वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६३ ] अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन २९३
तिरसठवाँ अध्याय
अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नारद उवाच<br>गतोऽन्धकस्तु पाताले किमचेष्टत दानवः।<br>शङ्करो मन्दरस्थोऽपि यच्चकार तदुच्यताम्॥ १ | नारदजीने पूछा— मुने! अन्धक दानवने पातालमें जाकर क्या किया? शङ्करने मन्दरपर्वतपर रहकर जो कुछ किया उसे भी बतलाइये॥ १॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>पातालस्थोऽन्धको ब्रह्मन् बाध्यते मदनाग्निना।<br>संतप्तविग्रहः सर्वान् दानवानिदमब्रवीत्॥ २<br>स मे सुहृत्स मे बन्धुः स भ्राता स पिता मम।<br>यस्तामद्रिसुतां शीघ्रं ममान्तिकमुपानयेत्॥ ३<br>एवं ब्रुवति दैत्येन्द्रं अन्धके मदनान्धके।<br>मेघगम्भीरनिर्घोषं प्रह्लादो वाक्यमब्रवीत्॥ ४<br>येयं गिरिसुता वीर सा माता धर्मतस्तव।<br>पिता त्रिनयनो देवः श्रूयतामत्र कारणम्॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! पातालमें रहता हुआ अन्धक कामाग्निसे दुःखी हो गया; उसका शरीर सन्तप्त होने लगा। उसने सभी दानवोंसे यह कहा— (दानवो!) वही मेरा मित्र, वही मेरा बन्धु, वही भाई और वही पिता है, जो उस पर्वतपुत्रीको मेरे पास शीघ्र ला दे। कामसे अधीर हुए दैत्येन्द्र अन्धकके ऐसा कहनेपर प्रह्लादने बादलके समान गम्भीर शब्दमें कहा— वीर! ये जो गिरिजा हैं, वे धर्मतः तुम्हारी माता हैं और त्रिलोचन शङ्कर तुम्हारे पिता हैं; इसका जो कारण है, उसे तुम सुनो— ॥ २–५ ॥ |
| तव पित्रा ह्यपुत्रेण धर्मनित्येन दानव।<br>आराधितो महादेवः पुत्रार्थाय पुरा किल॥ ६<br>तस्मै त्रिलोचनेनासीद् दत्तोऽन्धोऽप्येव दानव।<br>पुत्रकः पुत्रकामस्य प्रोक्त्वेत्थं वचनं विभो॥ ७<br>नेत्रत्रयं हिरण्याक्ष नर्मार्थमुमया मम।<br>पिहितं योगसंस्थस्य ततोऽन्धमभवत्तमः॥ ८<br>तस्माच्च तमसो जातो भूतो नीलघनस्वनः।<br>तदिदं गृह्यतां दैत्य तवौपयिकमात्मजम्॥ ९ | दानव! पहले समयमें धर्ममें सदा तत्पर रहनेवाले पुत्रहीन तुम्हारे पिताने पुत्रकी कामनासे महादेवकी आराधना की थी। दानव! त्रिलोचन शङ्करने पुत्रकी कामनावाले उसको अन्ध पुत्र दिया और यह कहा कि शक्तिशाली हिरण्याक्ष! एक समय मैं योगमें स्थित था और उमाने परिहासार्थ मेरे तीनों नेत्रोंको बन्द कर दिया था। उसके बाद अन्धकारस्वरूप तम उत्पन्न हुआ। उस तमसे नीले मेघके समान शब्द करनेवाला एक भूत (प्राणी) उत्पन्न हुआ। दैत्य! तुम इसे ग्रहण करो। यह तुम्हारे योग्य पुत्र है॥ ६–९॥ |
| यदा तु लोकविद्विष्टं दुष्टं कर्म करिष्यति।<br>त्रैलोक्यजननीं चापि अभिवाञ्छिष्यतेऽधमः॥ १०<br>घातयिष्यति वा विप्रं यदा प्रक्षिप्य चासुरान्।<br>तदास्य स्वयमेवाहं करिष्ये कायशोधनम्॥ ११<br>एवमुक्त्वा गतः शम्भुः स्वस्थानं मन्दराचलम्।<br>त्वत्पिताऽपि सम्भ्यागात् त्वामादाय रसातलम्॥ १२<br>एतेन कारणेनाम्बा शैलेयी भविता तव।<br>सर्वस्यापीह जगतो गुरुः शम्भुः पिता ध्रुवम्॥ १३ | (किंतु) यह अधम जब संसारके विरोधमें बुरा कर्म करेगा तथा त्रैलोक्य-जननीकी चाह करेगा अथवा असुरोंको भेजकर जब यह विप्रोंका वध करायेगा, तब मैं स्वयं इसके शरीरकी शुद्धि करूँगा। ऐसा कहकर शम्भु अपने स्थान मन्दराचलपर चले गये और तुम्हारे पिता तुमको लेकर रसातलमें चले आये। इसी कारण शैलपुत्री तुम्हारी माता एवं समस्त जगत्के गुरु शम्भु निश्चय ही तुम्हारे पिता हैं॥ १०–१३॥ |
| भवानपि तपोयुक्तः शास्त्रवेत्ता गुणाप्लुत:।<br>नेदृशे पापसंकल्पे मतिं कुर्याद् भवद्विधः॥ १४ | आप भी तपस्या करनेवाले एवं शास्त्रके ज्ञाता तथा अनेक अलौकिक गुणोंसे भूषित हो। अतः आप-जैसे पुरुषको इस प्रकारके पाप करनेमें मानसिक निश्चय भी |