वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 309, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 309
अध्याय ६४] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन २९९
चौंसठवाँ अध्याय
चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन
| दण्ड उवाच | दण्डने कहा— |
|---|---|
| चित्राङ्गदायास्त्वरजे तत्र सत्या यथासुखम्।<br>स्मरन्त्याः सुरथं वीरं महान् कालः समभ्यगात्॥ १<br>विश्वकर्माऽपि मुनिना शप्तो वानरतां गतः।<br>न्यपतन्मेरुशिखराद् भूपृष्ठं विधिचोदितः॥ २<br>वनं घोरं सुगुल्माढ्यं नदीं शालूकिनीमनु।<br>शाल्वेयं पर्वतश्रेष्ठं समावसति सुन्दरि॥ ३<br>तत्रासतोऽस्य सुचिरं फलमूलान्यथाश्नतः।<br>कालोऽत्यगाद् वरारोहे बहुवर्षगणो वने॥ ४ | अरजे! वहाँ वीर सुरथका स्मरण करते हुए आनन्दपूर्वक चित्राङ्गदाका लंबा समय व्यतीत हो गया। मुनिद्वारा शापित हो जानेके कारण विश्वकर्मा भी बन्दर हो गये। होनहारवश वे मेरुकी ऊँची चोटीसे गिरकर पृथ्वीपर आ गये। सुन्दरि! (फिर) वे शालूकिनी नदीके निकट घने झुरमुटोंसे भरे भयङ्कर वनवाले पर्वतश्रेष्ठ शाल्वेयपर रहने लगे। वरारोहे! उस वनमें फल-मूल खाकर रहते हुए उनके बहुत वर्षोंके युग निकल गये॥ १–४॥ |
| एकदा दैत्यशार्दूलः कन्दराख्यः सुतां प्रियाम्।<br>प्रतिगृह्य समभ्यागात् ख्यातां देववतीमिति॥ ५<br>तां च तद् वनमायान्तीं समं पित्रा वराननाम्।<br>ददर्श वानरश्रेष्ठः प्रजग्राह बलात् करे॥ ६<br>ततो गृहीतां कपिना स दैत्यः स्वसुतां शुभे।<br>कन्दरो वीक्ष्य संक्रुद्धः खड्गमुद्यम्य चाद्रवत्॥ ७<br>तमापतन्तं दैत्येन्द्रं दृष्ट्वा शाखामृगो बली।<br>तथैव सह चार्वङ्ग्या हिमाचलमुपागतः॥ ८ | एक समय कन्दर नामका दैत्य वीर 'देववती' नामसे प्रसिद्ध अपनी प्रिय पुत्रीको साथ लेकर वहाँ आया। उसके बाद पिताके साथ वनमें आ रही उस सुन्दरीको उस वानरश्रेष्ठने देखा, (उसने) बलपूर्वक उसका हाथ पकड़ लिया। शुभे! दैत्य कन्दर अपनी कन्याको बन्दरसे पकड़ी गयी देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हो गया और तलवार उठाकर दौड़ पड़ा। बलशाली बन्दर (अपने पीछे) उस दैत्येन्द्रको आते देखकर उस सुन्दरी कन्याको साथ लिये हिमालयपर चला गया॥ ५–८॥ |
| ददर्श च महादेवं श्रीकण्ठं यमुनातीरे।<br>तस्याविदूरे गहनमाश्रमं ऋषिवर्जितम्॥ ९<br>तस्मिन् महाश्रमे पुण्ये स्थाप्य देववतीं कपिः।<br>न्यमज्जत स कालिन्द्यां पश्यतो दानवस्य हि॥ १०<br>सोऽजानन् तां मृतां पुत्रीं समं शाखामृगेण हि।<br>जगाम च महातेजाः पातालं निलयं निजम्॥ ११<br>स चापि वानरो देव्या कालिन्द्या वेगतो हृतः।<br>नीतः शिवीति विख्यातं देशं शुभजनावृतम्॥ १२ | उसने यमुनाके तटपर महादेव श्रीकण्ठका दर्शन किया। (उसने) उससे थोड़ी दूरपर ऋषियोंसे रहित एक दुर्गम आश्रम भी देखा। उस पवित्र महाश्रममें देववतीको रखकर वह बन्दर दैत्य कन्दरके देखते-देखते कालिन्दी (-के जल)-में डूब गया। उस कन्दरने बन्दरके साथ पुत्रीको (डूबकर) मरी हुई समझ लिया। अतः (निराश होकर) वह महातेजस्वी पातालमें स्थित अपने घरमें चला गया और वेगपूर्वक उस बन्दरको भी देवी कालिन्दी शुभजनोंसे व्याप्त शिवि नामसे प्रसिद्ध स्थानमें बहाकर ले गयी॥ ९–१२॥ |
| ततस्तीर्त्वाऽथ वेगेन स कपिः पर्वतं प्रति।<br>गन्तुकामो महातेजा यत्र न्यस्ता सुलोचना॥ १३ | उसके बाद महातेजस्वी उस बन्दरने तेजीसे तैरकर उसे पार करनेके बाद उस पर्वतपर जानेकी इच्छा की, |