वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३२८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६८ |
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| ततो गिरिसुता देवं समालिङ्ग्य पुनः पुनः।<br>समीक्ष्य सस्नेहहरं प्राह गच्छ जयान्धकम्॥ ७<br><br>ततोऽमरगुरोर्गौरी चन्दनं रोचनाञ्जनम्।<br>प्रतिवन्द्य सुसम्प्रीता पादावेवाभ्यवन्दत॥ ८ | उसके बाद पर्वतनन्दिनीने महादेवको बार-बार गले लगाकर एवं प्रेमपूर्ण दृष्टिसे उन्हें देखकर (मङ्गल वचन) कहा—जाइये और अन्धकपर विजय प्राप्त कीजिये। उसके बाद गौरीने देवश्रेष्ठ शंकरको चन्दन, रोचना एवं अञ्जन लगाया तथा अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक उनके चरणोंकी वन्दना की॥ ५—८॥ | | ततो हरः प्राह वचो यशस्यं मालिनीमपि।<br>जयां च विजयां चैव जयन्तीं चापराजिताम्॥ ९<br>युष्माभिरप्रमत्ताभिः स्थेयं गेहे सुरक्षिते।<br>रक्षणीया प्रयत्नेन गिरिपुत्री प्रमादतः॥ १०<br>इति संदिश्य ताः सर्वाः समारुह्य वृषं विभुः।<br>निर्जगाम गृहात् तुष्टो जयेप्सुः शूलधृग् बली॥ ११<br>निर्गच्छतस्तु भवनादीश्वरस्य गणाधिपाः।<br>समन्तात् परिवार्थैव जयशब्दांश्च चक्रिरे॥ १२ | उसके बाद महादेवने मालिनी, जया, विजया, जयन्ती और अपराजितासे कीर्ति बढ़ानेवाला यह वचन कहा—तुमलोग सुरक्षित घरमें सतर्कतासे रहना और प्रयत्नपूर्वक पार्वतीको असावधानीसे बचाना। उन सभीको इस प्रकार समझाने-बुझानेके बाद वृषभपर सवार होकर शूल धारण करनेवाले विजयाभिलाषी बलशाली भगवान् शंकर (आत्मविश्वासके साथ) संतुष्ट होकर घरसे चल पड़े। घरसे निकलते समय गणाधिपोंने शंकरको चारों ओरसे घेरकर 'जय-जयकार' किया॥ ९—१२॥ | | रणाय निर्गच्छति लोकपाले<br>महेश्वरे शूलधरे महर्षे।<br>शुभानि सौम्यानि सुमङ्गलानि<br>जातानि चिह्नानि जयाय शम्भोः॥ १३<br>शिवा स्थिता वामतरेऽथ भागे<br>प्रयाति चाग्रे स्वनमुन्नदन्ती।<br>क्रव्यादसंघाश्च तथाामिषैषिणः<br>प्रयान्ति हृष्टास्तृषितासृगर्थे॥ १४<br>दक्षिणाङ्गं नखान्तं वै समकम्पत शूलिनः।<br>शकुनिश्चापि हारीतो मौनी याति पराङ्मुखः॥ १५<br>निमित्तानीदृशान् दृष्ट्वा भूतभव्यभवो विभुः।<br>शैलादिं प्राह वचनं सस्मितं शशिशेखरः॥ १६ | महर्षे! शूल धारण करनेवाले संसारके पालक महेश्वरके युद्ध करनेके लिये घरसे निकलनेपर उनकी जयके लिये शुभ, सौम्य और मङ्गलजनक लक्षण (शकुन) प्रकट हुए। उनकी बायीं बगलमें शृगालिनी स्थित होकर ऊँचे स्वरमें बोलती हुई आगे-आगे जा रही थी। मांसभक्षी प्राणियोंका समूह प्रसन्नतापूर्वक रक्तके लिये जा रहा था। शूलपाणिका सारा दायाँ अङ्ग फड़क उठा। हारीत पक्षी मौन होकर पीछेकी ओर जा रहा था। भूत, भविष्य एवं वर्तमानस्वरूप एवं व्यापक चन्द्रमौलि महादेव शंकरने इस प्रकारके लक्षणोंको देखकर शैलादि (नन्दी)-से प्रसन्नतापूर्वक वचन कहा—॥ १३—१६॥ | | हर उवाच<br>नन्दिन् जयोऽद्य मे भावी न कथंचित् पराजयः।<br>निमित्तानीह दृश्यन्ते सम्भूतानि गणेश्वर॥ १७ | शंकरने कहा— नन्दिन्! गणेश्वर! इस समय कल्याणकारी लक्षण दिखायी दे रहे हैं। इसलिये आज मेरी विजय होगी। किसी भी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। | | तच्छम्भुवचनं श्रुत्वा शैलादिः प्राह शङ्करम्।<br>कः संदेहो महादेव यत् त्वं जयसि शात्रवान्॥ १८<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं नन्दी रुद्रगणांस्तथा।<br>समादिदेश युद्धाय महापाशुपतैः सह॥ १९<br>तेऽभ्येत्य दानवबलं मर्दयन्ति स्म वेगिताः।<br>नानाशास्त्रधरा वीरा वृक्षानशनयो यथा॥ २० | शंकरके उस वचनको सुनकर शैलादिने उनसे कहा—महादेव! आप शत्रुओंको जीत लेंगे, इसमें संदेह ही कौन-सा है? ऐसा कहकर नन्दीने महापाशुपतके सहित रुद्रगणोंको युद्ध करनेके लिये आदेश दिया। (फिर तो) भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको धारण करनेवाले वे वीर दानवसैन्यके पास पहुँचकर उसे ऐसे कुचलकर नष्ट करने लगे जैसे वज्र वृक्षोंको नष्ट करता है॥ १७—२०॥ |