वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय ६८ ] | भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश | ३३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हत्वा कुजम्भं मुसलेन नन्दी<br>वज्रेण वीरः शतशो जघान।<br>ते वध्यमाना गणनायकेन<br>दुर्योधनं वै शरणं प्रपन्नाः॥ ४५<br><br>दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन<br>वज्रप्रहारैर्निहतान् दितीशान्।<br>प्रासं समाविध्य तडित्प्रकाशं<br>नन्दिं प्रचिक्षेप हतोऽसि वै ब्रुवन्॥ ४६<br><br>तमापतन्तं कुलिशेन नन्दी<br>बिभेद गुह्यं पिशुनो यथा नरः।<br>तत्प्रासमालक्ष्य तदा निकृत्तं<br>संवर्त्य मुष्टिं गणमाससाद॥ ४७<br><br>ततोऽस्य नन्दी कुलिशेन तूर्णं<br>शिरोऽच्छिनत् तालफलप्रकाशम्।<br>हतोऽथ भूमौ निपपात वेगाद्<br>दैत्याश्च भीता विगता दिशो दश॥ ४८ | वीर नन्दीने कुजम्भको मुसलसे मारकर वज्रद्वारा सैकड़ों दानवोंको भी मार डाला। गणनायकद्वारा मारे जा रहे वे सभी दानव दुर्योधनकी शरणमें गये। दुर्योधनने गणाधिपद्वारा वज्रके आघातसे दैत्योंको मारा हुआ देखकर बिजलीके सदृश प्रकाशसे युक्त प्रास ले लिया तथा 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुए उसे नन्दीकी ओर फेंका। नन्दीने आ रहे उस (प्रास)-को वज्रसे इस प्रकार टुकड़े-टुकड़े काट दिया, जैसे चुगलखोर व्यक्ति गुप्त विषयका भेदन कर देता है। उसके बाद उस प्रासको विदीर्ण हुआ देख (दुर्योधन) मुट्ठी बाँधकर गण (नन्दी)-के पास पहुँचा। उसके बाद ही नन्दीने शीघ्रतासे तालके समान उसके मस्तकको कुलिशसे काट डाला। मारे जानेपर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा और भयभीत हुए सभी दैत्य तेजीसे दसों दिशाओंमें भाग गये॥ ४५–४८॥ |
| ततो हतं स्वं तनयं निरीक्ष्य<br>हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम।<br>प्रगृह्य बाणासनमुग्रवेगं<br>बिभेद बाणैर्यमदण्डकल्पैः॥ ४९<br><br>गणान् सनन्दीन् वृषभध्वजांस्तान्<br>धाराभिरेवाम्बुधरास्तु शैलान्।<br>ते छाद्यमानासुरबाणजालै-<br>र्विनायकाद्या बलिनोऽपि वीराः।<br>सिंहप्रणुन्ना वृषभा यथैव<br>भयातुरा दुद्रुविरे समन्तात्॥ ५०<br><br>पराङ्मुखान् वीक्ष्य गणान् कुमारः<br>शक्त्या पृषत्कानथ वारयित्वा।<br>तूर्णं समभ्येत्य रिपुं समीक्ष्य<br>प्रगृह्य शक्त्या हृदये बिभेद॥ ५१<br><br>शक्तिनिर्भिन्नहृदयो हस्ती भूम्यां पपात ह।<br>ममार चारिपृतना जाता भूयः पराङ्मुखी॥ ५२<br><br>अमरारिबलं दृष्ट्वा भग्नं क्रुद्धा गणेश्वराः।<br>पुरतो नन्दिनं कृत्वा जिघांसन्ति स्म दानवान्॥ ५३<br><br>ते वध्यमानाः प्रमथैर्दैत्याश्चापि पराङ्मुखाः।<br>भूयो निवृत्ता बलिनः कार्त्तस्वरपुरोगमाः॥ ५४ | हस्ती (नामक असुर) अपने पुत्रको मारा गया देखकर नन्दीके समीप आ गया। उसने धनुष लेकर तीव्र वेगसे यमदण्डके समान बाणोंसे वार किया। बादल जिस प्रकार जलकी धाराओंसे पर्वतोंको ढँक लेता है, उसी प्रकार उसने नन्दीके साथ वृषभध्वजके उन गणोंको ढँक दिया। असुरके बाणसमूहसे घिरे वे विनायक आदि बलशाली वीर सिंहके द्वारा आक्रमण किये जानेपर वृषभोकी भाँति भयसे व्याकुल होकर चारों ओर भागने लगे। कुमारने गणोंको विमुख होते देख शक्तिद्वारा बाणोंको रोक दिया और तुरन्त ही शत्रुके पास पहुँचकर शक्तिसे उसके हृदयको बेध डाला। शक्तिसे हृदयके बिंध जानेपर हस्ती भूमिपर गिर पड़ा तथा मर गया और शत्रुसेना फिर पीठ दिखाकर विमुख हो गयी। दैत्यसेनाको छिन्न-भिन्न हुई देखकर कुपित हुए गणेश्वर नन्दीको आगे कर दानवोंको और मारने लगे; किंतु प्रमथोंद्वारा मारे जा रहे वे सभी विमुख बलशाली कार्त्तस्वरादि दैत्य फिर लौट पड़े॥ ४९–५४॥ |
