वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| २९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| मदर्थे च क्षमं मेऽस्य स्वप्रदानं सुरूपिणः।<br>सख्यस्तामब्रुवन् बाला न प्रगल्भाऽसि सुन्दरि॥ ४३<br>अस्वातन्त्र्यं तवास्तीह प्रदाने स्वात्मनोऽनघे।<br>पिता तवास्ति धर्मिष्ठः सर्वशिल्पविशारदः ॥ ४४<br>न ते युक्तमिहात्मानं दातुं नरपतेः स्वयम्।<br>एतस्मिन्नन्तरे राजा सुरथः सत्यवाक् सुधीः ॥ ४५<br>समभ्येत्याऽब्रवीदेनां कन्दर्पशरपीडितः ।<br>त्वं मुग्धे मोहयसि मां दृष्ट्यैव मदिरेक्षणे ॥ ४६ | उचित (प्रतीत होता) है कि इस सौन्दर्यशाली व्यक्तिको मैं अपनेको समर्पित कर दूँ। उसकी 'बाला' सहेलियोंने उससे कहा कि सुन्दरि! तुम सयानी (वयस्का) नहीं हो। निष्पाप बालिके! स्वयंको दान करनेमें तुम्हें स्वतन्त्रता नहीं है; तुम्हारे पिता परम धार्मिक हैं और सभी शिल्पकर्मोंमें परम निपुण हैं, इसलिये यहाँ तुम्हें अपनेको राजाके लिये (दान) दे देना ठीक नहीं है। इसी बीच कामबाणसे पीड़ित सत्यवक्ता बुद्धिमान् सुरथने उसके पास आकर कहा—मुग्धे! मदिरेक्षणे! तुम अपनी दृष्टिसे ही मुझे मोहित कर रही हो॥ ४२-४६॥ |
| त्वद्दृष्टिशरपातेन स्मरेणाभ्येत्य ताडितः।<br>तन्मां कुचतले तल्पे अभिशायितुमर्हसि ॥ ४७<br>नोचेत् प्रधक्ष्यते कामो भूयो भूयोऽतिदर्शनात् ।<br>ततः सा चारुसर्वाङ्गी राज्ञो राजीवलोचना ॥ ४८<br>वार्यमाणा सखीभिस्तु प्रादादात्मानमात्मना ।<br>एवं पुरा तया तन्व्या परित्रातः स भूपतिः ॥ ४९<br>तस्मान्मामपि सुश्रोणि त्वं परित्रातुमर्हसि ।<br>अरजस्काऽब्रवीद् दण्डं तस्या यद् वृत्तमुत्तरम् ॥ ५०<br>किं त्वया न परिज्ञातं तस्मात् ते कथयाम्यहम्।<br>तदा तया तु तन्वङ्ग्या सुरथस्य महीपतेः ॥ ५१<br>आत्मा प्रदत्तः स्वातन्त्र्यात् ततस्तामशपत् पिता।<br>यस्माद् धर्मं परित्यज्य स्त्रीभावान्मन्दचेतसे ॥ ५२<br>आत्मा प्रदत्तस्तस्माद्धि न विवाहो भविष्यति ।<br>विवाहरहिता नैव सुखं लप्स्यसि भर्तुतः ॥ ५३ | कामदेवने उपस्थित होकर तुम्हारी दृष्टिरूपी बाणसे मुझे घायल कर दिया है। इसलिये तुम मुझे अपने कुचतलरूपी शय्यापर सुलानेकी योग्या हो। ऐसा न करनेपर बार-बार तुम्हारे देखनेसे तो काम मुझे जला ही डालेगा। उसके बाद उस कमलनयनी सर्वाङ्गसुन्दरीने सखियोंके रोकनेपर भी स्वयंको राजाके प्रति अर्पित कर दिया। इस तरह प्राचीन कालमें उस कृशाङ्गीने उस राजाकी रक्षा की थी। अतः सुश्रोणि! तुम्हें भी मेरी रक्षा करनी चाहिये। शुक्रनन्दिनी अरजाने राजा दण्डसे कहा—क्या तुम उसके आगेकी घटित घटनाको नहीं जानते? (ऐसा ही लगता है;) अतः मैं तुमसे कहती हूँ, (सुनो)। जब उस कृशाङ्गीने स्वयंको राजा सुरथके लिये स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी इच्छासे दान कर दिया, तब पिताने उसको शाप दे दिया। मन्दबुद्धि! यतः तुमने स्त्रीस्वभावके कारण धर्मको छोड़कर (अपनी इच्छासे) स्वयंको प्रदान कर दिया है, अतः तुम्हारा विवाह नहीं होगा। (और तब विवाहसे रहित होनेके कारण) तुम पतिसे सुख नहीं प्राप्त कर सकोगी॥ ४७-५३॥ |
| न च पुत्रफलं नैव पतिना योगमेष्यसि ।<br>उत्सृष्टमात्रे शापे तु ह्यपोवाह सरस्वती ॥ ५४<br>अकृतार्थं नरपतिं योजनानि त्रयोदश।<br>अपकृष्टे नरपतौ साऽपि मोहमुपागता ॥ ५५<br>ततस्तां सिषिचुः सख्यः सरस्वत्या जलेन हि।<br>सा सिच्यमाना सुतरां शिशिरेणाप्यथाम्भसा ॥ ५६<br>मृतकल्पा महाबाहो विश्वकर्मसुताऽभवत् ।<br>तां मृतामिति विज्ञाय जग्मुः सख्यस्त्वरान्विताः ॥ ५७ | तुम्हें न तो पुत्रफलकी प्राप्ति होगी और न पतिसे संयोग ही होगा। फिर तो शाप देते ही सरस्वती व्यर्थ हुए मनोरथवाले राजाको तेरह योजनतक बहा ले गयी। राजाके (बहकर) दूर चले जानेपर चित्राङ्गदा भी बेहोश हो गयी। महाबाहो! उसके बाद सखियोंने सरस्वतीके जलसे उसको सींचा। सखियोंद्वारा शीतल जलसे भलीभाँति सींचे जानेपर भी वह विश्वकर्माकी पुत्री मरे हुएके समान हो गयी। सखियाँ उसे मरी हुई समझकर शीघ्रतासे कोई |