भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 489 में से

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पृष्ठ 308

| २९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६३ | | :--- | :--- |

| तां प्राह पुत्रि कस्यासि सुता सुरसुतोपमा।<br>किमर्थमागतासीह निर्मनुष्यमृगे वने॥ ७३<br>ततः सा प्राह तमृषिं यथातथ्यं कृशोदरी।<br>श्रुत्वर्षिः कोपमगमदशपच्छिल्पिनां वरम्॥ ७४<br>यस्मात् स्वतनूजातेयं परदेयाऽपि पापिना।<br>योजिता नैव पतिना तस्माच्छाखामृगोऽस्तु सः॥ ७५ | (ऋषिने) उससे पूछा—पुत्रि! देवकन्याकी भाँति तुम किसकी पुत्री हो? मनुष्य तथा पशुरहित इस वनमें तुम क्यों आयी हो? उसके बाद उस कृशोदरीने उन ऋषिसे सच्ची बात कही। उसे सुनकर ऋषि क्रुद्ध हो गये और शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माको शाप दे दिया—यतः उस पापीने दूसरेके देनेयोग्य भी अपनी इस पुत्रीको पतिसे युक्त नहीं किया, अतः वह शाखामृग (बन्दर) हो जाय॥ ७२—७५॥ | | इत्युक्त्वा स महायोगी भूयः स्नात्वा विधानतः।<br>उपास्य पश्चिमां सन्ध्यां पूजयामास शङ्करम्॥ ७६<br>सम्पूज्य देवदेवेशं यथोक्तविधिना हरम्।<br>उवाचागम्यतां सुभ्रू सुदतीं पतिलालसाम्॥ ७७<br>गच्छस्व सुभगे देशं सप्तगोदावरं शुभम्।<br>तत्रोपास्य महेशानं महान्तं हाटकेश्वरम्॥ ७८<br>तत्र स्थिताया रम्भोरु ख्याता देववती शुभा।<br>आगमिष्यति दैत्यस्य पुत्री कन्दर्मालिनः॥ ७९ | यह कहनेके बाद उन महायोगीने पुनः विधिपूर्वक स्नान एवं पश्चिम (सायंकालीन) सन्ध्या कर शङ्करजीका पूजन किया। शास्त्रमें कही गयी विधिसे देवेश्वर शङ्करकी पूजा करनेके बाद उन्होंने पतिको चाहनेवाली तथा सुन्दर भौंहों और दाँतोंवाली चित्राङ्गदासे कहा—सुभगे! कल्याण-दायक सप्तगोदावर नामके देशमें जाओ। वहाँ महान् हाटकेश्वर भगवान्‌की पूजा करते हुए निवास करो। रम्भोरु! वहाँपर रहती हुई दैत्य कन्दर्मालीकी प्रसिद्ध देववती नामकी कल्याणकारिणी पुत्री तुम्हारे पास आयेगी॥ ७६—७९॥ | | तथाऽन्या गुह्यकसुता नन्दयन्तीति विश्रुता।<br>अञ्जनस्यैव तत्रापि समेष्यति तपस्विनी।<br>तथाऽपरा वेदवती पर्जन्यदुहिता शुभा॥ ८०<br>यदा तिस्रः समेष्यन्ति सप्तगोदावरे जले।<br>हाटकाख्ये महादेवे तदा संयोगमेष्यसि॥ ८१<br>इत्येवमुक्ता मुनिना बाला चित्राङ्गदा तदा।<br>सप्तगोदावरं तीर्थमगमत् त्वरिता ततः॥ ८२<br>सम्प्राप्य तत्र देवेशं पूजयन्ती त्रिलोचनम्।<br>समध्यास्ते शुचिपरा फलमूलाशनऽभवत्॥ ८३<br>स चर्षिर्ज्ञानसम्पन्नः श्रीकण्ठायतनेऽलिखत्।<br>श्लोकमेकं महाख्यानं तस्याश्च प्रियकाम्यया॥ ८४<br>न सोऽस्ति कश्चित् त्रिदशोऽसुरो वा<br>यक्षोऽथ मर्त्यो रजनीचरो वा।<br>इदं हि दुःखं मृगशावनेत्र्या<br>निर्मार्जयेद् यः स्वपराक्रमेण॥ ८५<br>इत्येवमुक्त्वा स मुनिर्जगाम<br>द्रष्टुं विभुं पुष्करनाथमीड्यम्।<br>नदीं पयोष्णीं मुनिवृन्दवन्द्यां<br>संचिन्तयन्नेव विशालनेत्राम्॥ ८६ | इसके सिवाय वहींपर अञ्जन नामक गुह्यककी प्रसिद्ध नन्दयन्ती नामकी तपस्विनी पुत्री तथा वेदवती नामक पर्जन्यकी कल्याणमयी पुत्री भी आयेगी। जब वे तीनों हाटकेश्वर महादेवके पास सप्तगोदावरमें आयेंगी उस समय तुम उनसे मिलोगी। मुनिके इस प्रकार कहनेपर बाला चित्राङ्गदा वहाँसे शीघ्र सप्तगोदावर नामके तीर्थमें गयी। वहाँ जानेके बाद वह देवाधिदेव त्रिलोचनकी पूजा तथा फल-मूलका भक्षण करती हुई पवित्रतापूर्वक रहने लगी और उन ज्ञानसम्पन्न ऋषिने उसकी हित-कामनासे प्रेरित होकर श्रीकण्ठके मन्दिरमें महान् आख्यानसे युक्त एक श्लोक लिखा—‘ऐसा कोई देवता, असुर, यक्ष, मनुष्य या राक्षस नहीं है, जो अपने पराक्रमसे इस मृगनयनीका दुःख दूर कर सके।' इस प्रकार श्लोक कहने (लिखने)-के बाद उस विशालाक्षीके विषयमें सोच-विचार करते हुए वे मुनि पूज्य विभु पुष्करनाथका दर्शन करनेके लिये मुनिवृन्दसे वन्द्य पयोष्णी नदीके तटपर चले गये॥ ८०—८६॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६३॥

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