भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६६

| यो धर्मशीलो जितमानरोषो<br>विद्याविनीतो न परोपतापी।<br>स्वदारतुष्टः परदारवर्जी<br>न तस्य लोके भयमस्ति किंचित्॥ २९ | जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ, अभिमान और क्रोधको जीतनेवाला, विद्यासे विनम्र, किसीको दुःख न देनेवाला, अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट तथा परस्त्रीका त्याग करनेवाला होता है, उसे संसारमें कोई भय नहीं होता॥ २६-२९॥ | | यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा<br>परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः।<br>परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी<br>सुखं न विन्देत परत्र चेह॥ ३०<br><br>धर्मान्वितोऽभूद् भगवान् प्रभाकरः<br>संत्यक्तरोषश्च मुनिः स वारुणिः।<br>विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः<br>स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ ३१<br><br>एतानि पुण्यानि कृतान्यमीभि-<br>र्मया निबद्धानि कुलक्रमोक्त्या।<br>तेजोऽन्विताः शापवरक्षमाश्च<br>जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः॥ ३२<br><br>अधर्मयुक्तोऽङ्गसुतो बभूव<br>विभुश्च नित्यं कलहप्रियोऽभूत्।<br>परोपतापी नमुचिर्दुरात्मा<br>पराबलेप्सुर्नहुषश्च राजा॥ ३३ | जो व्यक्ति धर्मसे हीन, कलहसे प्रेम रखनेवाला, सदा दूसरोंको दुःख देनेवाला, वेद-शास्त्र (-के अध्ययन)-से रहित, दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीकी इच्छा रखनेवाला तथा भिन्न वर्णके साथ सम्बन्ध करनेवाला होता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पा सकता। भगवान् सूर्य धर्मसे युक्त थे, महर्षि वारुणि (वसिष्ठ)-ने क्रोध छोड़ दिया था, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान् थे और अगस्त्य ऋषि अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट थे। मैंने कुलके क्रमानुसार इन पुण्य करनेवालोंका उल्लेख किया है। शाप और वर देनेमें समर्थ ये सभी तेजस्वीलोग देवताओं और सिद्धोंके पूज्य हुए। अङ्गपुत्र (वेन) अधार्मिक और शक्तिशाली तथा नित्य कलहप्रिय था। दुरात्मा नमुचि परसंतापी एवं राजा नहुष परस्त्रीपर अधिकार प्राप्त करना चाहता था॥ ३०-३३॥ | | परार्थलिप्सुर्दितिजो हिरण्यदृक्<br>मूर्खस्तु तस्याप्यनुजः सुदुर्मतिः।<br>अवर्णसंगी यदुरुत्तमौजा<br>एते विनष्टास्त्वनयात् पुरा हि॥ ३४<br><br>तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः।<br>धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत्॥ ३५<br><br>धर्मस्तु गदितः पुम्भिस्तारणे दिवि चेह च।<br>पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परत्र च॥ ३६<br><br>त्याज्यं धर्मान्वितैर्नित्यं परदारोपसेवनम्।<br>नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम्।<br>सर्वेषामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रुवोऽन्धक॥ ३७ | दितिका पुत्र हिरण्याक्ष परधनका लालची था। उसका छोटा भाई दुर्बुद्धि एवं मूर्ख था तथा पराक्रमी यदु भिन्न जातिके साथ सम्बन्ध करनेवाला था। ये सभी पूर्वकालमें दुर्नीतिके कारण नष्ट हो गये। इसलिये धर्मको नहीं छोड़ना चाहिये; क्योंकि धर्म ही उत्तम गति है। धर्मसे हीन मनुष्य महान् रौरव नरकमें जाते हैं। पूर्वजोंने धर्मको ही परलोकको पार करनेवाला बताया है तथा अधर्मको इस लोक और परलोकमें पतनका हेतु बताया है। धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको परस्त्रीका सेवन करना सदैव वर्जनीय बताया है यतः परस्त्रियाँ इक्कीस नरकोंमें ले जाती हैं। अन्धक! सभी वर्णोंके लिये यह निश्चित धर्म है॥ ३४-३७॥ | | परार्थपरदारेषु यदा वाञ्छां करिष्यति।<br>स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः॥ ३८ | जो मनुष्य दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीमें कामना करता है, वह बहुत वर्षोंके लिये भयंकर रौरव नरकमें |