भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
३२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६६

| यो धर्मशीलो जितमानरोषो<br>विद्याविनीतो न परोपतापी।<br>स्वदारतुष्टः परदारवर्जी<br>न तस्य लोके भयमस्ति किंचित्॥ २९ | जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ, अभिमान और क्रोधको जीतनेवाला, विद्यासे विनम्र, किसीको दुःख न देनेवाला, अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट तथा परस्त्रीका त्याग करनेवाला होता है, उसे संसारमें कोई भय नहीं होता॥ २६-२९॥ | | यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा<br>परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः।<br>परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी<br>सुखं न विन्देत परत्र चेह॥ ३०<br><br>धर्मान्वितोऽभूद् भगवान् प्रभाकरः<br>संत्यक्तरोषश्च मुनिः स वारुणिः।<br>विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः<br>स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ ३१<br><br>एतानि पुण्यानि कृतान्यमीभि-<br>र्मया निबद्धानि कुलक्रमोक्त्या।<br>तेजोऽन्विताः शापवरक्षमाश्च<br>जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः॥ ३२<br><br>अधर्मयुक्तोऽङ्गसुतो बभूव<br>विभुश्च नित्यं कलहप्रियोऽभूत्।<br>परोपतापी नमुचिर्दुरात्मा<br>पराबलेप्सुर्नहुषश्च राजा॥ ३३ | जो व्यक्ति धर्मसे हीन, कलहसे प्रेम रखनेवाला, सदा दूसरोंको दुःख देनेवाला, वेद-शास्त्र (-के अध्ययन)-से रहित, दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीकी इच्छा रखनेवाला तथा भिन्न वर्णके साथ सम्बन्ध करनेवाला होता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पा सकता। भगवान् सूर्य धर्मसे युक्त थे, महर्षि वारुणि (वसिष्ठ)-ने क्रोध छोड़ दिया था, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान् थे और अगस्त्य ऋषि अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट थे। मैंने कुलके क्रमानुसार इन पुण्य करनेवालोंका उल्लेख किया है। शाप और वर देनेमें समर्थ ये सभी तेजस्वीलोग देवताओं और सिद्धोंके पूज्य हुए। अङ्गपुत्र (वेन) अधार्मिक और शक्तिशाली तथा नित्य कलहप्रिय था। दुरात्मा नमुचि परसंतापी एवं राजा नहुष परस्त्रीपर अधिकार प्राप्त करना चाहता था॥ ३०-३३॥ | | परार्थलिप्सुर्दितिजो हिरण्यदृक्<br>मूर्खस्तु तस्याप्यनुजः सुदुर्मतिः।<br>अवर्णसंगी यदुरुत्तमौजा<br>एते विनष्टास्त्वनयात् पुरा हि॥ ३४<br><br>तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः।<br>धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत्॥ ३५<br><br>धर्मस्तु गदितः पुम्भिस्तारणे दिवि चेह च।<br>पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परत्र च॥ ३६<br><br>त्याज्यं धर्मान्वितैर्नित्यं परदारोपसेवनम्।<br>नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम्।<br>सर्वेषामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रुवोऽन्धक॥ ३७ | दितिका पुत्र हिरण्याक्ष परधनका लालची था। उसका छोटा भाई दुर्बुद्धि एवं मूर्ख था तथा पराक्रमी यदु भिन्न जातिके साथ सम्बन्ध करनेवाला था। ये सभी पूर्वकालमें दुर्नीतिके कारण नष्ट हो गये। इसलिये धर्मको नहीं छोड़ना चाहिये; क्योंकि धर्म ही उत्तम गति है। धर्मसे हीन मनुष्य महान् रौरव नरकमें जाते हैं। पूर्वजोंने धर्मको ही परलोकको पार करनेवाला बताया है तथा अधर्मको इस लोक और परलोकमें पतनका हेतु बताया है। धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको परस्त्रीका सेवन करना सदैव वर्जनीय बताया है यतः परस्त्रियाँ इक्कीस नरकोंमें ले जाती हैं। अन्धक! सभी वर्णोंके लिये यह निश्चित धर्म है॥ ३४-३७॥ | | परार्थपरदारेषु यदा वाञ्छां करिष्यति।<br>स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः॥ ३८ | जो मनुष्य दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीमें कामना करता है, वह बहुत वर्षोंके लिये भयंकर रौरव नरकमें |

अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ [ ३२१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं पुराऽसुरपते देवर्षिरसितोऽव्ययः।<br>प्राह धर्मव्यवस्थां खगेन्द्रायारुणाय हि॥ ३९<br><br>तस्मात् सुदूरतो वर्जेत् परदारान् विचक्षणः।<br>नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम्॥ ४०चला जाता है। राक्षसराज! प्राचीन समयमें महात्मा देवर्षि असितने गरुड़ तथा अरुणसे धर्मकी यह व्यवस्था कही थी। इसलिये विद्वान् व्यक्ति दूसरी स्त्रियोंको दूरसे ही परित्याग कर दे; क्योंकि परस्त्रियाँ नीच बुद्धिवाले मनुष्योंको तिरस्कृत करा देती हैं॥ ३८–४०॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रह्लादं प्राह चान्धकः।<br>भवान् धर्मपरस्त्वेको नाहं धर्मं समाचरे॥ ४१<br><br>इत्येवमुक्त्वा प्रह्लादमन्धकः प्राह शम्बरम्।<br>गच्छ शम्बर शैलेन्द्रं मन्दरं वद शङ्करम्॥ ४२<br><br>भिक्षो किमर्थं शैलेन्द्रं स्वर्गंतुल्यं सकन्दरम्।<br>परिभुङ्क्षसि केनाद्य तव दत्तो वदस्व माम्॥ ४३<br><br>तिष्ठन्ति शासने मह्यं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>तत् किमर्थं निवमसे मामनादृत्य मन्दरे॥ ४४पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारका वचन कहनेपर अन्धकने प्रह्लादसे कहा कि आप अकेले धर्मनिष्ठ हैं। मैं धर्मका व्यवहार नहीं करता। प्रह्लादसे इस प्रकार कहकर अन्धकने शम्बरसे कहा—शम्बर! तुम मन्दर-पर्वतपर जाओ और शंकरसे कहो—भिक्षुक! तुम गुफामें रहनेवाले होकर और सबके समान मन्दर-पर्वतका उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बतलाओ कि तुमको इसे किसने दे दिया है? इन्द्र आदि देवता मेरा शासन मानते हैं। तुम मेरा अपमान करके इस मन्दर-पर्वतपर कैसे रह रहे हो?॥ ४१–४४॥
यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम।<br>येयं हि भवतः पत्नी सा मे शीघ्रं प्रदीयताम्॥ ४५<br><br>इत्युक्तः स तदा तेन शम्बरो मन्दरं द्रुतम्।<br>जगाम तत्र यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक्॥ ४६<br><br>गत्वावाचान्धकवचो याथातथ्यं दनोः सुतः।<br>तमुत्तरं हरः प्राह शृण्वत्या गिरिकन्यया॥ ४७<br><br>ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेण धीमता।<br>तन्न शक्नोम्यहं त्यक्तुं विनाज्ञां वृत्रवैरिणः॥ ४८यदि यह पर्वतराज तुम्हें अभीष्ट है तो मेरे कहनेके अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह स्त्री है, उसे मुझे शीघ्र दे दो। उसके ऐसा कहनेपर शम्बर शीघ्रतासे उस मन्दरपर्वतपर गया, जहाँ पिनाक-पाणि शंकर देवीके साथ निवास कर रहे थे। दनु-पुत्रने वहाँ जाकर अन्धकके वचनको ज्यों-का-त्यों कहा। शङ्करने पर्वतनन्दिनीके सुनते हुए उसे उत्तर दिया। बुद्धिमान् इन्द्रने मुझे यह मन्दरपर्वत दिया है। इसलिये वृत्रासुरके वैरी इन्द्रकी आज्ञाके बिना मैं इसे नहीं छोड़ सकता॥ ४५–४८॥
यच्चाब्रवीद् दीयतां मे गिरिपुत्रीति दानवः।<br>तदेषा यातु स्वं कामं नाहं वारयितुं क्षमः॥ ४९<br><br>ततोऽब्रवीद् गिरिसुता शम्बरं मुनिसत्तम।<br>ब्रूहि गत्वान्धकं वीर मम वाक्यं विपश्चितम्॥ ५०<br><br>अहं पताका संग्रामे भवानीशश्च देविनौ।<br>प्राणद्यूतं परिस्तीर्य यो जेष्यति स लप्स्यते॥ ५१<br><br>इत्येवमुक्तो मतिमान् शम्बरोऽन्धकमागमत्।<br>समागम्याब्रवीद् वाक्यं शर्वगौर्योश्च भाषितम्॥ ५२दानवने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनीको मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छासे जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। मुनिसत्तम! उसके बाद गिरिपुत्री पार्वतींने शम्बरसे कहा—वीर! तुम जाकर विद्वान् अन्धकसे मेरी बात कहो—संग्राममें मैं तो पताका हूँ। आप और शंकर खेलनेवाले हैं। प्राणोंका द्यूत फैलाकर (हार-जीतका दाँव लगाकर) जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा! ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् शम्बर अन्धकके पास गया एवं उसने शंकर तथा गौरीकी कही हुई बातें (ज्यों-की-त्यों) उससे कह दीं॥ ४९–५२॥
३२२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६६

| तच्छ्रुत्वा दानवपतिः क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन।<br>समाहूयाब्रवीद् वाक्यं दुर्योधनमिदं वचः॥ ५३<br>गच्छ शीघ्रं महाबाहो भेरीं सान्नाहिकीं दृढाम्।<br>ताडयस्व सुविश्रब्धं दुःशीलामिव योषितम्॥ ५४<br>समादिष्टोऽन्धकेनाथ भेरीं दुर्योधनो बलात्।<br>ताडयामास वेगेन यथा प्राणेन भूयसा॥ ५५<br>सा ताडिता बलवता भेरी दुर्योधनेन हि।<br>सत्वरं भैरवं रावं रुराव सुरभी यथा॥ ५६ | उसे सुनकर दानवपतिकी आँखें क्रोधसे जलने लगीं। लंबी साँस लेते हुए दुर्योधनको बुलाकर उसने कहा—महाबाहो! शीघ्र जाओ एवं मारू या संग्रामके समयमें बजनेवाले जुझाऊ नगाड़ेको (मस्तीसे) जोर-जोरसे ऐसे पीटो जैसे दुराचारिणीको कोई (उसके अपराधके कारण उसका अभिभावक आदि निर्भयतासे) ताड़ित करता है। उसके बाद अन्धकसे आदेश प्राप्त कर दुर्योधन अत्यन्त बलपूर्वक जी-जानसे वेगपूर्वक भेरीको बजाने लगा। बलवान् दुर्योधनद्वारा बलपूर्वक बजायी जाती हुई वह भेरी सहसा भयंकर ध्वनिमें घरघराने लगी, जिस प्रकार सुरभी घरघराती है॥ ५३–५६॥ | | याथातथ्यं च तान् सर्वान्हा सेनापतिर्बली।<br>ते चापि बलिनां श्रेष्ठाः संनद्धा युद्धकाङ्क्षिणः॥ ५८<br>सहान्धका निर्ययुस्ते गजैरुष्ट्रैर्हयै रथैः।<br>अन्धको रथमास्थाय पञ्चनल्वप्रमाणतः॥ ५९<br>त्र्यम्बकं स पराजेतुं कृतबुद्धिर्विनिर्ययौ।<br>जम्भः कुजम्भो हुण्डश्च तुहुण्डः शम्बरो बलिः॥ ६०<br>बाणः कार्तस्वरो हस्ती सूर्यशत्रुर्महोदरः।<br>अयःशंकुः शिबिः शाल्वो वृषपर्वा विरोचनः॥ ६१<br>हयग्रीवः कालनेमिः संह्लादः कालनाशनः।<br>शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६२<br>दुर्योधनश्च पाकश्च विपाकः कालशम्बरौ।<br>एते चान्ये च बहवो महावीर्या महाबलाः।<br>प्रजग्मुरुत्सुका योद्धुं नानायुधधरा रणे॥ ६३<br>इत्थं दुरात्मा दनुसैन्यपाल-<br>स्तदान्धको योद्धुमना हरेण।<br>महाचलं मन्दरमभ्युपेयिवान्<br>स कालपाशावसितो हि मन्दधीः॥ ६४ | उसकी उस ध्वनिको सुनकर सभी बड़े असुर ‘यह क्या है?’—ऐसा कहते हुए शीघ्रतासे सभामें आ गये। पराक्रमी सेनापतिने उन सभीसे उचित और सत्य वचन कहा। युद्धकी इच्छा करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वे सभी वीर तैयार हो गये। हाथी, ऊँट, घोड़ों और रथोंसहित वे सभी अन्धकके साथ बाहर निकले। पाँच नल्व—अर्थात् दो हजार हाथके प्रमाणवाले रथपर चढ़कर अन्धक त्रिलोचन शंकरको जीतनेका निश्चय कर बाहर निकला। जम्भ, कुजम्भ, हुण्ड, तुहुण्ड, शम्बर, बलि, बाण, कार्तस्वर, हस्ती, सूर्यशत्रु, महोदर, अयःशंकु, शिबि, शाल्व, वृषपर्वा, विरोचन, हयग्रीव, कालनेमि, संह्लाद, कालनाशन, शरभ, शलभ, पराक्रमी विप्रचित्ति, दुर्योधन, पाक, विपाक, काल एवं शम्बर—ये सभी तथा अन्य अनेक महापराक्रमशाली एवं महाबलवान् राक्षस भाँति-भाँतिके आयुधोंको लेकर प्रबल इच्छासे संग्राममें लड़नेके लिये चल पड़े। इस प्रकार काल-पाशसे बँधा हुआ वह अल्पमति दनुसैन्यपति दुष्टात्मा अन्धक शंकरसे युद्ध करनेके विचारसे महान् पर्वत मन्दरपर गया॥ ५७–६४॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छाछठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६६॥

