वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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३०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६४ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथापश्यत् समायान्तमञ्जनं गुह्यकोत्तमम्।<br>नन्दयन्त्या समं पुत्र्या गत्वा जिगमिषुः कपिः॥ १४<br><br>तां दृष्ट्वाऽमन्यत श्रीमान् सेयं देववती ध्रुवम्।<br>तन्मे वृथा श्रमो जातो जलमज्जनसम्भवः॥ १५<br><br>इति संचिन्तयन्नेव समाद्रवत सुन्दरीम्।<br>सा तद्भयाच्च न्यपतन्नदीं चैव हिरण्वतीम्॥ १६ | जहाँ वह सुनयना रखी गयी थी। इसके बाद उसने नन्दयन्ती नामकी पुत्रीके साथ आते हुए श्रेष्ठ गुह्यक अञ्जनको देखा। जानेकी इच्छा करनेवाला वह बन्दर (उसके) निकट गया। उसे देखकर श्रीमान् कपिने सोचा कि सचमुच यह वही देववती है। अतः जलमें डूबनेका मेरा परिश्रम व्यर्थ हो गया। इस प्रकार सोचता हुआ वह बन्दर उस सुन्दरीकी ओर दौड़ा। उसके भयसे वह कन्या हिरण्वती नदीमें कूद पड़ी॥ १३—१६॥ |
| गुह्यको वीक्ष्य तनयां पतितामापगाजले।<br>दुःखशोकसमाक्रान्तो जगामाञ्जनपर्वतम्॥ १७<br><br>तत्रासौ तप आस्थाय मौनव्रतधरः शुचिः।<br>समास्ते वै महातेजाः संवत्सरगणान् बहून्॥ १८<br><br>नन्दयन्त्यपि वेगेन हिरण्वत्याऽपवाहिता।<br>नीता देशं महापुण्यं कौशलं साधुभिर्युतम्॥ १९<br><br>गच्छन्ती सा च रुदती ददृशे वटपादपम्।<br>प्ररोहप्रावृततनुं जटाधरमिवेश्वरम्॥ २० | कन्याको नदीके जलमें कूदती हुई देखकर गुह्यक दुःख और शोकसे विह्वल होता हुआ अञ्जनपर्वतपर चला गया। वह महातेजस्वी वहाँ पवित्रतापूर्वक मौन-व्रत धारण करके बहुत वर्षोंतक तप करता रहा। हिरण्वती भी (जलधाराके) वेगसे नन्दयन्तीको भी बहा ले गयी और सज्जनोंसे सेवित महापवित्र कोशल देशमें उसे पहुँचा दिया। जाते समय रोती हुई उसने जटा-धारी शङ्करकी भाँति बरोहोंसे घिरी हुई जड़वाले एक वटवृक्षको देखा॥ १७—२०॥ |
| तं दृष्ट्वा विपुलच्छायं विशश्राम वरानना।<br>उपविष्टा शिलापट्टे ततो वाचं प्रशश्रुवे॥ २१<br><br>न सोऽस्ति पुरुषः कश्चिद् यस्तं ब्रूयात् तपोधनम्।<br>यथा स तनयस्तुभ्यमुद्वद्धो वटपादपे॥ २२<br><br>सा श्रुत्वा तां तदा वाणीं विस्पष्टाक्षरसंयुताम्।<br>तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव समन्तादवलोकयत्॥ २३<br><br>ददृशे वृक्षशिखरे शिशुं पञ्चाब्दिकं स्थितम्।<br>पिङ्गलाभिर्जटाभिस्तु उद्वद्धं यत्नतः शुभे॥ २४ | वह सुमुखी घनी छायावाले उस वृक्षको देखकर एक पत्थरपर बैठ गयी और विश्राम करने लगी। उसके बाद उसने यह वाणी सुनी—'क्या कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो उस तपोधन (ऋतध्वज)-से कहे कि तुम्हारा वह पुत्र वटवृक्षमें बँधा हुआ है।' उसने उस समय सुस्पष्ट अक्षरोंसे युक्त उस वाणीको सुनकर चारों ओर ऊपर-नीचे देखा। शुभे! (तब) उसने वृक्षकी सबसे ऊँची चोटीपर यत्नपूर्वक पिङ्गलवर्णकी जटाओंसे बँधे पाँच वर्षके एक बालकको देखा॥ २१—२४॥ |
| तं विद्रुवन्तं दृष्ट्वैव नन्दयन्ती सुदुःखिता।<br>प्राह केनासि बद्धस्त्वं पापिना वद बालक॥ २५<br><br>स तामाह महाभागे बद्धोऽस्मि कपिना वटे।<br>जटास्वेवं सुदुष्टेन जीवामि तपसो बलात्॥ २६<br><br>पुरोन्मत्तपुरेत्येव तत्र देवो महेश्वरः।<br>तत्रास्ति तपसो राशिः पिता मम ऋतध्वजः॥ २७<br><br>तस्यास्मि जपमानस्य महायोगं महात्मनः।<br>जातोऽलिवृन्दसंयुक्तः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २८ | अत्यन्त दुःखित होती हुई नन्दयन्तीने उस बोलनेवालेको ऊपर देखकर कहा—अरे बालक! बतलाओ, किस पापीने तुम्हें बाँधा है? उस बालकने उससे कहा—महाभागे! एक महादुष्ट बन्दरने मुझे जटाओंद्वारा इस वटमें बाँध दिया है। मैं अपने तपोबलसे ही जी रहा हूँ। पहले उन्मत्तपुरमें देव महेश्वर प्रतिष्ठित थे। वहाँ तपके राशिस्वरूप (महातपस्वी) मेरे पिता ऋतध्वज निवास करते थे। महायोगका जप-तप कर रहे उन महात्माका मैं सभी शास्त्रोंमें निपुण एवं भौंरोंके समूहसे युक्त पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २५—२८॥ |