वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ६६ ] | दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ | ३१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम्।<br>ऋत्विजोऽभूद् गालवस्तु हुत्वा हव्यं विधानतः ॥ १६१<br>गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।<br>आदौ जाबालिनः पाणिर्गृहीतो दैत्यकन्यया ॥ १६२<br>इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः।<br>ततः शकुनिना पाणिर्गृहीतो यक्षकन्यया ॥ १६३<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत्।<br>एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥ १६४ | उसके बाद उन लोगोंने प्रसन्नतापूर्वक भलीभाँति विवाहकी विधिको पूरा किया। विधिसे हव्यका हवन करनेवाले गालव ऋत्विक् बने। उस समय वहाँ गन्धर्वोंने गाना गाया और अप्सराओंने नृत्य किया। सबसे पहले दैत्य-कन्याने जाबालिका पाणिग्रहण किया। कल्याणि! उसके बाद विधिपूर्वक इन्द्रद्युम्नने वेदवतीका, शकुनिने यक्ष-कन्याका तथा सुरथने चित्राङ्गदाका पाणिग्रहण किया। (कृशोदरि!) इस प्रकार विवाहकार्य क्रमशः सम्पन्न हुआ॥ १६०-१६४॥ |
| वृत्ते मुनिर्विवाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान्।<br>अस्मिंस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥ १६५<br>स्थेयं विशेषतो मासमिमं माधवमुत्तमम्।<br>बाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा दिवं क्रमात् ॥ १६६<br>मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात्।<br>भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥ १६७<br>प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान्।<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल।<br>तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥ १६८<br>इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-<br>स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम्।<br>स्तुवन्मृगाक्षीं मृदुना क्रमेण<br>सा चापि वाक्यं नृपतिं बभाषे ॥ १६९ | विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर मुनि (ऋतध्वज)-ने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—इस सप्तगोदावर तीर्थमें आपलोग सदा निवास करें। विशेषरूपसे इस उत्तम वैशाखके महीनेमें आपलोग यहाँ अवश्य रहें। देवतालोग 'ऐसा ही हो'—(ऐसा) कहकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग चले गये। मुनिलोग पुत्रसहित मुनि (ऋतध्वज)-को सादर साथ लेकर चले गये। राजालोग भी अपनी-अपनी पत्नीके साथ अपने-अपने नगरमें आ गये। सभी लोग प्रिय विषयोंका उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक रहने लगे। कल्याणि! चित्राङ्गदाका पूर्व वृत्तान्त इस प्रकारका है। इसलिये सरोजनयने! ललनोत्तमे! तुम मुझे अङ्गीकार करो। ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) ब्राह्मणकी उस सुन्दरी मृगनयनी पुत्रीकी कोमल वाणीसे स्तुति करने लगे। उसने भी राजासे (आगेवाला वचन) कहा — ॥ १६५-१६९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६५ ॥
छाछठवाँ अध्याय
दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अरजा उवाच<br>नात्मानं तव दास्यामि बहुनोक्तेन किं तव।<br>रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ॥ १ | अरजाने कहा— पृथिवीपते! आपके अधिक कहनेसे क्या लाभ? (थोड़ेमें समझ लीजिये कि पिताके) शापसे आपकी और अपनी रक्षा करती हुई (ही) मैं अपनेको आपके लिये समर्पित नहीं करूँगी ॥ १॥ |