भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २८९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मधुंनोऽष्टौ जलस्योक्ताः सर्वे ते द्विगुणाः सुराः।<br>ततो रोचनया देवमष्टोत्तरशतेन हि॥ ११<br><br>अनुलिम्पेत् कुङ्कुमेन चन्दनेन च भक्तितः।<br>बिल्वपत्रैः सकमलैः धत्तूरसुरचन्दनैः ॥ १२<br><br>मन्दारैः पारिजातैश्च अतिमुक्तैस्तथाऽर्चयेत् ।<br>अगुरुं सह कालेयं चन्दनेनापि धूपयेत्॥ १३<br><br>जप्तव्यं शतरुद्रीयं ऋग्वेदोक्तैः पदक्रमैः।<br>एवं कृते तु देवेशं पश्यध्वं नेतरेण च॥ १४<br><br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः केशवमब्रुवन् ।<br>विधानं तप्तकृच्छ्रस्य कथ्यतां मधुसूदन।<br>यस्मिंश्चीर्णे कायशुद्धिर्भवते सार्वकालिकी ॥ १५देवताओ ! मधुका स्नान आठ घड़ोंसे तथा जलका स्नान इन सभीके दुगुने (२४०) घड़ोंसे कहा गया है। उसके बाद भक्तिपूर्वक देवको एक सौ आठ बार गोरोचन, कुङ्कुम और चन्दनका लेपन करनेका विधान है। फिर उन्हें भक्तिसे मलयचन्दन लगाना चाहिये। पूरे खिले हुए कमलोंके सहित बिल्वपत्र, धतूर एवं हरिचन्दनसे उनकी अर्चा होनी चाहिये। पूर्ण खिले हुए मन्दार और हरशृङ्गार चढ़ाकर पूजा करनी चाहिये। फिर अगुरु, केशर या काले चन्दन एवं चन्दनसे धूप दे। उसके बाद ऋग्वेदमें कथित 'पद' और 'क्रम' शैलियोंसे शतरुद्रीका जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे आपलोग देवेश्वरका दर्शन कर सकेंगे; अन्य किसी उपायसे नहीं। वासुदेवके ऐसा कहनेपर देवताओंने केशवसे कहा—मधुसूदन ! आप हमें तप्त-कृच्छ्र (-व्रत)-का विधान (भी) बतलाइये, जिसके करनेसे सदाके लिये कायशुद्धि हो जाती है ॥ १०—१५ ॥
वासुदेव उवाच<br>त्र्यहमुष्णं पिबेदापः त्र्यहमुष्णं पयः पिबेत् ।<br>त्र्यहमुष्णं पिबेत्सर्पिर्वायुभक्षो दिनत्रयम्॥ १६<br>पला द्वादश तोयस्य पलावष्टौ पयसः सुराः।<br>षट्पलं सर्पिषः प्रोक्तं दिवसे दिवसे पिबेत् ॥ १७वासुदेवने कहा—देवताओ ! (तप्त-कृच्छ्र-व्रतका विधान इस प्रकार है—) तीन दिन बारह पल गरम जल पिये, तीन दिन आठ पल गरम दूध पिये, तीन दिन छः पल गरम घी पिये एवं तीन दिन केवल वायु पीकर रहे ॥ १६-१७ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने सुराः कायविशुद्धये ।<br>तप्तकृच्छ्ररहस्यं वै चक्रुः शक्रपुरोगमाः ॥ १८<br>ततो व्रते सुराश्चीर्णे विमुक्ताः पापतोऽभवन्।<br>विमुक्तपापा देवेशं वासुदेवमथाब्रुवन् ॥ १९<br>क्वासौ वद जगन्नाथ शंभुस्तिष्ठति केशव।<br>यं क्षीराद्यभिषेकेण स्नापयामो विधानतः ॥ २०<br>अथोवाच सुरान्विष्णुरेष तिष्ठति शङ्करः ।<br>मद्देहे किं न पश्यध्वं योगश्रयं प्रतिष्ठितः ॥ २१पुलस्त्यजी बोले—इस प्रकार कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने शरीरकी शुद्धिके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतका एकान्त अनुष्ठान किया। उसके बाद उस व्रतका पालन हो जानेपर देवता पापसे छूट गये। पापसे छूटकर देवताओंने देवोंके स्वामी वासुदेवसे कहा—जगन्नाथ ! केशव ! आप कृपया यह बतलाइये कि शम्भु किस स्थानपर अवस्थित हैं? जिन्हें हमलोग दूध आदिके अभिषेकसे विधिपूर्वक स्नान करायें। उसके बाद विष्णुने देवताओंसे कहा—देवताओ ! मेरे शरीरमें ये शङ्कर संयुक्त होकर स्थित हैं। क्या आपलोग नहीं देख रहे हैं? ॥ १८—२१ ॥
तमूचुर्नैव पश्यामस्त्वत्तो वै त्रिपुरान्तकम् ।<br>सत्यं वद सुरेशान महेशानः क्व तिष्ठति ॥ २२<br>ततोऽव्ययात्मा स हरिः स्वहृत्पङ्कजशायिनम्।<br>दर्शयामास देवानां मुरारिर्लिङ्गमैश्र्वरम्॥ २३<br>ततः सुराः क्रमेणैव क्षीरादिभिरनन्तरम् ।<br>स्त्रापयाञ्चक्रिरे लिङ्गं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ २४उन लोगोंने विष्णुसे कहा कि हमलोग तो आपमें त्रिपुरनाशक शङ्करको नहीं देख रहे हैं। सुरेशान ! आप सच बतलाइये कि महेश किस स्थानपर स्थित हैं। उसके बाद अव्ययात्मा मुरारि विष्णुने देवताओंको अपने हृदयकमलमें विश्राम करनेवाले शङ्करके लिङ्गका दर्शन करा दिया। उसके बाद देवताओंने क्रमशः दूध आदिसे उस नित्य, स्थिर एवं अक्षय लिङ्गको स्नान कराया।