वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ ३१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शप्त्त्वेथं भगवाञ् छुक्रो दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम्।<br>जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम्॥ १६<br><br>दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रबलवाहनः।<br>महता ग्राववर्षेण सप्तरात्रान्तरे तदा॥ १७<br><br>एवं दण्डकारण्यं परित्यजन्ति देवताः।<br>आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शम्भुना॥ १८ | भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्डको इस प्रकार शाप देकर शिष्यके साथ दानवोंके निवास-स्थान पाताललोकमें चले गये। उसके बाद दण्ड भी बहुत बड़ी उपलवृष्टिके कारण सात रात्रियोंके भीतर ही अपने राष्ट्र, सेना और वाहनोंके साथ नष्ट हो गया। यही कारण है कि देवताओंने दण्डकारण्यको छोड़ दिया और शम्भुने उसे राक्षसोंका स्थान बना दिया॥ १५-१८॥ |
| एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि।<br>भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च पराभवम्॥ १९<br><br>तस्मादन्धक दुर्बुद्धिर्न कार्या भवता त्वियम्।<br>प्राकृताऽपि दहेन्नारी किमुताहोद्रिनन्दिनी॥ २०<br><br>शङ्करोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः।<br>द्रष्टुमप्यमितौजस्कः किमु योधयितुं रणे॥ २१ | इस प्रकार (जैसा कि ऊपर वर्णित है) परनारियाँ (अपनेको अपवित्र करनेवाले) पुण्यात्माओंको भी जलाकर राख (नष्ट) कर देती हैं, फिर साधारण मनुष्य तो बहुत बड़ा तिरस्कार प्राप्त करते हैं। अतः अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिये। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वतीका क्या कहना। दैत्येश! सुर या असुर कोई भी महादेवको नहीं जीत सकता। जब रणमें अत्यधिक ओजसे सम्पन्न शंकरको देखा भी नहीं जा सकता तब उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है॥ १९-२१॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने क्रुद्धस्ताम्रेक्षणः श्वसन्।<br>वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकासुरः॥ २२<br><br>किं ममासौ रणे योद्धुं शक्तस्त्रिणयनोऽसुर।<br>एकाकी धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः॥ २३<br><br>नान्धको बिभियादिन्द्रान्नामरेभ्यः कथंचन।<br>स कथं वृषपत्राक्षाद् बिभेति स्त्रीमुखेक्षकात्॥ २४<br><br>तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रह्लादः प्राह नारद।<br>न सम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः॥ २५ | पुलस्त्यजी बोले— ऐसा वचन कहनेपर क्रुद्ध एवं लाल-लाल आँखें किये हुए महातेजस्वी अन्धकासुरने लंबी साँस लेते हुए प्रह्लादसे कहा—असुर! क्या शरीरपर राख लपेटे, (किंतु, लोक) धर्मसे रहित अकेला वह त्रिनयन लड़ाईके मैदानमें मुझसे युद्ध कर सकता है? जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओंसे कभी नहीं डरता वह बैलकी सवारी करनेवाले तथा स्त्रीका मुख निहारनेवाले त्रिनेत्र (शंकर)-से कैसे डर सकता है? नारद! उसके उस कठोर वचनको सुनकर प्रह्लादने कहा—आप यह उचित नहीं कह रहे हैं। आपका कहना धर्म एवं अर्थके विपरीत है॥ २२-२५॥ |
| हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहक्रोष्टुकयोरिव।<br>गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुक्मपाषाणयोरिव॥ २६<br><br>एतेषाभिरुदितं यावदन्तरमन्धक।<br>तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च॥ २७<br><br>वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे।<br>शृणुष्व वाक्यं देवर्षेरसितस्य महात्मनः॥ २८ | अन्धक! अग्नि और जुगनू, सिंह और सियार, गजेन्द्र और मशक तथा सोने और पत्थरमें जितना अन्तर कहा जाता है, उतना ही अन्तर आप और शङ्करकी तुलनामें है। वीर! आपको मैंने रोका है और (अब भी) बार-बार रोक रहा हूँ। आप देवर्षि असितका वचन सुनें— |