६९- शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि-दानव-युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ-देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव-वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य-देव और इन्द्र-जम्भ-युद्ध, मातलिकका जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ-कुजम्भ-वध

अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२३


सड़सठवाँ अध्याय

नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, उनसे हरि और हरका एकत्व प्रतिपादन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>हरोऽपि शम्बरे याते समाहूयाथ नन्दिनम्।<br>प्राहामन्त्रय शैलादीन् ये स्थितास्तव शासने॥ १<br>ततो महेशवचनान्नन्दी तूर्णतरं गतः।<br>उपस्पृश्य जलं श्रीमान् सस्मार गणनायकान्॥ २<br>नन्दिना संस्मृताः सर्वे गणनाथाः सहस्रशः।<br>समुत्पत्य त्वरायुक्ताः प्रणतास्त्रिदशेश्वरम्॥ ३<br>आगतांश्च गणान्नन्दी कृताञ्जलिपुटोऽव्ययः।<br>सर्वान् निवेदयामास शङ्कराय महात्मने॥ ४पुलस्त्यजी बोले— शम्बरके चले जानेपर शंकरने भी नन्दीको बुलाकर कहा—नन्दिन्! तुम्हारे शासनमें जो पर्वत आदि रहते हैं, उन्हें इस (माङ्गलिक) कार्यमें आनेके लिये आमन्त्रित करो। उसके बाद महेशके कहनेसे नन्दी शीघ्रातिशीघ्र गये और उन्होंने जलका आचमन कर गणनायकोंका स्मरण किया। नन्दीसे स्मरण किये गये सभी गणनाथोंने हजारोंकी संख्यामें शीघ्रतासे आकर त्रिदशेश्वर शंकरको प्रणाम किया। अविनाशी नन्दीने महात्मा शंकरसे हाथ जोड़कर सभी आये हुए गणोंको निवेदित किया॥ १–४॥
नन्द्युवाच<br>यानेतान् पश्यसे शम्भो त्रिनेत्राञ्जटिलाञ्शुचीन्।<br>एते रुद्रा इति ख्याताः कोट्य एकादशैव तु॥ ५<br>वानरास्यान् पश्यसे यान् शार्दूलसमविक्रमान्।<br>एतेषां द्वारपालास्ते मन्नामानो यशोधनाः॥ ६<br>षण्मुखान् पश्यसे यांश्च शक्तिपाणीञ्शिखिध्वजान्।<br>षट् च षष्टिश्चता कोट्यः स्कन्दनाम्नः कुमारकान्॥ ७<br>एतावत्यस्तथा कोट्यः शाखा नाम षडाननाः।<br>विशाखास्तावदेवोक्ता नैगमेयाश्च शङ्कर॥ ८नन्दीने कहा— शम्भो! तीन नेत्रोंवाले और जटा धारण करनेवाले तथा पवित्र जिन गणोंको आप देख रहे हैं, उन्हें रुद्र कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह कोटि है। बन्दरके समान मुँह और सिंहके समान पराक्रमवाले जिन्हें आप देख रहे हैं, वे मेरे नामको धारण करनेवाले यशस्वी इनके द्वारपाल हैं। हाथमें शक्ति लिये तथा मयूरध्वजी जिन छः मुखवालोंको आप देख रहे हैं, वे स्कन्द नामके कुमार हैं। इनकी संख्या छाछठ करोड़ है। शंकर! इतने ही छः मुख धारण करनेवाले शाखा नामके गण हैं और इतने ही विशाख और नैगमेय नामके गण हैं॥ ५–८॥
सप्तकोटिशतं शम्भो अमी वै प्रमथोत्तमाः।<br>एकैकं प्रति देवेश तावत्यो ह्यपि मातरः॥ ९<br>भस्मारुणितदेहाश्च त्रिनेत्राः शूलपाणयः।<br>एते शैवा इति प्रोक्तास्तव भक्ता गणेश्वराः॥ १०<br>तथा पाशुपताश्चान्ये भस्मप्रहरणा विभो।<br>एते गणास्त्वसंख्याताः सहायर्थं समागताः॥ ११<br>पिनाकधारिणो रौद्रा गणाः कालमुखापरे।<br>तव भक्ताः समायाता जटामण्डलिनोऽद्भुताः॥ १२शम्भो! इन उत्तम प्रमथोंकी संख्या सात सौ करोड़ है। देवेश! प्रत्येकके साथ उतनी ही मातृकाएँ भी हैं। इन भस्मविभूषित शरीरवाले शूलपाणि त्रिनेत्रधारियोंको शैव कहा जाता है। ये सभी गणेश्वर आपके भक्त हैं। विभो! भस्मरूपी अस्त्र धारण करनेवाले अन्य अनगिनत पाशुपत गण सहायताके लिये आये हैं। पिनाक धारण करनेवाले जटामण्डलसे युक्त, अद्भुत भयङ्कर कालमुख नामक आपके अन्य गण (भी) आये हैं॥ ९–१२॥
श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६७ ]
३२४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
खट्वाङ्गयोधिनो वीरा रक्तचर्मसमावृताः ।<br>इमे प्राप्ता गणा योद्धुं महाव्रतिन उत्तमाः ॥ १३<br><br>दिग्वाससो मौनिनश्च घण्टाप्रहरणास्तथा ।<br>निराश्रया नाम गणाः समायाता जगद्गुरो ॥ १४<br><br>सार्धद्विनेत्राः पद्माक्षाः श्रीवत्साङ्कितवक्षसः ।<br>समायाताः खरारूढा वृषभध्वजिनोऽव्ययाः ॥ १५<br><br>महापाशुपता नाम चक्रशूलधरास्तथा ।<br>भैरवो विष्णुना सार्द्धमभेदेनार्चितो हि यैः ॥ १६खट्वाङ्गसे संग्राम करनेवाले, लाल ढालसे युक्त महाव्रती नामके ये उत्तम युद्धके लिये आये हैं। जगद्गुरो! घण्टा नामके आयुधको धारण करनेवाले दिगम्बर और मौनी तथा निराश्रय नामक गण उपस्थित हुए हैं। तीन नेत्रोंवाले, पद्माक्ष एवं श्रीवत्ससे चिह्नित वक्षःस्थलवाले गरुड़ पक्षीपर चढ़े हुए तथा अविनाशी वृषभध्वजी गण यहाँ आ गये हैं। चक्र तथा शूल धारण करनेवाले महापाशुपत नामके गण आ गये हैं, जिन्होंने अभिन्नभावसे विष्णुके साथ भैरवकी पूजा (यहाँ) की है॥ १३-१६॥
इमे मृगेन्द्रवदनाः शूलबाणधनुर्धराः ।<br>गणास्त्वद्रोमसम्भूता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १७<br><br>एते चान्ये च बहवः शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>सहायार्थं तवायाता यथा प्रीत्यादिशस्व तान् ॥ १८<br><br>ततोऽभ्येत्य गणाः सर्वे प्रणेमुर्वृषभध्वजम् ।<br>तान् करेणैव भगवान् समाश्वास्योपवेशयत् ॥ १९<br><br>महापाशुपतान् दृष्ट्वा समुत्थाय महेश्वरः ।<br>सम्परिष्वजताध्यक्षांस्ते प्रणेमुर्महेश्वरम् ॥ २०आपके रोमोंसे उत्पन्न ये सभी सिंहके समान मुखवाले शूल, बाण और धनुष धारण करनेवाले वीरभद्र आदि गण तथा दूसरे भी सैकड़ों एवं हजारों गण आपकी सहायताके लिये आ गये हैं। अपनी इच्छाके अनुसार आप इन्हें आदेश दें। उसके बाद सभी गणोंने पास जाकर वृषभध्वजको प्रणाम किया। भगवान्ने हाथसे उन्हें विश्वस्तकर बैठाया। महापाशुपत नामके अपने अध्यक्षोंको देखनेके बाद महेश्वरने उठकर उनको गले लगाया। उन लोगोंने महेश्वरको अभिवन्दित किया॥ १७-२०॥
ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा सर्वे गणेश्वराः ।<br>सुचिरं विस्मिताक्षाश्च वैलक्ष्यमगमत् परम् ॥ २१<br><br>विस्मिताक्षान् गणान् दृष्ट्वा शैलादिर्योगिनां वरः ।<br>प्राह प्रहस्य देवेशं शूलपाणिं गणाधिपम् ॥ २२<br><br>विस्मितामी गणा देव सर्व एव महेश्वर ।<br>महापाशुपतानां हि यत् त्वयालिङ्गनं कृतम् ॥ २३<br><br>तदेतेषां महादेव स्फुटं त्रैलोक्यविन्दकम् ।<br>रूपं ज्ञानं विवेकं च वदस्व स्वेच्छया विभो ॥ २४<br><br>प्रमथाधिपतेर्वाक्यं विदित्वा भूतभावनः ।<br>बभाषे तान् गणान् सर्वान् भावाभावविचारिणः ॥ २५उसके बाद उस अत्यन्त विचित्र दृश्यको देखकर सभी गणेश्वरोंकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। उसके बाद वे सभी बहुत ही लज्जित हो गये। गणोंको अचरजभरे नेत्रोंवाला देखकर योगिश्रेष्ठ शैलादि नन्दीने हँसकर गणाधिप देवेश शूलपाणिसे कहा—देव! महेश्वर! महापाशुपतोंको आपने जो गले लगाया है, उससे ये सभी गण आश्चर्यमें पड़ गये हैं। अतः महादेव! विभो! इनके तीनों लोकोंमें विख्यात रूप, ज्ञान एवं विवेकका अपने इच्छानुसार वर्णन करें। प्रमथोंके अधिपति नन्दीकी बात सुनकर भूतभावन महादेव भाव और अभावका विचार करनेवाले उन गणोंसे कहने लगे—॥ २१-२५॥
रुद्र उवाच<br>भवद्भिर्भक्तिसंयुक्तैर्हरो भावेन पूजितः ।<br>अहंकारविमूढैश्च निन्दद्भिर्वैष्णवं पदम् ॥ २६रुद्रने कहा— अहंकारसे विमूढ किंतु मेरी भक्तिसे युक्त आपलोगोंने वैष्णवपदकी निन्दा करते हुए

अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेनाज्ञानेन भवतोनादृत्यानुविरोधिताः।<br>योऽहं स भगवान् विष्णुर्विष्णुर्यः सोऽहमव्ययः॥ २७<br><br>नावयोर्वै विशेषोऽस्ति एका मूर्तिर्द्विधा स्थिता।<br>तदमीभिर्नरव्याघ्रैर्भक्तिभावयुतैर्गणैः॥ २८<br><br>यथाहं वै परिज्ञातो न भवद्भिस्तथा ध्रुवम्।<br>येनाहं निन्दितो नित्यं भवद्भिर्मूढबुद्धिभिः॥ २९<br><br>तेन ज्ञानं हि वै नष्टं नातस्त्वालिङ्गिता मया।<br>इत्येवमुक्ते वचने गणाः प्रोचुर्महेश्वरम्॥ ३०भावपूर्वक शंकरकी पूजा की है। इसी अज्ञानके हेतु आप सभीका अनादर कर उनका विशेष आग्रह किया गया। जो मैं हूँ वही भगवान् विष्णु हैं एवं जो विष्णु हैं वही अविनाशी मैं हूँ। हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें अवस्थित है। अतः भक्तिभावसे युक्त इन पुरुषश्रेष्ठ गणोंने जैसा मुझे जाना है, निश्चय ही उस प्रकार आपलोग मुझे नहीं जानते। जड-बुद्धिवाले आपलोगोंने यतः नित्य मेरी निन्दा की है, अतः आपलोगोंका ज्ञान नष्ट हो गया। इसीलिये मैंने आपलोगोंको गले नहीं लगाया है। इस प्रकार कहनेपर गणोंने महेश्वरसे कहा —॥ २६–३०॥
कथं भवान् यथैक्येन संस्थितोऽस्ति जनार्दनः।<br>भवान् हि निर्मलः शुद्धः शान्तः शुक्लो निरञ्जनः॥ ३१<br><br>स चाप्यञ्जनसंकाशः कथं तेनेह युज्यते।<br>तेषां वचनमर्थाढ्यं श्रुत्वा जीमूतवाहनः॥ ३२<br><br>विहस्य मेघगम्भीरं गणानिदमुवाच ह।<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये स्वयशोवर्द्धनं वचः॥ ३३<br><br>न त्वेव योग्या यूयं हि महाज्ञानस्य कर्हिचित्।<br>अपवादभयाद् गुह्यं भवतां हि प्रकाशये॥ ३४आप एवं जनार्दन ऐक्यरूपसे कैसे रहते हैं? आप निर्मल, शुद्ध, शान्त, शुक्ल और निर्दोष एवं अज्ञानसे रहित हैं। किंतु वे अञ्जनके तुल्य हैं; अतः उनसे आपका मेल कैसे होता है? उनके अभिप्राययुक्त वचनको सुननेके बाद जीमूतवाहन शंकरने मेघके समान गम्भीर वाणीमें हँसकर कहा—अपनी कीर्ति बढ़ानेवाली सम्पूर्ण बात मैं बतलाता हूँ; उसे सुनो—तुमलोग कभी भी महाज्ञानके योग्य नहीं हो। परंतु अपकीर्तिके डरसे मैं आप सभीके सामने गोपनीय वस्तु-स्थितिको प्रकाशित करता हूँ॥ ३१–३४॥
प्रियत्वं मयि चैतेन यन्मच्चित्तास्तु नित्यशः।<br>एकरूपात्मकं देहं कुरुध्वं यत्नमास्थिताः॥ ३५<br><br>पयसां हविषाद्यैश्च स्नपनेन प्रयत्नतः।<br>चन्दनादिभिरेकाग्रैर्न मे प्रीतिः प्रजायते॥ ३६<br><br>यत्नात् क्रकचमादाय छिन्धध्वं मम विग्रहम्।<br>नरकार्हा भवद्भक्ता रक्षामि स्वयशोऽर्थतः॥ ३७<br><br>माऽयं वदिष्यते लोको महान्तमपवादिनम्।<br>यथा पतन्ति नरके हरभक्तास्तपस्विनः॥ ३८मुझमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेसे भी अन्य लोग प्रिय हैं। तुमलोग यत्नपूर्वक एक देहात्मक रूपको समझो। प्रयत्नपूर्वक दूध या घीसे स्नान कराने तथा स्थिरचित्ततापूर्वक चन्दन आदिद्वारा लेप करनेसे मुझे प्रसन्नता नहीं उत्पन्न होती। आरा लेकर मेरी देहको भले ही चीर डालो, परंतु अपनी कीर्तिके लिये नरकके योग्य आप भक्तोंकी मैं (उससे) रक्षा करता ही हूँ। (क्योंकि) यह संसार मुझे इस प्रकारका महान् कलङ्क न लगाये कि शंकरके तपस्वी भक्त नरकमें जाते हैं॥ ३५–३८॥
व्रजन्ति नरकं घोरमित्येवं परिवादिनः।<br>अतोऽर्थं न क्षिपाम्यद्य भवतो नरकेऽद्भुते॥ ३९<br><br>यन्निन्दध्वं जगन्नाथं पुष्कराक्षं च मन्मयम्।<br>स चैव भगवान् शर्वः सर्वव्यापी गणेश्वरः॥ ४०<br><br>न तस्य सदृशो लोके विद्यते सचराचरे।<br>श्वेतमूर्तिः स भगवान् पीतो रक्तोऽञ्जनप्रभः॥ ४१इस प्रकारकी निन्दा करनेवाले लोग भयंकर नरकमें जाते हैं। इसलिये मैं आपलोगोंको अद्भुत नरकमें नहीं डालता। आपलोग मेरे स्वरूप जिन कमलनयन जगन्नाथकी निन्दा करते हैं, वे ही सर्वव्यापी गणेश्वर भगवान् शर्व हैं। इस समस्त चर और अचर लोकमें उनके समान कोई नहीं है। वे भगवान् श्वेतमूर्ति पीत, रक्त एवं
३२६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६७

| तस्मात् परतरं लोके नान्यद् धर्म हि विद्यते।<br>सात्त्विकं राजसं चैव तामसं मिश्रकं तथा।<br>स एव धत्ते भगवान् सर्वपूज्यः सदाशिवः॥ ४२<br>शङ्करस्य वचः श्रुत्वा शैवाद्याः प्रमथोत्तमाः।<br>प्रत्युचुर्भगवन् ब्रूहि सदाशिवविशेषणम्॥ ४३<br>तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा प्रमथानामथेश्वरः।<br>दर्शयामास तद्रूपं सदाशैव निरञ्जनम्॥ ४४<br>ततः पश्यन्ति हि गणाः तमीशं वै सहस्रशः।<br>सहस्रवक्त्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम्॥ ४५<br>दण्डपाणिं सुदुर्हृश्यं लोकैर्व्याप्तं समन्ततः।<br>दण्डसंस्थाऽस्य दृश्यन्ते देवप्रहरणास्तथा॥ ४६<br>तत एकमुखं भूयो ददृशुः शङ्करं गणाः।<br>रौद्रैश्च वैष्णवैश्चैव वृतं चिह्नः सहस्रशः॥ ४७<br>अर्द्धेन वैष्णववपुरर्द्धेन हरविग्रहः।<br>खगध्वजं वृषारूढं खगारूढं वृषध्वजम्॥ ४८<br>यथा यथा त्रिनयनो रूपं धत्ते गुणाग्रणीः।<br>तथा तथा त्वजायन्त महापाशुपता गणाः॥ ४९<br>ततोऽभवच्चैकरूपी शङ्करो बहुरूपवान्।<br>द्विरूपश्चाभवद् योगी एकरूपोऽप्यरूपवान्।<br>क्षणाच्छ्वेतः क्षणाद् रक्तः पीतो नीलः क्षणादपि॥ ५०<br>मिश्रको वर्णहीनश्च महापाशुपतस्तथा।<br>क्षणाद् भवति रुद्रेन्द्रः क्षणाच्छम्भुः प्रभाकरः॥ ५१<br>क्षणाद्धार्द्धाच्छङ्करो विष्णुः क्षणाच्चर्व्वः पितामहः।<br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा शैवादयो गणाः॥ ५२<br>अजानन्त तदैक्येन ब्रह्मविष्ण्वीशभास्करान्।<br>यदाऽभिन्नममन्यन्त देवदेवं सदाशिवम्॥ ५३<br>तदा निर्धूतपापास्ते समजायन्त पार्षदाः।<br>तेष्वेवं धूतपापेषु अभिन्नेषु हरीश्वरः॥ ५४<br>प्रीतात्मा विबभौ शम्भुः प्रीतियुक्तोऽब्रवीद् वचः।<br>परितुष्टोऽस्मि वः सर्वे ज्ञानेनानेन सुव्रताः॥ ५५<br>वृणुध्वं वरमानन्त्यं दास्ये वो मनसेप्सितम्।<br>ऊचुस्ते देहि भगवन् वरमस्माकमीश्वर।<br>भिन्नदृष्ट्युद्भवं पापं यत्तद् भ्रंशं प्रयातु नः॥ ५६ | अञ्जनके सदृश कान्तिवाले हैं। संसारमें उनसे श्रेष्ठ कोई दूसरा धर्म नहीं है। सर्वपूज्य वे सदाशिव (सदा मङ्गल करनेवाले) भगवान् ही सभी सात्त्विक, राजस, तामस एवं मिश्रित भावोंको धारण करते हैं॥ ३९-४२॥<br><br>शंकरके वचनको सुनकर शैव आदि श्रेष्ठ गणोंने कहा—भगवन्! आप सदाशिवकी विशेषता प्रकट करनेवाले गुणको कहिये। प्रमथेश्वरने उनके इस वचनको सुनकर उन्हें निरञ्जन सदाशिवरूपको दिखलाया। उसके बाद हजारों गणोंने उन ईश्वरको हजारों मुख, चरण एवं भुजाओंवाला हुआ देखा। वे लोकोंसे सभी ओर व्याप्त थे तथा दण्डपाणि एवं अत्यधिक सुदुर्हृश्य थे। देवताओंके अस्त्र उनके दण्डमें दिखलायी पड़ रहे थे॥ ४३—४६॥<br><br>उसके बाद पुनः गणोंने रुद्र एवं विष्णुके हजारों चिह्नोंसे युक्त एकमुख शंकरको देखा। उस रूपका आधा भाग शंकरके शरीरका था और आधा भाग गरुडध्वज था। (एक आधा भाग) गरुडध्वज वृषारूढ था एवं (दूसरा आधा भाग) वृषभध्वज गरुड़पर आरूढ़ था। गुणोंमें अग्रणी त्रिलोचन जैसे-जैसे रूप धारण करते जाते थे, वैसे-वैसे ही महापाशुपतगण भी होते जाते थे। उसके बाद एकरूपवाले शंकर बहुत रूपवाले हो गये। वे योगी दो रूप धारण करनेवाले, एक रूप धारण करनेवाले एवं बिना रूपके भी हो गये। वे प्रतिक्षण श्वेत, रक्त, पीत, नील, मिश्र वर्णवाले एवं वर्णहीन होते गये। महापाशुपतोंका भी स्वरूप उनके रूपके अनुरूप होता गया। श्रीशंकर किसी क्षणमें इन्द्र, किसी क्षणमें सूर्य, किसी क्षणमें विष्णु एवं किसी क्षणमें पितामहके रूपमें स्वरूप बदलते गये। यह अत्यन्त आश्चर्यजनक दृश्य देखकर शैव आदि गणोंने ब्रह्मा, विष्णु, ईश एवं सूर्यको (इनसे) अभिन्न समझा। उन लोगोंने जब देवाधिदेव सदाशिवको (सभी देवोंसे) अभिन्न मान लिया तब वे सभी पार्षद पापसे रहित हो गये। इस प्रकार अभेद-बुद्धिके कारण उनके पापसे विमुक्त हो जानेसे हरीश्वर शम्भु प्रसन्न हो गये। उन्होंने संतुष्ट होकर कहा—सुव्रतो! तुम्हारे इस प्रकारके ज्ञानसे मैं प्रसन्न हूँ। अब बहुतों-से वर फिर माँगो। मैं तुम्हें इच्छित वर दूँगा। उन्होंने कहा—भगवन्! महेश्वर! हमें यह वर दें कि भेदभाव रखनेके कारण उत्पन्न हमारे (शेष) सभी पाप नष्ट हो जायें॥ ४७—५६॥ |

अध्याय ६८ ]भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश३२७

| पुलस्त्य उवाच<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वश्चक्रे निर्धूतकल्मषान्।<br>सम्परिष्वजताव्यक्तस्तान् सर्वान् गणयूथपान्॥ ५७<br><br>इति विभुना प्रणतार्तिहरेण<br>गणपतयो वृषमेघरथेन।<br>श्रुतिगदितानुगमेनेव मन्दरं<br>गिरिमवतत्य समध्यवसन् तम्॥ ५८<br><br>आच्छादितो गिरिवरः प्रमथैर्घनाभै-<br>राभाति शुक्लतनुरीश्वरपादजुष्टः।<br>नीलाजिनातततनुः शरदभ्रवर्णो<br>यद्वद्विभाति बलवान् वृषभो हरस्य॥ ५९ | पुलस्त्यजी बोले— शंकरने कहा—'ऐसा ही होगा'। उसके बाद अदृश्य होते हुए शंकरने उन सभी गणाधिपोंको आलिङ्गित कर उन्हें पापसे (सर्वथा) रहित कर दिया। उसके बाद श्रुतिकी उक्तिका जैसे (शास्त्रोंमें) अनुगमन होता है उसी प्रकार वृष एवं मेघवाहन शरणागतोंके कष्टको हरण करनेवाले शंकरके साथ सभी गणपति मन्दरपर्वतको चारों ओरसे घेरकर रहने लगे। मेघके समान प्रमथोंसे घिरे शिव-चरणकी सेवा करनेवाले शुक्ल शरीरवाला पर्वतराज ऐसे सुशोभित हो रहा था जैसे नीले मृगचर्मसे ढके शरीरवाला एवं शरत्कालीन मेघके समान धवल रंगवाला शंकरका बलवान् वृषभ सुशोभित होता है॥ ५७—५९॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६७॥


