भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३३१ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
हत्वा कुजम्भं मुसलेन नन्दी<br>वज्रेण वीरः शतशो जघान।<br>ते वध्यमाना गणनायकेन<br>दुर्योधनं वै शरणं प्रपन्नाः॥ ४५<br><br>दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन<br>वज्रप्रहारैर्निहतान् दितीशान्।<br>प्रासं समाविध्य तडित्प्रकाशं<br>नन्दिं प्रचिक्षेप हतोऽसि वै ब्रुवन्॥ ४६<br><br>तमापतन्तं कुलिशेन नन्दी<br>बिभेद गुह्यं पिशुनो यथा नरः।<br>तत्प्रासमालक्ष्य तदा निकृत्तं<br>संवर्त्य मुष्टिं गणमाससाद॥ ४७<br><br>ततोऽस्य नन्दी कुलिशेन तूर्णं<br>शिरोऽच्छिनत् तालफलप्रकाशम्।<br>हतोऽथ भूमौ निपपात वेगाद्<br>दैत्याश्च भीता विगता दिशो दश॥ ४८वीर नन्दीने कुजम्भको मुसलसे मारकर वज्रद्वारा सैकड़ों दानवोंको भी मार डाला। गणनायकद्वारा मारे जा रहे वे सभी दानव दुर्योधनकी शरणमें गये। दुर्योधनने गणाधिपद्वारा वज्रके आघातसे दैत्योंको मारा हुआ देखकर बिजलीके सदृश प्रकाशसे युक्त प्रास ले लिया तथा 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए उसे नन्दीकी ओर फेंका। नन्दीने आ रहे उस (प्रास)-को वज्रसे इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े काट दिया, जैसे चुगलखोर व्यक्ति गुप्त विषयका भेदन कर देता है। उसके बाद उस प्रासको विदीर्ण हुआ देख (दुर्योधन) मुट्ठी बाँधकर गण (नन्दी)-के पास पहुँचा। उसके बाद ही नन्दीने शीघ्रतासे तालके समान उसके मस्तकको कुलिशसे काट डाला। मारे जानेपर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा और भयभीत हुए सभी दैत्य तेजीसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥ ४५–४८॥
ततो हतं स्वं तनयं निरीक्ष्य<br>हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम।<br>प्रगृह्य बाणासनमुग्रवेगं<br>बिभेद बाणैर्यमदण्डकल्पैः॥ ४९<br><br>गणान् सनन्दीन् वृषभध्वजांस्तान्<br>धाराभिरेवाम्बुधरास्तु शैलान्।<br>ते छाद्यमानासुरबाणजालै-<br>र्विनायकाद्या बलिनोऽपि वीराः।<br>सिंहप्रणुन्ना वृषभा यथैव<br>भयातुरा दुद्रुविरे समन्तात्॥ ५०<br><br>पराङ्मुखान् वीक्ष्य गणान् कुमारः<br>शक्त्या पृषत्कानथ वारयित्वा।<br>तूर्णं समभ्येत्य रिपुं समीक्ष्य<br>प्रगृह्य शक्त्या हृदये बिभेद॥ ५१<br><br>शक्तिनिर्भिन्नहृदयो हस्ती भूम्यां पपात ह।<br>ममार चारिपृतना जाता भूयः पराङ्मुखी॥ ५२<br><br>अमरारिबलं दृष्ट्वा भग्नं क्रुद्धा गणेश्वराः।<br>पुरतो नन्दिनं कृत्वा जिघांसन्ति स्म दानवान्॥ ५३<br><br>ते वध्यमानाः प्रमथैर्दैत्याश्चापि पराङ्मुखाः।<br>भूयो निवृत्ता बलिनः कार्त्तस्वरपुरोगमाः॥ ५४हस्ती (नामक असुर) अपने पुत्रको मारा गया देखकर नन्दीके समीप आ गया। उसने धनुष लेकर तीव्र वेगसे यमदण्डके समान बाणोंसे वार किया। बादल जिस प्रकार जलकी धाराओंसे पर्वतोंको ढँक लेता है, उसी प्रकार उसने नन्दीके साथ वृषभध्वजके उन गणोंको ढँक दिया। असुरके बाणसमूहसे घिरे वे विनायक आदि बलशाली वीर सिंहके द्वारा आक्रमण किये जानेपर वृषभोकी भाँति भयसे व्याकुल होकर चारों ओर भागने लगे। कुमारने गणोंको विमुख होते देख शक्तिद्वारा बाणोंको रोक दिया और तुरन्त ही शत्रुके पास पहुँचकर शक्तिसे उसके हृदयको बेध डाला। शक्तिसे हृदयके बिंध जानेपर हस्ती भूमिपर गिर पड़ा तथा मर गया और शत्रुसेना फिर पीठ दिखाकर विमुख हो गयी। दैत्यसेनाको छिन्न-भिन्न हुई देखकर कुपित हुए गणेश्वर नन्दीको आगे कर दानवोंको और मारने लगे; किंतु प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे सभी विमुख बलशाली कार्त्तस्वरादि दैत्य फिर लौट पड़े॥ ४९–५४॥
तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन्।<br>नन्दिषेणो व्याघ्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान्॥ ५५उन्हें लौटकर आते देख वेगशाली व्याघ्रमुख नन्दिषेण भी क्रोधसे आँखें लाल कर हाँफता हुआ लौट