भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेनाज्ञानेन भवतोनादृत्यानुविरोधिताः।<br>योऽहं स भगवान् विष्णुर्विष्णुर्यः सोऽहमव्ययः॥ २७<br><br>नावयोर्वै विशेषोऽस्ति एका मूर्तिर्द्विधा स्थिता।<br>तदमीभिर्नरव्याघ्रैर्भक्तिभावयुतैर्गणैः॥ २८<br><br>यथाहं वै परिज्ञातो न भवद्भिस्तथा ध्रुवम्।<br>येनाहं निन्दितो नित्यं भवद्भिर्मूढबुद्धिभिः॥ २९<br><br>तेन ज्ञानं हि वै नष्टं नातस्त्वालिङ्गिता मया।<br>इत्येवमुक्ते वचने गणाः प्रोचुर्महेश्वरम्॥ ३०भावपूर्वक शंकरकी पूजा की है। इसी अज्ञानके हेतु आप सभीका अनादर कर उनका विशेष आग्रह किया गया। जो मैं हूँ वही भगवान् विष्णु हैं एवं जो विष्णु हैं वही अविनाशी मैं हूँ। हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें अवस्थित है। अतः भक्तिभावसे युक्त इन पुरुषश्रेष्ठ गणोंने जैसा मुझे जाना है, निश्चय ही उस प्रकार आपलोग मुझे नहीं जानते। जड-बुद्धिवाले आपलोगोंने यतः नित्य मेरी निन्दा की है, अतः आपलोगोंका ज्ञान नष्ट हो गया। इसीलिये मैंने आपलोगोंको गले नहीं लगाया है। इस प्रकार कहनेपर गणोंने महेश्वरसे कहा —॥ २६–३०॥
कथं भवान् यथैक्येन संस्थितोऽस्ति जनार्दनः।<br>भवान् हि निर्मलः शुद्धः शान्तः शुक्लो निरञ्जनः॥ ३१<br><br>स चाप्यञ्जनसंकाशः कथं तेनेह युज्यते।<br>तेषां वचनमर्थाढ्यं श्रुत्वा जीमूतवाहनः॥ ३२<br><br>विहस्य मेघगम्भीरं गणानिदमुवाच ह।<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये स्वयशोवर्द्धनं वचः॥ ३३<br><br>न त्वेव योग्या यूयं हि महाज्ञानस्य कर्हिचित्।<br>अपवादभयाद् गुह्यं भवतां हि प्रकाशये॥ ३४आप एवं जनार्दन ऐक्यरूपसे कैसे रहते हैं? आप निर्मल, शुद्ध, शान्त, शुक्ल और निर्दोष एवं अज्ञानसे रहित हैं। किंतु वे अञ्जनके तुल्य हैं; अतः उनसे आपका मेल कैसे होता है? उनके अभिप्राययुक्त वचनको सुननेके बाद जीमूतवाहन शंकरने मेघके समान गम्भीर वाणीमें हँसकर कहा—अपनी कीर्ति बढ़ानेवाली सम्पूर्ण बात मैं बतलाता हूँ; उसे सुनो—तुमलोग कभी भी महाज्ञानके योग्य नहीं हो। परंतु अपकीर्तिके डरसे मैं आप सभीके सामने गोपनीय वस्तु-स्थितिको प्रकाशित करता हूँ॥ ३१–३४॥
प्रियत्वं मयि चैतेन यन्मच्चित्तास्तु नित्यशः।<br>एकरूपात्मकं देहं कुरुध्वं यत्नमास्थिताः॥ ३५<br><br>पयसां हविषाद्यैश्च स्नपनेन प्रयत्नतः।<br>चन्दनादिभिरेकाग्रैर्न मे प्रीतिः प्रजायते॥ ३६<br><br>यत्नात् क्रकचमादाय छिन्धध्वं मम विग्रहम्।<br>नरकार्हा भवद्भक्ता रक्षामि स्वयशोऽर्थतः॥ ३७<br><br>माऽयं वदिष्यते लोको महान्तमपवादिनम्।<br>यथा पतन्ति नरके हरभक्तास्तपस्विनः॥ ३८मुझमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेसे भी अन्य लोग प्रिय हैं। तुमलोग यत्नपूर्वक एक देहात्मक रूपको समझो। प्रयत्नपूर्वक दूध या घीसे स्नान कराने तथा स्थिरचित्ततापूर्वक चन्दन आदिद्वारा लेप करनेसे मुझे प्रसन्नता नहीं उत्पन्न होती। आरा लेकर मेरी देहको भले ही चीर डालो, परंतु अपनी कीर्तिके लिये नरकके योग्य आप भक्तोंकी मैं (उससे) रक्षा करता ही हूँ। (क्योंकि) यह संसार मुझे इस प्रकारका महान् कलङ्क न लगाये कि शंकरके तपस्वी भक्त नरकमें जाते हैं॥ ३५–३८॥
व्रजन्ति नरकं घोरमित्येवं परिवादिनः।<br>अतोऽर्थं न क्षिपाम्यद्य भवतो नरकेऽद्भुते॥ ३९<br><br>यन्निन्दध्वं जगन्नाथं पुष्कराक्षं च मन्मयम्।<br>स चैव भगवान् शर्वः सर्वव्यापी गणेश्वरः॥ ४०<br><br>न तस्य सदृशो लोके विद्यते सचराचरे।<br>श्वेतमूर्तिः स भगवान् पीतो रक्तोऽञ्जनप्रभः॥ ४१इस प्रकारकी निन्दा करनेवाले लोग भयंकर नरकमें जाते हैं। इसलिये मैं आपलोगोंको अद्भुत नरकमें नहीं डालता। आपलोग मेरे स्वरूप जिन कमलनयन जगन्नाथकी निन्दा करते हैं, वे ही सर्वव्यापी गणेश्वर भगवान् शर्व हैं। इस समस्त चर और अचर लोकमें उनके समान कोई नहीं है। वे भगवान् श्वेतमूर्ति पीत, रक्त एवं