वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३०० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६४ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथापश्यत् समायान्तमञ्जनं गुह्यकोत्तमम्।<br>नन्दयन्त्या समं पुत्र्या गत्वा जिगमिषुः कपिः॥ १४<br><br>तां दृष्ट्वाऽमन्यत श्रीमान् सेयं देववती ध्रुवम्।<br>तन्मे वृथा श्रमो जातो जलमज्जनसम्भवः॥ १५<br><br>इति संचिन्तयन्नेव समाद्रवत सुन्दरीम्।<br>सा तद्भयाच्च न्यपतन्नदीं चैव हिरण्वतीम्॥ १६ | जहाँ वह सुनयना रखी गयी थी। इसके बाद उसने नन्दयन्ती नामकी पुत्रीके साथ आते हुए श्रेष्ठ गुह्यक अञ्जनको देखा। जानेकी इच्छा करनेवाला वह बन्दर (उसके) निकट गया। उसे देखकर श्रीमान् कपिने सोचा कि सचमुच यह वही देववती है। अतः जलमें डूबनेका मेरा परिश्रम व्यर्थ हो गया। इस प्रकार सोचता हुआ वह बन्दर उस सुन्दरीकी ओर दौड़ा। उसके भयसे वह कन्या हिरण्वती नदीमें कूद पड़ी॥ १३—१६॥ |
| गुह्यको वीक्ष्य तनयां पतितामापगाजले।<br>दुःखशोकसमाक्रान्तो जगामाञ्जनपर्वतम्॥ १७<br><br>तत्रासौ तप आस्थाय मौनव्रतधरः शुचिः।<br>समास्ते वै महातेजाः संवत्सरगणान् बहून्॥ १८<br><br>नन्दयन्त्यपि वेगेन हिरण्वत्याऽपवाहिता।<br>नीता देशं महापुण्यं कौशलं साधुभिर्युतम्॥ १९<br><br>गच्छन्ती सा च रुदती ददृशे वटपादपम्।<br>प्ररोहप्रावृततनुं जटाधरमिवेश्वरम्॥ २० | कन्याको नदीके जलमें कूदती हुई देखकर गुह्यक दुःख और शोकसे विह्वल होता हुआ अञ्जनपर्वतपर चला गया। वह महातेजस्वी वहाँ पवित्रतापूर्वक मौन-व्रत धारण करके बहुत वर्षोंतक तप करता रहा। हिरण्वती भी (जलधाराके) वेगसे नन्दयन्तीको भी बहा ले गयी और सज्जनोंसे सेवित महापवित्र कोशल देशमें उसे पहुँचा दिया। जाते समय रोती हुई उसने जटा-धारी शङ्करकी भाँति बरोहोंसे घिरी हुई जड़वाले एक वटवृक्षको देखा॥ १७—२०॥ |
| तं दृष्ट्वा विपुलच्छायं विशश्राम वरानना।<br>उपविष्टा शिलापट्टे ततो वाचं प्रशश्रुवे॥ २१<br><br>न सोऽस्ति पुरुषः कश्चिद् यस्तं ब्रूयात् तपोधनम्।<br>यथा स तनयस्तुभ्यमुद्वद्धो वटपादपे॥ २२<br><br>सा श्रुत्वा तां तदा वाणीं विस्पष्टाक्षरसंयुताम्।<br>तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव समन्तादवलोकयत्॥ २३<br><br>ददृशे वृक्षशिखरे शिशुं पञ्चाब्दिकं स्थितम्।<br>पिङ्गलाभिर्जटाभिस्तु उद्वद्धं यत्नतः शुभे॥ २४ | वह सुमुखी घनी छायावाले उस वृक्षको देखकर एक पत्थरपर बैठ गयी और विश्राम करने लगी। उसके बाद उसने यह वाणी सुनी—'क्या कोई ऐसा पुरुष नहीं है जो उस तपोधन (ऋतध्वज)-से कहे कि तुम्हारा वह पुत्र वटवृक्षमें बँधा हुआ है।' उसने उस समय सुस्पष्ट अक्षरोंसे युक्त उस वाणीको सुनकर चारों ओर ऊपर-नीचे देखा। शुभे! (तब) उसने वृक्षकी सबसे ऊँची चोटीपर यत्नपूर्वक पिङ्गलवर्णकी जटाओंसे बँधे पाँच वर्षके एक बालकको देखा॥ २१—२४॥ |
| तं विद्रुवन्तं दृष्ट्वैव नन्दयन्ती सुदुःखिता।<br>प्राह केनासि बद्धस्त्वं पापिना वद बालक॥ २५<br><br>स तामाह महाभागे बद्धोऽस्मि कपिना वटे।<br>जटास्वेवं सुदुष्टेन जीवामि तपसो बलात्॥ २६<br><br>पुरोन्मत्तपुरेत्येव तत्र देवो महेश्वरः।<br>तत्रास्ति तपसो राशिः पिता मम ऋतध्वजः॥ २७<br><br>तस्यास्मि जपमानस्य महायोगं महात्मनः।<br>जातोऽलिवृन्दसंयुक्तः सर्वशास्त्रविशारदः॥ २८ | अत्यन्त दुःखित होती हुई नन्दयन्तीने उस बोलनेवालेको ऊपर देखकर कहा—अरे बालक! बतलाओ, किस पापीने तुम्हें बाँधा है? उस बालकने उससे कहा—महाभागे! एक महादुष्ट बन्दरने मुझे जटाओंद्वारा इस वटमें बाँध दिया है। मैं अपने तपोबलसे ही जी रहा हूँ। पहले उन्मत्तपुरमें देव महेश्वर प्रतिष्ठित थे। वहाँ तपके राशिस्वरूप (महातपस्वी) मेरे पिता ऋतध्वज निवास करते थे। महायोगका जप-तप कर रहे उन महात्माका मैं सभी शास्त्रोंमें निपुण एवं भौंरोंके समूहसे युक्त पुत्र उत्पन्न हुआ॥ २५—२८॥ |
अध्याय ६४ ] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन ३०१
| ततो मामब्रवीत् तातो नाम कृत्वा शुभानने।<br>जाबालीति परिख्याय तच्छृणुष्व शुभानने॥ २९<br>पञ्चवर्षसहस्राणि बाल एव भविष्यसि।<br>दशवर्षसहस्राणि कुमारत्वे चरिष्यसि॥ ३०<br>विंशतिं यौवनस्थायी वीर्येण द्विगुणं ततः।<br>पञ्चवर्षशतान् बालो भोक्ष्यसे बन्धनं दृढम्॥ ३१<br>दशवर्षशतान्येव कौमारे कायपीडनम्।<br>यौवने परमान् भोगान् द्विसहस्रसमास्तथा॥ ३२ | शुभानने! पिताजीने मेरा नाम जाबालि रखकर मुझसे जो कुछ कहा, उसे सुनो। उन्होंने कहा—तुम पाँच हजार वर्षोंतक बालक रहोगे एवं दस हजार वर्षोंतक कुमार रहोगे। बीस वर्षोंतक तुम्हारा पराक्रमपूर्ण यौवन रहेगा और उसके बाद उसके दुगुने समयतक बुढ़ापेकी स्थिति रहेगी। बाल्यावस्थामें पाँच सौ वर्षोंतक तुम्हें दृढ़ बन्धन भोगना पड़ेगा। उसके बाद एक हजार वर्षोंतक कुमारावस्थामें तुम्हें शारीरिक कष्ट भोगना पड़ेगा तथा युवावस्थामें दो हजार वर्षोंतक तुम उत्तम भोगोंको प्राप्त करोगे॥ २९—३२॥ |
| चत्वारिंशच्छतान्येव वार्धके क्लेशमुत्तमम्।<br>लप्स्यसे भूमिशय्याढ्यं कदन्नाशनभोजनम्॥ ३३<br>इत्येवमुक्तः पित्राऽहं बालः पञ्चाब्ददेशिकः।<br>विचरामि महीपृष्ठं गच्छन् स्नातुं हिरण्वतीम्॥ ३४<br>ततोऽपश्यं कपिवरं सोऽवदन्मां क्व यास्यसि।<br>इमां देववतीं गुह्यां मूढ न्यस्तां महाश्रमे॥ ३५<br>ततोऽसौ मां समादाय विस्फुरन्तं प्रयत्नतः।<br>वटाग्रेऽस्मिन्नुद्बबन्ध जटाभिरपि सुन्दरि॥ ३६ | बुढ़ापेमें चालीस सौ वर्षोंतक अत्यन्त क्लेश भोगना होगा। उस समय तुम्हें भूमिपर सोना तथा कुत्सित-अन्न—कदन्न—साँवा, कोदो (आदि)-का भोजन करना पड़ेगा। पिताके इस प्रकार कहनेके बाद पाँच वर्षकी अवस्थामें मैं हिरण्वतीमें स्नान करनेके उद्देश्यसे पृथ्वीपर विचरता हुआ जा रहा था। उस समय मैंने एक श्रेष्ठ बन्दरको देखा। उसने मुझसे कहा—अरे मूढ़! इस महान् आश्रममें रखी हुई इस देववतीको लेकर तू कहाँ जा रहा है? सुन्दरि! उसके बाद उसने छटपटाते हुए मुझको पकड़कर प्रयत्नपूर्वक इस वटवृक्षके शिखरपर जटाओं (बरोहों)-से बाँध दिया॥ ३३—३६॥ |
| तथा च रक्षा कपिना कृता भीरु निरन्तरैः।<br>लतापाशैर्महायन्त्रमधस्ताद् दुष्टबुद्धिना॥ ३७<br>अभेद्योऽयमनाक्रम्य उपरिष्टात् तथाप्यधः।<br>दिशां मुखेषु सर्वेषु कृतं यन्त्रं लतामयम्॥ ३८<br>संयम्य मां कपिवरः प्रयातोऽमरपर्वतम्।<br>यथेच्छया मया दृष्टमेतत् ते गदितं शुभे॥ ३९<br>भवती का महारण्ये ललना परिवर्जिता।<br>समायाता सुचार्वङ्गी केन सार्थेन मां वद॥ ४० | भीरु! उस कुमति बन्दरने बहुत-से लता-जालोंसे एक महान् यन्त्र (छज्जा) बनाकर उसके नीचे मुझे स्थापित कर दिया और सदा मेरी रक्षा करता रहा। सभी दिशाओंमें चारों ओरसे बनाया गया यह लतायन्त्र न तो टूट सकता है और न किसी प्रकार ऊपर या नीचेसे इसके ऊपर आक्रमण ही किया जा सकता है। वह श्रेष्ठ बन्दर मुझको बाँधकर स्वेच्छासे अमर-पर्वतपर चला गया। शुभे! मैंने जो कुछ देखा था उसे तुमसे कह दिया। सुन्दरि! मुझे बतलाओ कि तुम कौन हो एवं इस विस्तृत वनमें अकेली तुम किसके साथ आयी हो?॥ ३७—४०॥ |
| साऽब्रवीदञ्जनो नाम गुह्यकेन्द्रः पिता मम।<br>नन्दयन्तीति मे नाम प्रम्लोचागर्भसम्भवा॥ ४१<br>तत्र मे जातके प्रोक्तमृषिणा मुद्गलेन हि।<br>इयं नरेन्द्रमहिषी भविष्यति न संशयः॥ ४२ | उसने कहा—गुह्यकराज अञ्जन मेरे पिता हैं। मेरा नाम नन्दयन्ती है। मेरा जन्म प्रम्लोचाके गर्भसे हुआ है। मेरे जन्मके समय मुद्गल ऋषि ने कहा था कि यह कन्या भविष्यमें राजरानी बनेगी। |
| ३०२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६४ |
|---|
| तद्वाक्यसमकालं च व्यनदद् देवदुन्दुभिः।<br>शिवा चाशिवनिर्घोषा ततो भूयोऽब्रवीन्मुनिः॥ ४३<br>न संदेहो नरपतेर्महाराज्ञी भविष्यति।<br>महान्तं संशयं घोरं कन्याभावे गमिष्यसि।<br>ततो जगाम स ऋषिरैवमुक्त्वा वचोऽद्भुतम्॥ ४४ | उनके कहनेके समय ही स्वर्गमें दुन्दुभि बजने लगी तथा तत्काल ही अमङ्गलसूचक शब्दवाली सियारिन बोलने लगी। उसके बाद मुनिने पुनः कहा—इसमें संदेह नहीं कि यह बालिका महाराजकी महारानी होगी। परंतु कन्या-अवस्थामें ही यह भयङ्कर विपत्तिमें पड़ जायगी। इस प्रकारका अद्भुत वचन कहकर वे ऋषि चले गये॥ ४१–४४॥ | | पिता मामपि चादाय समागन्तुमथैच्छत।<br>तीर्थं ततो हिरण्वत्यास्तीरात् कपिरथोत्पतत्॥ ४५<br>तद्भयाच्च मया ह्यात्मा क्षिप्तः सागरगाजले।<br>तयाऽस्मि देशमानीता इमं मानुषवर्जितम्॥ ४६<br>श्रुत्वा जाबालिरथ तद् वचनं वै तयोदितम्।<br>प्राह सुन्दरि गच्छस्व श्रीकण्ठं यमुनातीटे॥ ४७<br>तत्रागच्छति मध्याह्ने मत्पिता शर्वमर्चितुम्।<br>तस्मै निवेद्यात्मानं तत्र श्रेयोऽधिलप्स्यसे॥ ४८ | उसके बाद मेरे पिताने तीर्थयात्रा करनेकी इच्छा की। इसी बीच मुझे (अपने साथ) लेकर बन्दर हिरण्वतीके तटसे उछला। उसके डरसे मैंने अपनेको समुद्रमें गिरनेवाली नदीके जलमें गिरा दिया (मैं नदीमें कूद पड़ी)। उस नदीके भीषण प्रवाहसे मैं इस निर्जन देशमें आ गयी हूँ। जाबालिने उसकी कही हुई बातको सुनकर कहा—सुन्दरि! तुम यमुनाके किनारे श्रीकण्ठके पास जाओ। वहाँ मेरे पिताजी मध्याह्नमें शिवजीकी पूजा करनेके लिये आते हैं। तुम वहाँ जाकर उनको अपना समाचार सुनाओ। इससे तुम्हारा कल्याण होगा॥ ४५–४८॥ | | ततस्तु त्वरिता काले नन्दयन्ती तपोनिधिम्।<br>परित्राणार्थमगमद्धिमाद्रेर्यमुनां नदीम्॥ ४९<br>सा त्वदीर्घेण कालेन कन्दमूलफलाशना।<br>सम्प्राप्ता शङ्करस्थानं यत्रागच्छति तापसः॥ ५०<br>ततः सा देवदेवेशं श्रीकण्ठं लोकवन्दितम्।<br>प्रतिवन्द्य ततोऽपश्यदक्षरांस्तान्महामुने॥ ५१<br>तेषामर्थं हि विज्ञाय सा तदा चारुहासिनी।<br>तज्जाबाल्युदितं श्लोकमलिखच्चान्यमात्मनः॥ ५२ | उसके बाद नन्दयन्ती अपनी रक्षाके लिये शीघ्रतापूर्वक हिमाचलसे चल पड़ी और यमुनाके तीरपर स्थित तपोनिधि (ऋतध्वज)-के पास पहुँच गयी। कन्द-मूल-फल खाती हुई वह कुछ ही समयमें शङ्करके (भी) उस स्थानपर पहुँची जहाँ तपस्वी आया करते थे। महामुने! उसके बाद उसने विश्ववन्दित देवाधिदेव श्रीकण्ठकी पूजा कर उन (लिखे) अक्षरोंको देखा। उनका अर्थ जानकर मधुर मुस्कान करती हुई उसने जाबालिद्वारा कथित श्लोक तथा अपना एक अन्य श्लोक लिखा—॥ ४९–५२॥ | | मुद्गलेनास्मि गदिता राजपत्नी भविष्यति।<br>सा चावस्थामिमां प्राप्ता कश्चिन्मां त्रातुमीश्वरः॥ ५३<br>इत्युल्लिख्य शिलापट्टे गता स्नातुं यमस्वसाम्।<br>ददृशे चाश्रमवरं मत्तकोकिलनादितम्॥ ५४<br>ततोऽमन्यत सात्रर्षिर्नूनं तिष्ठति सत्तमः।<br>इत्येवं चिन्तयन्ती सा सम्प्रविष्टा महाश्रमम्॥ ५५<br>ततो ददर्श देवाभां स्थितां देववतीं शुभाम्।<br>संशुष्कास्यां चलनेत्रां परिम्लानामिवाब्जिनीम्॥ ५६ | 'महर्षि मुद्गलने कहा था कि मैं राजपत्नी होऊँगी, किंतु मैं इस अवस्थामें आ गयी हूँ। क्या कोई मेरा उद्धार करनेमें समर्थ है?' शिलापट्टपर यह लिखकर वह स्नान करनेके लिये यमुनाके किनारे चली गयी और उस स्थानपर मतवाली कोकिलोंके स्वरों (काकली)-से निनादित एक सुन्दर आश्रम देखा। उसने सोचा—इस स्थानपर श्रेष्ठ ऋषि अवश्य रहते होंगे। ऐसा सोचती हुई उस महान् आश्रममें प्रविष्ट हुई। उसके बाद उसने दैवी शोभासे युक्त, मुर्झायी हुई कमलिनीके समान सूखे मुख एवं चञ्चल नेत्रोंवाली देववतीको वहाँ बैठी हुई देखा॥ ५३–५६॥ |
अध्याय ६४] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन ३०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सा चापतन्तीं ददृशे यक्षजां दैत्यनन्दिनी।<br>केयमित्येव संचिन्त्य समुत्थाय स्थिताभवत् ॥ ५७<br><br>ततोऽन्योन्यं समालिङ्ग्य गाढं गाढं सुहृत्तया।<br>पप्रच्छतुस्तथान्योन्यं कथयामासतुस्तदा ॥ ५८<br><br>ते परिज्ञाततत्त्वार्थे अन्योन्यं ललनोत्तमे।<br>समासीने कथाभिस्ते नानारूपाभिरादरात् ॥ ५९<br><br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः श्रीकण्ठं स्नातुमादरात्।<br>स तत्त्वज्ञो मुनिश्रेष्ठो अक्षराण्यवलोकयन् ॥ ६० | देववतीने यक्षपुत्रीको आती हुई देखा और यह कौन है—ऐसा विचारकर वह उठ खड़ी हुई। उसके बाद सखीभावसे उन दोनोंने आपसमें गाढ़ आलिङ्गन किया—वे एक-दूसरेके गले लगीं तथा परस्पर पूछ-ताछ और बातचीत करने लगीं। वे दोनों उत्तम ललनाएँ एक दूसरीकी सच्ची घटनाओंको जानकर बैठ गयीं एवं आदरपूर्वक अनेक प्रकारकी कथाएँ कहने लगीं। इसी बीच वे तत्त्वज्ञाता मुनिश्रेष्ठ श्रीकण्ठके निकट स्नान करनेके लिये आये और उन्होंने पत्थरपर लिखे हुए अक्षरोंको देखा॥ ५७—६०॥ |
| स दृष्ट्वा वाचयित्वा च तमर्थमधिगम्य च।<br>मुहूर्तं ध्यानमास्थाय व्यजानाच्च तपोनिधिः ॥ ६१<br><br>ततः सम्पूज्य देवेशं त्वरया स ऋतध्वजः।<br>अयोध्यागमत् क्षिप्रं द्रष्टुमैक्ष्वाकुमीश्वरम् ॥ ६२<br><br>तं दृष्ट्वा नृपतिश्रेष्ठं तापसो वाक्यमब्रवीत्।<br>श्रूयतां नरशार्दूल विज्ञप्तिर्मम पार्थिव ॥ ६३<br><br>मम पुत्रो गुणैर्युक्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>उद्बद्धः कपिना राजन् विषयान्ते तवैव हि ॥ ६४ | उन्हें देख और पढ़कर तथा उनका अर्थ समझकर वे तपोनिधि एक क्षणमें ध्यान लगाकर (सब कुछ ठीक-ठीक) जान गये। उसके बाद महर्षि ऋतध्वज शीघ्रतासे देवेश्वरकी पूजा कर राजा इक्ष्वाकुका दर्शन करनेके लिये तुरंत ही अयोध्या चले गये। श्रेष्ठ नरपतिका दर्शन करके तपस्वी ऋतध्वजने कहा—नरशार्दूल! राजन्! मेरी विज्ञप्ति (याचिका) सुनिये—राजन्! आपके ही राज्यकी सीमामें एक बन्दरने सर्वशास्त्रोंमें निपुण, अच्छे गुणोंसे युक्त मेरे पुत्रको बाँध रखा है॥ ६१—६४॥ |
| तं हि मोचयितुं नान्यः शक्तस्त्वत्तनयादृते।<br>शकुनिर्नाम राजेन्द्र स ह्यस्त्रविधिपारगः ॥ ६५<br><br>तन्मुनेर्वाक्यमाकर्ण्य पिता मम कृशोदरि।<br>आदिदेश प्रियं पुत्रं शकुनिं तापसान्वये ॥ ६६<br><br>ततः स प्रहितः पित्रा भ्राता मम महाभुजः।<br>सम्प्राप्तो बन्धनोद्देशं समं हि परमर्षिणा ॥ ६७<br><br>दृष्ट्वा न्यग्रोधमत्युच्चं प्ररोहास्तृतदिङ्मुखम्।<br>ददर्श वृक्षशिखरे उद्बद्धमृषिपुत्रकम् ॥ ६८ | राजेन्द्र! अस्त्र-विधिमें पारङ्गत आपके शकुनि नामक पुत्रके सिवाय दूसरा कोई उसे छुड़ा नहीं सकता। कृशोदरि! मुनिके उस वचनको सुनकर मेरे पिताने अपने पुत्र (मेरे भाई) शकुनिको उन तपस्वीके पुत्रके (बन्धन छुड़ानेके) सम्बन्धमें उचित आदेश दिया। उसके बाद पिताके द्वारा भेजा गया वह शक्तिशाली मेरा भाई उन श्रेष्ठ ऋषिके साथ ही बन्धनके स्थानपर आया। चारों ओर बरोहोंसे ढके हुए अत्यन्त ऊँचे वटवृक्षको देखनेके बाद उसने वृक्षकी ऊँची चोटीपर बँधे हुए ऋषिके पुत्रको (बँधा हुआ) देखा॥ ६५—६८॥ |
| तांश्च सर्वांल्लतापाशान् दृष्टवान् स समन्ततः।<br>दृष्ट्वा स मुनिपुत्रं तं स्वजटासंततं वटे ॥ ६९<br><br>धनुरादाय बलवानधिज्यं स चकार ह।<br>लाघवादृषिपुत्रं तं रक्षंश्चिच्छेद मार्गणैः ॥ ७० | (फिर) उसने (फैले हुए) उन समस्त लताजालोंको चारों ओरसे (अच्छी तरह) देखा एवं बड़के पेड़में अपनी जटाओंसे बँधे मुनिपुत्रको देखकर उस पराक्रमीने धनुष लेकर उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) चढ़ायी एवं वह ऋषि-पुत्रकी रक्षा करते हुए निपुणतासे बाणोंद्वारा लताजालोंको |
| ३०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| कपिना यत् कृतं सर्वं लतापाशं चतुर्दिशम्।<br>पञ्चवर्षशते काले गते शक्तस्तदा शरैः॥ ७१<br><br>लताच्छन्नं ततस्तूर्णमारुरोह मुनिर्वटम्।<br>प्राप्तं स्वपितरं दृष्ट्वा जाबालिः संयतोऽपि सन्॥ ७२<br><br>आदरात् पितरं मूर्ध्ना ववन्दे तु विधानतः।<br>सम्परिष्वज्य स मुनिर्मूर्ध्न्याघ्राय सुतं ततः॥ ७३<br><br>उन्मोचयितुमारब्धो न शशाक सुसंयतम्।<br>ततस्तूर्णं धनुन्र्यस्य बाणांश्च शकुनिर्बली॥ ७४<br><br>आरुरोह वटं तूर्णं जटा मोचयितुं तदा।<br>न च शक्नोति संच्छन्नं दृढं कपिवरेण हि॥ ७५<br><br>यदा न शकितास्तेन सम्प्रमोचयितुं जटाः।<br>तदाऽवतीर्णः शकुनिः सहितः परमर्षिणा॥ ७६<br><br>जग्राह च धनुर्बाणांश्चकार शरमण्डपम्।<br>लाघवादर्द्धचन्द्रैस्तां शाखां चिच्छेद स त्रिधा॥ ७७<br><br>शाखया कृत्तया चासौ भारवाही तपोधनः।<br>शरसोपानमार्गेण अवतीर्णोऽथ पादपात्॥ ७८<br><br>तस्मिंस्तदा स्वे तनये ऋतध्वज-<br>स्त्राते नरेन्द्रस्य सुतेन धन्विना।<br>जाबालिना भारवहेन संयुतः<br>समाजगामाथ नदीं स सूर्यजाम्॥ ७९ | काटने लगा। पाँच सौ वर्ष बीत जानेपर चारों ओर बन्दरके द्वारा बनाया गया लताजाल बाणोंसे जब काट दिया गया तब ऋषि ऋतध्वज लताओंसे ढके उस वटवृक्षपर शीघ्र चढ़ गये। जाबालिने अपने पिताको आया देखकर बँधे रहनेपर भी अत्यन्त आदरके साथ यथाविधि सिरसे (सिर झुकाकर) प्रणाम किया। उन मुनिने (पुत्रका) मस्तक सूँघकर उसको अच्छी तरह गले लगाया॥ ६९—७३॥<br><br>फिर वे बन्धन खोलने लगे; परंतु अत्यन्त दृढ़ बन्धनको वे खोल न सके। तब पराक्रमी शकुनि शीघ्र ही धनुष और बाणोंको रखकर जटा खोलनेके लिये बरगदके पेड़पर चढ़ गया। पर (वह भी) कपिद्वारा दृढ़तापूर्वक बनाये गये बन्धनको खोल न सका। जब वह जटाओंको नहीं खोल सका, तब श्रेष्ठ ऋषिके साथ शकुनि नीचे उतर आया। फिर उसने धनुष एवं बाण लिया तथा एक शरमण्डप बनाया। उसके बाद उसने हल्के हाथ अर्द्धचन्द्राकार बाणोंसे उस शाखाको तीन टुकड़ोंमें काट दिया। कटी हुई शाखाके साथ ही भारवाही तपोधन बाणकी सीढ़ियोंके मार्गसे वृक्षके नीचे उतर आये। राजाके धनुर्धारी पुत्रद्वारा अपने पुत्रकी रक्षा हो जानेके बाद ऋतध्वज भारवाही जाबालिके साथ सूर्यपुत्री (यमुना) नदीके तटपर गये॥ ७४—७९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६४॥
पैंसठवाँ अध्याय
गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त, जाबालिकी जटाओंसे मुक्ति, विश्वकर्माकी शाप-मुक्ति, इन्द्रद्युम्नादिका सप्तगोदावरमें आना, शिव-स्तुति, सप्तगोदावरमें सम्मेलन, कन्याओंका विवाह
| दण्डक उवाच<br><br>एतस्मिन्नन्तरे बाले यक्षासुरसुते शुभे।<br>समागते हरं द्रष्टुं श्रीकण्ठं योगिनां वरम्॥ १<br><br>ददृशाते परिम्लानसंशुष्ककुसुमं विभुम्।<br>बहुनिर्माल्यसंयुक्तं गते तस्मिन् ऋतध्वजे॥ २ | दण्डकने कहा— बाले! इसी बीच यक्ष और असुरकी दोनों कन्याएँ योगीश्वर श्रीकण्ठ महादेवका दर्शन करनेके लिये आयीं। उन ऋतध्वजके चले जानेपर उन दोनोंने महादेवके चारों ओर मुरझाये तथा सूखे हुए फूल और विसर्जनके बाद समर्पित की गयी अन्य बहुत-सी |
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त [ ३०५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततस्तं वीक्ष्य देवेशं ते उभे अपि कन्यके।<br>स्नापयेतां विधानेन पूजयेतामहर्निशम् ॥ ३<br><br>ताभ्यां स्थिताभ्यां तत्रैव ऋषिरभ्यागमद् वनम्।<br>द्रष्टुं श्रीकण्ठमव्यक्तं गालवो नाम नामतः ॥ ४ | वस्तुएँ पड़ी हुई देखीं। उसके बाद उन देवेशका दर्शन कर वे दोनों कन्याएँ विधिसे दिन-रात श्रीकण्ठ भगवान्को स्नान करातीं एवं उनका पूजन करती थीं। उसी स्थानपर उन दोनोंके रहते हुए गालव नामके ऋषि अव्यक्तस्वरूपवाले श्रीकण्ठका दर्शन करनेके लिये इस वनमें आये ॥ १–४ ॥ |
