वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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३३० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६८ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो गणेशः कलशध्वजस्तु<br>प्रासेन राहुं हृदये बिभेद।<br>घटोदरो वै गदया जघान<br>खड्गेन रक्षोऽधिपतिः सुकेशी ॥ ३५<br>स तैश्चतुर्भिः परिताड्यमानो<br>गणाधिपं राहुरथोत्ससर्ज।<br>संत्यक्तमात्रोऽथ परश्वधेन<br>तुहुण्डमूर्द्धानमथो बिभेद ॥ ३६ | उसके बाद कलशके ध्वजवाले गणेशने प्रासद्वारा राहुके हृदयपर (भी) चोट कर दिया। घटोदरने गदासे तथा राक्षसोंके अधिपति सुकेशीने तलवारसे वार किया। उन चारोंद्वारा प्रहार किये जानेपर राहुने गणाधिपतिको छोड़ दिया। छूटते ही उन्होंने फरसेसे तुहुण्डके मस्तकको काट दिया॥ ३३–३६॥ |
| हते तुहुण्डे विमुखे च राहौ<br>गणेश्वराः क्रोधविषं मुमुक्षवः।<br>पञ्चैककालानलसन्निकाशा<br>विशन्ति सेनां दनुपुङ्गवानाम् ॥ ३७<br>तां वध्यमानां स्वचमूं समीक्ष्य<br>बलिर्बली मारुततुल्यवेगः।<br>गदां समाविध्य जघान मूर्ध्नि<br>विनायकं कुम्भतटे करे च ॥ ३८<br>कुण्डोदरं भग्नकटिं चकार<br>महोदरं शीर्णशिरःकपालम्।<br>कुम्भध्वजं चूर्णितसंधिबन्धं<br>घटोदरं चोरुविभिन्नसंधिम् ॥ ३९<br>गणाधिपांस्तान् विमुखान् स कृत्व<br>बलान्वितो वीरतरोऽसुरेन्द्रः।<br>समभ्यधावत् त्वरितो निहन्तुं<br>गणेश्वरान् स्कन्दविशाखमुख्यान् ॥ ४० | तुहुण्डके मारे जाने और राहुके पीठ दिखा देनेपर क्रोधरूपी विषको छोड़नेकी कामनावाले प्रलयकालकी अग्निके समान पाँचों गणेश्वर एक साथ दानवश्रेष्ठोंकी सेनामें पैठ गये। अपनी उस सेनाको मारी जाती हुई देखकर वायुके समान तीव्र गतिवाले बलशाली बलिने गदा लेकर विनायकके कुम्भस्थल, मस्तक एवं सूँडपर वार किया। कुण्डोदरकी कमर तोड़ दी, महोदरके सिरकी खोपड़ीको विधुन दिया, कुम्भध्वजके जोड़ोंको चूर-चूर कर डाला एवं घटोदरकी जाँघोंको तोड़ दिया। उन गणाधिपोंको पीछे भगाकर वीरश्रेष्ठ वह बलशाली असुरेन्द्र तुरंत स्कन्द, विशाख आदि मुख्य-मुख्य गणेश्वरोंको मारनेके लिये दौड़ पड़ा॥ ३७–४०॥ |
| तमापतन्तं भगवान् समीक्ष्य<br>महेश्वरः श्रेष्ठतमं गणानाम्।<br>शैलादिमामन्त्र्य वचो बभाषे<br>गच्छस्व दैत्यान् जहि वीर युद्धे ॥ ४१<br>इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन<br>वज्रं समादाय शिलादसूनुः।<br>बलिं समभ्येत्य जघान मूर्ध्नि<br>सम्मोहितः सोऽवनिमाससाद ॥ ४२<br>सम्मोहितं भ्रातृसुतं विदित्वा<br>बली कुजम्भो मुसलं प्रगृह्य।<br>सम्भ्रामयंस्तूर्णतरं स वेगात्<br>ससर्ज नन्दिं प्रति जातकोपः ॥ ४३<br>तमापतन्तं मुसलं प्रगृह्य<br>करेण तूर्णं भगवान् स नन्दी।<br>जघान तेनैव कुजम्भमाहवे<br>स प्राणहीनो निपपात भूमौ ॥ ४४ | भगवान् महेश्वरने उसे आते हुए देखकर गणोंमें सर्वश्रेष्ठ शैलादिको बुलाकर कहा—वीर! जाओ और संग्राममें दैत्योंको मारो। वृषभध्वजके ऐसा कहनेपर शिलादके पुत्र नन्दीने वज्र ले करके बलिके पास जाकर उसके सिरपर वार किया, जिससे वह अचेत होकर धरतीपर गिर पड़ा। अपने भतीजेको बेहोश जानकर बलवान् कुजम्भने क्रुद्ध हो मुसल लेकर उसे घुमाते हुए नन्दीकी ओर तेजीसे फेंका। भगवान् नन्दीने आते हुए उस मुसलको तुरंत हाथसे पकड़ लिया और उसीसे युद्धमें कुजम्भको मार दिया। वह प्राणहीन होकर भूमिपर गिर पड़ा॥ ४१–४४॥ |