अडसठवाँ अध्याय

भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश

| पुलस्त्य उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः समं दैत्यैस्तथाऽन्धकः।<br>मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं प्रमथाश्रितकन्दरम्॥ १<br>प्रमथा दानवान् दृष्ट्वा चक्रुः किलकिलाध्वनिम्।<br>प्रमथाश्चापि संरब्धा जघ्नुस्तूर्यान्यनेकशः॥ २<br>स चावृणोन्महानादो रोदसी प्रलयोपमः।<br>शुश्राव वायुमार्गस्थो विघ्नराजो विनायकः॥ ३<br>समभ्ययात् सुसंक्रुद्धः प्रमथैरभिसंवृतः।<br>मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं ददृशे पितरं तथा॥ ४<br>प्रणिपत्य तथा भक्त्या वाक्यमाह महेश्वरम्।<br>किं तिष्ठसि जगन्नाथ समुत्तिष्ठ रणोत्सुकः॥ ५<br><br>ततो विघ्नेशवचनाज्जगन्नाथोऽम्बिकां वचः।<br>प्राह यास्येऽन्धकं हन्तुं स्थेयमेवाप्रमत्तया॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) इसी बीच दैत्योंके साथ वह अन्धक प्रमथोंसे सेवित गुफाओंवाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरगिरिपर आ गया। प्रमथोंने दानवोंको देखकर हर्षसूचक 'किलकिला'-ध्वनि की और फिर उन्होंने बहुत-सी तुरहियाँ बजायीं। प्रलय (कालीन ध्वनि)-के समान वह भयङ्कर ध्वनि आकाश और पृथ्वीके बीच भर गयी। आकाशमें स्थित विघ्नराज गणेशने उस ध्वनिको सुना। प्रमथोंसे घिरे हुए वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गये और उन्होंने अपने पिताको देखा॥ १—४॥<br>(फिर) श्रद्धापूर्वक प्रणामकर महेश्वरसे (यह) वाक्य कहा—हे जगन्नाथ! आप बैठे क्यों हैं? युद्ध करनेके लिये प्रबल इच्छा रखकर आप उठें। विघ्नेश्वर गणेशके कहनेपर जगत्पति महादेवने अम्बिकासे कहा—मैं अन्धकको मारनेके लिये जाऊँगा, तुम सावधानीसे रहना। |

३२८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६८

| ततो गिरिसुता देवं समालिङ्ग्य पुनः पुनः।<br>समीक्ष्य सस्नेहहरं प्राह गच्छ जयान्धकम्॥ ७<br><br>ततोऽमरगुरोर्गौरी चन्दनं रोचनाञ्जनम्।<br>प्रतिवन्द्य सुसम्प्रीता पादावेवाभ्यवन्दत॥ ८ | उसके बाद पर्वतनन्दिनीने महादेवको बार-बार गले लगाकर एवं प्रेमपूर्ण दृष्टिसे उन्हें देखकर (मङ्गल वचन) कहा—जाइये और अन्धकपर विजय प्राप्त कीजिये। उसके बाद गौरीने देवश्रेष्ठ शंकरको चन्दन, रोचना एवं अञ्जन लगाया तथा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५—८॥ | | ततो हरः प्राह वचो यशस्यं मालिनीमपि।<br>जयां च विजयां चैव जयन्तीं चापराजिताम्॥ ९<br>युष्माभिरप्रमत्ताभिः स्थेयं गेहे सुरक्षिते।<br>रक्षणीया प्रयत्नेन गिरिपुत्री प्रमादतः॥ १०<br>इति संदिश्य ताः सर्वाः समारुह्य वृषं विभुः।<br>निर्जगाम गृहात् तुष्टो जयेप्सुः शूलधृग् बली॥ ११<br>निर्गच्छतस्तु भवनादीश्वरस्य गणाधिपाः।<br>समन्तात् परिवार्थैव जयशब्दांश्च चक्रिरे॥ १२ | उसके बाद महादेवने मालिनी, जया, विजया, जयन्ती और अपराजितासे कीर्ति बढ़ानेवाला यह वचन कहा—तुमलोग सुरक्षित घरमें सतर्कतासे रहना और प्रयत्नपूर्वक पार्वतीको असावधानीसे बचाना। उन सभीको इस प्रकार समझाने-बुझानेके बाद वृषभपर सवार होकर शूल धारण करनेवाले विजयाभिलाषी बलशाली भगवान् शंकर (आत्मविश्वासके साथ) संतुष्ट होकर घरसे चल पड़े। घरसे निकलते समय गणाधिपोंने शंकरको चारों ओरसे घेरकर 'जय-जयकार' किया॥ ९—१२॥ | | रणाय निर्गच्छति लोकपाले<br>महेश्वरे शूलधरे महर्षे।<br>शुभानि सौम्यानि सुमङ्गलानि<br>जातानि चिह्नानि जयाय शम्भोः॥ १३<br>शिवा स्थिता वामतरेऽथ भागे<br>प्रयाति चाग्रे स्वनमुन्नदन्ती।<br>क्रव्यादसंघाश्च तथाामिषैषिणः<br>प्रयान्ति हृष्टास्तृषितासृगर्थे॥ १४<br>दक्षिणाङ्गं नखान्तं वै समकम्पत शूलिनः।<br>शकुनिश्चापि हारीतो मौनी याति पराङ्मुखः॥ १५<br>निमित्तानीदृशान् दृष्ट्वा भूतभव्यभवो विभुः।<br>शैलादिं प्राह वचनं सस्मितं शशिशेखरः॥ १६ | महर्षे! शूल धारण करनेवाले संसारके पालक महेश्वरके युद्ध करनेके लिये घरसे निकलनेपर उनकी जयके लिये शुभ, सौम्य और मङ्गलजनक लक्षण (शकुन) प्रकट हुए। उनकी बायीं बगलमें शृगालिनी स्थित होकर ऊँचे स्वरमें बोलती हुई आगे-आगे जा रही थी। मांसभक्षी प्राणियोंका समूह प्रसन्नतापूर्वक रक्तके लिये जा रहा था। शूलपाणिका सारा दायाँ अङ्ग फड़क उठा। हारीत पक्षी मौन होकर पीछेकी ओर जा रहा था। भूत, भविष्य एवं वर्तमानस्वरूप एवं व्यापक चन्द्रमौलि महादेव शंकरने इस प्रकारके लक्षणोंको देखकर शैलादि (नन्दी)-से प्रसन्नतापूर्वक वचन कहा—॥ १३—१६॥ | | हर उवाच<br>नन्दिन् जयोऽद्य मे भावी न कथंचित् पराजयः।<br>निमित्तानीह दृश्यन्ते सम्भूतानि गणेश्वर॥ १७ | शंकरने कहा— नन्दिन्! गणेश्वर! इस समय कल्याणकारी लक्षण दिखायी दे रहे हैं। इसलिये आज मेरी विजय होगी। किसी भी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। | | तच्छम्भुवचनं श्रुत्वा शैलादिः प्राह शङ्करम्।<br>कः संदेहो महादेव यत् त्वं जयसि शात्रवान्॥ १८<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं नन्दी रुद्रगणांस्तथा।<br>समादिदेश युद्धाय महापाशुपतैः सह॥ १९<br>तेऽभ्येत्य दानवबलं मर्दयन्ति स्म वेगिताः।<br>नानाशास्त्रधरा वीरा वृक्षानशनयो यथा॥ २० | शंकरके उस वचनको सुनकर शैलादिने उनसे कहा—महादेव! आप शत्रुओंको जीत लेंगे, इसमें संदेह ही कौन-सा है? ऐसा कहकर नन्दीने महापाशुपतके सहित रुद्रगणोंको युद्ध करनेके लिये आदेश दिया। (फिर तो) भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको धारण करनेवाले वे वीर दानवसैन्यके पास पहुँचकर उसे ऐसे कुचलकर नष्ट करने लगे जैसे वज्र वृक्षोंको नष्ट करता है॥ १७—२०॥ |

| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३२९ | | :--- | :--- |

ते वध्यमाना बलिभिः प्रमथैर्दैत्यदानवाः।<br>प्रवृत्ताः प्रमथान् हन्तुः कूटमुद्गरपाणयः॥ २१<br>ततोऽम्बरतले देवाः सेन्द्रविष्णुपितामहाः।<br>ससूर्याग्निपुरोगास्तु समायाता दिदृक्षवः॥ २२<br>ततोऽम्बरतले घोषः सस्वनः समजायत।<br>गीतवाद्यादिसम्मिश्रो दुन्दुभीनां कलिप्रिय॥ २३<br>ततः पश्यत्सु देवेषु महापाशुपतादयः।<br>गणास्तद्दानवं सैन्यं जिघांसन्ति स्म कोपिताः॥ २४बलशाली प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे दैत्य-दानवगण (भी) हाथोंमें कूट-मुद्गर लेकर प्रमथोंको मारने लगे। उसके बाद (युद्ध) देखनेकी लालसासे इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य एवं अग्नि आदि देवगण आकाशमें एकत्र हो गये। नारदजी! उसके बाद गाने-बजानेके साथ दुन्दुभियोंकी ध्वनि आकाशमें गूँजने लगी। फिर तो देवताओंके देखते-ही-देखते क्रुद्ध होकर महापाशुपत आदि गण दानव-सेनाका विध्वंस करने लगे॥ २१-२४॥
चतुरङ्गबलं दृष्ट्वा हन्यमानं गणेश्वरैः।<br>क्रोधान्वितस्तुहुण्डस्तु वेगेनाभिससार ह॥ २५<br>आदाय परिघं घोरं पट्टोद्बद्धमयस्मयम्।<br>राजतं राजतेऽत्यर्थमिन्द्रध्वजमिवोच्छ्रितम्॥ २६<br>तं भ्रामयानो बलवान् निजघान रणे गणान्।<br>रुद्राद्याः स्कन्दपर्यन्तास्तेऽभज्यन्त भयातुराः॥ २७<br>तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा गणनाथो विनायकः।<br>समाद्रवत वेगेन तुहुण्डं दनुपुङ्गवम्॥ २८गणेश्वरोंद्वारा चतुरङ्गिणी—रथ, हाथी, घोड़े, पैदल चार अङ्गोंवाली सेनाको मारी जाती हुई देख करके क्रुद्ध होकर तुहुण्ड तेजीसे आगे बढ़ा। ढालसे बँधे हुए लौहके बने चमचमाते भयङ्कर परिघको लेकर वह इन्द्रके ऊँचे ध्वजके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। बलशाली तुहुण्ड उस परिघको घुमाते हुए युद्धमें गणोंको मारने लगा। रुद्रसे लेकर स्कन्दतक वे सभी गण भयभीत होकर भाग चले। उस सेनाको नष्ट हुई देखकर गणनाथ विनायक दानवश्रेष्ठ तुहुण्डकी ओर तेजीसे दौड़े॥ २५-२८॥
आपतन्तं गणपतिं दृष्ट्वा दैत्यो दुरात्मवान्।<br>परिघं पातयामास कुम्भपृष्ठे महाबलः॥ २९<br>विनायकस्य तत्कुम्भे परिघं वज्रभूषणम्।<br>शतधा त्वगमद् ब्रह्मन् मेरोः कूट इवाशनिः॥ ३०<br>परिघं विफलं दृष्ट्वा समायान्तं च पार्षदम्।<br>बबन्ध बाहुपाशेन राहू रक्षन् हि मातुलम्॥ ३१<br>स बद्धो बाहुपाशेन बलादाकृष्य दानवम्।<br>समाजघान शिरसि कुठारेण महोदरः॥ ३२महाबलशाली दुष्टात्मा दैत्यने गणपतिको सामने आते देखकर (उनके) कुम्भस्थलमें परिघका वार कर दिया। ब्रह्मन्! वज्रसे अलंकृत वह परिघ विनायकके कुम्भस्थलपर ऐसे सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मेरुके शिखरपर वज्र सैकड़ों टुकड़े हो जाता है। परिघको विफल हुआ देखकर अपने मामाकी रक्षा करते हुए राहुने आनेवाले पार्षदको अपने भुजापाशमें जकड़ लिया। भुजापाशमें बँधे हुए (होनेपर भी) उन महोदरने दानवको बलपूर्वक खींचकर उसके मस्तकपर कुठारसे वार किया॥ २९-३२॥
काष्ठवत् स द्विधा भूतो निपपात धरातले।<br>तथाऽपि नात्यजद् राहुर्बलवान् दानवेश्वरः।<br>स मोक्षार्थेऽकरोद् यत्नं न शशाक च नारद॥ ३३<br>विनायकं संयतमीक्ष्य राहुणा<br>कुण्डोदरो नाम गणेश्वरोऽथ।<br>प्रगृह्य तूर्णं मुशलं महात्मा<br>राहुं दुरात्मानमसौ जघान॥ ३४वह काष्ठके समान दो टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर भी बलशाली दानवेश्वर राहुने उन्हें नहीं छोड़ा। नारदजी! उन्होंने छूटनेका प्रयत्न तो किया, किंतु उससे वे छूट न सके। राहुद्वारा विनायकको बँधा हुआ देखकर कुण्डोदर नामके गणेश्वरने तुरंत मुसल उठा लिया और उन महात्माने दुरात्मा राहुपर (दे) मारा।

३३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६८ ]

