भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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३१६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५

| परित्रायस्व मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥ १४६<br><br>पितृघ्नी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br><br>अथोवाच मुनिस्तन्वीं मा विषादं कृथाधुना ॥ १४७ | विचारकर उसने ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! मैं पापसे नष्टमतिवाली हूँ। आप मेरी रक्षा करें। पिताका घात करनेवाली मैं मरना चाहती हूँ। अतः आप स्वीकृति दें। तब मुनिने उस तन्वङ्गीसे कहा—अब विषाद मत करो ॥ १४४—१४७॥ | | भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्याक्षीः कलेवरम्।<br>भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्द्धकिः ॥ १४८<br>जातेऽपत्ये घृताच्यां तु नात्र कार्या विचारणा।<br>इत्येवमुक्ते वचने मुनिना भावितात्मना ॥ १४९<br>घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदां वचः ।<br>पुत्रि त्यजस्व शोकं त्वं मासैर्दशभिरात्मजः ॥ १५०<br>भविष्यति पितुस्तुभ्यं मत्सकाशान्न संशयः ।<br>इत्येवमुक्ता संहृष्टा बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥ १५१ | भवितव्यताका विनाश नहीं होता—होनी होकर रहती है। इसलिये देहका परित्याग मत करो। घृताचीकी कोखसे पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर तुम्हारे पिता फिर देवताओंके शिल्पी हो जायेंगे—इसमें संदेह नहीं है। मनके ऊपर नियन्त्रण रखनेवाले मुनिके इस प्रकार कहनेपर घृताचीने चित्राङ्गदाके पास जाकर उससे कहा—पुत्रि! तुम चिन्ता करना छोड़ दो। तुम्हारे पिताद्वारा मुझसे दस महीनोंमें निःसंदेह एक पुत्र उत्पन्न होगा। (फिर सुतरां शाप-विमोचन हो जायगा।) ऐसा कहनेपर चित्राङ्गदा हर्षित हो गयी ॥ १४८—१५१ ॥ | | प्रतीक्षन्ती सुचार्वङ्गी विवाहे पितृदर्शनम् ।<br>सर्वास्ता अपि तावन्तं कालं सुतनुकन्यकाः ॥ १५२<br>प्रत्यैक्षन्त विवाहं हि तस्या एव प्रियेप्सया ।<br>ततो दशसु मासेषु समतीतेष्वथाप्सराः ॥ १५३<br>तस्मिन् गोदावरीतीर्थे प्रसूता तनयं नलम् ।<br>जातेऽपत्ये कपित्वाच्च विश्वकर्माप्यमुच्यत ॥ १५४ | सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाहमें मिलनेवाले पिताके दर्शनकी (उत्सुकतासे) प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी सभी कन्याएँ भी प्रियकी प्राप्तिकी वाञ्छासे उसके विवाहके समयकी प्रतीक्षा करने लगीं। दस महीने बीत जानेपर अप्सराने उस गोदावरीतीर्थमें पुत्रको उत्पन्न किया, जो (आगे चलकर) नल (नामक) हुआ। पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर विश्वकर्मा भी वानरत्वसे छूट गये ॥ १५२—१५४ ॥ | | समभ्येत्य प्रियां पुत्रीं पर्यष्वजत चादरात् ।<br>ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्धकिः ॥ १५५<br>सुराणामधिपं शक्रं सहैव सुरकिन्नरैः ।<br>त्वष्टाऽथ संस्मृतः शक्रो मरुद्गणवृतस्तदा ॥ १५६<br>सुरैः सरुद्रैः सम्प्राप्तस्तत्तीर्थं हाटकाह्वयम् ।<br>समायातेषु देवेषु गन्धर्वेष्वप्सरस्सु च ॥ १५७<br>इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रेष्ठमृतध्वजमुवाच ह।<br>जाबालेर्दीयतां ब्रह्मन् सुता कन्दरमालिनः ॥ १५८<br>गृह्णातु विधिवत् पाणिं दैतेय्यास्तनयस्तव ।<br>नन्दयन्तीं च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥ १५९ | अपनी प्रिय पुत्रीके पास जाकर उन्होंने उसको स्नेहपूर्वक गले लगाया। उसके बाद प्रसन्न मनसे देवशिल्पीने देवताओं एवं किन्नरोंसहित देवराज इन्द्रका स्मरण किया। देवशिल्पीके स्मरण करनेपर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एवं रुद्रोंके साथ हाटक नामके तीर्थमें आ गये। देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओंके आनेपर इन्द्रद्युम्नने मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! जाबालिको कन्दरमालीकी कन्याका दान कर दें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनीका पाणिग्रहण कर ले। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्तीसे विवाह करें ॥ १५५—१५९ ॥ | | ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्रेयी सुरथस्य च।<br>बाढमित्यब्रवीद्धृष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ॥ १६० | यह वेदवती मेरी (इन्द्रद्युम्नकी) और त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथकी पत्नी हो। मुनिने मनुपुत्र राजासे कहा—ठीक है। |

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