वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ [ ३२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एवं पुराऽसुरपते देवर्षिरसितोऽव्ययः।<br>प्राह धर्मव्यवस्थां खगेन्द्रायारुणाय हि॥ ३९<br><br>तस्मात् सुदूरतो वर्जेत् परदारान् विचक्षणः।<br>नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम्॥ ४० | चला जाता है। राक्षसराज! प्राचीन समयमें महात्मा देवर्षि असितने गरुड़ तथा अरुणसे धर्मकी यह व्यवस्था कही थी। इसलिये विद्वान् व्यक्ति दूसरी स्त्रियोंको दूरसे ही परित्याग कर दे; क्योंकि परस्त्रियाँ नीच बुद्धिवाले मनुष्योंको तिरस्कृत करा देती हैं॥ ३८–४०॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रह्लादं प्राह चान्धकः।<br>भवान् धर्मपरस्त्वेको नाहं धर्मं समाचरे॥ ४१<br><br>इत्येवमुक्त्वा प्रह्लादमन्धकः प्राह शम्बरम्।<br>गच्छ शम्बर शैलेन्द्रं मन्दरं वद शङ्करम्॥ ४२<br><br>भिक्षो किमर्थं शैलेन्द्रं स्वर्गंतुल्यं सकन्दरम्।<br>परिभुङ्क्षसि केनाद्य तव दत्तो वदस्व माम्॥ ४३<br><br>तिष्ठन्ति शासने मह्यं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>तत् किमर्थं निवमसे मामनादृत्य मन्दरे॥ ४४ | पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारका वचन कहनेपर अन्धकने प्रह्लादसे कहा कि आप अकेले धर्मनिष्ठ हैं। मैं धर्मका व्यवहार नहीं करता। प्रह्लादसे इस प्रकार कहकर अन्धकने शम्बरसे कहा—शम्बर! तुम मन्दर-पर्वतपर जाओ और शंकरसे कहो—भिक्षुक! तुम गुफामें रहनेवाले होकर और सबके समान मन्दर-पर्वतका उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बतलाओ कि तुमको इसे किसने दे दिया है? इन्द्र आदि देवता मेरा शासन मानते हैं। तुम मेरा अपमान करके इस मन्दर-पर्वतपर कैसे रह रहे हो?॥ ४१–४४॥ |
| यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम।<br>येयं हि भवतः पत्नी सा मे शीघ्रं प्रदीयताम्॥ ४५<br><br>इत्युक्तः स तदा तेन शम्बरो मन्दरं द्रुतम्।<br>जगाम तत्र यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक्॥ ४६<br><br>गत्वावाचान्धकवचो याथातथ्यं दनोः सुतः।<br>तमुत्तरं हरः प्राह शृण्वत्या गिरिकन्यया॥ ४७<br><br>ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेण धीमता।<br>तन्न शक्नोम्यहं त्यक्तुं विनाज्ञां वृत्रवैरिणः॥ ४८ | यदि यह पर्वतराज तुम्हें अभीष्ट है तो मेरे कहनेके अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह स्त्री है, उसे मुझे शीघ्र दे दो। उसके ऐसा कहनेपर शम्बर शीघ्रतासे उस मन्दरपर्वतपर गया, जहाँ पिनाक-पाणि शंकर देवीके साथ निवास कर रहे थे। दनु-पुत्रने वहाँ जाकर अन्धकके वचनको ज्यों-का-त्यों कहा। शङ्करने पर्वतनन्दिनीके सुनते हुए उसे उत्तर दिया। बुद्धिमान् इन्द्रने मुझे यह मन्दरपर्वत दिया है। इसलिये वृत्रासुरके वैरी इन्द्रकी आज्ञाके बिना मैं इसे नहीं छोड़ सकता॥ ४५–४८॥ |
| यच्चाब्रवीद् दीयतां मे गिरिपुत्रीति दानवः।<br>तदेषा यातु स्वं कामं नाहं वारयितुं क्षमः॥ ४९<br><br>ततोऽब्रवीद् गिरिसुता शम्बरं मुनिसत्तम।<br>ब्रूहि गत्वान्धकं वीर मम वाक्यं विपश्चितम्॥ ५०<br><br>अहं पताका संग्रामे भवानीशश्च देविनौ।<br>प्राणद्यूतं परिस्तीर्य यो जेष्यति स लप्स्यते॥ ५१<br><br>इत्येवमुक्तो मतिमान् शम्बरोऽन्धकमागमत्।<br>समागम्याब्रवीद् वाक्यं शर्वगौर्योश्च भाषितम्॥ ५२ | दानवने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनीको मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छासे जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। मुनिसत्तम! उसके बाद गिरिपुत्री पार्वतींने शम्बरसे कहा—वीर! तुम जाकर विद्वान् अन्धकसे मेरी बात कहो—संग्राममें मैं तो पताका हूँ। आप और शंकर खेलनेवाले हैं। प्राणोंका द्यूत फैलाकर (हार-जीतका दाँव लगाकर) जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा! ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् शम्बर अन्धकके पास गया एवं उसने शंकर तथा गौरीकी कही हुई बातें (ज्यों-की-त्यों) उससे कह दीं॥ ४९–५२॥ |