| स दृष्ट्वा कन्यकायुग्मं कस्येदमिति चिन्तयन्।<br>प्रविवेश शुचिः स्नात्वा कालिन्द्या विमले जले ॥ ५<br><br>ततोऽनुपूजयामास श्रीकण्ठं गालवो मुनिः।<br>गायेते सुस्वरं गीतं यक्षासुरसुते ततः॥ ६<br><br>ततः स्वरं समाकर्ण्य गालवस्ते अजानत।<br>गन्धर्वकन्यके चैते संदेहो नात्र विद्यते ॥ ७<br><br>सम्पूज्य देवमीशानं गालवस्तु विधानतः।<br>कृतजप्यः समध्यास्ते कन्याभ्यामभिवादितः ॥ ८ | उन्होंने उन दोनों कन्याओंको देखकर 'ये किसकी कन्याएँ हैं'—इस प्रकार सोचते-विचारते हुए कालिन्दीके विमल जलमें प्रवेश किया। गालव ऋषिने स्नान करनेके बाद पवित्र होकर श्रीकण्ठ महादेवकी पूजा की। उसके बाद यक्ष और असुरकी दोनों कन्याओंने मधुर स्वरसे गीत गाया। तब (उनके) स्वरको सुनकर गालवने यह जान लिया कि ये दोनों निस्सन्देह गन्धर्वकी ही कन्याएँ हैं। गालवने विधिसे श्रीकण्ठदेवकी पूजा कर जप किया। उसके बाद दोनों कन्याओंसे अभिवन्दित होकर वे बैठ गये ॥ ५–८ ॥ |
| ततः पप्रच्छ स मुनिः कन्यके कस्य कथ्यताम्।<br>कुलालङ्कारकरणे भक्तियुक्ते भवस्य हि॥ ९<br><br>तमूचतुर्मुनिश्रेष्ठं याथातथ्यं शुभानने।<br>जातो विदितवृत्तान्तो गालवस्तपसां वरः॥ १०<br><br>समुष्य तत्र रजनीं ताभ्यां सम्पूजितो मुनिः।<br>प्रातरुत्थाय गौरीशं सम्पूज्य च विधानतः॥ ११<br><br>ते उपेत्याब्रवीद्यास्ये पुष्कारारण्यमुत्तमम्।<br>आमन्त्रयामि वां कन्ये समनुज्ञातुमर्हथः॥ १२ | उसके बाद उन मुनिने उन दोनों कन्याओंसे पूछा—कन्याओ! तुम दोनों यह बतलाओ कि शङ्करमें भक्ति करनेवाली कुलकी शोभारूपा तुम दोनों किनकी कन्याएँ हो? शुभानने! उन दोनों कन्याओंने उन मुनिश्रेष्ठसे सत्य बातें बतलायीं। तब तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गालवने सम्पूर्ण वृत्तान्त (पूर्णतः) जान लिया। उन दोनोंसे सत्कृत होकर मुनिने वहाँ रात्रिमें निवास किया और प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक गौरीपति शङ्करका पूजन किया। उसके बाद उन दोनोंके पास जाकर उन्होंने कहा—मैं परम उत्तम पुष्कर वनमें जाऊँगा। मैं तुम दोनोंसे अनुरोधकर विदा लेना चाहता हूँ। तुम दोनों मुझे अनुज्ञा (अनुमति) दो ॥ ९–१२ ॥ |
| ततस्ते ऊचतुर्ब्रह्मन् दुर्लभं दर्शनं तव।<br>किमर्थं पुष्कारारण्यं भवान् यास्यत्यथादरात्॥ १३<br><br>ते उवाच महातेजा महत्कार्यसमन्वितः।<br>कार्तिकी पुण्यदा भाविमासान्ते पुष्करेषु हि॥ १४<br><br>ते ऊचतुर्वयं यामो भवान् यत्र गमिष्यति।<br>न त्वया स्म विना ब्रह्मन्निह स्थातुं हि शक्नुवः ॥ १५<br><br>बाढमाह ऋषिश्रेष्ठस्ततो नत्वा महेश्वरम्।<br>गते ते ऋषिणा सार्द्धं पुष्कारारण्यमादरात् ॥ १६ | उसके बाद उन दोनोंने कहा—ब्रह्मन्! आपका दर्शन दुर्लभ है। किस कारण आप पुष्कारारण्यमें जा रहे हैं। इसके बाद धार्मिक कृत्य करनेवाले महातेजस्वी (मुनि)-ने उन दोनोंसे आदरपूर्वक कहा—आगे महीनेके अन्तमें पुष्करमें पुण्यदायिनी कार्तिकी पूर्णिमा होगी। उन दोनोंने कहा—(तो) आप जहाँ जायँगे, वहीं हम भी चलेंगी। ब्रह्मन्! आपके बिना हम दोनों यहाँ नहीं रह सकतीं। ऋषिश्रेष्ठने कहा—ठीक है। उसके बाद आदरपूर्वक महेश्वरको प्रणामकर ऋषिके साथ वे दोनों (कन्याएँ) पुष्कारारण्य चली गयीं ॥ १३–१६ ॥ |
| ३०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथाऽन्ये ऋषयस्तत्र समायाताः सहस्रशः।<br>पार्थिवा जानपदाश्च मुक्त्वाैकं तमृतध्वजम्॥ १७<br>ततः स्नाताश्च कार्त्तिक्यामृषयः पुष्करेष्वथ।<br>राजानश्च महाभागा नाभागेश्वाकुसंयुताः॥ १८<br>गालवोऽपि समं ताभ्यां कन्यकाभ्यामवातरत्।<br>स्नातुं स पुष्करे तीर्थे मध्यमे धनुषाकृतौ॥ १९<br>निमग्नश्चापि ददृशे महामत्स्यं जलेशयम्।<br>बह्वीभिर्मत्स्यकन्याभिः प्रीयमाणं पुनः पुनः॥ २० | वहाँ केवल उन ऋतध्वजके सिवाय अन्य हजारों ऋषि, राजा एवं जनपद-निवासी भी आये। उसके बाद ऋषियों एवं नाभाग तथा इक्ष्वाकु आदि महाभाग्यवान् राजाओंने कार्तिकी पूर्णिमाके दिन पुष्करतीर्थमें स्नान किया। गालव भी उन दोनों कन्याओंके साथ धनुषकी आकृतिवाले मध्यम पुष्करतीर्थमें स्नान करनेके लिये उतरे। (जलमें) निमग्न होनेपर उन्होंने देखा कि एक जलचर महामत्स्य जलमें स्थित है और अनेक मत्स्य-कन्याएँ उसे पुनः-पुनः प्रसन्न करनेमें लगी हुई हैं॥ १७–२०॥ |
| स ताश्चाह तिमिर्मुग्धा यूयं धर्मं न जानथ।<br>जनापवादं घोरं हि न शक्तः सोढुमुलबणम्॥ २१<br><br>तास्तमूचुर्महामत्स्यं किं न पश्यसि गालवम्।<br>तापसं कन्यकाभ्यां वै विचरन्तं यथेच्छया॥ २२<br><br>यद्यसावपि धर्मात्मा न बिभेति तपोधनः।<br>जनापवादात् तत्किं त्वं बिभेषि जलमध्यगः॥ २३<br><br>ततस्ताश्चाह स तिमिर्नैष वेत्ति तपोधनः।<br>रागान्धो नापि च भयं विजानाति सुबालिशः॥ २४ | उस मत्स्यने उन (मछलियों)-से कहा—भोली प्रकृति होनेके कारण तुम सभी लोक-धर्म नहीं जानती हो। मैं जनताद्वारा किये जानेवाले कठोर अपवाद (निन्दा) सहन नहीं कर सकता। (तब) उन सभी (मछलियों)-ने कहा—क्या तुम स्वच्छन्दतासे विचरते हुए तपस्वी गालवको दो कन्याओंके साथ नहीं देख रहे हो? यदि धर्मात्मा एवं तपस्वी होते हुए भी वे लोक-निन्दासे नहीं डरते तो जलमें रहनेवाले तुम क्यों डर रहे हो? उसके बाद उस तिमि (मत्स्य)-ने उनसे कहा—तपस्वी लोक-निन्दाको नहीं जानते एवं प्रेममें अन्धा होनेसे प्रचण्डमूर्ख बनकर लोक-निन्दाके भयको भी नहीं समझते॥ २१–२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा मत्स्यवचनं गालवो व्रीडया युतः।<br>नोत्तार निमग्नोऽपि तस्थौ स विजितेन्द्रियः॥ २५<br><br>स्नात्वा ते अपि रम्भोरू समुत्तीर्य तटे स्थिते।<br>प्रतीक्षन्त्यौ मुनिवरं तद्दर्शनसमुत्सुके॥ २६<br><br>वृत्ता च पुष्करे यात्रा गता लोका यथागतम्।<br>ऋषयः पार्थिवाश्चान्ये नाना जानपदास्तदा॥ २७<br><br>तत्र स्थितैका सुदती विश्वकर्मतनूरुहा।<br>चित्राङ्गदा सुचार्वङ्गी वीक्षन्ती तनुमध्यमे॥ २८ | मत्स्यके उस वचनको सुनकर गालव लज्जित हो गये। (फिर तो) वे जितेन्द्रिय मुनि जलमें निमग्न होनेपर भी ऊपर नहीं आये, भीतर ही डूबे रहे। वे दोनों कदली-सदृश ऊरूवाली सुन्दरियाँ स्नान करनेके बाद जलसे बाहर निकल कर तीरपर खड़ी हो गयीं एवं मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगीं। पुष्करकी यात्रा पूरी होनेपर सभी ऋषि, राजा और नगरवासी लोग जहाँसे आये थे, वहाँ चले गये। वहाँ केवल सुन्दर दाँतोंवाली एवं पतली सुन्दर शरीरवाली विश्वकर्माकी कन्या चित्राङ्गदा उन दोनों कृशोदरियों (कन्याओं)-को देखती हुई रह गयी॥ २५–२८॥ |
| ते स्थिते चापि वीक्षन्त्यौ प्रतीक्षन्त्यौ च गालवम्।<br>संस्थिते निर्जने तीर्थे गालवोऽन्तर्जले तथा॥ २९ | वे दोनों भी (उसे) देखती एवं गालवकी प्रतीक्षा करती हुई निर्जन तीर्थमें पड़ी रहीं और गालव जलके |
६६- दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त [ ३०७
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽभ्यागाद् वेदवती नाम्ना गन्धर्वकन्यका।<br>पर्जन्यतनया साध्वी घृताचीगर्भसम्भवा॥ ३०<br><br>सा चाभ्येत्य जले पुण्ये स्नात्वा मध्यमपुष्करे।<br>ददर्श कन्यात्रितयमुभयोस्तटयोः स्थितम्॥ ३१<br><br>चित्राङ्गदामथाभ्येत्य पर्यपृच्छदनिष्ठुरम्।<br>कासि केन च कार्येण निर्जने स्थितवत्यसि॥ ३२ | भीतर ही स्थित रहे। उसके बाद वेदवती नामकी गन्धर्व-कन्या वहाँ आयी। वह साध्वी घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई थी एवं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री थी। उसने आकर मध्यम पुष्करतीर्थके पवित्र जलमें स्नान किया और दोनों तटोंपर स्थित (उन) तीनों कन्याओंको देखा। इसके बाद चित्राङ्गदाके समीप जाकर उसने सरलतासे पूछा—तुम कौन हो? और किस कार्यसे इस निर्जन स्थानमें स्थित हो?॥ २९—३२॥ |
| सा तामुवाच पुत्रीं मां विन्दस्व सुरवर्धकेः।<br>चित्राङ्गदेति सुश्रोणि विख्यातां विश्वकर्मणः॥ ३३<br><br>साहमभ्यागता भद्रे स्नातुं पुण्यां सरस्वतीम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षीं तु विख्यातां धर्ममातरम्॥ ३४<br><br>तत्रागताथ राज्ञाऽहं दृष्टा वैदर्भकेण हि।<br>सुरथेन स कामार्तो मामेव शरणं गतः॥ ३५<br><br>मयात्मा तस्य दत्तश्च सखीभिर्वार्यमाणया।<br>ततः शप्ताऽस्मि तातेन वियुक्तास्मि च भूभुजा॥ ३६ | उस (चित्राङ्गदा)-ने उस (वेदवती)-से कहा—हे सुश्रोणि! मुझे देवशिल्पी विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामसे प्रसिद्ध पुत्री जानो। भद्रे! मैं नैमिषमें धर्मकी जननी काञ्चनाक्षी नामसे प्रसिद्ध पवित्र सरस्वती नदीमें स्नान करने आयी थी। वहाँ आनेपर विदर्भवंशमें उत्पन्न राजा सुरथने मुझे देखा और कामपीड़ित होकर मेरी शरणमें आया। सखियोंके रोकनेपर भी मैंने उन्हें अपनेको समर्पित कर दिया। उसके बाद पिताजीने मुझे शाप दे दिया और मैं राजासे वियोगिनी हो गयी॥ ३३—३६॥ |
| मर्तुं कृतमतिर्भद्रे वारिता गुह्यकेन च।<br>श्रीकण्ठमगमं द्रष्टुं ततो गोदावरं जलम्॥ ३७<br><br>तस्मादिमं समायाता तीर्थप्रवरमुत्तमम्।<br>न चापि दृष्टः सुरथः स मनोह्लादनः पतिः॥ ३८<br><br>भवती चात्र का बाले वृत्ते यात्राफलेऽधुना।<br>समागता हि तच्छंस मम सत्येन भामिनि॥ ३९<br><br>साब्रवीच्छ्रूयतां याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी।<br>यथा यात्राफले वृत्ते समायाताऽस्मि पुष्करम्॥ ४० | भद्रे! मैंने मरनेका विचार किया; परंतु गुह्यकने मुझे रोक दिया। उसके बाद मैं श्रीकण्ठभगवान्का दर्शन करनेके लिये गयी और वहाँसे गोदावर जलके निकट गयी, (और अब) वहाँसे मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थमें आ गयी हूँ। किंतु मनको आनन्दित करनेवाले उन सुरथ पतिको मैंने नहीं देखा। बाले! यात्राफलके समाप्त होनेपर (पर्वकी समाप्ति हो जानेपर) आज यहाँ आनेवाली आप कौन हैं? भामिनि! मुझे सच-सच बतलाओ। उसने कहा—कृशोदरि! मैं मन्दभागिनी कौन हूँ तथा यात्राफलके समाप्त होनेपर पुष्करमें क्यों आयी हूँ, उसे सुनो॥ ३७—४०॥ |
