वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| २९४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्रैलोक्यप्रभुरव्यक्तो भवः सर्वैर्नमस्कृतः।<br>अजेयस्तस्य भार्येयं न त्वमर्होऽमरार्दन ॥ १५<br><br>न चापि शक्तः प्राप्तुं तां भवाच्छैलनृपात्मजाम्।<br>अजित्वा सगणं रुद्रं स च कामोऽद्य दुर्लभः ॥ १६<br><br>यस्तरेत् सागरं दोर्भ्यां पातयेद् भुवि भास्करम्।<br>मेरुमुत्पाटयेद् वापि स जयेच्छूलपाणिनम् ॥ १७ | नहीं करना चाहिये। हे देवताओंको कष्ट देनेवाले (अमर्दन!), तीनों लोकोंपर शासन करनेवाले और सबसे वन्दित अव्यक्त भगवान् शङ्कर (सर्वथा) अजेय हैं। उनकी ये भार्या हैं। तुम न तो इनके योग्य हो और न समर्थ ही। गणोंके सहित शङ्करको बिना जीते तुम उस पर्वतराजकी कन्याको प्राप्त करना चाहते हो, सो तो यह मनोरथ पूरा होना कठिन है। शूलपाणि शङ्करको वही जीत सकता है, जो अपनी भुजाओंसे समुद्रको पार कर जाय अथवा सूर्यको पृथ्वीपर गिरा दे या मेरु पर्वतको उखाड़ दे॥ १४-१७॥ |
| उताहोस्विदिमाः शक्त्याः क्रियाः कर्तुं नरैर्बलात्।<br>न च शक्यो हरो जेतुं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ १८<br><br>किं त्वया न श्रुतं दैत्य यथा दण्डो महीपतिः।<br>परस्त्रीकामवान् मूढः सराष्ट्रो नाशमाप्तवान् ॥ १९<br><br>आसीद् दण्डो नाम नृपः प्रभूतबलवाहनः।<br>स च वव्रे महातेजाः पौरोहित्याय भार्गवम् ॥ २०<br><br>ईजे च विविधैर्यज्ञैर्नृपतिः शुक्रपालितः।<br>शुक्रस्यासीच्च दुहिता अरजा नाम नामतः ॥ २१ | उपर्युक्त सभी कार्य भले ही मनुष्य बलसे कर ले, किंतु शङ्कर नहीं जीते जा सकते; यह मैंने सच-सच कह दिया है। दैत्य! क्या तुमने यह नहीं सुना है कि परस्त्रीकी अभिलाषा करनेवाला दण्ड नामका मूर्ख राजा अपने राष्ट्रके साथ विनष्ट हो गया। (सुनो, प्राचीन कालमें) प्रचुर सेना एवं वाहनोंसे भरा-पूरा दण्ड नामका एक राजा था। उस महातेजस्वीने पुरोहितके स्थानपर शुक्राचार्यको वृत किया था। शुक्राचार्यके निर्देशनमें उस राजाने भाँति-भाँतिके यज्ञोंका अनुष्ठान किया। शुक्राचार्यकी अरजा नामकी एक कन्या थी॥ १८-२१॥ |
| शुक्रः कदाचिदगमद् वृषपर्वाणमासुरम्।<br>तेनार्चितश्चिरं तत्र तस्थौ भार्गवसत्तमः ॥ २२<br><br>अरजा स्वगृहे वह्निं शुश्रूषन्ती महासुर।<br>अतिष्ठत सुचार्वङ्गी ततोऽभ्यगान्नराधिपः ॥ २३<br><br>स पप्रच्छ क्व शुक्रेति तमूचुः परिचारिकाः।<br>गतः स भगवान् शुक्नो याजनाय दनोः सुतम् ॥ २४<br><br>पप्रच्छ नृपतिः का तु तिष्ठते भार्गवाश्रमे।<br>तास्तमूचुर्गुरोः पुत्री संतिष्ठत्यरजा नृप ॥ २५ | किसी समय शुक्राचार्य वृषपर्वा नामके असुरके पास गये हुए थे। भार्गव वंशमें श्रेष्ठ वे (शुक्र) उससे पूजित-सत्कृत होकर बहुत समयतक वहीं रुके रह गये। महासुर! सुन्दरी अरजा अपने घरमें अग्निकी सेवा-हवनादि कार्य करती हुई रह गयी थी। इतनेमें एक दिन राजा दण्ड वहाँ पहुँच गया। उसने पूछा—शुक्राचार्य कहाँ हैं? घरकी सेविकाओंने उससे कहा—वे भगवान् शुक्र दनुनन्दन (वृषपर्वा)-के यहाँ यज्ञ कराने गये हैं। राजाने पूछा—शुक्राचार्यके आश्रममें (यह) कौन स्त्री रह रही है। उन लोगोंने उत्तर दिया—राजन्! (यह) गुरुजीकी कन्या अरजा है॥ २२-२५॥ |
| तामाश्रमे शुक्रसुतां द्रष्टुमैक्ष्वाकुनन्दनः।<br>प्रविवेश महाबाहुर्ददर्शारजसं ततः ॥ २६<br><br>तां दृष्ट्वा कामसंतप्तस्तत्क्षणादेव पार्थिवः।<br>संजातोऽन्धक दण्डस्तु कृतान्तबलचोदितः ॥ २७<br><br>ततो विसर्जयामास भृत्यान् भ्रातॄन् सुहृत्तमान्।<br>शुक्रशिष्यानपि बली एकाकी नृप आव्रजत् ॥ २८<br><br>तमागतं शुक्रसुता प्रत्युत्थाय यशस्विनी।<br>पूजयामास संहृष्टा भ्रातृभावेन दानव ॥ २९ | महाबाहु इक्ष्वाकुनन्दन (दण्ड) शुक्राचार्यकी उस कन्याको देखनेके लिये आश्रममें प्रविष्ट हुआ और उसने अरजाको देखा। अन्धक! कालबलसे प्रेरित होकर राजा उसे देखकर तत्काल ही कामसे पीड़ित हो गया। उसके बाद बलवान् राजाने भृत्यों, भाइयों, घनिष्ठ मित्रों एवं शुक्राचार्यके शिष्योंको भी (वहाँसे) हटा दिया और (वहाँ) अकेला आ गया। शुक्राचार्यकी यशस्विनी कन्याने आये हुए उस राजाका भ्रातृभावसे प्रसन्नतापूर्वक स्वागत-सत्कार किया॥ २६-२९॥ |