वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३२६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६७ |
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| तस्मात् परतरं लोके नान्यद् धर्म हि विद्यते।<br>सात्त्विकं राजसं चैव तामसं मिश्रकं तथा।<br>स एव धत्ते भगवान् सर्वपूज्यः सदाशिवः॥ ४२<br>शङ्करस्य वचः श्रुत्वा शैवाद्याः प्रमथोत्तमाः।<br>प्रत्युचुर्भगवन् ब्रूहि सदाशिवविशेषणम्॥ ४३<br>तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा प्रमथानामथेश्वरः।<br>दर्शयामास तद्रूपं सदाशैव निरञ्जनम्॥ ४४<br>ततः पश्यन्ति हि गणाः तमीशं वै सहस्रशः।<br>सहस्रवक्त्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम्॥ ४५<br>दण्डपाणिं सुदुर्हृश्यं लोकैर्व्याप्तं समन्ततः।<br>दण्डसंस्थाऽस्य दृश्यन्ते देवप्रहरणास्तथा॥ ४६<br>तत एकमुखं भूयो ददृशुः शङ्करं गणाः।<br>रौद्रैश्च वैष्णवैश्चैव वृतं चिह्नः सहस्रशः॥ ४७<br>अर्द्धेन वैष्णववपुरर्द्धेन हरविग्रहः।<br>खगध्वजं वृषारूढं खगारूढं वृषध्वजम्॥ ४८<br>यथा यथा त्रिनयनो रूपं धत्ते गुणाग्रणीः।<br>तथा तथा त्वजायन्त महापाशुपता गणाः॥ ४९<br>ततोऽभवच्चैकरूपी शङ्करो बहुरूपवान्।<br>द्विरूपश्चाभवद् योगी एकरूपोऽप्यरूपवान्।<br>क्षणाच्छ्वेतः क्षणाद् रक्तः पीतो नीलः क्षणादपि॥ ५०<br>मिश्रको वर्णहीनश्च महापाशुपतस्तथा।<br>क्षणाद् भवति रुद्रेन्द्रः क्षणाच्छम्भुः प्रभाकरः॥ ५१<br>क्षणाद्धार्द्धाच्छङ्करो विष्णुः क्षणाच्चर्व्वः पितामहः।<br>ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा शैवादयो गणाः॥ ५२<br>अजानन्त तदैक्येन ब्रह्मविष्ण्वीशभास्करान्।<br>यदाऽभिन्नममन्यन्त देवदेवं सदाशिवम्॥ ५३<br>तदा निर्धूतपापास्ते समजायन्त पार्षदाः।<br>तेष्वेवं धूतपापेषु अभिन्नेषु हरीश्वरः॥ ५४<br>प्रीतात्मा विबभौ शम्भुः प्रीतियुक्तोऽब्रवीद् वचः।<br>परितुष्टोऽस्मि वः सर्वे ज्ञानेनानेन सुव्रताः॥ ५५<br>वृणुध्वं वरमानन्त्यं दास्ये वो मनसेप्सितम्।<br>ऊचुस्ते देहि भगवन् वरमस्माकमीश्वर।<br>भिन्नदृष्ट्युद्भवं पापं यत्तद् भ्रंशं प्रयातु नः॥ ५६ | अञ्जनके सदृश कान्तिवाले हैं। संसारमें उनसे श्रेष्ठ कोई दूसरा धर्म नहीं है। सर्वपूज्य वे सदाशिव (सदा मङ्गल करनेवाले) भगवान् ही सभी सात्त्विक, राजस, तामस एवं मिश्रित भावोंको धारण करते हैं॥ ३९-४२॥<br><br>शंकरके वचनको सुनकर शैव आदि श्रेष्ठ गणोंने कहा—भगवन्! आप सदाशिवकी विशेषता प्रकट करनेवाले गुणको कहिये। प्रमथेश्वरने उनके इस वचनको सुनकर उन्हें निरञ्जन सदाशिवरूपको दिखलाया। उसके बाद हजारों गणोंने उन ईश्वरको हजारों मुख, चरण एवं भुजाओंवाला हुआ देखा। वे लोकोंसे सभी ओर व्याप्त थे तथा दण्डपाणि एवं अत्यधिक सुदुर्हृश्य थे। देवताओंके अस्त्र उनके दण्डमें दिखलायी पड़ रहे थे॥ ४३—४६॥<br><br>उसके बाद पुनः गणोंने रुद्र एवं विष्णुके हजारों चिह्नोंसे युक्त एकमुख शंकरको देखा। उस रूपका आधा भाग शंकरके शरीरका था और आधा भाग गरुडध्वज था। (एक आधा भाग) गरुडध्वज वृषारूढ था एवं (दूसरा आधा भाग) वृषभध्वज गरुड़पर आरूढ़ था। गुणोंमें अग्रणी त्रिलोचन जैसे-जैसे रूप धारण करते जाते थे, वैसे-वैसे ही महापाशुपतगण भी होते जाते थे। उसके बाद एकरूपवाले शंकर बहुत रूपवाले हो गये। वे योगी दो रूप धारण करनेवाले, एक रूप धारण करनेवाले एवं बिना रूपके भी हो गये। वे प्रतिक्षण श्वेत, रक्त, पीत, नील, मिश्र वर्णवाले एवं वर्णहीन होते गये। महापाशुपतोंका भी स्वरूप उनके रूपके अनुरूप होता गया। श्रीशंकर किसी क्षणमें इन्द्र, किसी क्षणमें सूर्य, किसी क्षणमें विष्णु एवं किसी क्षणमें पितामहके रूपमें स्वरूप बदलते गये। यह अत्यन्त आश्चर्यजनक दृश्य देखकर शैव आदि गणोंने ब्रह्मा, विष्णु, ईश एवं सूर्यको (इनसे) अभिन्न समझा। उन लोगोंने जब देवाधिदेव सदाशिवको (सभी देवोंसे) अभिन्न मान लिया तब वे सभी पार्षद पापसे रहित हो गये। इस प्रकार अभेद-बुद्धिके कारण उनके पापसे विमुक्त हो जानेसे हरीश्वर शम्भु प्रसन्न हो गये। उन्होंने संतुष्ट होकर कहा—सुव्रतो! तुम्हारे इस प्रकारके ज्ञानसे मैं प्रसन्न हूँ। अब बहुतों-से वर फिर माँगो। मैं तुम्हें इच्छित वर दूँगा। उन्होंने कहा—भगवन्! महेश्वर! हमें यह वर दें कि भेदभाव रखनेके कारण उत्पन्न हमारे (शेष) सभी पाप नष्ट हो जायें॥ ४७—५६॥ |