| पर्जन्यस्य घृताच्यां तु जाता वेदवतीति हि।<br>रममाणा वनोद्देशे दृष्टाऽस्मि कपिना सखि॥ ४१<br><br>स चाभ्येत्याब्रवीत् का त्वं यासि देववतीति हि।<br>आनीतास्याश्रमात् केन भूपृष्ठान्मेरुपर्वतम्॥ ४२<br><br>ततो मयोक्तो नैवास्मि कपे देववतीत्यहम्।<br>नाम्ना वेदवतीत्येवं मेरोरपि कृताश्रया॥ ४३ | मैं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ तथा घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई हूँ। मेरा नाम वेदवती है। सखि! वनप्रदेशमें भ्रमण कर रही मुझको एक बन्दरने देखा। उसने समीपमें आकर मुझसे कहा—तुम कौन हो? कहाँ जा रही हो? (निश्चय ही तुम) देववती हो। पृथ्वीपर रहनेवाले आश्रमसे मेरुपर्वतपर तुम्हें कौन लाया है? इसपर मैंने कहा—कपे! मैं देववती नहीं हूँ, मेरा नाम वेदवती है। मेरुपर्वतपर ही मैंने अपना |
| ३०८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेण हृषिद्रुता।<br>समारूढास्मि सहसा बन्धुजीवं नगोत्तमम्॥ ४४ | आश्रम बना लिया है। उसके बाद अत्यन्त दुष्ट उस बन्दरसे खदेड़ी जाती हुई मैं बन्धुजीव (गुलदुपहरिया) के उत्तम वृक्षपर शीघ्रतासे चढ़ गयी॥ ४१-४४॥ | | तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत।<br>ततोऽस्य विपुलां शाखां समालिङ्ग्य स्थिता त्वहम्॥ ४५<br><br>ततः प्लवङ्गमो वृक्षं प्राक्षिपत् सागराम्भसि।<br>सह तेनैव वृक्षेण पतितास्म्यहमाकुला॥ ४६<br><br>ततोऽम्बरतलाद् वृक्षं निपतन्तं यदृच्छया।<br>ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ४७<br><br>ततो हाहाकृतं लोकैर्मां पतन्तीं निरीक्ष्य हि।<br>ऊचुश्च सिद्धगन्धर्वाः कष्टं सेयं महात्मनः॥ ४८<br><br>इन्द्रद्युम्नस्य महिषी गदिता ब्रह्मणा स्वयम्।<br>मनोः पुत्रस्य वीरस्य सहस्रक्रतुयाजिनः॥ ४९ | उसने शीघ्र ही पैरके आघातसे उस वृक्षको तोड़ दिया। उसके बाद मैं उस वृक्षकी एक बड़ी डालीको पकड़कर स्थित रही। फिर बन्दरने उस वृक्षको समुद्रके जलमें फेंक दिया। मैं अत्यन्त घबड़ाकर उस वृक्षके साथ ही जलमें गिर पड़ी। उसके बाद चर और अचर सभी प्राणियोंने आकाशसे गिरनेवाले उस वृक्षको देखा। उसके बाद उसीके साथ मुझको भी गिरती हुई देखकर सभी लोग हाहाकार करने लगे। सिद्ध और गन्धर्वलोग कहने लगे—हाय! यह कष्टकी बात है। इसके सम्बन्धमें तो ब्रह्माने स्वयं कहा था कि यह कन्या हजारों यज्ञोंके करनेवाले मनुके वीर पुत्र इन्द्रद्युम्नकी राजरानी होगी (पर यह क्या हो गया!)॥ ४५-४९॥ | | तां वाणीं मधुरां श्रुत्वा मोहमस्यागता ततः।<br>न च जाने स केनापि वृक्षश्छिन्नः सहस्रधा॥ ५०<br><br>ततोऽस्मि वेगाद् बलिना हृतानलसखेन हि।<br>समानीतास्म्यहमिमं त्वं दृष्टा चाद्य सुन्दरि॥ ५१<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छावः पृच्छावः क इमे स्थिते।<br>कन्यके अनुपश्ये हि पुष्करस्योत्तरे तटे॥ ५२<br><br>एवमुक्त्वा वराङ्गी सा तया सुत नुकन्यया।<br>जगाम कन्यके द्रष्टुं प्रष्टुं कार्यसमुत्सुका॥ ५३ | उस मधुर वाणीको सुननेके बाद मुझे मूर्च्छा आ गयी। मैं यह नहीं जानती कि उस वृक्षको किसने सहस्रों टुकड़ोंमें काट डाला। उसके बाद अग्निके सखा बलवान् वायुने मुझे शीघ्रतासे यहाँ ला दिया है। सुन्दरि! तुमको आज मैंने यहाँ देखा है। इसलिये उठो, हम दोनों चलें; और फिर पूछें तथा देखें कि पुष्करतीर्थके उत्तरी तटपर दिखायी देनेवाली ये दोनों कन्याएँ कौन हैं? ऐसा कहकर इस कार्यके करनेमें उत्कण्ठित वह सुन्दरी उस सुन्दर तथा दुर्बल देहवाली कन्याके साथ उस पारकी दोनों कन्याओंको देखने तथा वस्तुस्थिति पूछनेके लिये वहाँ गयी॥ ५०-५३॥ | | ततो गत्वा पर्यपृच्छत् ते ऊचतुरभे अपि।<br>याथातथ्यं तयोस्ताभ्यां स्वमात्मानं निवेदितम्॥ ५४<br><br>ततस्ताश्चतुरोपीह सप्तगोदावरं जलम्।<br>सम्प्राप्य तीर्थे तिष्ठन्ति अर्चन्त्यो हाटकेश्वरम्॥ ५५<br><br>ततो बहून् वर्षगणान् बभ्रमुस्ते जनास्त्रयः।<br>तासामर्थाय शकुनिर्जाबालिः स ऋतध्वजः॥ ५६<br><br>भारवाही ततः खिन्नो दशाब्दशतिके गते।<br>काले जगाम निर्वेदात् समं पित्रा तु शाकलम्॥ ५७ | उसके बाद वहाँ जाकर उसने उन दोनोंसे पूछा। उन दोनोंने अपनी सच्ची घटना उन दोनोंसे बतायीं। उसके बाद चारों कन्याएँ सप्तगोदावर जलके समीप जाकर हाटकेश्वर भगवान्की पूजा करती हुई तीर्थमें रहने लगीं। इधर शकुनि, जाबालि और ऋतध्वज—ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओंके लिये अनेक वर्षोंतक भ्रमण करते रहे। तब एक हजार वर्ष बीत जानेपर भार-वहन करनेवाले (जाबालि) खिन्न होकर पिताके साथ शाकल जनपदमें चले गये॥ ५४-५७॥ |
| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३०१ |
|---|
| तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रद्युम्नो मनोः सुतः।<br>समध्यास्ते स विज्ञाय सार्घपात्रो विनिर्ययौ॥ ५८<br><br>सम्यक् सम्पूजितस्तेन सजाबालिर्ऋतध्वजः।<br>स चेक्ष्वाकुसुतो धीमान् शकुनिर्भ्रातृजोऽर्चितः॥ ५९<br><br>ततो वाक्यं मुनिः प्राह इन्द्रद्युम्नमृतध्वजः।<br>राजन् नष्टाऽबलास्माकं नन्दयन्तीति विश्रुता॥ ६०<br><br>तस्यार्थे चैव वसुधा अस्माभिरटिता नृप।<br>तस्मादुत्तिष्ठ मार्गस्व साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ६१<br><br>अथोवाच नृपो ब्रह्मन् ममापि ललनोत्तमा।<br>नष्टा कृतश्रमस्यापि कस्याहं कथयामि ताम्॥ ६२<br><br>आकाशात् पर्वताकारः पतनामो नगोत्तमः।<br>सिद्धानां वाक्यमाकर्ण्य बाणैश्छिन्नः सहस्रधा॥ ६३<br><br>न चैव सा वरारोहा विभिन्ना लाघवान्मया।<br>न च जानामि सा कुत्र तस्माद् गच्छामि मार्गितुम्॥ ६४<br><br>इत्येवमुक्त्वा स नृपः समुत्थाय त्वरान्वितः।<br>स्यन्दनानि द्विजाभ्यां स भ्रातृपुत्राय चार्पयत्॥ ६५<br><br>तेऽधिरुह्य रथांस्तूर्णं मार्गन्ते वसुधां क्रमात्।<br>बदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसां निधिम्॥ ६६<br><br>तपसा कर्शितं दीनं मलपङ्कजटाधरम्।<br>निःश्वासायासपरमं प्रथमे वयसि स्थितम्॥ ६७<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् राजा इन्द्रद्युम्नो महाभुजः।<br>तपस्विन् यौवने घोरमास्थितोऽसि सुदुश्चरम्॥ ६८<br><br>तपः किमर्थं तच्छंस किमभिप्रेतमुच्यताम्।<br>सोऽब्रवीत् को भवान् ब्रूहि ममात्मानं सुहृत्तया॥ ६९<br><br>परिपृच्छसि शोकार्तं परिखिन्नं तपोऽन्वितम्।<br>स प्राह राजाऽस्मि विभो तपस्विञ्शाकले पुरे॥ ७०<br><br>मनोः पुत्रः प्रियो भ्राता इक्ष्वाकोः कथितं तव।<br>स चास्मै पूर्वचरितं सर्वं कथितवान् नृपः॥ ७१ | वहाँ मनुके पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न निवास कर रहे थे। वे इस समाचारको जानकर अर्घपात्र हाथमें लिये बाहर निकले। उन्होंने विधिपूर्वक सुन्दर रीतिसे जाबालि और ऋतध्वजकी पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन बुद्धिमान् भतीजे शकुनिकी भी अर्चना की। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजन्! हमलोगोंकी नन्दयन्ती नामसे प्रसिद्ध (अयानी) कन्या खो गयी है। राजन्! उसके लिये हमलोगों ने सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया है। इसलिये (कृपया) उठिये, पता लगाइये और हमारी सहायता कीजिये॥ ५८—६१॥<br><br>इसके बाद राजाने कहा—ब्रह्मन्! मेरी भी एक उत्तम लाडिली कन्या खो गयी है। उसे ढूँढ़नेमें मैं परिश्रम कर चुका हूँ। उसके विषयमें मैं किससे कहूँ। सिद्धोंका वचन सुनकर आकाशसे नीचे गिरनेवाले पर्वतके समान श्रेष्ठ वृक्षको मैंने बाणोंसे हजारों टुकड़ोंमें काट डाला। मेरे हस्तकौशलसे उस सुन्दरी कन्याको चोट नहीं लगी। मैं नहीं जानता हूँ कि वह कहाँ है? अतः उसे ढूँढ़नेके लिये मैं (भी) चल रहा हूँ। ऐसा कहनेके बाद वे राजा शीघ्रतासे उठे। उन्होंने उन दोनों ब्राह्मणों तथा अपने भतीजेके लिये रथ दे दिये॥ ६२—६५॥<br><br>वे रथोंपर चढ़कर शीघ्रतासे क्रमशः पृथ्वीपर खोज करने लगे। (इस क्रममें) उन लोगोंने बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करनेसे दुबले और धूल-मिट्टीसे भरे, जटा धारण किये हुए, जोर-जोरसे साँस ले रहे एक तपोमूर्ति युवकको देखा। महाबाहु राजा इन्द्रद्युम्नने उसके पास जाकर कहा—तपस्विन्! यह बतलाओ कि युवा-अवस्थामें ही तुम अत्यन्त दुष्कर कठोर तप क्यों कर रहे हो? यह भी बतलाओ कि तुम्हारी अभिलाषा क्या है? उसने कहा—आप मुझसे यह बतलायें कि चिन्तासे ग्रस्त अत्यन्त दुःखी एवं तपश्चर्यासे युक्त मुझसे प्रेमपूर्वक पूछनेवाले आप कौन हैं? उसने कहा—तपस्विन्! विभो! मैं मनुका पुत्र एवं इक्ष्वाकुका प्रिय भाई शाकलपुरका राजा हूँ। मैंने अपना परिचय कह दिया। उस राजाने भी उनसे पहलेकी सारी कथा कह सुनायी॥ ६६—७१॥ |
३१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| श्रुत्वा प्रोवाच राजर्षिर्मा मुञ्चस्व कलेवरम्।<br>आगच्छ यामि तन्वङ्गीं विचेतुं भ्रातृजोऽसि मे॥ ७२<br>इत्युक्त्वा सम्परिष्वज्य नृपं धमनिसंततम्।<br>समारोप्य रथं तूर्णं तापसाभ्यां न्यवेदयत्॥ ७३<br>ऋतध्वजः सपुत्रस्तु तं दृष्ट्वा पृथिवीपतिम्।<br>प्रोवाच राजन्नेह्येहि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ७४<br>यासौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नैमिषे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं सा मयैव विसर्जिता॥ ७५ | (ऊपर कही बातोंको) सुनकर राजर्षिने कहा— तुम अपने शरीरका त्याग मत करो। तुम मेरे भतीजे हो। आओ, मैं उस सुन्दरीकी खोज करने जा रहा हूँ। इतना कहकर उन्होंने उभरी शिराओंसे भरे हुए राजाको गले लगाया और उन्हें रथपर चढ़ाकर शीघ्र उन दोनों तपस्वियोंके पास पहुँचा दिया। पुत्रके सहित ऋतध्वजने उन राजाको देखकर कहा—राजन्! आइये! आइये! मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। आपने नैमिषारण्यमें जिस चित्राङ्गदाको देखा था, उसे मैंने ही सप्तगोदावर नामके तीर्थमें छोड़ दिया था॥ ७२–७५॥ |
