वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६४ ] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन ३०१
| ततो मामब्रवीत् तातो नाम कृत्वा शुभानने।<br>जाबालीति परिख्याय तच्छृणुष्व शुभानने॥ २९<br>पञ्चवर्षसहस्राणि बाल एव भविष्यसि।<br>दशवर्षसहस्राणि कुमारत्वे चरिष्यसि॥ ३०<br>विंशतिं यौवनस्थायी वीर्येण द्विगुणं ततः।<br>पञ्चवर्षशतान् बालो भोक्ष्यसे बन्धनं दृढम्॥ ३१<br>दशवर्षशतान्येव कौमारे कायपीडनम्।<br>यौवने परमान् भोगान् द्विसहस्रसमास्तथा॥ ३२ | शुभानने! पिताजीने मेरा नाम जाबालि रखकर मुझसे जो कुछ कहा, उसे सुनो। उन्होंने कहा—तुम पाँच हजार वर्षोंतक बालक रहोगे एवं दस हजार वर्षोंतक कुमार रहोगे। बीस वर्षोंतक तुम्हारा पराक्रमपूर्ण यौवन रहेगा और उसके बाद उसके दुगुने समयतक बुढ़ापेकी स्थिति रहेगी। बाल्यावस्थामें पाँच सौ वर्षोंतक तुम्हें दृढ़ बन्धन भोगना पड़ेगा। उसके बाद एक हजार वर्षोंतक कुमारावस्थामें तुम्हें शारीरिक कष्ट भोगना पड़ेगा तथा युवावस्थामें दो हजार वर्षोंतक तुम उत्तम भोगोंको प्राप्त करोगे॥ २९—३२॥ |
| चत्वारिंशच्छतान्येव वार्धके क्लेशमुत्तमम्।<br>लप्स्यसे भूमिशय्याढ्यं कदन्नाशनभोजनम्॥ ३३<br>इत्येवमुक्तः पित्राऽहं बालः पञ्चाब्ददेशिकः।<br>विचरामि महीपृष्ठं गच्छन् स्नातुं हिरण्वतीम्॥ ३४<br>ततोऽपश्यं कपिवरं सोऽवदन्मां क्व यास्यसि।<br>इमां देववतीं गुह्यां मूढ न्यस्तां महाश्रमे॥ ३५<br>ततोऽसौ मां समादाय विस्फुरन्तं प्रयत्नतः।<br>वटाग्रेऽस्मिन्नुद्बबन्ध जटाभिरपि सुन्दरि॥ ३६ | बुढ़ापेमें चालीस सौ वर्षोंतक अत्यन्त क्लेश भोगना होगा। उस समय तुम्हें भूमिपर सोना तथा कुत्सित-अन्न—कदन्न—साँवा, कोदो (आदि)-का भोजन करना पड़ेगा। पिताके इस प्रकार कहनेके बाद पाँच वर्षकी अवस्थामें मैं हिरण्वतीमें स्नान करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर विचरता हुआ जा रहा था। उस समय मैंने एक श्रेष्ठ बन्दरको देखा। उसने मुझसे कहा—अरे मूढ़! इस महान् आश्रममें रखी हुई इस देववतीको लेकर तू कहाँ जा रहा है? सुन्दरि! उसके बाद उसने छटपटाते हुए मुझको पकड़कर प्रयत्नपूर्वक इस वटवृक्षके शिखरपर जटाओं (बरोहों)-से बाँध दिया॥ ३३—३६॥ |
| तथा च रक्षा कपिना कृता भीरु निरन्तरैः।<br>लतापाशैर्महायन्त्रमधस्ताद् दुष्टबुद्धिना॥ ३७<br>अभेद्योऽयमनाक्रम्य उपरिष्टात् तथाप्यधः।<br>दिशां मुखेषु सर्वेषु कृतं यन्त्रं लतामयम्॥ ३८<br>संयम्य मां कपिवरः प्रयातोऽमरपर्वतम्।<br>यथेच्छया मया दृष्टमेतत् ते गदितं शुभे॥ ३९<br>भवती का महारण्ये ललना परिवर्जिता।<br>समायाता सुचार्वङ्गी केन सार्थेन मां वद॥ ४० | भीरु! उस कुमति बन्दरने बहुत-से लता-जालोंसे एक महान् यन्त्र (छज्जा) बनाकर उसके नीचे मुझे स्थापित कर दिया और सदा मेरी रक्षा करता रहा। सभी दिशाओंमें चारों ओरसे बनाया गया यह लतायन्त्र न तो टूट सकता है और न किसी प्रकार ऊपर या नीचेसे इसके ऊपर आक्रमण ही किया जा सकता है। वह श्रेष्ठ बन्दर मुझको बाँधकर स्वेच्छासे अमर-पर्वतपर चला गया। शुभे! मैंने जो कुछ देखा था उसे तुमसे कह दिया। सुन्दरि! मुझे बतलाओ कि तुम कौन हो एवं इस विस्तृत वनमें अकेली तुम किसके साथ आयी हो?॥ ३७—४०॥ |
| साऽब्रवीदञ्जनो नाम गुह्यकेन्द्रः पिता मम।<br>नन्दयन्तीति मे नाम प्रम्लोचागर्भसम्भवा॥ ४१<br>तत्र मे जातके प्रोक्तमृषिणा मुद्गलेन हि।<br>इयं नरेन्द्रमहिषी भविष्यति न संशयः॥ ४२ | उसने कहा—गुह्यकराज अञ्जन मेरे पिता हैं। मेरा नाम नन्दयन्ती है। मेरा जन्म प्रम्लोचाके गर्भसे हुआ है। मेरे जन्मके समय मुद्गल ऋषि ने कहा था कि यह कन्या भविष्यमें राजरानी बनेगी। |