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततो गणेशः कलशध्वजस्तु<br>प्रासेन राहुं हृदये बिभेद।<br>घटोदरो वै गदया जघान<br>खड्गेन रक्षोऽधिपतिः सुकेशी ॥ ३५<br>स तैश्चतुर्भिः परिताड्यमानो<br>गणाधिपं राहुरथोत्ससर्ज।<br>संत्यक्तमात्रोऽथ परश्वधेन<br>तुहुण्डमूर्द्धानमथो बिभेद ॥ ३६उसके बाद कलशके ध्वजवाले गणेशने प्रासद्वारा राहुके हृदयपर (भी) चोट कर दिया। घटोदरने गदासे तथा राक्षसोंके अधिपति सुकेशीने तलवारसे वार किया। उन चारोंद्वारा प्रहार किये जानेपर राहुने गणाधिपतिको छोड़ दिया। छूटते ही उन्होंने फरसेसे तुहुण्डके मस्तकको काट दिया॥ ३३–३६॥
हते तुहुण्डे विमुखे च राहौ<br>गणेश्वराः क्रोधविषं मुमुक्षवः।<br>पञ्चैककालानलसन्निकाशा<br>विशन्ति सेनां दनुपुङ्गवानाम् ॥ ३७<br>तां वध्यमानां स्वचमूं समीक्ष्य<br>बलिर्बली मारुततुल्यवेगः।<br>गदां समाविध्य जघान मूर्ध्नि<br>विनायकं कुम्भतटे करे च ॥ ३८<br>कुण्डोदरं भग्नकटिं चकार<br>महोदरं शीर्णशिरःकपालम्।<br>कुम्भध्वजं चूर्णितसंधिबन्धं<br>घटोदरं चोरुविभिन्नसंधिम् ॥ ३९<br>गणाधिपांस्तान् विमुखान् स कृत्व<br>बलान्वितो वीरतरोऽसुरेन्द्रः।<br>समभ्यधावत् त्वरितो निहन्तुं<br>गणेश्वरान् स्कन्दविशाखमुख्यान् ॥ ४०तुहुण्डके मारे जाने और राहुके पीठ दिखा देनेपर क्रोधरूपी विषको छोड़नेकी कामनावाले प्रलयकालकी अग्निके समान पाँचों गणेश्वर एक साथ दानवश्रेष्ठोंकी सेनामें पैठ गये। अपनी उस सेनाको मारी जाती हुई देखकर वायुके समान तीव्र गतिवाले बलशाली बलिने गदा लेकर विनायकके कुम्भस्थल, मस्तक एवं सूँडपर वार किया। कुण्डोदरकी कमर तोड़ दी, महोदरके सिरकी खोपड़ीको विधुन दिया, कुम्भध्वजके जोड़ोंको चूर-चूर कर डाला एवं घटोदरकी जाँघोंको तोड़ दिया। उन गणाधिपोंको पीछे भगाकर वीरश्रेष्ठ वह बलशाली असुरेन्द्र तुरंत स्कन्द, विशाख आदि मुख्य-मुख्य गणेश्वरोंको मारनेके लिये दौड़ पड़ा॥ ३७–४०॥
तमापतन्तं भगवान् समीक्ष्य<br>महेश्वरः श्रेष्ठतमं गणानाम्।<br>शैलादिमामन्त्र्य वचो बभाषे<br>गच्छस्व दैत्यान् जहि वीर युद्धे ॥ ४१<br>इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन<br>वज्रं समादाय शिलादसूनुः।<br>बलिं समभ्येत्य जघान मूर्ध्नि<br>सम्मोहितः सोऽवनिमाससाद ॥ ४२<br>सम्मोहितं भ्रातृसुतं विदित्वा<br>बली कुजम्भो मुसलं प्रगृह्य।<br>सम्भ्रामयंस्तूर्णतरं स वेगात्<br>ससर्ज नन्दिं प्रति जातकोपः ॥ ४३<br>तमापतन्तं मुसलं प्रगृह्य<br>करेण तूर्णं भगवान् स नन्दी।<br>जघान तेनैव कुजम्भमाहवे<br>स प्राणहीनो निपपात भूमौ ॥ ४४भगवान् महेश्वरने उसे आते हुए देखकर गणोंमें सर्वश्रेष्ठ शैलादिको बुलाकर कहा—वीर! जाओ और संग्राममें दैत्योंको मारो। वृषभध्वजके ऐसा कहनेपर शिलादके पुत्र नन्दीने वज्र ले करके बलिके पास जाकर उसके सिरपर वार किया, जिससे वह अचेत होकर धरतीपर गिर पड़ा। अपने भतीजेको बेहोश जानकर बलवान् कुजम्भने क्रुद्ध हो मुसल लेकर उसे घुमाते हुए नन्दीकी ओर तेजीसे फेंका। भगवान् नन्दीने आते हुए उस मुसलको तुरंत हाथसे पकड़ लिया और उसीसे युद्धमें कुजम्भको मार दिया। वह प्राणहीन होकर भूमिपर गिर पड़ा॥ ४१–४४॥

| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३३१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हत्वा कुजम्भं मुसलेन नन्दी<br>वज्रेण वीरः शतशो जघान।<br>ते वध्यमाना गणनायकेन<br>दुर्योधनं वै शरणं प्रपन्नाः॥ ४५<br><br>दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन<br>वज्रप्रहारैर्निहतान् दितीशान्।<br>प्रासं समाविध्य तडित्प्रकाशं<br>नन्दिं प्रचिक्षेप हतोऽसि वै ब्रुवन्॥ ४६<br><br>तमापतन्तं कुलिशेन नन्दी<br>बिभेद गुह्यं पिशुनो यथा नरः।<br>तत्प्रासमालक्ष्य तदा निकृत्तं<br>संवर्त्य मुष्टिं गणमाससाद॥ ४७<br><br>ततोऽस्य नन्दी कुलिशेन तूर्णं<br>शिरोऽच्छिनत् तालफलप्रकाशम्।<br>हतोऽथ भूमौ निपपात वेगाद्<br>दैत्याश्च भीता विगता दिशो दश॥ ४८वीर नन्दीने कुजम्भको मुसलसे मारकर वज्रद्वारा सैकड़ों दानवोंको भी मार डाला। गणनायकद्वारा मारे जा रहे वे सभी दानव दुर्योधनकी शरणमें गये। दुर्योधनने गणाधिपद्वारा वज्रके आघातसे दैत्योंको मारा हुआ देखकर बिजलीके सदृश प्रकाशसे युक्त प्रास ले लिया तथा 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए उसे नन्दीकी ओर फेंका। नन्दीने आ रहे उस (प्रास)-को वज्रसे इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े काट दिया, जैसे चुगलखोर व्यक्ति गुप्त विषयका भेदन कर देता है। उसके बाद उस प्रासको विदीर्ण हुआ देख (दुर्योधन) मुट्ठी बाँधकर गण (नन्दी)-के पास पहुँचा। उसके बाद ही नन्दीने शीघ्रतासे तालके समान उसके मस्तकको कुलिशसे काट डाला। मारे जानेपर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा और भयभीत हुए सभी दैत्य तेजीसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥ ४५–४८॥
ततो हतं स्वं तनयं निरीक्ष्य<br>हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम।<br>प्रगृह्य बाणासनमुग्रवेगं<br>बिभेद बाणैर्यमदण्डकल्पैः॥ ४९<br><br>गणान् सनन्दीन् वृषभध्वजांस्तान्<br>धाराभिरेवाम्बुधरास्तु शैलान्।<br>ते छाद्यमानासुरबाणजालै-<br>र्विनायकाद्या बलिनोऽपि वीराः।<br>सिंहप्रणुन्ना वृषभा यथैव<br>भयातुरा दुद्रुविरे समन्तात्॥ ५०<br><br>पराङ्मुखान् वीक्ष्य गणान् कुमारः<br>शक्त्या पृषत्कानथ वारयित्वा।<br>तूर्णं समभ्येत्य रिपुं समीक्ष्य<br>प्रगृह्य शक्त्या हृदये बिभेद॥ ५१<br><br>शक्तिनिर्भिन्नहृदयो हस्ती भूम्यां पपात ह।<br>ममार चारिपृतना जाता भूयः पराङ्मुखी॥ ५२<br><br>अमरारिबलं दृष्ट्वा भग्नं क्रुद्धा गणेश्वराः।<br>पुरतो नन्दिनं कृत्वा जिघांसन्ति स्म दानवान्॥ ५३<br><br>ते वध्यमानाः प्रमथैर्दैत्याश्चापि पराङ्मुखाः।<br>भूयो निवृत्ता बलिनः कार्त्तस्वरपुरोगमाः॥ ५४हस्ती (नामक असुर) अपने पुत्रको मारा गया देखकर नन्दीके समीप आ गया। उसने धनुष लेकर तीव्र वेगसे यमदण्डके समान बाणोंसे वार किया। बादल जिस प्रकार जलकी धाराओंसे पर्वतोंको ढँक लेता है, उसी प्रकार उसने नन्दीके साथ वृषभध्वजके उन गणोंको ढँक दिया। असुरके बाणसमूहसे घिरे वे विनायक आदि बलशाली वीर सिंहके द्वारा आक्रमण किये जानेपर वृषभोकी भाँति भयसे व्याकुल होकर चारों ओर भागने लगे। कुमारने गणोंको विमुख होते देख शक्तिद्वारा बाणोंको रोक दिया और तुरन्त ही शत्रुके पास पहुँचकर शक्तिसे उसके हृदयको बेध डाला। शक्तिसे हृदयके बिंध जानेपर हस्ती भूमिपर गिर पड़ा तथा मर गया और शत्रुसेना फिर पीठ दिखाकर विमुख हो गयी। दैत्यसेनाको छिन्न-भिन्न हुई देखकर कुपित हुए गणेश्वर नन्दीको आगे कर दानवोंको और मारने लगे; किंतु प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे सभी विमुख बलशाली कार्त्तस्वरादि दैत्य फिर लौट पड़े॥ ४९–५४॥
तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन्।<br>नन्दिषेणो व्याघ्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान्॥ ५५उन्हें लौटकर आते देख वेगशाली व्याघ्रमुख नन्दिषेण भी क्रोधसे आँखें लाल कर हाँफता हुआ लौट
३३२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६८

| तस्मिन् निवृत्ते गणपे पट्टिशाग्रकरे तदा।<br>कार्त्तस्वरो निववृते गदामादाय नारद॥ ५६<br>तमापतन्तं ज्वलनप्रकाशं<br>गणः समीक्ष्यैव महासुरेन्द्रम्।<br>तं पट्टिशं भ्राम्य जघान मूर्ध्नि<br>कार्त्तस्वरं विस्वरमुन्नदन्तम्॥ ५७<br>तस्मिन् हते भ्रातरि मातुलेये<br>पाशं समाविध्य तुरङ्गकन्धरः।<br>बबन्ध वीरः सह पट्टिशेन<br>गणेश्वरं चाप्यथ नन्दिषेणम्॥ ५८<br>नन्दिषेणं तथा बद्धं समीक्ष्य बलिनां वरः।<br>विशाखः कुपितोऽभ्येत्य शक्तिपाणिरवस्थितः॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा बलिनां श्रेष्ठः पाशपाणिरयःशिराः।<br>संयोधयामास बली विशाखं कुक्कुटध्वजम्॥ ६० | पड़ा। नारदजी! उसके बाद हाथके अग्रभागमें पट्टिश लिये हुए उस गणाधिपके लौटनेपर कार्त्तस्वर भी गदा लेकर लौट पड़ा। अग्निके समान प्रकाशवाले उस महासुरेन्द्रको आते देखकर गणपतिने पट्टिश घुमाकर उसके मस्तकपर मारा। कार्त्तस्वर चीत्कार करता हुआ मर गया। उस ममेरे भाईके मारे जानेपर वीर तुरङ्गकन्धरने पाशको लेकर पट्टिशके सहित नन्दिषेण गणेश्वरको बाँध लिया। नन्दिषेणको बँधा देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ विशाख क्रुद्ध होकर उसके पास गये और हाथमें शक्ति लिये हुए (उसके सामने) खड़े हो गये। उन्हें देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ अयःशिरा हाथमें पाश लेकर कुक्कुटध्वज विशाखके साथ संग्राम करने लगा॥ ५५—६०॥ | | विशाखं संनिरुद्धं वै दृष्ट्वायःशिरसा रणे।<br>शाखश्च नैगमेयश्च तूर्णमाद्रवतां रिपुम्॥ ६१<br>एकतो नैगमेयेन भिन्नः शक्त्या त्वयःशिराः।<br>एकतश्चैव शाखेन विशाखप्रियकाम्यया॥ ६२<br>स त्रिभिः शङ्करसुतैः पीड्यमानो जहौ रणम्।<br>ते प्राप्ताः शम्बरं तूर्णं प्रेक्ष्यमाणा गणेश्वराः॥ ६३<br>पाशं शक्त्या समाहत्य चतुर्भिः शङ्करात्मजैः।<br>जगाम विलयं तूर्णमाकाशादिव भूतलम्॥ ६४<br>पाशे निराशातां याते शम्बरः कातरेक्षणः।<br>दिशोऽथ भेजे देवर्षे कुमारः सैन्यमर्दयत्॥ ६५<br>तैर्वध्यमाना पृतना महर्षे<br>सा दानवी रुद्रसुतैर्गणैश्च।<br>विषण्णरूपा भयविह्वलाङ्गी<br>जगाम शुक्रं शरणं भयार्ता॥ ६६ | विशाखको अयःशिराके द्वारा युद्धमें घिरा हुआ देखकर शाख तथा नैगमेय नामके गण शीघ्रतासे शत्रुको ओर दौड़ पड़े। विशाखको प्रसन्न करनेकी इच्छासे एक ओरसे नैगमेयेने और दूसरी ओरसे शाखने शक्तिद्वारा अयःशिराको मारा। शंकरके तीनों पुत्रोंद्वारा ग्रस्त होनेपर उस अयःशिराने युद्ध छोड़ दिया। वे गणेश्वर शम्बरको देखकर शीघ्र ही उसके समीप पहुँचे। शम्बरने पाशको घुमाकर उनपर चलाया। शंकरके चार पुत्रोंने पाशपर वार किया, (इससे वह पाश) आकाशसे भूमिपर गिरकर नष्ट हो गया। पाशके नष्ट हो जानेपर भयभीत होकर शम्बर (इधर-उधर) दिशाओंमें भाग गया और कुमार सेनाको रौंदने लगे। महर्षे! उन रुद्र-पुत्रों एवं गणोंद्वारा मारी जा रही वह दानवी सेना दुःखी एवं भयसे व्याकुल होकर शुक्रकी शरणमें गयी॥ ६१—६६॥ |