| तदागच्छथ गच्छामः सौदेवस्यैव कारणात्।<br>तत्रास्माकं समेष्यन्ति कन्यास्तिस्रस्तथापराः॥ ७६<br>इत्येवमुक्त्वा स ऋषिः समाश्वास्य सुदेवजम्।<br>शकुनिं पुरतः कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुत्रकः॥ ७७<br>स्यन्दनेनाश्वयुक्तेन गन्तुं समुपचक्रमे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं यत्र ताः कन्यका गताः॥ ७८<br>एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकसंयुता।<br>विचचारोदयगिरिं विचिन्वन्ती सुतां निजाम्॥ ७९ | तो आइये, हमलोग सुदेवके पुत्रके कार्यसे ही वहाँ चलें। वहाँपर हमलोगोंको अन्य तीन कन्याएँ भी मिलेंगी। इस प्रकार कहकर उन्होंने ऋषि सुदेवके पुत्रको सान्त्वना दे करके एवं शकुनिको आगे कर इन्द्रद्युम्न और पुत्रके साथ घोड़े जुते रथसे सप्तगोदावर तीर्थमें जानेकी योजना बनायी—जहाँ वे कन्याएँ गयी थीं। इस बीच दुर्बलाङ्गी घृताची शोकसे चिन्तित होकर अपनी कन्याको ढूँढ़ती हुई उदयगिरिपर विचरण करने लगी॥ ७६–७९॥ |
| तमाससाद च कपिं पर्यपृच्छत् तथाप्सराः।<br>किं बाला न त्वया दृष्टा कपे सत्यं वदस्व माम्॥ ८०<br>तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह बालिकाम्।<br>दृष्टा देववती नाम्ना मया न्यस्ता महाश्रमे॥ ८१<br>कालिन्द्या विमले तीर्थे मृगपक्षिसमन्विते।<br>श्रीकण्ठायतनस्याग्रे मया सत्यं तवोदितम्॥ ८२<br>सा प्राह वानरपते नाम्ना वेदवतीति सा।<br>न हि देववती ख्याता तदागच्छ व्रजावहे॥ ८३ | वहाँ घृताची अप्सराको वह बन्दर मिल गया। घृताची अप्सराने उससे पूछा—कपे! मुझसे सच कहो कि क्या तुमने लड़कीको नहीं देखा है? उसके वचनको सुनकर उस कपिने कहा—मैंने देववती नामकी बालिकाको देखा है और उसे मृगों तथा पक्षियोंसे भरे कालिन्दीके विमलतीर्थमें श्रीकण्ठके मन्दिरके सामने स्थित महाश्रममें रख दिया है। मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है। उस (घृताची)-ने कहा—कपिराज! वह वेदवती नामसे विख्यात है, वह देववती नहीं है। तो आओ; हम दोनों वहाँ चलें॥ ८०–८३॥ |
| घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः।<br>पृष्ठतोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कौशिकीम्॥ ८४<br>ते चापि कौशिकीं प्राप्ता राजर्षिप्रवरास्त्रयः।<br>द्वितयं तापसाभ्यां च रथैः परमवेगिभिः॥ ८५<br>अवतीर्य रथेभ्यस्ते स्नातुमभ्यागमन् नदीम्।<br>घृताच्यपि नदीं स्नातुं सुपुण्यामाजगाम ह॥ ८६<br>तामन्वेव कपिः प्रायाद् दृष्टो जाबालिना तथा।<br>दृष्ट्वैव पितरं प्राह पार्थिवं च महाबलम्॥ ८७ | घृताचीकी उस बातको सुनकर बन्दर शीघ्रतासे पग बढ़ाता हुआ उसके पीछे-पीछे कौशिकी नदीकी ओर चला। वे तीनों श्रेष्ठ राजर्षि भी दोनों तपस्वियों (जाबालि और ऋतध्वज)-के साथ बहुत तेज चलनेवाले रथोंपर चढ़कर कौशिकी नदीके समीप पहुँचे। वे लोग रथसे उतरकर स्नान करनेके लिये नदीके निकट आये। घृताची भी उस परम पवित्र नदीमें स्नान करने आयी। बन्दर भी उनके पीछे ही आ गया। जाबालिने उसे देखा। देखते ही उन्होंने पिता एवं महाबलशाली राजासे कहा— ॥ ८४–८७॥ |
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३११
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| स एव पुनरायाति वानरस्तात वेगवान्।<br>पूर्वं जटास्वेव बलाद्येन बद्धोऽस्मि पादपे॥ ८८<br>तज्जाबालिवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः।<br>सशरं धनुरदाय इदं वचनमब्रवीत्॥ ८९<br>ब्रह्मन् प्रदीयतां मह्यमाज्ञां तात वदस्व माम्।<br>यावदेनं निहन्म्यद्य शरेणैकेन वानरम्॥ ९०<br>इत्येवमुक्ते वचने सर्वभूतहिते रतः।<br>महर्षिः शकुनिं प्राह हेतुयुक्तं वचो महत्॥ ९१ | तात! यह वही बन्दर फिर तेजीसे (यहाँ) आ रहा है, जिसने पहले मुझे जबरदस्ती जटाजालसे बड़के पेड़में बाँध दिया था। जाबालिके उस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए शकुनिने बाणसहित धनुषको लेकर यह वचन कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; तात! मुझसे कहिये; क्या मैं एक बाणसे ही इस बन्दरको मार डालूँ? ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंकी भलाईमें लगे रहनेवाले महर्षिने शकुनिसे अत्यन्त युक्तियुक्त वचन कहा— ॥ ८८-९१ ॥ |
| न कश्चित्तात केनापि बध्यते हन्यतेऽपि वा।<br>वधबन्धौ पूर्वकर्मवश्यौ नृपतिनन्दन॥ ९२<br>इत्येवमुक्त्वा शकुनिंमृषिर्वानरमब्रवीत्।<br>एह्येहि वानरास्माकं साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ९३<br>इत्येवमुक्तो मुनिना बाले स कपिकुञ्जरः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्॥ ९४<br>ममाज्ञा दीयतां ब्रह्मन् शाधि किं करवाण्यहम्॥ ९४<br>इत्युक्ते प्राह स मुनिस्तं वानरपतिं वचः।<br>मम पुत्रस्त्वयोद्बद्धो जटासु वटपादपे॥ ९५ | तात! (वस्तुतः) न तो किसीको कोई बाँधता है और न मारता ही है। नृपतिनन्दन! वध और बन्धन पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फलाधीन होते हैं। शकुनिसे इस प्रकार कहकर मुनिने बन्दरसे कहा—बन्दर! आओ, आओ! तुम्हें हमलोगोंकी सहायता करनी चाहिये। बाले! मुनिके ऐसा कहनेपर उस श्रेष्ठ कपिने करबद्ध प्रणाम करते हुए यह कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; मुझे निर्देश दीजिये कि मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस कपिपतिसे यह वचन कहा—तुमने मेरे पुत्रको बड़के पेड़में जटाओंसे बाँध रखा था॥ ९२-९५॥ |
| न चोन्मोचयितुं वृक्षाच्छक्नुयामोऽपि यत्नतः।<br>तदनेन नरेन्द्रेण त्रिधा कृत्वा तु शाखिनः॥ ९६<br>शाखां वहति मत्सूनुः शिरसा तां विमोचय।<br>दशवर्षशतान्यस्य शाखां वै वहतोऽगमन्॥ ९७<br>न च सोऽस्ति पुमान् कश्चिद् यो ह्युन्मोचयितुं क्षमः।<br>स ऋषेर्वाक्यमाकर्ण्य कपिर्जाबालिनो जटाः॥ ९८<br>शनैरुन्मोचयामास क्षणादुन्मोचिताश्च ताः।<br>ततः प्रीतो मुनिश्रेष्ठो वरदोऽभूदृत्तध्वजः॥ ९९ | विशेष यत्न करनेपर भी हमलोग उस पेड़से इसको उन्मुक्त (अलग) नहीं कर सके। इसलिये इस राजाने उस वृक्षके तीन टुकड़े कर दिये। मेरा पुत्र आजतक सिरपर उसकी डालीको ढो रहा है। अब तुम उसे उन्मुक्त कर दो। इस डालीको ढोते हुए उसको एक हजार वर्ष बीत गये हैं। ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो इसे छुड़ानेमें समर्थ हो। उस बन्दरने ऋषिकी बात सुनकर जाबालिकी जटाओंको धीरे-धीरे खोल दिया। वे जटाएँ क्षणभरमें ही खुल गयीं। उसके बाद प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वज वर देनेके लिये तैयार हो गये॥ ९६-९९॥ |
| कपिं प्राह वृणीष्व त्वं वरं यन्मनसेप्सितम्।<br>ऋतध्वजवचः श्रुत्वा इमं वरमयाचत॥ १००<br>विश्वकर्मा महातेजाः कपित्वे प्रतिसंस्थितः।<br>ब्रह्मन् भगवान् वरं मह्यं यदि दातुमिहेच्छति॥ १०१<br>तत्स्वदत्तो महाघोरो मम शापो निवर्त्यताम्।<br>चित्राङ्गदायाः पितरं मां त्वष्टारं तपोधन॥ १०२ | (फिर) उन्होंने बन्दरसे कहा—तुम अपना मनोऽभिलषित वर माँगो। ऋतध्वजकी बात सुनकर कपि-योनिमें स्थित महातेजस्वी विश्वकर्माने यह वर माँगा—ब्रह्मन्! यदि आप मुझे वर देनेके लिये इच्छा कर रहे हैं तो मुझे दिये गये अपने महाघोर शापका निवारण कर दें। तपोधन! चित्राङ्गदाके पिता मुझ त्वष्टाको आप पहचान लें। |
| ३१२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| अभिजानीहि भवतः शापाद्वानरतां गतम्।<br>सुबहूनि च पापानि मया यानि कृतानि हि॥ १०३<br>कपिचापल्यदोषेण तानि मे यान्तु संक्षयम्।<br>ततो ऋतध्वजः प्राह शापस्यान्तो भविष्यन्ति॥ १०४<br>यदा घृताच्यां तनयं जनिष्यसि महाबलम्।<br>इत्येवमुक्तः संहृष्टः स तदा कपिकुञ्जरः॥ १०५ | आपके शापसे (ही) मैं बन्दर हो गया हूँ। कपिकी (स्वाभाविक) चञ्चलतारूपी दोषसे मैंने जिन बहुत-से पापोंको किया है, वे सभी नष्ट हो जायँ। उसके बाद ऋतध्वजने कहा—जब तुम घृताचीसे महाबलवान् पुत्र उत्पन्न करोगे तब शापका अन्त होगा। तब ऐसा कहनेपर वह कपिश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हो गया॥ १००—१०५॥ |
| स्नातुं तूर्णं महानद्यामवतीर्णः कृशोदरि।<br>ततस्तु सर्वे क्रमशः स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः॥ १०६<br>जग्मुर्हृष्टा रथेभ्यस्ते घृताची दिवमुत्पतत्।<br>तमन्वेव महावेगः स कपिः प्लवतां वरः॥ १०७<br>ददृशे रूपसम्पन्नां घृताचीं स प्लवङ्गमः।<br>सापि तं बलिनां श्रेष्ठं दृष्ट्वैव कपिकुञ्जरम्॥ १०८<br>ज्ञात्वाऽथ विश्वकर्माणं कामयामास कामिनी।<br>ततोऽनुपर्वतश्रेष्ठे ख्याते कोलाहले कपिः॥ १०९<br>रमयामास तां तन्वीं सा च तं वानरोत्तमम्।<br>एवं रमन्तौ सुचिरं सम्प्राप्तौ विन्ध्यपर्वतम्॥ ११० | कृशोदरि! वह शीघ्र ही महानदीमें स्नान करनेके लिये उतरा। उसके बाद वे सब क्रमशः स्नानकर पितरों और देवोंके तर्पण-अर्चन कर रथसे चले गये एवं घृताची स्वर्गमें उड़ गयी। महावेगशाली श्रेष्ठ कपिने भी उसका अनुसरण किया। उस बन्दरने रूपसे सम्पन्न घृताचीको देखा। उस कामिनी (घृताची)-ने भी बलवानोंमें श्रेष्ठ उत्तम कपिको देखकर एवं उसे विश्वकर्मा जानकर उसकी कामना की। उसके बाद कोलाहल नामसे विख्यात श्रेष्ठ पर्वतपर उस बन्दरने घृताचीके साथ एवं घृताचीने उस श्रेष्ठ बन्दरके साथ आनन्द-क्रीड़ा की। इस प्रकार बहुत दिनोंतक क्रीड़ा करते हुए वे दोनों विन्ध्यपर्वतपर पहुँचे॥ १०६—११०॥ |
