भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६२

| तेनाद्य तुष्टोऽस्मि भृशं द्विजेन्द्र<br>येनास्मि नृत्यामि सुभावितात्मा ॥ ४९<br>तं प्राह शम्भुर्द्विज पश्य मह्यं<br>भस्म प्रवृत्तोऽङ्गुलितोऽतिशुक्लम् ।<br>संताडनादेव न च प्रहर्षो<br>ममास्ति नूनं हि भवान् प्रमत्तः ॥ ५० | द्विजेन्द्र ! इसी कारण मुझे बहुत आनन्द मिल रहा है और मैं भावविभोर होकर नृत्य कर रहा हूँ। शम्भुने उनसे कहा—द्विज ! मुझे देखो। चोट करनेसे ही मेरी अङ्गुलिसे अत्यन्त स्वच्छ सफेद भस्म निकल रहा है, परंतु इससे मुझे तो उत्कृष्ट प्रसन्नता नहीं होती। आप निश्चय ही उन्मत्त हो गये हैं ॥ ४७-५० ॥ | | श्रुत्वाऽथ वाक्यं वृषभध्वजस्य<br>मत्वा मुनिर्मङ्कणको महर्षे ।<br>नृत्यं परित्यज्य सुविस्मितोऽथ<br>ववन्द पादौ विनयावनम्रः ॥ ५१<br>तमाह शम्भुर्द्विज गच्छ लोकं<br>तं ब्रह्मणो दुर्गममव्ययस्य ।<br>इदं च तीर्थं प्रवरं पृथिव्यां<br>पृथूदकस्यास्तु समं फलेन ॥ ५२<br>सांनिध्यमत्रैव सुरासुराणां<br>गन्धर्वविद्याधरकिन्नराणाम् ।<br>सदाऽस्तु धर्मस्य निधानमग्र्यं<br>सारस्वतं पापमलापहारि ॥ ५३<br>सुप्रभा काञ्चनाक्षी च सुवेणुर्विमलोदका ।<br>मनोहरा चौघवती विशाला च सरस्वती ॥ ५४<br>एताः सप्त सरस्वत्यो निवसिष्यन्ति नित्यशः ।<br>सोमपानफलं सर्वाः प्रयच्छन्ति सुपुण्यदाः ॥ ५५ | महर्षे ! शंकरकी बात सुनकर और उसे मानकर मङ्कणक मुनिने नृत्य करना छोड़ दिया और आश्चर्यसहित तथा विनम्र भावसे झुककर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। शम्भुने उनसे कहा—द्विज ! तुम अविनाशी ब्रह्मके दुर्गम लोकको जाओ। और, यह श्रेष्ठ तीर्थ पृथूदकतीर्थके सदृश पृथ्वीमें फल देनेवाला प्रसिद्ध होगा। सुर, असुर, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नरलोग सदा यहाँ उपस्थित रहेंगे। यह श्रेष्ठ 'सारस्वत' तीर्थ सदा धर्मका निधान एवं पाप-मलका अपहरण करनेवाला होगा। यहाँ सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, सुवेणु, विमलोदका, मनोहरा, ओघवती, विशाला, सरस्वती नामकी सात नदियाँ नित्य निवास करेंगी। ये सभी पुण्य प्रदान करनेवाली नदियाँ यज्ञीय सोमरसके पीनेसे होनेवाले फलको देनेवाली हैं ॥ ५१-५५ ॥ | | भवानपि कुरुक्षेत्रे मूर्तिं स्थाप्य गरीयसीम् ।<br>गमिष्यति महापुण्यं ब्रह्मलोकं सुदुर्गमम् ॥ ५६<br>इत्येवमुक्तो देवेन शङ्करेण तपोधनः ।<br>मूर्तिं स्थाप्य कुरुक्षेत्रे ब्रह्मलोकमगाद् वशी ॥ ५७<br>गते मङ्कणके पृथ्वी निश्चला समजायत ।<br>अथागान्मन्दरं शम्भुर्निजमावसथं शुचिः ॥ ५८<br>एतत् तवोक्तं द्विज शङ्करस्तु<br>गतस्तदासीत् तपसेऽथ शैले ।<br>शून्येऽभ्यगाद् दुष्टमतिर्हि देव्या<br>संयोधितो येन हि कारणेन ॥ ५९ | तुम भी कुरुक्षेत्रमें अत्यन्त उत्तम मूर्ति स्थापित करके परम पवित्र सुदुर्गम ब्रह्मलोकमें जाओगे। महादेवके इस प्रकार कहनेपर जितेन्द्रिय तपस्वी मङ्कणक ऋषि कुरुक्षेत्रमें मूर्ति स्थापित करके ब्रह्मलोक चले गये। मङ्कणक ऋषिके चले जानेपर पृथ्‍वी शान्त हो गयी। महादेव भी अपने पवित्र निवास-स्थान मन्दर-पर्वतपर चले गये। (पुलस्त्यजीने कहा—) द्विज ! मैंने तुमसे यह बतलाया कि उस समय शङ्करके तपस्या-हेतु जानेके कारण शून्य (उनकी उपस्थितिसे रहित) पर्वतपर जाकर दुष्टमति (अन्धक)-ने जिस कारणसे देवीसे युद्ध किया ॥ ५६-५९ ॥ |

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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बासठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६२ ॥


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