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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६८॥


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अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश [ ३३३


उनहत्तरवाँ अध्याय

शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि-दानव-युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ-देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव-वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य-देव और इन्द्र-जम्भ-युद्ध, मातलिक जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ-कुजम्भ-वध

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>ततः स्वसैन्यमालक्ष्य निहतं प्रमथैरथ।<br>अन्धकोऽभ्येत्य शुक्रं तु इदं वचनमब्रवीत्॥ १<br>भगवंस्त्वां समाश्रित्य वयं बाधाम देवताः।<br>अथान्यानपि विप्रर्षे गन्धर्वासुरकिन्नरान्॥ २<br>तदियं पश्य भगवन् मया गुप्ता वरूथिनी।<br>अनाथेव यथा नारी प्रमथैरपि काल्यते॥ ३<br>कुजम्भाद्याश्च निहता भ्रातरो मम भार्गव।<br>अक्षयाः प्रमथाश्चामी कुरुक्षेत्रफलं यथा॥ ४पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) उसके बाद अन्धकने अपनी सेनाको प्रमथोंद्वारा मारी गयी जान करके शुक्राचार्यके निकट जाकर यह वचन कहा—'भगवन्! विप्रर्षे! हम आपके ही बलपर देवता, गन्धर्व, असुर, किन्नर एवं अन्य प्राणियोंको बाधित (पराभूत) करते हैं। परंतु भगवन्! आप देखिये कि मेरे द्वारा संरक्षित (हमारी) यह सेना अनाथिनी नारी-सी होकर प्रमथोंद्वारा कालके मुखमें भेजी जा रही है। भार्गव! कुजम्भ आदि मेरे भाई तो मारे गये और ये प्रमथगण (अब तक) कुरुक्षेत्रतीर्थके फलके सदृश अक्षय बने हुए हैं॥ १—४॥
तस्मात् कुरुष्व श्रेयो नो न जयेम यथा परैः।<br>जयेम च परान् युद्धे तथा त्वं कर्तुमर्हसि॥ ५<br>शुक्रोऽन्धकवचः श्रुत्वा सान्त्वयन् परमाद्भुतम्।<br>वचनं प्राह देवर्षे ब्रह्मर्षिर्दानवेश्वरम्।<br>त्वद्धितार्थं यतिष्यामि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ६<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं विद्यां संजीवनीं कविः।<br>आवर्तयामास तदा विधानेन शुचिव्रतः॥ ७<br>तस्यामावर्त्यमानायां विद्यायामसुरेश्वराः।<br>ये हताः प्रथमं युद्धे दानवास्ते समुत्थिताः॥ ८अतः आप हमलोगोंके लिये कल्याणका विधान करें, जिससे हमलोग शत्रुओंके द्वारा जीते न जायें और ऐसा भी उपाय करें जिससे हमलोग युद्धमें दूसरोंको जीत सकें। देवर्षे! ब्रह्मर्षि शुक्राचार्यने अन्धककी बातको सुनकर दानवेश्वरको आश्वासन देते हुए उससे कहा—मैं तुम्हारे कल्याणके लिये उद्योग करूँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। ऐसा कहकर पवित्र व्रतवाले शुक्राचार्यने विधानके अनुसार संजीवनी विद्याको प्रकट किया। उस विद्याके प्रकट होनेपर युद्धमें पहले मारे गये (सभी) असुरेश्वर और दानव जी उठे॥ ५—८॥
कुजम्भादिषु दैत्येषु भूय एवोत्थितेष्वथ।<br>युद्धायाभ्यागतेष्वेव नन्दी शङ्करमब्रवीत्॥ ९<br>महादेव वचो मह्यं शृणु त्वं परमाद्भुतम्।<br>अविचिन्त्यमसह्यं च मृतानां जीवनं पुनः॥ १०<br>ये हताः प्रमथैर्दैत्या यथाशक्त्या रणाजिरे।<br>ते समुज्जीविता भूयो भार्गवेणाथ विद्यया॥ ११<br>तदिदं तैर्महादेव महत्कर्मकृतं रणे।<br>संजातं स्वल्पमेवेश शुक्रविद्याबलाश्रयात्॥ १२उसके बाद कुजम्भ आदि दैत्योंके फिर उठ खड़े होने तथा युद्ध करनेके लिये उपस्थित होनेपर नन्दीने शंकरसे कहा—महादेव! आप मेरा अत्यन्त अद्भुत वचन सुनिये। मरे हुए लोगोंका फिर भी जी उठना कल्पनासे परे तथा असहनीय है। संग्राममें प्रमथोंने जिन दैत्योंको बलपूर्वक मारा था, उन्हें भार्गवने संजीवनी विद्याद्वारा पुनः जीवित कर दिया। अतः हे महादेव! हे ईश! उन सभीने युद्धमें जो उत्कृष्ट कार्य किया था, वह शुक्रकी विद्याके बलसे महत्त्वहीन हो गया है—सबपर पानी फिर गया है॥ ९—१२॥
३३४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

| इत्येवमुक्ते वचने नन्दिना कुलनन्दिना।<br>प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थसाधनमुत्तमम्॥ १३<br>गच्छ शुक्रं गणपते ममान्तिकमुपानय।<br>अहं तं संयमिष्यामि यथायोगं समेत्य हि॥ १४<br>इत्येवमुक्तो रुद्रेण नन्दी गणपतिस्ततः।<br>समाजगाम दैत्यानां चमूं शुक्रजिघृक्षया॥ १५<br>तं ददर्शासुरश्रेष्ठो बलवान् हयकन्धरः।<br>संरुरोध तदा मार्गं सिंहस्येव पशुर्वने॥ १६<br>समुपेत्याहनन्नन्दी वज्रेण शतपर्वणा।<br>स पपाताथ निःसंज्ञो ययौ नन्दी ततस्त्वरन्॥ १७ | कुलको आनन्द देनेवाले नन्दीके इस प्रकार कहनेपर महादेवने स्नेहपूर्वक स्वार्थसिद्ध करनेवाला उत्तम वचन कहा—गणपते! तुम जाओ और शुक्रको मेरे समीप लिवा लाओ। (फिर तो) मैं उन्हें पाकर योगक्रियासे संयमित कर दूँगा। रुद्रके ऐसा कहनेपर गणपति नन्दी शुक्राचार्यको पकड़ लानेकी कामनासे दैत्योंकी सेनामें गये। हयकन्धर नामके बलवान् श्रेष्ठ असुरने उन्हें सेनामें आते हुए देखा और जिस प्रकार साधारण पशु (दुस्साहससे) वनमें सिंहका मार्ग रोक दे, उसी प्रकार उनके मार्गको उसने रोका। नन्दीने समीप जाकर शतपर्व (वज्र)-से उसे मारा और वह अचेत होकर गिर पड़ा। उसके बाद नन्दी तुरंत वहाँसे चल दिये॥ १३—१७॥ | | ततः कुजम्भो जम्भश्च बलो वृत्रस्त्वयःशिराः।<br>पञ्च दानवशार्दूला नन्दिनं समुपाद्रवन्॥ १८<br>तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयह्लादपुरोगमाः।<br>नानाप्रहरणा युद्धे गणनाथमभिद्रवन्॥ १९<br>ततो गणनामाधिपं कुट्यमानं महाबलैः।<br>समपश्यन्त देवास्तं पितामहपुरोगमाः॥ २०<br>तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा प्राह शक्रपुरोगमान्।<br>साहाय्यं क्रियतां शम्भोरेतदन्तरमुत्तमम्॥ २१ | उसके बाद कुजम्भ, जम्भ, बल, वृत्र और अयःशिरा नामके पाँच श्रेष्ठ दानव नन्दीकी ओर दौड़े। इसी प्रकार युद्धमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवाले मय एवं ह्लाद आदि दानवश्रेष्ठोंने भी नन्दीका पीछा किया। फिर पितामहादि देवोंने महाबली दानवोंके द्वारा कूटे जा रहे गणाधिपको देखा। भगवान् ब्रह्माने उसे देखकर इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—आपलोग इस उत्तम (उपयुक्त) अवसरपर शम्भुकी सहायता करें॥ १८—२१॥ | | पितामहोक्तं वचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात्॥ २२<br>तेषामापततां वेगः प्रमथानां बले बभौ।<br>आपगानां महावेगं पतन्तीनां महार्णवे॥ २३<br>ततो हलहलाशब्दः समजायत चोभयोः।<br>बलयोर्घोरसंकाशो सुरप्रमथयोरथ॥ २४<br>तमन्तरमुपागम्य नन्दी संगृह्य वेगवान्।<br>रथाद् भार्गवमाक्रामत् सिंहः क्षुद्रं मृगं यथा॥ २५<br>तमादाय हराभ्याशमागमद् गणनायकः।<br>निपात्य रक्षिणः सर्वानथ शुक्रं न्यवेदयत्॥ २६<br>तमानीतं कविं शर्वः प्राक्षिपद् वदने प्रभुः।<br>भार्गवं त्वावृततनुं जठरे स न्यवेशयत्॥ २७<br>स शम्भुना कविश्रेष्ठो ग्रस्तो जठरमास्थितः।<br>तुष्टाव भगवन्तं तं मुनिर्वाग्भिरथादरात्॥ २८ | पितामहके कहे हुए वचनको सुनकर इन्द्र आदि देवता आकाशमार्गसे जल्दी ही शिवकी सेनामें आ गये। समुद्रमें जाती हुई नदियोंके महावेगके सदृश प्रमथोंकी सेनामें (आकाशसे) आते हुए देवताओंका वेग सुशोभित हुआ। उसके बाद प्रमथों और असुरों—दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें भीषण ‘हलहला’ शब्द उत्पन्न हुआ। उसी समय अवसर पाकर तीव्र गतिवाले नन्दी, जिस प्रकार सिंह क्षुद्र मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार भार्गवको लेकर रथसे भाग चले। गणनायक उन्हें लेकर सभी रक्षा करनेवालोंको मारते हुए शंकरके पास पहुँच गये। शुक्राचार्यको उन्होंने उनके निकट निवेदित कर दिया। समर्थ शंकरने लाये गये उन शुक्रको अपने मुखमें फेंका और अक्षुण्ण शरीरवाले भार्गवको अपने उदरमें (ज्यों-का-त्यों) रख लिया। शम्भुसे ग्रस्त होकर उनके उदरमें स्थित हुए वे मुनिश्रेष्ठ शुक्र प्रेमपूर्वक उन भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ २२—२८॥ |

७०- अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व, देवादिकोंका भेजना, अर्द्धकुसुमसे पार्वतीका प्राकट्य और अन्धकद्वारा उनकी स्तुति