| रथैः पञ्चापि तत्तीर्थं सम्प्राप्तास्ते नरोत्तमाः।<br>मध्याह्नसमये प्रीताः सप्तगोदावरं जलम्॥ १११<br>प्राप्य विश्रामहेत्वर्थमवतेरुस्त्वरान्विताः।<br>तेषां सारथयश्चाश्वान् स्नात्वा पीतोदकाप्लुतान्॥ ११२<br>रमणीये वनोद्देशे प्रचारार्थं समुत्सृजन्।<br>शाद्वलाढ्येषु देशेषु मुहूर्त्तादेव वाजिनः॥ ११३<br>तृप्ताः समाद्रवन् सर्वे देवायतनमुत्तमम्।<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषं श्रुत्वा ता योषितां वराः॥ ११४<br>किमेतदिति चोक्त्वैव प्रजग्मुहाटकेश्वरम्।<br>आरुह्य बलभीं तास्तु समुदैक्षन्त सर्वशः॥ ११५ | वे पाँचों श्रेष्ठ व्यक्ति भी उल्लसित होकर रथद्वारा दोपहरके समय सप्तगोदावर जलवाले उस तीर्थमें पहुँचे। वहाँ जाकर वे विश्राम करनेके लिये शीघ्रतासे नीचे उतरे। उनके सारथियोंने भी स्नान किया एवं घोड़ोंको जल पिलाकर तथा नहला-धुलाकर (उन्हें) सुन्दर वन-प्रदेशमें विचरण करनेके लिये छोड़ दिया। मुहूर्तभरमें ही हरियालीसे हरे-भरे स्थानमें वे घोड़े तृप्त हो गये। उसके बाद वे सभी (घोड़े) उत्तम देव-मन्दिरके पास दौड़ने लगे। घोड़ोंके तापका शब्द सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियाँ 'यह क्या है' ऐसा कहकर हाटकेश्वर (-के मन्दिरमें) गयीं एवं छतपर चढ़कर सभी ओर देखने लगीं॥ १११—११५॥ |
| अपश्यंस्तीर्थसलिले स्नायमानान् नरोत्तमान्।<br>ततश्चित्राङ्गदा दृष्ट्वा जटामण्डलधारिणम्।<br>सुरथं हसती प्राह संरोहत्पुलका सखीम्॥ ११६ | उन कन्याओंने तीर्थके जलमें स्नान करते हुए उन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा। फिर चित्राङ्गदाने जटा-मण्डल धारण करनेवाले नृपति सुरथको देखा। रोमाञ्चित होकर उसने हँसती हुई सखीसे कहा— |
| योऽसौ युवा नीलघनप्रकाशः<br>संदृश्यते दीर्घभुजः सुरूपः। | नीले मेघके समान वर्ण तथा लम्बी भुजाओंवाला वह जो सुन्दर युवा पुरुष |
और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना
अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३१३
| स एव नूनं नरदेवसूनु-<br>र्वृतो मया पूर्वतरं पतिर्यः॥ ११७<br>यश्चैष जाम्बूनदतुल्यवर्णः<br>श्वेतं जटाभारमधारयिष्यत्।<br>स एष नूनं तपतां वरिष्ठो<br>ऋतध्वजो नात्र विचारमस्ति॥ ११८<br>ततोऽब्रवीदथो हृष्टा नन्दयन्ती सखीजनम्।<br>एषोऽपरोऽस्यैव सुतो जाबालिनात्र संशयः॥ ११९<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं बलभ्या अवतीर्य च।<br>समासताग्रतः शम्भोर्गायन्त्यो गीतिकां शुभाम्॥ १२० | दिखलायी पड़ रहा है, निश्चय ही पहले (जन्ममें) मैंने उसी राजपुत्रको पतिरूपसे वरण किया था। इसमें कुछ विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। स्वर्णके समान वर्णवाले जो व्यक्ति श्वेत जटाभारको धारण किये हुए हैं वे निश्चय ही तपस्वियोंमें श्रेष्ठ ऋतध्वज ही हैं (इसमें शङ्का नहीं है)। उसके बाद नन्दयन्तीने सखियोंसे हर्षित होकर कहा—वह दूसरा व्यक्ति निःसन्देह इन्हीं ऋतध्वजके पुत्र जाबालि हैं। इस प्रकार कहकर वे सभी छतसे उतरीं एवं शङ्करके सामने बैठकर कल्याण करनेवाले गीतका गान करने (स्तुति करने) लगीं—॥ ११६-१२०॥ | | नमोऽस्तु शर्व शम्भो त्रिनेत्र चारुगात्र त्रैलोक्यनाथ<br><br>उमापते दक्षयज्ञविध्वंसकर कामाङ्गनाशन घोर<br><br>पापप्रणाशन महापुरुष महोग्रमूर्ते सर्वसत्त्वक्षयंकर<br><br>शुभङ्कर महेश्वर त्रिशूलधारिन् स्मरारे गुहावासिन्<br><br>दिग्वासः महाशङ्खशेखर जटाधर कपालमाला-<br><br>विभूषितशरीर वामचक्षुः वामदेवप्रजाध्यक्ष भगाक्ष्णोः<br><br>क्षयङ्कर भीमसेन महासेनानाथ पशुपते कामाङ्गदहन<br><br>चत्वरवासिन् शिव महादेव ईशान शङ्कर भीम भव<br><br>वृषभध्वज जटिल प्रौढ महानाट्येश्वर भूरिरत्न<br><br>अविमुक्तक रुद्र रुद्रेश्वर स्थाणो एकलिङ्ग<br><br>कालिन्दीप्रिय श्रीकण्ठ नीलकण्ठ अपराजित<br><br>रिपुभयङ्कर सन्तोषपते वामदेव अघोर तत्पुरुष महाघोर<br><br>अघोरमूर्ते शान्त सरस्वतीकान्त कीनाट सहस्रमूर्ते<br><br>महोद्भव विभो कालाग्निरुद्र रुद्र हर महीधरप्रिय<br><br>सर्वतीर्थाधिवास हंस कामेश्वर केदाराधिपते परिपूर्ण<br><br>मुचुकुन्द मधुनिवासिन् कृपाणपाणे भयङ्कर विद्याराज | हे शर्व! हे शम्भो! हे तीन नेत्रवाले! हे सुन्दर गात्रवाले! हे तीनों लोकोंके स्वामिन्! हे उमापते! हे दक्ष यज्ञको विध्वस्त करनेवाले! हे कामदेवके नाश करनेवाले! हे घोर! हे पापके नष्ट करनेवाले! हे महापुरुष! हे भयङ्कर मूर्तिवाले! हे सम्पूर्ण प्राणियोंके क्षय करनेवाले! हे शुभ करनेवाले! हे महेश्वर! हे त्रिशूलधारिन्! हे कामशत्रो! हे गुफामें रहनेवाले! हे दिगम्बर! हे महाशङ्खके शिरोभूषणवाले! हे जटाधर! हे कपालमालासे विभूषित शरीरवाले! हे वामचक्षु! हे वामदेव! हे प्रजाध्यक्ष! हे भगाक्षिके क्षयकारिन्! हे भीमसेन! हे महासेनानाथ! हे पशुपते! हे कामदेवके जलानेवाले! हे चत्वरवासिन् (चबूतरेपर वास करनेवाले)! हे शिव! हे महादेव! हे ईशान! हे शङ्कर! हे भीम! हे भव! हे वृषभध्वज! हे जटिल! हे प्रौढ! हे महानाट्येश्वर! हे भूरिरत्न (रत्नराशि)! हे अविमुक्तक! हे रुद्र! हे रुद्रेश्वर! हे स्थाणो! हे एकलिङ्ग! हे कालिन्दीप्रिय! हे श्रीकण्ठ! हे नीलकण्ठ! हे अपराजित! हे रिपुभयङ्कर! हे सन्तोषपते! हे वामदेव! हे अघोर! हे तत्पुरुष! हे महाघोर! हे अघोरमूर्ते! हे शान्त! हे सरस्वतीकान्त! हे कीनाट! हे सहस्रमूर्ते! हे महोद्भव! हे विभो! हे कालाग्निरुद्र! हे रुद्र! हे हर! हे महीधरप्रिय! हे सर्वतीर्थाधिवास! हे हंस! हे कामेश्वर! हे केदाराधिपते! हे परिपूर्ण! हे मुचुकुन्द! हे मधुनिवासिन्! हे कपालपाणे! हे भयङ्कर! हे विद्याराज! |
| ३१४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सोमराज कामराज रञ्जक अञ्जनराजकन्याहृदचल-<br>वसते समुद्रशायिन् गजमुख घण्टेश्वर गोकर्ण ब्रह्मयोने।<br>सहस्रवक्त्राक्षिचरण हाटकेश्वर नमोऽस्तु ते॥ | हे सोमराज! हे कामराज! हे रञ्जक! हे अञ्जनराजकन्या (काली)-के हृदयमें सदा रहनेवाले! हे समुद्रशायिन्! हे गजमुख! हे घण्टेश्वर! हे गोकर्ण! हे ब्रह्मयोने! हे हजार मुख, आँख एवं चरणवाले! हे हाटकेश्वर! आपको नमस्कार है। |
| एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ताः सर्व एवर्षिपार्थिवाः।<br>द्रष्टुं त्रैलोक्यकर्तारं त्र्यम्बकं हाटकेश्वरम्॥ १२१<br>समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योषितश्च ताः।<br>स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम्॥ १२२<br>ततः सुदेवतनयो विश्वकर्मसुतां प्रियाम्।<br>दृष्ट्वा हृषितचित्तस्तु संरोहत्पुलको बभौ॥ १२३<br>ऋतध्वजोऽपि तन्वङ्गीं दृष्ट्वा चित्राङ्गदां स्थिताम्।<br>प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा बभौ मुदितमानसः॥ १२४<br>ततस्तु सहसाऽभ्येत्य देवेशं हाटकेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्त्र्यक्षं ते स्तुवन्तः संस्थिताः क्रमात्॥ १२५ | इसी बीच समस्त ऋषि एवं राजालोग तीनों लोकोंके कर्ता भगवान् त्र्यम्बक हाटकेश्वरका दर्शन करने वहाँ पहुँच गये और भलीभाँति स्नान करनेके बाद ऊपर चढ़कर उन लोगोंने देवताके अभिमुख बैठकर गीत गाती हुई (स्तुति करती हुई) स्त्रियोंको देखा। उसके बाद वसुदेवके पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्माकी पुत्रीको देखकर हर्षसे गद्गद हो गये। योगी ऋतध्वज भी तन्वङ्गी चित्राङ्गदाको वहाँ स्थित देख एवं पहचानकर महान् हर्षमें भर गये। उसके बाद सभी व्यक्ति शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर भगवान्के निकट गये एवं त्रिलोचनकी पूजाकर क्रमशः खड़े होकर स्तुति करने लगे॥ १२१-१२५॥ |
| चित्राङ्गदापि तान् दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान्।<br>समं ताभिः कृशाङ्गीभिरभ्युत्थायाभ्यवादयत्॥ १२६<br>स च ताः प्रतिनन्द्यैव समं पुत्रेण तापसः।<br>समं नृपतिभिर्हृष्टः संविवेश यथासुखम्॥ १२७<br>ततः कपिवरः प्राप्तो घृताच्या सह सुन्दरि।<br>स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिदृक्षुर्हाटकेश्वरम्॥ १२८<br>ततोऽपश्यत् सुतां तन्वीं घृताची शुभदर्शनाम्।<br>साऽपि तां मातरे दृष्ट्वा हृष्टाऽभूद्वरवणिनी॥ १२९ | चित्राङ्गदाने भी उन ऋतध्वज आदिको देखकर उन तन्वङ्गी (कन्याओं)-के साथ उठकर प्रणाम किया। पुत्रसहित उन तपस्वीने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे प्रसन्नतासे राजाओंके साथ सुखपूर्वक बैठ गये। सुन्दरि! उसके बाद गोदावरीतीर्थमें स्नानकर हाटकेश्वर भगवान्का दर्शन करनेकी इच्छावाला वह श्रेष्ठ बन्दर भी घृताचीके साथ वहाँ पहुँचा। फिर घृताचीने अपनी शोभाशालिनी कृशाङ्गी पुत्रीको देखा। वह सुन्दरी भी अपनी उस माताको देखकर हर्षित हो गयी॥ १२६-१२९॥ |
| ततो घृताची स्वां पुत्रीं परिष्वज्य न्यपीडयत्।<br>स्नेहात् सवाष्पनयनां मुहुस्तां परिजिघ्रती॥ १३० | उसके बाद घृताचीने अपनी पुत्रीको भलीभाँति गले लगाया। स्नेहसे आँखोंमें आँसू भरकर वह (अपनी) पुत्रीको बार-बार सूँघने लगी—आशीर्वादात्मक शुभ भावना करने लगी। |
| ततो ऋतध्वजः श्रीमान् कपिं वचनमब्रवीत्।<br>गच्छानेतुं गुह्यकं त्वमञ्जनाद्रौ महाञ्जनम्॥ १३१ | उसके बाद श्रीमान् ऋतध्वजने कपिसे कहा—तुम महाजन नामके गुह्यकको ले आनेके |
| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३१५ | | :--- | :--- |
