वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| २९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६२ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गोरोचनया त्वालिप्य चन्दनेन सुगन्धिना।<br>बिल्वपत्राम्बुजैर्देवं पूजयामासुरञ्जसा ॥ २५ | फिर उन लोगोंने गोरोचन और सुगन्धित चन्दनका लेपन कर बिल्वपत्रों और कमलोंसे भक्तिपूर्वक (यथाविधि उन) देवकी पूजा की॥ २२—२५॥ |
| प्रधूप्यागुरुणा भक्त्या निवेद्य परमौषधीः।<br>जप्त्वाऽष्टशतनामानं प्रणामं चक्रिरे ततः ॥ २६<br>इत्येवं चिन्तयन्तश्च देवावेतौ हरीश्वरौ।<br>कथं योगत्वमापन्नौ सत्त्वान्धतमसोद्भवौ ॥ २७<br>सुराणां चिन्तितं ज्ञात्वा विश्वमूर्तिर्बभूविभुः।<br>सर्वलक्षणसंयुक्तः सर्वायुधधरोऽव्ययः ॥ २८<br>सार्द्धं त्रिनेत्रं कमलाइकुण्डलं<br>जटागुडाकेशखगर्भभव्ध्वजम् ।<br>समाधवं हारभुजङ्गवक्षसं<br>पीताजिनाच्छन्नकटिप्रदेशम् ॥ २९<br>चक्रासिहस्तं हलशार्ङ्गपाणिं<br>पिनाकशूलाजगवान्वितं च।<br>कपर्दखट्वाङ्गकपालघण्टा-<br>सशङ्खटङ्काररवं महर्षे ॥ ३०<br>दृष्ट्वैव देवा हरिशङ्करं तं<br>नमोऽस्तु ते सर्वगताव्ययेति।<br>प्रोक्त्वा प्रणामं कमलासनाद्या-<br>श्चकुर्मतिं चैकतरां नियुज्य ॥ ३१ | उसके बाद देवोंने प्रेमपूर्वक धूप-दानकर परमौषधियों (भङ्ग आदि)-को समर्पित किया। फिर (शङ्करके) एक सौ आठ नामोंका जप करनेके बाद उन्हें प्रणाम किया। सभी देवता यह विचारने लगे कि सत्त्वगुणकी प्रधानतासे विष्णु एवं तमोगुणकी अधिकतासे आविर्भूत शिवमें एकता किस प्रकार हुई? देवताओंके विचारको जानकर अविनाशी व्यापक भगवान् सभी (शुभ) लक्षणोंसे युक्त एवं सब प्रकारके आयुधोंको धारण करनेवाले विश्वमूर्ति हो गये। महर्षे! फिर तो देवताओंने एक ही शरीरमें कानमें सर्पके कुण्डल पहने, सिरपर आपसमें चिपके लंबे बालके जटाजूट बाँधे, गलेमें सर्पके हार लटकाये, हाथमें पिनाक, शूल, आजगव धनुष, खट्वाङ्ग धारण किये तथा घण्टासे युक्त वाघाम्बर धारण करनेवाले त्रिनेत्रधारी वृषभध्वज महादेव और साथ ही कमलके कुण्डलधारी, गरुड़ध्वज, हार और पीताम्बर पहने, हाथोंमें चक्र, असि, हल, शार्ङ्गधनुष, टंकार-सी ध्वनि करनेवाले शङ्खको लिये गुडाकेश विष्णुको देखा। उसके बाद 'सर्वव्यापी अविनाशी प्रभुको नमस्कार है'—इस प्रकार कहकर ब्रह्मा आदि देवताओंने उन हरि एवं शङ्करको एक रूप (अभिन्न) समझा॥ २६—३१॥ |
| तानेकचित्तान् विज्ञाय देवान् देवपतिर्हरिः।<br>प्रगृह्याभ्यद्रवत्तूर्णं कुरुक्षेत्रं स्वमाश्रमम् ॥ ३२<br>ततोऽपश्यन्त देवेशं स्थाणुभूतं जले शुचिम्।<br>दृष्ट्वा नमः स्थाणवेति प्रोक्त्वा सर्वे ह्युपाविशन् ॥ ३३<br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिरेहोहि दीयतां वरः।<br>क्षुब्धं जगज्जगन्नाथ उन्मज्जस्व प्रियातिथे ॥ ३४<br>ततस्तां मधुरां वाणीं शुश्राव वृषभध्वजः।<br>श्रुत्वोत्तस्थौ च वेगेन सर्वव्यापी निरञ्जनः ॥ ३५<br>नमोऽस्तु सर्वदेवेभ्यः प्रोवाच प्रहसन् हरः।<br>स चागतः सुरैः सेन्द्रैः प्रणतौ विनयान्वितैः ॥ ३६ | देवोंके स्वामी भगवान् विष्णु उन देवताओंको समान हृदयवाला समझ उन्हें साथ लेकर शीघ्र अपने आश्रम कुरुक्षेत्रमें चले गये। उसके बाद उन लोगोंने जलके भीतर पवित्र स्थाणुभूत उन देवेश (महादेव)-को देखा। उन्हें देखकर 'स्थाणवे नमः' (स्थाणुको नमस्कार है)—यह कहकर वे सभी (वहीं) बैठ गये। उसके बाद इन्द्रने कहा—जगन्नाथ! अतिथप्रिय! संसार अशान्त हो उठा है। आप (कृपया) बाहर निकलकर यहाँ आइये, यहाँ आइये (और आकर) हमें वर दीजिये। उसके बाद वृषकेतु महादेवने वह मधुर वाणी सुनी। फिर उसे सुनकर वे सर्वव्यापी परमविशुद्ध शङ्कर वेगसे उठ खड़े हुए। उन्होंने हँसते हुए 'सभी देवताओंको नमस्कार है' ऐसा कहा। इन्द्र आदि देवताओंने जलसे ऊपर आये हुए उन शङ्करको और अधिक विनयभावसे प्रणाम किया॥ ३२—३६॥ |