वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ६३] | अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन | २९५ |
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| ततस्तामाह नृपतिर्बाले कामाग्नितापितम्।<br>मां समाह्लादयस्वाद्य स्वपरिष्वङ्गवारिणा॥ ३०<br><br>साऽपि प्राह नृपश्रेष्ठ मा विनीनश आतुरः।<br>पिता मम महाक्रोधात् त्रिदशानपि निर्दहेत्॥ ३१<br><br>मूढबुद्धे भवान् भ्राता ममासि त्वनयाप्लुतः।<br>भगिनी धर्मतस्तेऽहं भवाञ्छिष्यः पितुर्मम॥ ३२<br><br>सोऽब्रवीद् भीरु मां शुक्रः कालेन परिधक्ष्यति।<br>कामाग्निर्निर्दहति मामद्यैव तनुमध्यमे॥ ३३ | उसके बाद राजाने उससे पूछा—बाले! मैं कामाग्निसे संतप्त हूँ। आज तुम अपने आलिङ्गनकूपी जलसे मुझे आनन्दित करो। वह (अरजा) बोली—नरपतिप्रवर! (कामसे) अधीर होकर अपनेको विनष्ट मत करो। मेरे पिता अपने महान् क्रोधसे देवताओंको भी भस्म कर सकते हैं। मूढबुद्धे! तुम मेरे भाई हो। परंतु अनीतिसे ओतप्रोत हो गये हो। मैं धर्मसे तुम्हारी बहन हूँ; क्योंकि तुम मेरे पिताके शिष्य हो। उस (दण्डक)-ने कहा—भीरु! शुक्र (भविष्यमें) किसी समय मुझे जला देंगे; परंतु कृशोदरि! कामकी आग तो मुझे आज ही (अभी) जलाये जा रही है॥ ३०-३३॥ |
| सा प्राह दण्डं नृपतिं मुहूर्तं परिपालय।<br>तमेव याचस्व गुरुं स ते दास्यत्यसंशयम्॥ ३४<br><br>दण्डोऽब्रवीत् सुतन्वङ्गि कालक्षेपो न मे क्षमः।<br>च्युतावसरकर्तृत्वे विघ्नो जायेत सुन्दरि॥ ३५<br><br>ततोऽब्रवीच्च विरजा नाहं त्वां पार्थिवात्मज।<br>दातुं शक्ता स्वमात्मानं स्वतन्त्रा न हि योषितः॥ ३६<br><br>किं वा ते बहुनोक्तेन मा त्वं नाशं नराधिप।<br>गच्छस्व शुक्रशापेन सभृत्यज्ञातिबान्धवः॥ ३७ | उस (अरजा)-ने राजा दण्डसे कहा—राजन्! एक क्षण प्रतीक्षा करो। तुम उन गुरुसे ही याचना करो। वे तुम्हें निःसन्देह मुझको दे देंगे। दण्डने कहा—सुन्दरि! मैं समयकी प्रतीक्षा करनेमें असमर्थ हूँ। बहुधा अवसर चूक जानेपर कार्यमें विघ्न हो जाया करता है। उसके बाद अरजाने कहा—राजपुत्र! मैं स्वयं अपनेको तुम्हें अर्पित करनेमें समर्थ नहीं हूँ; क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होतीं। अथवा नरपते! तुमसे अधिक कहनेसे क्या (लाभ); (बस मैं इतना ही कहती हूँ कि इस असत् प्रस्तावके कारण—) तुम शुक्राचार्यके शापसे भृत्य, जाति और बन्धुओंके साथ अपना विनाश मत करो॥ ३४-३७॥ |
| ततोऽब्रवीन्ररपतिः सुतनु शृणु चेष्टितम्।<br>चित्राङ्गदाया यद् वृत्तं पुरा देवयुगे शुभे॥ ३८<br><br>विश्वकर्मसुता साध्वी नाम्ना चित्राङ्गदाऽभवत्।<br>रूपयौवनसम्पन्ना पद्महीनेव पद्मिनी॥ ३९<br><br>सा कदाचिन्महारण्यं सखीभिः परिवारिता।<br>जगाम नैमिषं नाम स्नातुं कमललोचना॥ ४०<br><br>सा स्नातुमवतीर्णा च अथाभ्यागान्न्ररेश्वरः।<br>सुदेवतनयो धीमान् सुरथो नाम नामतः।<br>तां ददर्श च तन्वङ्गीं शुभाङ्गो मदनातुरः॥ ४१ | उसके बाद राजाने कहा—सुन्दरि! प्राचीन कालमें—पवित्र देवयुगमें घटित चित्राङ्गदाका एक वृत्तान्त सुनो। विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामकी एक साध्वी कन्या थी। वह रूप और यौवनसे सम्पन्न मानो कमलसे रहित कमलिनी थी। कमलके समान नेत्रोंवाली वह किसी समय अपनी सखियोंसे घिरी हुई—सखियोंके साथ नैमिष नामके महारण्यमें स्नान करनेके लिये गयी। वह स्नान करनेके लिये जलमें जैसे ही उतरी, वैसे ही सुदेवके पुत्र बुद्धिमान् राजा सुरथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने उस कृशाङ्गीको देखा। सुन्दर शरीरवाले वे उसे देखकर कामातुर हो गये॥ ३८-४१॥ |
| तं दृष्ट्वा सा सखीराह वचनं सत्यसंयुक्तम्।<br>असौ नराधिपसुतो मदनेन कदर्यते॥ ४२ | उनको देखकर उस (चित्राङ्गदा)-ने अपनी सखियोंसे सत्य (छिपावरहित) वचन कहा—यह राजपुत्र मेरे ही लिये कामपीड़ित होकर कष्ट पा रहा है। अतः मुझे यह |