अध्याय ६९ ]शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश३३५
शुक्र उवाच<br>वरदाय नमस्तुभ्यं हराय गुणशालिने।<br>शङ्कराय महेशाय त्र्यम्बकाय नमो नमः॥ २९<br>जीवनाय नमस्तुभ्यं लोकनाथ वृषाकपे।<br>मदनाग्ने कालशत्रो वामदेवाय ते नमः॥ ३०<br>स्थाणवे विश्वरूपाय वामनाय सदागते।<br>महादेवाय शर्वाय ईश्वराय नमो नमः॥ ३१<br>त्रिनयन हर भव शङ्कर उमापते जीमूतकेतो<br>गुहागृहश्मशाननिरत भूतिविलेपन शूलपाणे पशुपते<br>गोपते तत्पुरुषसत्तम नमो नमस्ते।<br>इत्थं स्तुतः कविवरेण हरोऽथ भक्त्या<br>प्रीतो वरं वरय दद्मि तवेत्युवाच।<br>स प्राह देववर देहि वरं ममाद्य<br>यद्वै तवैव जठरात् प्रतिनिर्गमोऽस्तु ॥ ३२<br>ततो हरोऽक्षीणि तदा निरुध्य<br>प्राह द्विजेन्द्राद्य विनिर्गमस्व।<br>इत्युक्तमात्रो विभुना चचार<br>देवोदरे भार्गवपुङ्गवस्तु ॥ ३३शुक्रने कहा— प्रभो ! गुणसे सम्पन्न आप वरदानी हरको नमस्कार है। शंकर, महेश, त्रिनेत्रको बार-बार नमस्कार है। लोकोंके स्वामिन् ! वृषाकपे ! आप जीवनस्वरूपको नमस्कार है। हे कामदेवके लिये अग्निस্বরূপ ! कालशत्रो ! आप वामदेवको नमस्कार है। स्थाणु, विश्वरूप, वामन, सदागति, महादेव, शर्व और ईश्वर ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे त्रिनयन ! हे हर ! हे भव ! हे शङ्कर ! हे उमापते ! हे जीमूतकेतो ! हे गुहागृह ! हे श्मशाननिरत ! हे भूतिविलेपन ! हे शूलपाणे ! हे पशुपते ! हे गोपते ! हे श्रेष्ठ परमपुरुष ! आपको बार-बार नमस्कार है। इस प्रकार कविवर (शुक्राचार्य)-के भक्तिपूर्वक स्तुति करनेपर शंकरने कहा—मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम वर माँगो; मैं तुम्हें वर दूँगा। उन्होंने कहा—हे देववर ! इस समय मुझे यही वर दीजिये कि मैं पुनः आपके उदरसे बाहर निकलूँ। उसके बाद शंकरने नेत्रोंको बंदकर कहा—हे द्विजेन्द्र ! अब तुम बाहर निकल जाओ ! (परंतु) शंकरके इस प्रकार कहनेपर भी वे भार्गवश्रेष्ठ शुक्राचार्य उनके उदरमें विचरण करने लगे ॥ २९—३३ ॥
परिभ्रमन् ददर्शाथ शम्भोरेवोदरे कविः।<br>भुवनार्णवपातालान् वृतान् स्थावरजङ्गमैः ॥ ३४<br>आदित्यान् वसवो रुद्रान् विश्वेदेवान् गणांस्तथा।<br>यक्षान् किंपुरुषाद्यादीन् गन्धर्वाप्सरसां गणान् ॥ ३५<br>मुनीन् मनुजसाध्यांश्च पशुकीटपिपीलिकान्।<br>वृक्षगुल्मान् गिरीन् वल्ल्यः फलमूलौषधानि च॥ ३६<br>स्थलस्थांश्च जलस्थांश्चानिनिमिषान्निमिषानपि।<br>चतुष्पदान् सद्विपदान् स्थावराञ् जङ्गमानपि ॥ ३७<br>अव्यक्तांश्चैव व्यक्तांश्च सगुणान्निर्गुणानपि।<br>स दृष्ट्वा कौतुकाविष्टः परिबभ्राम भार्गवः।<br>तत्रासतो भार्गवस्य दिव्यः संवत्सरो गतः ॥ ३८<br>न चान्तमलभद् ब्रह्मंस्ततः श्रान्तोऽभवत् कविः।<br>स श्रान्तं वीक्ष्य चात्मानं नालभन्निर्गमं वशी।<br>भक्तिनम्रो महादेवं शरणं समुपागमत् ॥ ३९(भगवान् शंकरके उदरमें) विचरण करते हुए शुक्राचार्यने शंकरके ही उदरमें चराचर प्राणियोंसे व्याप्त सारा जगत्, समुद्र एवं पातालोंको देखा। आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, गणों, यक्षों, किम्पुरुषों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मुनियों, मनुष्यों, साध्यों, पशुओं, कीटों, पिपीलिकाओं, वृक्षों, गुल्मों, पर्वतों, लताओं, फलों, मूलों, ओषधियों, स्थलपर रहनेवालों, जलमें रहनेवालों, अनिमिषों, निमिषों, चतुष्पदों, द्विपदों, स्थावरों, जङ्गमों, अव्यक्तों, व्यक्तों, सगुणों एवं निर्गुणोंको देखते हुए कुतूहलवश (उसी उदरमें ही) भार्गव चारों ओर घूमने लगे। भृगुवंशी शुक्राचार्यको वहाँ इस प्रकार रहते हुए एक दिव्य वर्ष बीत गया। परंतु ब्रह्मन्! शुक्रको अन्त नहीं मिला और वे थक गये। स्वयंको थका हुआ देखकर और बाहर निकलनेका मार्ग न पाकर आत्माको वशमें करनेवाले वे भक्तिसे नम्र होकर महादेवकी शरणमें आ गये॥ ३४—३९॥
३३६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

| शुक्र उवाच<br>विश्वरूप महारूप विश्वरूपाक्षसूत्रधृक्।<br>सहस्राक्ष महादेव त्वामहं शरणं गतः॥ ४०<br>नमोऽस्तु ते शङ्कर शर्व शम्भो<br>सहस्रनेत्राङ्घ्रिभुजङ्गभूषण ।<br>दृष्ट्वैव सर्वान् भुवनांस्तवोदरे<br>श्रान्तो भवन्तं शरणं प्रपन्नः॥ ४१<br>इत्येवमुक्ते वचने महात्मा<br>शम्भुर्वचः प्राह ततो विहस्य।<br>निर्गच्छ पुत्रोऽसि ममाधुना त्वं<br>शिश्नेन भो भार्गववंशचन्द्र॥ ४२<br>नाम्ना तु शुक्रेति चराचरास्त्वां<br>स्तोष्यन्ति नैवात्र विचारमन्यत्।<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् मुमोच<br>शिश्नेन शुक्रं स च निर्जगाम॥ ४३<br>विनिर्गतो भार्गववंशचन्द्रः<br>शुक्रत्वमापद्य महानुभावः।<br>प्रणम्य शम्भुं स जगाम तूर्णं<br>महासुराणां बलमुत्तमौजाः॥ ४४ | शुक्रने कहा— हे विश्वरूप! हे महारूप! हे विश्वरूपाक्ष! हे सूत्रधारिन्! हे सहस्राक्ष! हे महादेव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शङ्कर! हे शर्व! हे शम्भो! हे सहस्रनेत्राङ्घ्रि! हे भुजङ्गभूषण! आपके उदरमें सभी भुवनोंको देखते-देखते थककर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकारके वचन कहनेपर महात्मा शम्भुने हँसकर यह वचन कहा—अब तुम मेरे पुत्र हो गये हो। इसलिये हे भार्गववंशके चन्द्र! मेरे शिश्नसे बाहर निकलो। अब समस्त चराचर जगत् तुम्हारी स्तुति शुक्रके नामसे करेगा। इसमें किसी अन्य प्रकारके विचारका स्थान नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्‌ने शिश्न-मार्गसे शुक्रको मुक्त कर दिया और वे बाहर निकल आये। शुक्रत्व प्राप्तकर बाहर निकले ओजस्वी महानुभाव भार्गववंशचन्द्र शम्भुको प्रणामकर शीघ्र महासुरोंकी सेनामें चले गये॥ ४०—४४॥ | | भार्गवे पुनरायाते दानवा मुदिताभवन्।<br>पुनर्युद्धाय विदधुर्मतिं सह गणेश्वरैः॥ ४५<br>गणेश्वरास्तानसुरान् सहामरगणैरथ।<br>युयुधुः संकुलं युद्धं सर्व एव जयेप्सवः॥ ४६<br>ततोऽसुरगणानां च देवतानां च युध्यताम्।<br>द्वन्द्वयुद्धं समभवद् घोररूपं तपोधन॥ ४७<br>अन्धको नन्दिनं युद्धे शङ्कुकर्णं त्वयःशिराः।<br>कुम्भध्वजं बलिर्धीमान् नन्दिषेणं विरोचनः॥ ४८ | शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर दानव प्रसन्न हो गये। उन्होंने गणेश्वरोंके साथ फिर युद्ध करनेका विचार किया। उसके बाद देवताओंसहित विजयकी कामनावाले सभी गणेश्वरोंने उन असुरोंसे भयंकर युद्ध किया। हे तपोधन! उसके बाद युद्ध करनेमें लगे हुए असुरगणों एवं देवताओंमें भयानक द्वन्द्वयुद्ध हुआ। अन्धक नन्दीके साथ, अयःशिरा शंकुकर्णके साथ, बुद्धिमान् बलि कुम्भध्वजके साथ एवं विरोचन नन्दिषेणके साथ भिड़ गये॥ ४५—४८॥ | | अश्वग्रीवो विशाखं च शाखो वृत्रमयोधयत्।<br>बाणस्तथा नैगमेयं बलं राक्षसपुङ्गवः॥ ४९<br>विनायको महावीर्यः परश्वधधरो रणे।<br>संक्रुद्धो राक्षसश्रेष्ठं तुहुण्डं समयोधयत्।<br>दुर्योधनश्च बलिनं घण्टाकर्णमयोधयत्॥ ५०<br>हस्ती च कुण्डजठरं ह्रादो वीरं घटोदरम्।<br>एते हि बलिनां श्रेष्ठा दानवाः प्रमथास्तथा।<br>संयोधयन्ति देवर्षे दिव्याब्दानां शतानि षट्॥ ५१<br>शतक्रतुमथायान्तं वज्रपाणिमभिस्थितम्।<br>वारयामास बलवाञ् जम्भो नाम महासुरः॥ ५२ | अश्वग्रीव विशाखके साथ और शाख वृत्रके साथ, बाण नैगमेयके साथ और राक्षसपुंगव बलके साथ लड़ने लगा। युद्धमें कुपित होकर परशु धारण करनेवाले महापराक्रमी विनायक राक्षसश्रेष्ठ तुहुण्डके साथ भिड़ गये और दुर्योधन बलशाली घण्टाकर्णके साथ युद्ध करने लगा। हस्ती कुण्डजठरके साथ और ह्राद वीर घटोदरसे लड़ने लगा। देवर्षे! बलवानोंमें श्रेष्ठ ये सभी दानव एवं प्रमथगण आपसमें छः सौ दिव्य वर्षोंतक संग्राम करते रहे। जम्भ नामके बलशाली असुरने सामने आ रहे वज्रपाणि इन्द्रको रोक लिया॥ ४९—५२॥ |

अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३७


संस्कृतहिन्दी
शम्भुनामाऽसुरपतिः स ब्रह्माणमयोधयत्।<br>महौजसं कुजम्भश्च विष्णुं दैत्यान्तकारिणम्॥ ५३<br>विवस्वन्तं रणे शाल्वो वरुणं त्रिशिरास्तथा।<br>द्विमूर्धा पवनं सोमं राहुर्मित्रं विरूपधृक्॥ ५४<br>अष्टौ ये वसवः ख्याता धराद्यास्ते महासुरान्।<br>अष्टावेव महेष्वासान् वारयामासुराहवे॥ ५५<br>सरभः शलभः पाकः पुरोऽथ विपृथुः पृथुः।<br>वातापी चेल्वलश्चैव नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः॥ ५६<br>विश्वेदेवगणान् सर्वान् विष्वक्सेनपुरोगमान्।<br>एक एव रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः॥ ५७शम्भु नामका असुरराज ब्रह्मासे लड़ने लगा और कुजम्भ दैत्योंका अन्त करनेवाले महान् ओजस्वी विष्णुसे युद्ध करने लगा। शाल्व सूर्यसे, त्रिशिरा वरुणसे, द्विमूर्धा पवनसे, राहु सोमसे और विरूपधृक् मित्रसे लड़ने लगा। धरादि नामसे विख्यात आठ वसुओंने सरभ, शलभ, पाक, पुर, विपृथु, पृथु, वातापी और इल्वल—इन आठ महान् धनुर्धारी असुरोंको युद्धमें लड़कर (पीछे) हटा दिया। ये असुर भाँति-भाँतिके शस्त्र और अस्त्र लेकर लड़ने लगे। कालनेमि नामका भयंकर महासुर युद्धमें अकेला ही विष्वक्सेन आदि विश्वेदेव गणोंसे युद्ध करने लगा॥ ५३—५७॥
एकादशैव ये रुद्रास्तानेकोऽपि रणोत्कटः।<br>योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः॥ ५८<br>द्वावश्विनौ च नरको भास्करानेव शम्बरः।<br>साध्यान् मरुद्गणांश्चैव निवातकवचादयः॥ ५९<br>एवं द्वन्द्वसहस्त्राणि प्रमथामरदानवैः।<br>कृतानि च सुराब्दानां दशतीः षण्महामुने॥ ६०<br>यदा न शकिता योद्धुं दैवतैरमरारयः।<br>तदा मायां समाश्रित्य ग्रसन्तः क्रमशोडव्ययान्॥ ६१रणमें उत्कट तेजवाले विद्युन्माली नामके महासुरने अकेले ही एकादश रुद्रोंका (डटकर) सामना किया। नरकने दोनों अश्विनीकुमारोंसे, शम्बरने (द्वादश) भास्करोंसे एवं निवातकवचादिने साध्यों तथा मरुद्गणोंसे युद्ध किया। महामुने! इस प्रकार आठ दिव्य वर्षोंतक प्रमथों एवं दानवोंके हजारोंकी संख्यामें दो-दो लड़ाके वीर आपसमें द्वन्द्वयुद्ध करते रहे। जब असुरगण इस प्रकार देवोंसे युद्ध करनेमें समर्थहीन हो गये, तब उन लोगोंने मायाका सहारा लेकर देवोंको क्रमशः निगलना प्रारम्भ कर दिया॥ ५८—६१॥
ततोऽभवच्छैलपृष्ठं प्रावृडभ्रसमप्रभैः।<br>आवृतं वर्जितं सर्वैः प्रमथैरमरैरपि॥ ६२<br>दृष्ट्वा शून्यं गिरिप्रस्थं ग्रस्तांश्च प्रमथामरान्।<br>क्रोधादुत्पादयामास रुद्रो जृम्भायिकां वशी॥ ६३<br>तया स्पृष्टा दनुसुता अलसा मन्दभाषिणः।<br>वदनं विकृतं कृत्वा मुक्तशस्त्रं विजृम्भिरे॥ ६४<br>जृम्भमाणेषु च तदा दानवेषु गणेश्वराः।<br>सुराश्च निर्ययुस्तूर्णं दैत्यदेहेभ्य आकुलाः॥ ६५उसके बाद सारे प्रमथों और देवोंसे रहित पर्वत वर्षाकालीन मेघके समान दानवोंसे ढक गया। पर्वतप्रान्तको शून्य और प्रमथों तथा देवोंको ग्रसित हुआ देखकर विजितेन्द्रिय रुद्रने क्रोधसे जृम्भायिकाको उत्पन्न किया। उसके स्पर्श करनेपर अस्त्रोंको छोड़कर धीरे-धीरे बोलते हुए आलस्यसे पूर्ण दानव मुखको विवर्ण बनाकर जँभाई लेने लगे। दानवोंके जँभाई लेते समय आकुल होकर गणेश्वर एवं देवतालोग दैत्योंकी देहसे अविलम्ब बाहर निकल गये॥ ६२—६५॥
मेघप्रभेभ्यो दैत्येभ्यो निर्गच्छन्तोऽमरोत्तमाः।<br>शोभन्ते पद्मपत्राक्षा मेघेभ्य इव विद्युततः॥ ६६<br>गणामरेषु च समं निर्गतेषु तपोधन।<br>अयुध्यन्त महात्मानो भूय एवातिकोपिताः॥ ६७मेघके समान दैत्योंके शरीरसे बाहर निकल रहे कमलके सदृश आँखोंवाले श्रेष्ठ देवगण बादलसे निकलनेवाली बिजलीकी भाँति शोभित हो रहे थे। तपोधन! गणों और देवोंके बाहर आ जानेपर वे महान् (दैत्य)
३३८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्तु देवैः सगणैः दानवाः शर्वपालितैः ।<br>पराजीयन्त संग्रामे भूयो भूयस्त्वहर्निशम् ॥ ६८<br><br>ततस्त्रिनेत्रः स्वां संध्यां सप्ताब्दशतिके गते ।<br>कालेऽभ्युपासत तदा सोऽष्टादशभुजोऽव्ययः ॥ ६९अत्यन्त कुपित होकर युद्ध करने लगे। उसके बाद शम्भुसे पालित गणों एवं देवोंने युद्धमें दानवोंको दिन-रात बारम्बार हराया। उसके बाद सात सौ वर्षोंका समय बीत जानेपर अठारह भुजाओंवाले अविनाशी त्र्यम्बक शंकर अपनी नित्यक्रियाकी सन्ध्या करने लगे॥ ६८–६९॥
संस्पृश्यापः सरस्वत्यां स्नात्वा च विधिना हरः ।<br>कृतार्थो भक्तिमान् मूर्ध्ना पुष्पाञ्जलिमुपाक्षिपत् ॥ ७०<br><br>ततो ननाम शिरसा ततश्चक्रे प्रदक्षिणम् ।<br>हिरण्यगर्भेत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ॥ ७१<br><br>त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् ।<br>ननर्त भावगम्भीरं दोर्दण्डं भ्रामयन् बलात् ॥ ७२<br><br>परिनृत्यति देवेशे गणाश्चैवामरास्तथा ।<br>नृत्यन्ते भावसंयुक्ता हरस्यानुविलासिनः ॥ ७३उन भक्तिमान् शंकरने जलका स्पर्शकर (आचमनकर) विधिपूर्वक सरस्वतीमें स्नान किया। वे कृतार्थ हो गये। उन्होंने पुष्पाञ्जलि सिरसे लगाकर समर्पित की। उसके बाद उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम एवं उसके पश्चात् प्रदक्षिणा कर 'हिरण्यगर्भ' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यकी वन्दना की और जप किया। उसके बाद 'त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु' इसका स्पष्टरूपसे उच्चारण कर शूलपाणि शंकर बलपूर्वक अपना बाहुदण्ड घुमाते हुए भाव-गम्भीर होकर नाचने लगे। देवेश्वरके नाचनेपर उनके अनुगामी गण और देवता भी (वैसे ही) भाव-विभोर होकर नाचने लगे॥ ७०–७३॥
सन्ध्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया ।<br>युद्धाय दानवैः सार्द्धं मतिं भूयः समादधे ॥ ७४<br><br>ततोऽमरगणैः सर्वैस्त्रिनेत्रभुजपालितैः ।<br>दानवा निर्जिताः सर्वे बलिभिर्भयवर्जितैः ॥ ७५<br><br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा मत्वाऽजेयं च शङ्करम् ।<br>अन्धकः सुन्दमाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७६<br><br>सुन्द भ्राताऽसि मे वीर विश्वास्यः सर्ववस्तुषु ।<br>तद्ददाम्यद्य यद्वाक्यं तच्छ्रुत्वा यत्क्षमं कुरु ॥ ७७सन्ध्योपासन करके इच्छानुकूल नृत्य करनेके बाद शंकरने फिर दानवोंसे संग्राम करनेका विचार किया। फिर तो शंकरकी भुजाओंसे रक्षित बलशाली और निर्भय सम्पूर्ण देवताओंने सारे दानवोंको जीत लिया। अपनी सेनाको पराजित देखकर तथा महादेवको पराजित करनेमें कठिनाई जान करके अन्धकने सुन्दको बुलाकर यह वचन कहा—वीर सुन्द! तुम मेरे भाई हो और सभी विषयोंमें तुम मेरे विश्वासी हो। इसलिये आज मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे सुनकर यथाशक्ति उसे पूर्ण करो॥ ७४–७७॥
दुर्जयोऽसौ रणपटुर्धर्मात्मा कारणान्तरैः ।<br>समासते हि हृदये पद्माक्षी शैलनन्दिनी ॥ ७८<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छामो यत्रास्ते चारुहासिनी ।<br>तत्रैनां मोहयिष्यामि हररूपेण दानव ॥ ७९<br><br>भवान् भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः ।<br>ततो गत्वाऽथ भुक्त्वा तां जेष्यामि प्रमथान् सुरान् ॥ ८०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने बाढं सुन्दोऽभ्यभाषत ।<br>समजायत शैलादिरन्धकः शङ्करोऽप्यभूत् ॥ ८१किन्हीं मुख्य कारणोंसे युद्ध करनेमें परम चतुर ये धर्मात्मा दुर्जय हैं। मेरे हृदयमें कमलनयनी पार्वती बसी हुई है। अतः उठो; हम वहाँ चलें, जहाँ वह मधुर मुसकानवाली स्थित है। दानव! वहाँ मैं शंकरका रूप धारण करके उसे मुग्ध कर दूँगा (भुलावेमें डाल दूँगा)। तुम शंकरका अनुचर गणेश्वर नन्दी बनो। तब वहाँ पहुँच करके और उसका सुख भोगकर प्रमथों एवं देवोंको जीतूँगा। ऐसा कहनेपर सुन्दने कहा—ठीक है। उसके बाद वह शैलादि (नन्दी) बन गया और अन्धक शिव बन गया॥ ७८–८१॥
नन्दिरुद्रौ ततो भूत्वा महासुरचमूपती ।<br>सम्प्राप्तौ मन्दरगिरिं प्रहारैः क्षतविग्रहौ ॥ ८२उसके बाद महासुर (अन्धक) और सेनापति (सुन्द) शस्त्रास्त्रोंकी मारसे अधिक घायल हुए शरीरवाले रुद्र और नन्दीका रूप धारण कर मन्दरगिरिपर पहुँचे।
अध्याय ६९ ]शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश३३९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हस्तमालम्ब्य सुन्दस्य अन्धको हरमन्दिरम्।<br>विवेश निर्विशङ्केन चित्तेनासुरसत्तमः ॥ ८३<br>ततो गिरिसुता दूरादायान्तं वीक्ष्य चान्धकम्।<br>महेश्वरवपुश्छन्नं प्रहारैर्जर्जरच्छविम् ॥ ८४<br>सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशत् ततः।<br>तं दृष्ट्वा मालिनीं प्राह सुयशां विजयां जयाम् ॥ ८५असुरश्रेष्ठ अन्धक सुन्दका हाथ पकड़कर निडर होकर महादेवके मन्दिरमें घुस गया। उसके बाद शैलादि नन्दीके रूपमें स्थित सुन्दको पकड़कर मारोंसे जर्जर महादेवके शरीरमें छिपे अन्धकको दूरसे आते देखकर पार्वतीजीने यशस्विनी मालिनी, विजया तथा जयासे कहा— ॥ ८२–८५ ॥
जये पश्यस्व देवस्य मदर्थे विग्रहं कृतम्।<br>शत्रुभिर्दानववरैस्तदुत्तिष्ठस्व सत्वरम् ॥ ८६<br>घृतमानय पौराणं बीजिकां लवणं दधि।<br>व्रणभङ्गं करिष्यामि स्वयमेव पिनाकिनः ॥ ८७<br>कुरुष्व शीघ्रं सुयशे स्वभर्तुर्व्रणनाशनम्।<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं समुत्थाय वरासनात् ॥ ८८<br>अभ्युद्ययौ तदा भक्त्या मन्यमाना वृषध्वजम्।<br>शूलपाणेस्ततः स्थित्वा रूपं चिह्नानि यत्नतः ॥ ८९<br>अन्विषेष ततो ब्रह्मन्नोभौ पार्श्वस्थितौ वृषौ।<br>सा ज्ञात्वा दानवं रौद्रं मायाच्छादितविग्रहम् ॥ ९०जये! देखो, मेरे स्वामीके शरीरको मेरे लिये दानव-शत्रुओंने किस प्रकार जर्जरित कर डाला है। इसलिये अविलम्ब उठो। पुराना घी, बीजिका, लवण और दही ले आओ। पिनाक धारण करनेवाले शंकरके घावोंको मैं स्वयं ही भरूँगी। यशस्विनि! शीघ्र अपने स्वामीके घावोंको भरो—ऐसा कहते हुए आसनसे उठकर उसे वृषध्वज शंकर समझती हुई वे भक्तिपूर्वक उसके पास गयीं। उसके बाद खड़ी होकर वे शंकरके रूप एवं चिह्नोंको भलीभाँति देखने लगीं। ब्रह्मन्! उन्होंने देखा कि उसकी बगलमें स्थित दोनों वृष नहीं हैं। इसलिये उन्हें यह मालूम हो गया कि यह मायासे छिपे शरीरवाला भयानक दानव है॥ ८६–९० ॥
अपयानं तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने।<br>देव्याश्चिन्तितमाज्ञाय सुन्दं त्यक्त्वान्धकोऽसुरः ॥ ९१<br>समाद्रवत वेगेन हरकान्तां विभावरीम्।<br>समाद्रवत दैतेयो येन मार्गेण साऽगमत् ॥ ९२<br>अपस्कारान्तरं भञ्जन् पादप्लुतिभिराकुलः।<br>तमापतन्तं दृष्ट्वैव गिरिजा प्राद्रवद् भयात् ॥ ९३<br>गृहं त्यक्त्वा ह्युपवनं सखीभिः सहिता तदा।<br>तत्राप्यनुजगामासौ मदान्धो मुनिपुङ्गव ॥ ९४<br>तथापि न शशापैनं तपसो गोपनाय तु।<br>तद्भयादाविशद् गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥ ९५मुने! उसके बाद गिरिराजकी कन्या भाग चलीं। देवीके विचारको समझकर अन्धकासुर सुन्दको छोड़कर शीघ्रतापूर्वक शंकरप्रिया विभावरीके पीछे उसी रास्तेसे दौड़ा, जिससे वे गयी थीं। चरणके चपेटोंसे राहकी रुकावटोंको चूर-चूर करते हुए वह अधीरतापूर्वक दौड़ पड़ा। उसे आते देखकर गिरितनया भयसे (और) भाग चलीं। मुनिवर! उसके बाद देवी सखियोंके साथ घर छोड़कर उपवनमें चली गयीं। वहाँ भी मदान्ध (अन्धक)-ने उनका पीछा किया। इतनेपर भी अपने तपकी रक्षाके लिये उन्होंने उसे शाप नहीं दिया। किंतु गौरी स्वयं उसके डरसे पवित्र सफेद अर्कके फूलमें छिप गयीं ॥ ९१–९५ ॥
विजयाद्या महागुल्मे सम्प्रयाता लयं मुने।<br>नष्टायामथ पार्वत्यां भूयो हैरण्यलोचनिः ॥ ९६<br>सुन्दं हस्ते समादाय स्वसैन्यं पुनरागमत्।<br>अन्धके पुनरायाते स्वबलं मुनिसत्तम ॥ ९७मुने! विजया आदि भी घनी झाड़ियोंमें छिप गयीं। उसके बाद पार्वतीके अदृश्य हो जानेपर हिरण्याक्षका पुत्र (अन्धक) सुन्दका हाथ पकड़कर पुनः अपनी सेनामें वापस आ गया। मुनिसत्तम! अन्धकके अपनी सेनामें पुनः लौट आनेपर प्रमथों और असुरोंमें घमासान