वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ | | :--- | :--- |
| प्रह्लाद उवाच | |
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| इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुतां बलात्।<br>कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः॥ २<br>तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः।<br>निष्क्रामाश्रमात् तस्माद् गतश्च नगरं निजम्॥ ३<br>साऽपि शुक्रसुता तन्वी अरजा रजसाप्लुता।<br>आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी॥ ४<br>चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः।<br>महाग्रहोपसृप्तेव रोहिणी शशिनः प्रिया॥ ५ | प्रह्लादने कहा—कामसे अंधे हुए उस मूर्खने इस प्रकार विवाद (निषेध) करती हुई श्रेष्ठ भार्गव कुलमें प्रसूत उस कन्याको हठात् अपावन (ध्वस्तशील) कर दिया। मदसे अंधा बना हुआ वह चरित्रसे च्युत हो करके उस आश्रमसे बाहर निकलकर अपने नगर चला गया। उसके बाद रजसे लपटायी वह कृशाङ्गी शुक्रपुत्री अरजा भी आश्रमसे बाहर निकलकर नीचे मुख लटकाये बैठ गयी। राहुसे पीड़ित चन्द्र-प्रिया रोहिणीके समान वह अपने पिताका चिन्तन करती हुई बारम्बार (बिलख-बिलखकर) रोने लगी॥ २—५॥ |
| ततो बहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि।<br>पातालादागमच्छुक्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः॥ ६<br>आश्रमान्ते च ददृशे सुतां दैत्य रजस्वलाम्।<br>मेघलेखामिवाकाशे संध्यारागेण रञ्जिताम्॥ ७<br>तां दृष्ट्वा परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि धर्षिता।<br>कः क्रीडति सरोषेण सममाशीविषेण हि॥ ८<br>कोऽद्यैव याम्यां नगरीं गमिष्यति सुदुर्मतिः।<br>कस्त्वां शुद्धसमाचारां विध्वंसयति पापकृत्॥ ९<br>ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः।<br>रुदन्ती व्रीडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह॥ १० | उसके बाद जब बहुत तिथियोंवाला समय बीत गया और यज्ञ समाप्त हो गया तब शुक्रममुनि पातालसे अपने आश्रममें आये। दैत्य! उन्होंने आश्रमसे बाहर आकाशमें सन्ध्याके समय लालिमासे रञ्जित मेघमालाकी तरह धूलसे लिपटी हुई अपनी पुत्रीको देखा। उसे देखकर उन्होंने पूछा—पुत्रि! किसने तुम्हारा धर्षण (अपमान) किया है? क्रोधभरे साँपसे कौन खेल कर रहा है? पवित्र आचरणवाली तुम्हें शीलसे च्युत कर कौन दुर्बुद्धि पापी आज ही यमपुरी जानेवाला है? उसके बाद अपने पिताको देखकर बारम्बार काँपती, रोती एवं लजाती हुई अरजाने धीरे-धीरे कहा—॥ ६—१०॥ |
| तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत्।<br>बलादनाथा रुदती नीताऽहं वचनीयताम्॥ ११<br>एतत् पुत्र्या वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ १२<br>यस्मात् तेनावनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम्।<br>गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजा कृता॥ १३<br>तस्मात् सराष्ट्रः सबलः सभृत्यो वाहनैः सह।<br>सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्राववृष्ट्या भविष्यति॥ १४ | बार-बार बरजनेपर भी आपके शिष्य दण्डने रोती हुई मुझ अनाथाको बलपूर्वक निन्दनीया बना दिया है—हमारा शीलभ्रंश कर दिया है। कन्याकी इस बातको सुनकर शुक्राचार्यकी आँखें क्रोधसे अत्यन्त लाल हो गयीं। उन्होंने आचमन करके शुद्ध होकर यह (शाप) वचन कहा—यतः उस उद्दण्डने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरवको तिरस्कृतकर अरजाको धर्मसे च्युत किया है, अतः वह सात रात्रियों (दिनों)-में उपलवृष्टिके कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनोंसहित विनष्ट हो जायगा—हो जाय॥ ११—१४॥ |
| इत्येवमुक्त्वा मुनिपुङ्गवोऽसौ<br>शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच।<br>त्वं पापमोक्षार्थमिहैव पुत्रि<br>तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती॥ १५ | उन मुनिश्रेष्ठने ऐसा कहकर दण्डको शाप देनेके बाद अपनी पुत्रीसे कहा—पुत्रि! कल्याणि! पापसे छुटकारा पानेके लिये तुम तपस्या करती हुई यहीं रहो। |