वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६२ ] शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा २९१
| तमूचुर्देवताः सर्वास्त्यज्यतां शङ्कर द्रुतम्।<br>महाव्रतं त्रयो लोकाः क्षुब्धास्त्वत्तेजसावृताः॥ ३७<br><br>अथोवाच महादेवो मया त्यक्तो महाव्रतः।<br>ततः सुरा दिवं जग्मुर्हृष्टाः प्रयतमानसाः॥ ३८<br><br>ततोऽपि कम्पते पृथ्वी साब्धिद्वीपाचला मुने।<br>ततोऽभिचिन्तयद्रुद्रः किमर्थं क्षुभिता मही॥ ३९<br><br>ततः पर्यचरच्छूली कुरुक्षेत्रं समन्ततः।<br>ददर्शौघवतीतीरे उशनसं तपोनिधिम्॥ ४०<br><br>ततोऽब्रवीत्सुरपतिः किमर्थं तप्यते तपः।<br>जगत्क्षोभकरं विप्र तच्छीघ्रं कथ्यतां मम॥ ४१ | सभी देवताओेंने उनसे कहा कि शंकर! कृपया महाव्रतको शीघ्र छोड़ दीजिये। आपके तेजसे व्याप्त होकर तीनों लोक क्षुब्ध हो गये हैं। उसके बाद महादेवने कहा कि (लीजिये), मैंने महाव्रतका त्याग कर दिया। तत्पश्चात् देवता प्रसन्न हो गये और शान्तचित्त होकर स्वर्ग चले गये। मुने! तो भी समुद्र, द्वीप और पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही थी। तब (स्वयं) रुद्रने सोचा कि (अब) पृथ्वी क्यों क्षुब्ध हो रही है? फिर त्रिशूल धारण करनेवाले (शङ्कर) कुरुक्षेत्रके चारों ओर विचरण करने लगे। उन्होंने ओघवतीके किनारे (तपस्या करते) तपोनिधि उशनाको देखा। उसके बाद देवाधिदेव शंकरने उनसे कहा—विप्र! आप जगत्को क्षुब्ध करनेवाला तप क्यों कर रहे हैं? उसे मुझे शीघ्र बतलाइये॥ ३७—४१॥ |
| उशना उवाच<br>तवाराधनकामार्थं तप्यते हि महत्तपः।<br>संजीवनीं शुभां विद्यां ज्ञातुमिच्छे त्रिलोचन॥ ४२ | उशनाने कहा— आपकी आराधना (प्रसन्नता-प्राप्ति)-की इच्छासे मैं महान् तप कर रहा हूँ। त्रिनयन! मैं मङ्गलमयी संजीवनी विद्याको जानना चाहता हूँ॥ ४२॥ |
| हर उवाच<br>तपसा परितुष्टोऽस्मि सुतप्तेन तपोधन।<br>तस्मात् संजीवनीं विद्यां भवाञ्ज्ञास्यति तत्त्वतः॥ ४३<br><br>वरं लब्ध्वा ततः शुक्रस्तपसः संन्यवर्त्तत।<br>तथापि चलते पृथ्वी साब्धिभूभृन्नगावृता॥ ४४<br><br>ततोऽगमन्महादेवः सप्तसारस्वतं शुचिः।<br>ददर्श नृत्यमानं च ऋषिं मङ्कणसंज्ञितम्॥ ४५<br><br>भावेन पोप्लूयति बालवत् स<br>भुजौ प्रसार्यैव ननर्त्त वेगात्।<br>तस्यैव वेगेन समाहता तु<br>चचाल भूभूमिधरैः सहैव॥ ४६ | महादेवने कहा— तपोधन! मैं भलीभाँति की गयी आपकी तपस्यासे प्रसन्न हूँ। इसलिये आप संजीवनी विद्याको यथार्थरूपमें जान जायेंगे। शुक्र (शुक्राचार्य) वर पाकर तपस्यासे विरत हो गये। फिर भी सागर, पर्वत, वृक्ष आदिके साथ सारी पृथ्वी काँप रही थी। उसके बाद परमपावन महादेव सप्तसारस्वतमें गये। वहाँ उन्होंने मङ्कण नामके महर्षिको नाचते हुए देखा। वे बालकके समान भाव-विभोर होकर दोनों हाथ फैलाकर वेगसे (उछल-उछलकर) नाच रहे थे। उसके (उछलनेके) वेगसे आहत हो पृथ्वी पर्वतोंसहित बड़े जोरसे काँप रही थी—हिल रही थी॥ ४३—४६॥ |
| तं शङ्करोऽभ्येत्य करे निगृह्य<br>प्रोवाच वाक्यं प्रहसन् महर्षे।<br>किं भावितो नृत्यसि केन हेतुना<br>वदस्व मामेत्य किमत्र तुष्टिः॥ ४७<br><br>स ब्राह्मणः प्राह ममाद्य तुष्टि-<br>र्यैनेह जाता शृणु तद् द्विजेन्द्र।<br>बहून् गणान् वै मम तप्यतस्तपः<br>संवत्सरान् कायविशोषणार्थम्॥ ४८<br><br>ततोऽनुपश्यामि करात् क्षतोत्थं<br>निर्गच्छते शाकरसं ममेह। | शंकरने उनके पास जाकर एवं उनका हाथ पकड़कर हँसते हुए कहा—महर्षे! किस भावनासे प्रभावित होकर एवं किस कारणसे आप नाच रहे हैं? आप (मेरे पास) आकर मुझसे यह बतलाइये कि आपको इस विषयमें क्यों संतुष्टि है? उस ब्राह्मणने कहा—द्विजेन्द्र! आज मुझे जिस कारणसे प्रसन्नता हो रही है, उसे सुनिये। शरीरको दुर्बल करनेके लिये तपस्या करते हुए मेरे अनेक वर्ष बीत गये हैं। अब मैं देखता हूँ कि मेरे हाथके घावसे शाकरस निकल रहा है। |