भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337
अध्याय ६८ ]भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश३२७

| पुलस्त्य उवाच<br>बाढमित्यब्रवीच्छर्वश्चक्रे निर्धूतकल्मषान्।<br>सम्परिष्वजताव्यक्तस्तान् सर्वान् गणयूथपान्॥ ५७<br><br>इति विभुना प्रणतार्तिहरेण<br>गणपतयो वृषमेघरथेन।<br>श्रुतिगदितानुगमेनेव मन्दरं<br>गिरिमवतत्य समध्यवसन् तम्॥ ५८<br><br>आच्छादितो गिरिवरः प्रमथैर्घनाभै-<br>राभाति शुक्लतनुरीश्वरपादजुष्टः।<br>नीलाजिनातततनुः शरदभ्रवर्णो<br>यद्वद्विभाति बलवान् वृषभो हरस्य॥ ५९ | पुलस्त्यजी बोले— शंकरने कहा—'ऐसा ही होगा'। उसके बाद अदृश्य होते हुए शंकरने उन सभी गणाधिपोंको आलिङ्गित कर उन्हें पापसे (सर्वथा) रहित कर दिया। उसके बाद श्रुतिकी उक्तिका जैसे (शास्त्रोंमें) अनुगमन होता है उसी प्रकार वृष एवं मेघवाहन शरणागतोंके कष्टको हरण करनेवाले शंकरके साथ सभी गणपति मन्दरपर्वतको चारों ओरसे घेरकर रहने लगे। मेघके समान प्रमथोंसे घिरे शिव-चरणकी सेवा करनेवाले शुक्ल शरीरवाला पर्वतराज ऐसे सुशोभित हो रहा था जैसे नीले मृगचर्मसे ढके शरीरवाला एवं शरत्कालीन मेघके समान धवल रंगवाला शंकरका बलवान् वृषभ सुशोभित होता है॥ ५७—५९॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६७॥


अडसठवाँ अध्याय

भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश

| पुलस्त्य उवाच<br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः समं दैत्यैस्तथाऽन्धकः।<br>मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं प्रमथाश्रितकन्दरम्॥ १<br>प्रमथा दानवान् दृष्ट्वा चक्रुः किलकिलाध्वनिम्।<br>प्रमथाश्चापि संरब्धा जघ्नुस्तूर्यान्यनेकशः॥ २<br>स चावृणोन्महानादो रोदसी प्रलयोपमः।<br>शुश्राव वायुमार्गस्थो विघ्नराजो विनायकः॥ ३<br>समभ्ययात् सुसंक्रुद्धः प्रमथैरभिसंवृतः।<br>मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं ददृशे पितरं तथा॥ ४<br>प्रणिपत्य तथा भक्त्या वाक्यमाह महेश्वरम्।<br>किं तिष्ठसि जगन्नाथ समुत्तिष्ठ रणोत्सुकः॥ ५<br><br>ततो विघ्नेशवचनाज्जगन्नाथोऽम्बिकां वचः।<br>प्राह यास्येऽन्धकं हन्तुं स्थेयमेवाप्रमत्तया॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) इसी बीच दैत्योंके साथ वह अन्धक प्रमथोंसे सेवित गुफाओंवाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दरगिरिपर आ गया। प्रमथोंने दानवोंको देखकर हर्षसूचक 'किलकिला'-ध्वनि की और फिर उन्होंने बहुत-सी तुरहियाँ बजायीं। प्रलय (कालीन ध्वनि)-के समान वह भयङ्कर ध्वनि आकाश और पृथ्वीके बीच भर गयी। आकाशमें स्थित विघ्नराज गणेशने उस ध्वनिको सुना। प्रमथोंसे घिरे हुए वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर पर्वतश्रेष्ठ मन्दरपर गये और उन्होंने अपने पिताको देखा॥ १—४॥<br>(फिर) श्रद्धापूर्वक प्रणामकर महेश्वरसे (यह) वाक्य कहा—हे जगन्नाथ! आप बैठे क्यों हैं? युद्ध करनेके लिये प्रबल इच्छा रखकर आप उठें। विघ्नेश्वर गणेशके कहनेपर जगत्पति महादेवने अम्बिकासे कहा—मैं अन्धकको मारनेके लिये जाऊँगा, तुम सावधानीसे रहना। |