भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 307

| अध्याय ६३ ] | अन्धकासुरका प्रसङ्ग, दण्डकाख्यानका कथन, दण्डकका अरजासे चित्राङ्गदाका वृत्तान्त-कथन | २९७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
काष्ठान्याहर्तुमपरा वह्निमानेतुमाकुला।<br>सा च तास्वपि सर्वासु गतासु वनमुत्तमम्॥ ५८<br>संज्ञां लेभे सुचार्वङ्गी दिशश्चाप्यवलोकयत्।<br>अपश्यन्ती नरपतिं तथा स्निग्धं सखीजनम्॥ ५९<br>निपतात सरस्वत्याः पयसि स्फुरितेक्षणा।<br>तां वेगात् काञ्चनाक्षी तु महानद्यां नरेश्वर॥ ६०<br>गोमत्यां परिचिक्षेप तरङ्गकुटिले जले।<br>तयाऽपि तस्यास्तद्भाव्यं विदित्वाऽथ विशांपते॥ ६१<br>महावने परिक्षिप्ता सिंहव्याघ्रभयाकुले।<br>एवं तस्याः स्वतन्त्राया एषाऽवस्था श्रुता मया॥ ६२<br>तस्मान्न दास्याम्यात्मानं रक्षन्ती शीलमुत्तमम्।<br>तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा दण्डः शक्रसमो बली।<br>विहस्य त्वरजां प्राह स्वार्थमर्थक्षयंकरम्॥ ६३काष्ठ लेने एवं कुछ व्याकुल होकर अग्नि लाने चली गयीं। उत्तम वनमें उन सभीके चले जानेपर उसे चेतना प्राप्त हुई; सुन्दर अङ्गोंवाली वह चारों ओर देखने लगी। राजा एवं प्रिय सखियोंको न देखकर चञ्चल नेत्रवाली वह सरस्वतीके जलमें गिर पड़ी। नरेश्वर! काञ्चनाक्षीने वेगपूर्वक उसे महानदी गोमतीकी हिलोरे लेती हुई लहरोंवाले जलमें फेंक दिया। राजन्! उसकी भवितव्यताको जानकर उस (गोमती)-ने भी उसे सिंह एवं व्याघ्रसे पूर्ण वनमें फेंक दिया। इस प्रकार मैंने उसकी स्वतन्त्रताकी इस दुरवस्थाका वर्णन सुना है। अतः मैं अपने उत्तम शीलकी रक्षा करती हुई स्वयंको तुम्हें समर्पित नहीं करूँगी। इन्द्रके तुल्य बलवान् राजा दण्डने उसके उस वचनको सुनकर हँसते हुए उस अरजासे पुरुषार्थको नष्ट करनेवाला अपना अभिप्राय कहा॥ ५८—६३॥
दण्ड उवाच<br>तस्या यदुत्तरं वृत्तं तत्पितुश्च कृशोदरि।<br>सुरथस्य तथा राजंस्तच्छ्रोतुं मतिमादध॥ ६४<br>यदाऽवकृष्टे नृपतौ पतिता सा महावने।<br>तदा गगनसंचारी दृष्टवान् गुह्यकोऽञ्जनः॥ ६५<br>ततः सोऽभ्येत्य तां बालां परिसान्त्व्य प्रयत्नतः।<br>प्राह मा गच्छ सुभगे विषादं सुरथं प्रति॥ ६६<br>ध्रुवमेष्यसि तेन त्वं संयोगमसितेक्षणे।<br>तस्माद् गच्छस्व शीघ्रं त्वं द्रष्टुं श्रीकण्ठमीश्वरम्॥ ६७**दण्डने कहा—**कृशोदरि! उसके पिता तथा राजा सुरथके साथ घटित हुए उसके बादके वृत्तान्तको सुननेके लिये तुम सावधान हो जाओ। राजाके दूर चले जानेपर जब वह महावनमें गिरी, उस समय आकाशमें संचरण करनेवाले अञ्जन नामके गुह्यकने उसे देखा। उसके बाद वह उस बालाके पास गया और प्रयत्नपूर्वक उसे सान्त्वना देते हुए कहा—सुभगे! सुरथके लिये उदास मत होओ। अयि कजरारे नेत्रोंवाली! तुम उससे संयोग अवश्य प्राप्त कर लोगी। अतः तुम शीघ्र भगवान् श्रीकण्ठका दर्शन करनेके लिये चली जाओ॥ ६४—६७॥
इत्येवमुक्ता सा तेन गुह्यकेन सुलोचना।<br>श्रीकण्ठमागता तूर्णं कालिन्द्या दक्षिणे तटे॥ ६८<br>दृष्ट्वा महेशं श्रीकण्ठं स्नात्वा रविसुताजले।<br>अतिष्ठत शिरोनम्रा यावन्मध्यस्थितो रविः॥ ६९<br>अथाजगाम देवस्य स्नानं कर्तुं तपोधनः।<br>शुभः पाशुपताचार्यः सामवेदी ऋतध्वजः॥ ७०<br>ददर्श तत्र तन्वङ्गीं मुनिश्चित्राङ्गदां शुभाम्।<br>रतीमिव स्थितां पुण्यामनङ्गपरिवर्जिताम्॥ ७१उस गुह्यकके ऐसा कहनेपर सुन्दर नेत्रोंवाली वह शीघ्रतापूर्वक कालिन्दीके दक्षिण तटपर स्थित श्रीकण्ठके निकट चली गयी। वह कालिन्दीके जलमें स्नान करके महेश्वर श्रीकण्ठका दर्शन कर दोपहरतक सिर झुकाये स्थित रही। इतनेमें देव श्रीकण्ठके पास शुभ लक्षणोंसे युक्त, पाशुपताचार्य, सामवेदी, तपोधन, ऋतध्वज स्नान करनेके लिये आये। मुनिने कामसे रहित रतिके समान कृशाङ्गी कल्याणकारिणी चित्राङ्गदाको वहाँ देखा॥ ६८—७१॥
तां दृष्ट्वा स मुनिर्ध्यानमगमत् केयमित्युत।<br>अथ सा तमृषिं वन्द्य कृताञ्जलिरुपस्थिता॥ ७२उन मुनिने उसको देखकर ध्यान किया कि यह कौन है। इसके बाद वह उन ऋषिके निकट जाकर उन्हें प्रणाम कर हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी।