भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३२९ | | :--- | :--- |

ते वध्यमाना बलिभिः प्रमथैर्दैत्यदानवाः।<br>प्रवृत्ताः प्रमथान् हन्तुः कूटमुद्गरपाणयः॥ २१<br>ततोऽम्बरतले देवाः सेन्द्रविष्णुपितामहाः।<br>ससूर्याग्निपुरोगास्तु समायाता दिदृक्षवः॥ २२<br>ततोऽम्बरतले घोषः सस्वनः समजायत।<br>गीतवाद्यादिसम्मिश्रो दुन्दुभीनां कलिप्रिय॥ २३<br>ततः पश्यत्सु देवेषु महापाशुपतादयः।<br>गणास्तद्दानवं सैन्यं जिघांसन्ति स्म कोपिताः॥ २४बलशाली प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे दैत्य-दानवगण (भी) हाथोंमें कूट-मुद्गर लेकर प्रमथोंको मारने लगे। उसके बाद (युद्ध) देखनेकी लालसासे इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य एवं अग्नि आदि देवगण आकाशमें एकत्र हो गये। नारदजी! उसके बाद गाने-बजानेके साथ दुन्दुभियोंकी ध्वनि आकाशमें गूँजने लगी। फिर तो देवताओंके देखते-ही-देखते क्रुद्ध होकर महापाशुपत आदि गण दानव-सेनाका विध्वंस करने लगे॥ २१-२४॥
चतुरङ्गबलं दृष्ट्वा हन्यमानं गणेश्वरैः।<br>क्रोधान्वितस्तुहुण्डस्तु वेगेनाभिससार ह॥ २५<br>आदाय परिघं घोरं पट्टोद्बद्धमयस्मयम्।<br>राजतं राजतेऽत्यर्थमिन्द्रध्वजमिवोच्छ्रितम्॥ २६<br>तं भ्रामयानो बलवान् निजघान रणे गणान्।<br>रुद्राद्याः स्कन्दपर्यन्तास्तेऽभज्यन्त भयातुराः॥ २७<br>तत्प्रभग्नं बलं दृष्ट्वा गणनाथो विनायकः।<br>समाद्रवत वेगेन तुहुण्डं दनुपुङ्गवम्॥ २८गणेश्वरोंद्वारा चतुरङ्गिणी—रथ, हाथी, घोड़े, पैदल चार अङ्गोंवाली सेनाको मारी जाती हुई देख करके क्रुद्ध होकर तुहुण्ड तेजीसे आगे बढ़ा। ढालसे बँधे हुए लौहके बने चमचमाते भयङ्कर परिघको लेकर वह इन्द्रके ऊँचे ध्वजके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। बलशाली तुहुण्ड उस परिघको घुमाते हुए युद्धमें गणोंको मारने लगा। रुद्रसे लेकर स्कन्दतक वे सभी गण भयभीत होकर भाग चले। उस सेनाको नष्ट हुई देखकर गणनाथ विनायक दानवश्रेष्ठ तुहुण्डकी ओर तेजीसे दौड़े॥ २५-२८॥
आपतन्तं गणपतिं दृष्ट्वा दैत्यो दुरात्मवान्।<br>परिघं पातयामास कुम्भपृष्ठे महाबलः॥ २९<br>विनायकस्य तत्कुम्भे परिघं वज्रभूषणम्।<br>शतधा त्वगमद् ब्रह्मन् मेरोः कूट इवाशनिः॥ ३०<br>परिघं विफलं दृष्ट्वा समायान्तं च पार्षदम्।<br>बबन्ध बाहुपाशेन राहू रक्षन् हि मातुलम्॥ ३१<br>स बद्धो बाहुपाशेन बलादाकृष्य दानवम्।<br>समाजघान शिरसि कुठारेण महोदरः॥ ३२महाबलशाली दुष्टात्मा दैत्यने गणपतिको सामने आते देखकर (उनके) कुम्भस्थलमें परिघका वार कर दिया। ब्रह्मन्! वज्रसे अलंकृत वह परिघ विनायकके कुम्भस्थलपर ऐसे सैकड़ों टुकड़े हो गया, जैसे मेरुके शिखरपर वज्र सैकड़ों टुकड़े हो जाता है। परिघको विफल हुआ देखकर अपने मामाकी रक्षा करते हुए राहुने आनेवाले पार्षदको अपने भुजापाशमें जकड़ लिया। भुजापाशमें बँधे हुए (होनेपर भी) उन महोदरने दानवको बलपूर्वक खींचकर उसके मस्तकपर कुठारसे वार किया॥ २९-३२॥
काष्ठवत् स द्विधा भूतो निपपात धरातले।<br>तथाऽपि नात्यजद् राहुर्बलवान् दानवेश्वरः।<br>स मोक्षार्थेऽकरोद् यत्नं न शशाक च नारद॥ ३३<br>विनायकं संयतमीक्ष्य राहुणा<br>कुण्डोदरो नाम गणेश्वरोऽथ।<br>प्रगृह्य तूर्णं मुशलं महात्मा<br>राहुं दुरात्मानमसौ जघान॥ ३४वह काष्ठके समान दो टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। फिर भी बलशाली दानवेश्वर राहुने उन्हें नहीं छोड़ा। नारदजी! उन्होंने छूटनेका प्रयत्न तो किया, किंतु उससे वे छूट न सके। राहुद्वारा विनायकको बँधा हुआ देखकर कुण्डोदर नामके गणेश्वरने तुरंत मुसल उठा लिया और उन महात्माने दुरात्मा राहुपर (दे) मारा।