें शारीरिक कष्ट भोगना पड़ेगा तथा युवावस्थामें दो हजार वर्षोंतक तुम उत्तम भोगोंको प्राप्त करोगे॥ २९—३२॥
चत्वारिंशच्छतान्येव वार्धके क्लेशमुत्तमम्।<br>लप्स्यसे भूमिशय्याढ्यं कदन्नाशनभोजनम्॥ ३३<br>इत्येवमुक्तः पित्राऽहं बालः पञ्चाब्ददेशिकः।<br>विचरामि महीपृष्ठं गच्छन् स्नातुं हिरण्वतीम्॥ ३४<br>ततोऽपश्यं कपिवरं सोऽवदन्मां क्व यास्यसि।<br>इमां देववतीं गुह्यां मूढ न्यस्तां महाश्रमे॥ ३५<br>ततोऽसौ मां समादाय विस्फुरन्तं प्रयत्नतः।<br>वटाग्रेऽस्मिन्नुद्बबन्ध जटाभिरपि सुन्दरि॥ ३६बुढ़ापेमें चालीस सौ वर्षोंतक अत्यन्त क्लेश भोगना होगा। उस समय तुम्हें भूमिपर सोना तथा कुत्सित-अन्न—कदन्न—साँवा, कोदो (आदि)-का भोजन करना पड़ेगा। पिताके इस प्रकार कहनेके बाद पाँच वर्षकी अवस्थामें मैं हिरण्वतीमें स्नान करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर विचरता हुआ जा रहा था। उस समय मैंने एक श्रेष्ठ बन्दरको देखा। उसने मुझसे कहा—अरे मूढ़! इस महान् आश्रममें रखी हुई इस देववतीको लेकर तू कहाँ जा रहा है? सुन्दरि! उसके बाद उसने छटपटाते हुए मुझको पकड़कर प्रयत्नपूर्वक इस वटवृक्षके शिखरपर जटाओं (बरोहों)-से बाँध दिया॥ ३३—३६॥
तथा च रक्षा कपिना कृता भीरु निरन्तरैः।<br>लतापाशैर्महायन्त्रमधस्ताद् दुष्टबुद्धिना॥ ३७<br>अभेद्योऽयमनाक्रम्य उपरिष्टात् तथाप्यधः।<br>दिशां मुखेषु सर्वेषु कृतं यन्त्रं लतामयम्॥ ३८<br>संयम्य मां कपिवरः प्रयातोऽमरपर्वतम्।<br>यथेच्छया मया दृष्टमेतत् ते गदितं शुभे॥ ३९<br>भवती का महारण्ये ललना परिवर्जिता।<br>समायाता सुचार्वङ्गी केन सार्थेन मां वद॥ ४०भीरु! उस कुमति बन्दरने बहुत-से लता-जालोंसे एक महान् यन्त्र (छज्जा) बनाकर उसके नीचे मुझे स्थापित कर दिया और सदा मेरी रक्षा करता रहा। सभी दिशाओंमें चारों ओरसे बनाया गया यह लतायन्त्र न तो टूट सकता है और न किसी प्रकार ऊपर या नीचेसे इसके ऊपर आक्रमण ही किया जा सकता है। वह श्रेष्ठ बन्दर मुझको बाँधकर स्वेच्छासे अमर-पर्वतपर चला गया। शुभे! मैंने जो कुछ देखा था उसे तुमसे कह दिया। सुन्दरि! मुझे बतलाओ कि तुम कौन हो एवं इस विस्तृत वनमें अकेली तुम किसके साथ आयी हो?॥ ३७—४०॥
साऽब्रवीदञ्जनो नाम गुह्यकेन्द्रः पिता मम।<br>नन्दयन्तीति मे नाम प्रम्लोचागर्भसम्भवा॥ ४१<br>तत्र मे जातके प्रोक्तमृषिणा मुद्गलेन हि।<br>इयं नरेन्द्रमहिषी भविष्यति न संशयः॥ ४२उसने कहा—गुह्यकराज अञ्जन मेरे पिता हैं। मेरा नाम नन्दयन्ती है। मेरा जन्म प्रम्लोचाके गर्भसे हुआ है। मेरे जन्मके समय मुद्गल ऋषि ने कहा था कि यह कन्या भविष्यमें राजरानी बनेगी।
३०२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६४