| पातालादपि दैत्येशं वीरं कन्दरमालिनम्।<br>स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय॥ १३२<br>इत्येवमुक्ते मुनिना प्राह वेदवती कपिम्।<br>गालवं वानरश्रेष्ठ इहानेतुं त्वमर्हसि॥ १३३ | लिये अञ्जन नामक पर्वतपर चले जाओ। फिर पातालसे वीर दैत्येश्वर कन्दारमालीको और स्वर्गसे गन्धर्वराज पर्जन्यको यहाँ शीघ्र बुला लाओ। मुनिके इस प्रकार कहनेपर वेदवतीने बन्दरसे कहा—कपिश्रेष्ठ! गालवको भी आप यहाँ बुला लावें॥ १३०-१३३॥ | | इत्येवमुक्ते वचने कपिर्मारुतविक्रमः।<br>गत्वाऽञ्जनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम्॥ १३४<br>पर्जन्यं तत्र चामन्त्र्य प्रेषयित्वा महाश्रमे।<br>सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः॥ १३५<br>तत्रामन्त्र्य महावीर्यं कपिः कन्दरमालिनम्।<br>पातालादभिनिष्क्रम्य महीं पर्यचरज्जवी॥ १३६<br>गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु।<br>समुत्पत्यानयच्छीघ्रं सप्तगोदावरं जलम्॥ १३७<br>तत्र स्नात्वा विधानेन सम्प्राप्तो हाटकेश्वरम्।<br>ददृशे नन्दयन्तीं च स्थितां वेदवतीमपि॥ १३८ | ऐसा कहनेपर वायुके समान पराक्रमवाला कपि अञ्जनपर्वतपर पहुँच गया और (गुह्यकको) आमन्त्रित कर पुनः सुमेरुपर्वतपर प्रविष्ट हो गया। वहाँ उसने पर्जन्यको आमन्त्रित किया और सप्तगोदावरतीर्थमें स्थित महाश्रममें उन्हें भेजनेके बाद वह फिर पाताललोकमें प्रविष्ट हो गया। वहाँ (जाकर उसने) महापराक्रमी कन्दारमालीको आमन्त्रित किया। वेगशाली बन्दर फिर पातालसे निकलकर पृथ्वीपर घूमने-फिरने लगा। तपोनिधि गालवको माहिष्मतीके निकट देखकर उसने छलाँग भरी और उन्हें शीघ्र सप्तगोदावरके जलके निकट ला दिया। वहाँ विधानसे स्नान करनेके बाद वह हाटकेश्वरके समीप पहुँचा और उसने वहाँ बैठी हुई नन्दयन्ती तथा वेदवतीको भी देखा॥ १३४-१३८॥ | | तं दृष्ट्वा गालवं चैव समुत्थायाभ्यवादयत्।<br>स चार्चयिष्यन्महादेवं महर्षीनभ्यवादयत्।<br>ते चापि नृपतिश्रेष्ठास्तं सम्पूज्य तपोधनम्॥ १३९<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा उपविष्टा यथासुखम्।<br>तेषूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिताः॥ १४०<br>समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः।<br>तानागतान् समीक्ष्यैव पुत्र्यस्ताः पृथुलोचनाः॥ १४१<br>स्नेहार्द्रनयनाः सर्वास्तदा सस्वजिरे पितॄन्।<br>नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना॥ १४२<br>सवाष्पनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा।<br>अथ तामाह स मुनिः सत्यं सत्यध्वजो वचः॥ १४३ | उन सभीने गालवको देखकर उठकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने भी महादेवकी पूजा कर महर्षियोंको प्रणाम किया। उन श्रेष्ठ राजाओंने भी उन तपस्वीकी पूजा की तथा वे अत्यन्त हर्षित होकर सुखपूर्वक बैठ गये। उनके बैठ जानेपर कपिद्वारा आमन्त्रित किये गये यक्ष, महानुभाव गन्धर्व एवं दानव वहाँ आ गये। उन्हें आया हुआ देखते ही उन विशालनयना पुत्रियोंके नेत्रोंमें स्नेहसे आँसू भर आये। वे सभी अपने-अपने पिताके गले लग गयीं। नन्दयन्ती आदिको पिताके साथ उपस्थित हुई देखकर विश्वकर्माकी सुन्दरी पुत्रीके नेत्रोंमें (पिताकी स्मृतिमें) आँसू छलक आये। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने उससे सच्ची बात कह दी—॥ १३९-१४३॥ | | मा विषादं कृथाः पुत्रि पिताऽयं तव वानरः।<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य व्रीडोपहतचेतना॥ १४४<br>कथं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्वं गतोऽधुना।<br>दुष्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्ष्ये कलेवरम्॥ १४५<br>इति संचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह। | पुत्रि! तुम उदास मत होओ। यह बन्दर ही तुम्हारा पिता है। उस वचनको सुनकर वह लजा गयी; क्योंकि मुझ कुपुत्रीके जन्म लेनेके कारण ये विश्वकर्मा इस समय बन्दर हो गये हैं; अतः (उसने सोचा—) मैं अपने शरीरका त्याग करूँगी। मनमें इस प्रकार |
| ३१६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
|---|
| परित्रायस्व मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥ १४६<br><br>पितृघ्नी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br><br>अथोवाच मुनिस्तन्वीं मा विषादं कृथाधुना ॥ १४७ | विचारकर उसने ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! मैं पापसे नष्टमतिवाली हूँ। आप मेरी रक्षा करें। पिताका घात करनेवाली मैं मरना चाहती हूँ। अतः आप स्वीकृति दें। तब मुनिने उस तन्वङ्गीसे कहा—अब विषाद मत करो ॥ १४४—१४७॥ | | भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्याक्षीः कलेवरम्।<br>भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्द्धकिः ॥ १४८<br>जातेऽपत्ये घृताच्यां तु नात्र कार्या विचारणा।<br>इत्येवमुक्ते वचने मुनिना भावितात्मना ॥ १४९<br>घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदां वचः ।<br>पुत्रि त्यजस्व शोकं त्वं मासैर्दशभिरात्मजः ॥ १५०<br>भविष्यति पितुस्तुभ्यं मत्सकाशान्न संशयः ।<br>इत्येवमुक्ता संहृष्टा बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥ १५१ | भवितव्यताका विनाश नहीं होता—होनी होकर रहती है। इसलिये देहका परित्याग मत करो। घृताचीकी कोखसे पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर तुम्हारे पिता फिर देवताओंके शिल्पी हो जायेंगे—इसमें संदेह नहीं है। मनके ऊपर नियन्त्रण रखनेवाले मुनिके इस प्रकार कहनेपर घृताचीने चित्राङ्गदाके पास जाकर उससे कहा—पुत्रि! तुम चिन्ता करना छोड़ दो। तुम्हारे पिताद्वारा मुझसे दस महीनोंमें निःसंदेह एक पुत्र उत्पन्न होगा। (फिर सुतरां शाप-विमोचन हो जायगा।) ऐसा कहनेपर चित्राङ्गदा हर्षित हो गयी ॥ १४८—१५१ ॥ | | प्रतीक्षन्ती सुचार्वङ्गी विवाहे पितृदर्शनम् ।<br>सर्वास्ता अपि तावन्तं कालं सुतनुकन्यकाः ॥ १५२<br>प्रत्यैक्षन्त विवाहं हि तस्या एव प्रियेप्सया ।<br>ततो दशसु मासेषु समतीतेष्वथाप्सराः ॥ १५३<br>तस्मिन् गोदावरीतीर्थे प्रसूता तनयं नलम् ।<br>जातेऽपत्ये कपित्वाच्च विश्वकर्माप्यमुच्यत ॥ १५४ | सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाहमें मिलनेवाले पिताके दर्शनकी (उत्सुकतासे) प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी सभी कन्याएँ भी प्रियकी प्राप्तिकी वाञ्छासे उसके विवाहके समयकी प्रतीक्षा करने लगीं। दस महीने बीत जानेपर अप्सराने उस गोदावरीतीर्थमें पुत्रको उत्पन्न किया, जो (आगे चलकर) नल (नामक) हुआ। पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर विश्वकर्मा भी वानरत्वसे छूट गये ॥ १५२—१५४ ॥ | | समभ्येत्य प्रियां पुत्रीं पर्यष्वजत चादरात् ।<br>ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्धकिः ॥ १५५<br>सुराणामधिपं शक्रं सहैव सुरकिन्नरैः ।<br>त्वष्टाऽथ संस्मृतः शक्रो मरुद्गणवृतस्तदा ॥ १५६<br>सुरैः सरुद्रैः सम्प्राप्तस्तत्तीर्थं हाटकाह्वयम् ।<br>समायातेषु देवेषु गन्धर्वेष्वप्सरस्सु च ॥ १५७<br>इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रेष्ठमृतध्वजमुवाच ह।<br>जाबालेर्दीयतां ब्रह्मन् सुता कन्दरमालिनः ॥ १५८<br>गृह्णातु विधिवत् पाणिं दैतेय्यास्तनयस्तव ।<br>नन्दयन्तीं च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥ १५९ | अपनी प्रिय पुत्रीके पास जाकर उन्होंने उसको स्नेहपूर्वक गले लगाया। उसके बाद प्रसन्न मनसे देवशिल्पीने देवताओं एवं किन्नरोंसहित देवराज इन्द्रका स्मरण किया। देवशिल्पीके स्मरण करनेपर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एवं रुद्रोंके साथ हाटक नामके तीर्थमें आ गये। देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओंके आनेपर इन्द्रद्युम्नने मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! जाबालिको कन्दरमालीकी कन्याका दान कर दें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनीका पाणिग्रहण कर ले। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्तीसे विवाह करें ॥ १५५—१५९ ॥ | | ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्रेयी सुरथस्य च।<br>बाढमित्यब्रवीद्धृष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ॥ १६० | यह वेदवती मेरी (इन्द्रद्युम्नकी) और त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथकी पत्नी हो। मुनिने मनुपुत्र राजासे कहा—ठीक है। |
६८- भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश
| अध्याय ६६ ] | दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ | ३१७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम्।<br>ऋत्विजोऽभूद् गालवस्तु हुत्वा हव्यं विधानतः ॥ १६१<br>गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।<br>आदौ जाबालिनः पाणिर्गृहीतो दैत्यकन्यया ॥ १६२<br>इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः।<br>ततः शकुनिना पाणिर्गृहीतो यक्षकन्यया ॥ १६३<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत्।<br>एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥ १६४ | उसके बाद उन लोगोंने प्रसन्नतापूर्वक भलीभाँति विवाहकी विधिको पूरा किया। विधिसे हव्यका हवन करनेवाले गालव ऋत्विक् बने। उस समय वहाँ गन्धर्वोंने गाना गाया और अप्सराओंने नृत्य किया। सबसे पहले दैत्य-कन्याने जाबालिका पाणिग्रहण किया। कल्याणि! उसके बाद विधिपूर्वक इन्द्रद्युम्नने वेदवतीका, शकुनिने यक्ष-कन्याका तथा सुरथने चित्राङ्गदाका पाणिग्रहण किया। (कृशोदरि!) इस प्रकार विवाहकार्य क्रमशः सम्पन्न हुआ॥ १६०-१६४॥ |
