भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325

| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३१५ | | :--- | :--- |

| पातालादपि दैत्येशं वीरं कन्दरमालिनम्।<br>स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय॥ १३२<br>इत्येवमुक्ते मुनिना प्राह वेदवती कपिम्।<br>गालवं वानरश्रेष्ठ इहानेतुं त्वमर्हसि॥ १३३ | लिये अञ्जन नामक पर्वतपर चले जाओ। फिर पातालसे वीर दैत्येश्वर कन्दारमालीको और स्वर्गसे गन्धर्वराज पर्जन्यको यहाँ शीघ्र बुला लाओ। मुनिके इस प्रकार कहनेपर वेदवतीने बन्दरसे कहा—कपिश्रेष्ठ! गालवको भी आप यहाँ बुला लावें॥ १३०-१३३॥ | | इत्येवमुक्ते वचने कपिर्मारुतविक्रमः।<br>गत्वाऽञ्जनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम्॥ १३४<br>पर्जन्यं तत्र चामन्त्र्य प्रेषयित्वा महाश्रमे।<br>सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः॥ १३५<br>तत्रामन्त्र्य महावीर्यं कपिः कन्दरमालिनम्।<br>पातालादभिनिष्क्रम्य महीं पर्यचरज्जवी॥ १३६<br>गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु।<br>समुत्पत्यानयच्छीघ्रं सप्तगोदावरं जलम्॥ १३७<br>तत्र स्नात्वा विधानेन सम्प्राप्तो हाटकेश्वरम्।<br>ददृशे नन्दयन्तीं च स्थितां वेदवतीमपि॥ १३८ | ऐसा कहनेपर वायुके समान पराक्रमवाला कपि अञ्जनपर्वतपर पहुँच गया और (गुह्यकको) आमन्त्रित कर पुनः सुमेरुपर्वतपर प्रविष्ट हो गया। वहाँ उसने पर्जन्यको आमन्त्रित किया और सप्तगोदावरतीर्थमें स्थित महाश्रममें उन्हें भेजनेके बाद वह फिर पाताललोकमें प्रविष्ट हो गया। वहाँ (जाकर उसने) महापराक्रमी कन्दारमालीको आमन्त्रित किया। वेगशाली बन्दर फिर पातालसे निकलकर पृथ्वीपर घूमने-फिरने लगा। तपोनिधि गालवको माहिष्मतीके निकट देखकर उसने छलाँग भरी और उन्हें शीघ्र सप्तगोदावरके जलके निकट ला दिया। वहाँ विधानसे स्नान करनेके बाद वह हाटकेश्वरके समीप पहुँचा और उसने वहाँ बैठी हुई नन्दयन्ती तथा वेदवतीको भी देखा॥ १३४-१३८॥ | | तं दृष्ट्वा गालवं चैव समुत्थायाभ्यवादयत्।<br>स चार्चयिष्यन्महादेवं महर्षीनभ्यवादयत्।<br>ते चापि नृपतिश्रेष्ठास्तं सम्पूज्य तपोधनम्॥ १३९<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा उपविष्टा यथासुखम्।<br>तेषूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिताः॥ १४०<br>समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः।<br>तानागतान् समीक्ष्यैव पुत्र्यस्ताः पृथुलोचनाः॥ १४१<br>स्नेहार्द्रनयनाः सर्वास्तदा सस्वजिरे पितॄन्।<br>नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना॥ १४२<br>सवाष्पनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा।<br>अथ तामाह स मुनिः सत्यं सत्यध्वजो वचः॥ १४३ | उन सभीने गालवको देखकर उठकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने भी महादेवकी पूजा कर महर्षियोंको प्रणाम किया। उन श्रेष्ठ राजाओंने भी उन तपस्वीकी पूजा की तथा वे अत्यन्त हर्षित होकर सुखपूर्वक बैठ गये। उनके बैठ जानेपर कपिद्वारा आमन्त्रित किये गये यक्ष, महानुभाव गन्धर्व एवं दानव वहाँ आ गये। उन्हें आया हुआ देखते ही उन विशालनयना पुत्रियोंके नेत्रोंमें स्नेहसे आँसू भर आये। वे सभी अपने-अपने पिताके गले लग गयीं। नन्दयन्ती आदिको पिताके साथ उपस्थित हुई देखकर विश्वकर्माकी सुन्दरी पुत्रीके नेत्रोंमें (पिताकी स्मृतिमें) आँसू छलक आये। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने उससे सच्ची बात कह दी—॥ १३९-१४३॥ | | मा विषादं कृथाः पुत्रि पिताऽयं तव वानरः।<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य व्रीडोपहतचेतना॥ १४४<br>कथं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्वं गतोऽधुना।<br>दुष्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्ष्ये कलेवरम्॥ १४५<br>इति संचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह। | पुत्रि! तुम उदास मत होओ। यह बन्दर ही तुम्हारा पिता है। उस वचनको सुनकर वह लजा गयी; क्योंकि मुझ कुपुत्रीके जन्म लेनेके कारण ये विश्वकर्मा इस समय बन्दर हो गये हैं; अतः (उसने सोचा—) मैं अपने शरीरका त्याग करूँगी। मनमें इस प्रकार |