| तद्वाक्यसमकालं च व्यनदद् देवदुन्दुभिः।<br>शिवा चाशिवनिर्घोषा ततो भूयोऽब्रवीन्मुनिः॥ ४३<br>न संदेहो नरपतेर्महाराज्ञी भविष्यति।<br>महान्तं संशयं घोरं कन्याभावे गमिष्यसि।<br>ततो जगाम स ऋषिरैवमुक्त्वा वचोऽद्भुतम्॥ ४४ | उनके कहनेके समय ही स्वर्गमें दुन्दुभि बजने लगी तथा तत्काल ही अमङ्गलसूचक शब्दवाली सियारिन बोलने लगी। उसके बाद मुनिने पुनः कहा—इसमें संदेह नहीं कि यह बालिका महाराजकी महारानी होगी। परंतु कन्या-अवस्थामें ही यह भयङ्कर विपत्तिमें पड़ जायगी। इस प्रकारका अद्भुत वचन कहकर वे ऋषि चले गये॥ ४१–४४॥ | | पिता मामपि चादाय समागन्तुमथैच्छत।<br>तीर्थं ततो हिरण्वत्यास्तीरात् कपिरथोत्पतत्॥ ४५<br>तद्भयाच्च मया ह्यात्मा क्षिप्तः सागरगाजले।<br>तयाऽस्मि देशमानीता इमं मानुषवर्जितम्॥ ४६<br>श्रुत्वा जाबालिरथ तद् वचनं वै तयोदितम्।<br>प्राह सुन्दरि गच्छस्व श्रीकण्ठं यमुनातीटे॥ ४७<br>तत्रागच्छति मध्याह्ने मत्पिता शर्वमर्चितुम्।<br>तस्मै निवेद्यात्मानं तत्र श्रेयोऽधिलप्स्यसे॥ ४८ | उसके बाद मेरे पिताने तीर्थयात्रा करनेकी इच्छा की। इसी बीच मुझे (अपने साथ) लेकर बन्दर हिरण्वतीके तटसे उछला। उसके डरसे मैंने अपनेको समुद्रमें गिरनेवाली नदीके जलमें गिरा दिया (मैं नदीमें कूद पड़ी)। उस नदीके भीषण प्रवाहसे मैं इस निर्जन देशमें आ गयी हूँ। जाबालिने उसकी कही हुई बातको सुनकर कहा—सुन्दरि! तुम यमुनाके किनारे श्रीकण्ठके पास जाओ। वहाँ मेरे पिताजी मध्याह्नमें शिवजीकी पूजा करनेके लिये आते हैं। तुम वहाँ जाकर उनको अपना समाचार सुनाओ। इससे तुम्हारा कल्याण होगा॥ ४५–४८॥ | | ततस्तु त्वरिता काले नन्दयन्ती तपोनिधिम्।<br>परित्राणार्थमगमद्धिमाद्रेर्यमुनां नदीम्॥ ४९<br>सा त्वदीर्घेण कालेन कन्दमूलफलाशना।<br>सम्प्राप्ता शङ्करस्थानं यत्रागच्छति तापसः॥ ५०<br>ततः सा देवदेवेशं श्रीकण्ठं लोकवन्दितम्।<br>प्रतिवन्द्य ततोऽपश्यदक्षरांस्तान्महामुने॥ ५१<br>तेषामर्थं हि विज्ञाय सा तदा चारुहासिनी।<br>तज्जाबाल्युदितं श्लोकमलिखच्चान्यमात्मनः॥ ५२ | उसके बाद नन्दयन्ती अपनी रक्षाके लिये शीघ्रतापूर्वक हिमाचलसे चल पड़ी और यमुनाके तीरपर स्थित तपोनिधि (ऋतध्वज)-के पास पहुँच गयी। कन्द-मूल-फल खाती हुई वह कुछ ही समयमें शङ्करके (भी) उस स्थानपर पहुँची जहाँ तपस्वी आया करते थे। महामुने! उसके बाद उसने विश्ववन्दित देवाधिदेव श्रीकण्ठकी पूजा कर उन (लिखे) अक्षरोंको देखा। उनका अर्थ जानकर मधुर मुस्कान करती हुई उसने जाबालिद्वारा कथित श्लोक तथा अपना एक अन्य श्लोक लिखा—॥ ४९–५२॥ | | मुद्गलेनास्मि गदिता राजपत्नी भविष्यति।<br>सा चावस्थामिमां प्राप्ता कश्चिन्मां त्रातुमीश्वरः॥ ५३<br>इत्युल्लिख्य शिलापट्टे गता स्नातुं यमस्वसाम्।<br>ददृशे चाश्रमवरं मत्तकोकिलनादितम्॥ ५४<br>ततोऽमन्यत सात्रर्षिर्नूनं तिष्ठति सत्तमः।<br>इत्येवं चिन्तयन्ती सा सम्प्रविष्टा महाश्रमम्॥ ५५<br>ततो ददर्श देवाभां स्थितां देववतीं शुभाम्।<br>संशुष्कास्यां चलनेत्रां परिम्लानामिवाब्जिनीम्॥ ५६ | 'महर्षि मुद्गलने कहा था कि मैं राजपत्नी होऊँगी, किंतु मैं इस अवस्थामें आ गयी हूँ। क्या कोई मेरा उद्धार करनेमें समर्थ है?' शिलापट्टपर यह लिखकर वह स्नान करनेके लिये यमुनाके किनारे चली गयी और उस स्थानपर मतवाली कोकिलोंके स्वरों (काकली)-से निनादित एक सुन्दर आश्रम देखा। उसने सोचा—इस स्थानपर श्रेष्ठ ऋषि अवश्य रहते होंगे। ऐसा सोचती हुई उस महान् आश्रममें प्रविष्ट हुई। उसके बाद उसने दैवी शोभासे युक्त, मुर्झायी हुई कमलिनीके समान सूखे मुख एवं चञ्चल नेत्रोंवाली देववतीको वहाँ बैठी हुई देखा॥ ५३–५६॥ |