| वृत्ते मुनिर्विवाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान्।<br>अस्मिंस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥ १६५<br>स्थेयं विशेषतो मासमिमं माधवमुत्तमम्।<br>बाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा दिवं क्रमात् ॥ १६६<br>मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात्।<br>भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥ १६७<br>प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान्।<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल।<br>तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥ १६८<br>इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-<br>स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम्।<br>स्तुवन्मृगाक्षीं मृदुना क्रमेण<br>सा चापि वाक्यं नृपतिं बभाषे ॥ १६९ | विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर मुनि (ऋतध्वज)-ने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—इस सप्तगोदावर तीर्थमें आपलोग सदा निवास करें। विशेषरूपसे इस उत्तम वैशाखके महीनेमें आपलोग यहाँ अवश्य रहें। देवतालोग 'ऐसा ही हो'—(ऐसा) कहकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग चले गये। मुनिलोग पुत्रसहित मुनि (ऋतध्वज)-को सादर साथ लेकर चले गये। राजालोग भी अपनी-अपनी पत्नीके साथ अपने-अपने नगरमें आ गये। सभी लोग प्रिय विषयोंका उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक रहने लगे। कल्याणि! चित्राङ्गदाका पूर्व वृत्तान्त इस प्रकारका है। इसलिये सरोजनयने! ललनोत्तमे! तुम मुझे अङ्गीकार करो। ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) ब्राह्मणकी उस सुन्दरी मृगनयनी पुत्रीकी कोमल वाणीसे स्तुति करने लगे। उसने भी राजासे (आगेवाला वचन) कहा — ॥ १६५-१६९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अरजा उवाच<br>नात्मानं तव दास्यामि बहुनोक्तेन किं तव।<br>रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ॥ १ | अरजाने कहा— पृथिवीपते! आपके अधिक कहनेसे क्या लाभ? (थोड़ेमें समझ लीजिये कि पिताके) शापसे आपकी और अपनी रक्षा करती हुई (ही) मैं अपनेको आपके लिये समर्पित नहीं करूँगी ॥ १॥ |
| ३१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ | | :--- | :--- |
| प्रह्लाद उवाच | |
|---|---|
| इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुतां बलात्।<br>कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः॥ २<br>तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः।<br>निष्क्रामाश्रमात् तस्माद् गतश्च नगरं निजम्॥ ३<br>साऽपि शुक्रसुता तन्वी अरजा रजसाप्लुता।<br>आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी॥ ४<br>चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः।<br>महाग्रहोपसृप्तेव रोहिणी शशिनः प्रिया॥ ५ | प्रह्लादने कहा—कामसे अंधे हुए उस मूर्खने इस प्रकार विवाद (निषेध) करती हुई श्रेष्ठ भार्गव कुलमें प्रसूत उस कन्याको हठात् अपावन (ध्वस्तशील) कर दिया। मदसे अंधा बना हुआ वह चरित्रसे च्युत हो करके उस आश्रमसे बाहर निकलकर अपने नगर चला गया। उसके बाद रजसे लपटायी वह कृशाङ्गी शुक्रपुत्री अरजा भी आश्रमसे बाहर निकलकर नीचे मुख लटकाये बैठ गयी। राहुसे पीड़ित चन्द्र-प्रिया रोहिणीके समान वह अपने पिताका चिन्तन करती हुई बारम्बार (बिलख-बिलखकर) रोने लगी॥ २—५॥ |
| ततो बहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि।<br>पातालादागमच्छुक्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः॥ ६<br>आश्रमान्ते च ददृशे सुतां दैत्य रजस्वलाम्।<br>मेघलेखामिवाकाशे संध्यारागेण रञ्जिताम्॥ ७<br>तां दृष्ट्वा परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि धर्षिता।<br>कः क्रीडति सरोषेण सममाशीविषेण हि॥ ८<br>कोऽद्यैव याम्यां नगरीं गमिष्यति सुदुर्मतिः।<br>कस्त्वां शुद्धसमाचारां विध्वंसयति पापकृत्॥ ९<br>ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः।<br>रुदन्ती व्रीडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह॥ १० | उसके बाद जब बहुत तिथियोंवाला समय बीत गया और यज्ञ समाप्त हो गया तब शुक्रममुनि पातालसे अपने आश्रममें आये। दैत्य! उन्होंने आश्रमसे बाहर आकाशमें सन्ध्याके समय लालिमासे रञ्जित मेघमालाकी तरह धूलसे लिपटी हुई अपनी पुत्रीको देखा। उसे देखकर उन्होंने पूछा—पुत्रि! किसने तुम्हारा धर्षण (अपमान) किया है? क्रोधभरे साँपसे कौन खेल कर रहा है? पवित्र आचरणवाली तुम्हें शीलसे च्युत कर कौन दुर्बुद्धि पापी आज ही यमपुरी जानेवाला है? उसके बाद अपने पिताको देखकर बारम्बार काँपती, रोती एवं लजाती हुई अरजाने धीरे-धीरे कहा—॥ ६—१०॥ |
| तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत्।<br>बलादनाथा रुदती नीताऽहं वचनीयताम्॥ ११<br>एतत् पुत्र्या वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ १२<br>यस्मात् तेनावनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम्।<br>गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजा कृता॥ १३<br>तस्मात् सराष्ट्रः सबलः सभृत्यो वाहनैः सह।<br>सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्राववृष्ट्या भविष्यति॥ १४ | बार-बार बरजनेपर भी आपके शिष्य दण्डने रोती हुई मुझ अनाथाको बलपूर्वक निन्दनीया बना दिया है—हमारा शीलभ्रंश कर दिया है। कन्याकी इस बातको सुनकर शुक्राचार्यकी आँखें क्रोधसे अत्यन्त लाल हो गयीं। उन्होंने आचमन करके शुद्ध होकर यह (शाप) वचन कहा—यतः उस उद्दण्डने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरवको तिरस्कृतकर अरजाको धर्मसे च्युत किया है, अतः वह सात रात्रियों (दिनों)-में उपलवृष्टिके कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनोंसहित विनष्ट हो जायगा—हो जाय॥ ११—१४॥ |
| इत्येवमुक्त्वा मुनिपुङ्गवोऽसौ<br>शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच।<br>त्वं पापमोक्षार्थमिहैव पुत्रि<br>तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती॥ १५ | उन मुनिश्रेष्ठने ऐसा कहकर दण्डको शाप देनेके बाद अपनी पुत्रीसे कहा—पुत्रि! कल्याणि! पापसे छुटकारा पानेके लिये तुम तपस्या करती हुई यहीं रहो। |
अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शप्त्त्वेथं भगवाञ् छुक्रो दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम्।<br>जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम्॥ १६<br><br>दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रबलवाहनः।<br>महता ग्राववर्षेण सप्तरात्रान्तरे तदा॥ १७<br><br>एवं दण्डकारण्यं परित्यजन्ति देवताः।<br>आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शम्भुना॥ १८ | भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्डको इस प्रकार शाप देकर शिष्यके साथ दानवोंके निवास-स्थान पाताललोकमें चले गये। उसके बाद दण्ड भी बहुत बड़ी उपलवृष्टिके कारण सात रात्रियोंके भीतर ही अपने राष्ट्र, सेना और वाहनोंके साथ नष्ट हो गया। यही कारण है कि देवताओंने दण्डकारण्यको छोड़ दिया और शम्भुने उसे राक्षसोंका स्थान बना दिया॥ १५-१८॥ |
| एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि।<br>भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च पराभवम्॥ १९<br><br>तस्मादन्धक दुर्बुद्धिर्न कार्या भवता त्वियम्।<br>प्राकृताऽपि दहेन्नारी किमुताहोद्रिनन्दिनी॥ २०<br><br>शङ्करोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः।<br>द्रष्टुमप्यमितौजस्कः किमु योधयितुं रणे॥ २१ | इस प्रकार (जैसा कि ऊपर वर्णित है) परनारियाँ (अपनेको अपवित्र करनेवाले) पुण्यात्माओंको भी जलाकर राख (नष्ट) कर देती हैं, फिर साधारण मनुष्य तो बहुत बड़ा तिरस्कार प्राप्त करते हैं। अतः अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिये। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वतीका क्या कहना। दैत्येश! सुर या असुर कोई भी महादेवको नहीं जीत सकता। जब रणमें अत्यधिक ओजसे सम्पन्न शंकरको देखा भी नहीं जा सकता तब उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है॥ १९-२१॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने क्रुद्धस्ताम्रेक्षणः श्वसन्।<br>वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकासुरः॥ २२<br><br>किं ममासौ रणे योद्धुं शक्तस्त्रिणयनोऽसुर।<br>एकाकी धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः॥ २३<br><br>नान्धको बिभियादिन्द्रान्नामरेभ्यः कथंचन।<br>स कथं वृषपत्राक्षाद् बिभेति स्त्रीमुखेक्षकात्॥ २४<br><br>तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रह्लादः प्राह नारद।<br>न सम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा वचन कहनेपर क्रुद्ध एवं लाल-लाल आँखें किये हुए महातेजस्वी अन्धकासुरने लंबी साँस लेते हुए प्रह्लादसे कहा—असुर! क्या शरीरपर राख लपेटे, (किंतु, लोक) धर्मसे रहित अकेला वह त्रिनयन लड़ाईके मैदानमें मुझसे युद्ध कर सकता है? जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओंसे कभी नहीं डरता वह बैलकी सवारी करनेवाले तथा स्त्रीका मुख निहारनेवाले त्रिनेत्र (शंकर)-से कैसे डर सकता है? नारद! उसके उस कठोर वचनको सुनकर प्रह्लादने कहा—आप यह उचित नहीं कह रहे हैं। आपका कहना धर्म एवं अर्थके विपरीत है॥ २२-२५॥ |
| हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहक्रोष्टुकयोरिव।<br>गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुक्मपाषाणयोरिव॥ २६<br><br>एतेषाभिरुदितं यावदन्तरमन्धक।<br>तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च॥ २७<br><br>वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे।<br>शृणुष्व वाक्यं देवर्षेरसितस्य महात्मनः॥ २८ | अन्धक! अग्नि और जुगनू, सिंह और सियार, गजेन्द्र और मशक तथा सोने और पत्थरमें जितना अन्तर कहा जाता है, उतना ही अन्तर आप और शङ्करकी तुलनामें है। वीर! आपको मैंने रोका है और (अब भी) बार-बार रोक रहा हूँ। आप देवर्षि असितका वचन सुनें— |