| तान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन्।<br>नन्दिषेणो व्याघ्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान्॥ ५५ | उन्हें लौटकर आते देख वेगशाली व्याघ्रमुख नन्दिषेण भी क्रोधसे आँखें लाल कर हाँफता हुआ लौट |
| ३३२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६८ |
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| तस्मिन् निवृत्ते गणपे पट्टिशाग्रकरे तदा।<br>कार्त्तस्वरो निववृते गदामादाय नारद॥ ५६<br>तमापतन्तं ज्वलनप्रकाशं<br>गणः समीक्ष्यैव महासुरेन्द्रम्।<br>तं पट्टिशं भ्राम्य जघान मूर्ध्नि<br>कार्त्तस्वरं विस्वरमुन्नदन्तम्॥ ५७<br>तस्मिन् हते भ्रातरि मातुलेये<br>पाशं समाविध्य तुरङ्गकन्धरः।<br>बबन्ध वीरः सह पट्टिशेन<br>गणेश्वरं चाप्यथ नन्दिषेणम्॥ ५८<br>नन्दिषेणं तथा बद्धं समीक्ष्य बलिनां वरः।<br>विशाखः कुपितोऽभ्येत्य शक्तिपाणिरवस्थितः॥ ५९<br>तं दृष्ट्वा बलिनां श्रेष्ठः पाशपाणिरयःशिराः।<br>संयोधयामास बली विशाखं कुक्कुटध्वजम्॥ ६० | पड़ा। नारदजी! उसके बाद हाथके अग्रभागमें पट्टिश लिये हुए उस गणाधिपके लौटनेपर कार्त्तस्वर भी गदा लेकर लौट पड़ा। अग्निके समान प्रकाशवाले उस महासुरेन्द्रको आते देखकर गणपतिने पट्टिश घुमाकर उसके मस्तकपर मारा। कार्त्तस्वर चीत्कार करता हुआ मर गया। उस ममेरे भाईके मारे जानेपर वीर तुरङ्गकन्धरने पाशको लेकर पट्टिशके सहित नन्दिषेण गणेश्वरको बाँध लिया। नन्दिषेणको बँधा देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ विशाख क्रुद्ध होकर उसके पास गये और हाथमें शक्ति लिये हुए (उसके सामने) खड़े हो गये। उन्हें देखकर बलवानोंमें श्रेष्ठ अयःशिरा हाथमें पाश लेकर कुक्कुटध्वज विशाखके साथ संग्राम करने लगा॥ ५५—६०॥ | | विशाखं संनिरुद्धं वै दृष्ट्वायःशिरसा रणे।<br>शाखश्च नैगमेयश्च तूर्णमाद्रवतां रिपुम्॥ ६१<br>एकतो नैगमेयेन भिन्नः शक्त्या त्वयःशिराः।<br>एकतश्चैव शाखेन विशाखप्रियकाम्यया॥ ६२<br>स त्रिभिः शङ्करसुतैः पीड्यमानो जहौ रणम्।<br>ते प्राप्ताः शम्बरं तूर्णं प्रेक्ष्यमाणा गणेश्वराः॥ ६३<br>पाशं शक्त्या समाहत्य चतुर्भिः शङ्करात्मजैः।<br>जगाम विलयं तूर्णमाकाशादिव भूतलम्॥ ६४<br>पाशे निराशातां याते शम्बरः कातरेक्षणः।<br>दिशोऽथ भेजे देवर्षे कुमारः सैन्यमर्दयत्॥ ६५<br>तैर्वध्यमाना पृतना महर्षे<br>सा दानवी रुद्रसुतैर्गणैश्च।<br>विषण्णरूपा भयविह्वलाङ्गी<br>जगाम शुक्रं शरणं भयार्ता॥ ६६ | विशाखको अयःशिराके द्वारा युद्धमें घिरा हुआ देखकर शाख तथा नैगमेय नामके गण शीघ्रतासे शत्रुको ओर दौड़ पड़े। विशाखको प्रसन्न करनेकी इच्छासे एक ओरसे नैगमेयेने और दूसरी ओरसे शाखने शक्तिद्वारा अयःशिराको मारा। शंकरके तीनों पुत्रोंद्वारा ग्रस्त होनेपर उस अयःशिराने युद्ध छोड़ दिया। वे गणेश्वर शम्बरको देखकर शीघ्र ही उसके समीप पहुँचे। शम्बरने पाशको घुमाकर उनपर चलाया। शंकरके चार पुत्रोंने पाशपर वार किया, (इससे वह पाश) आकाशसे भूमिपर गिरकर नष्ट हो गया। पाशके नष्ट हो जानेपर भयभीत होकर शम्बर (इधर-उधर) दिशाओंमें भाग गया और कुमार सेनाको रौंदने लगे। महर्षे! उन रुद्र-पुत्रों एवं गणोंद्वारा मारी जा रही वह दानवी सेना दुःखी एवं भयसे व्याकुल होकर शुक्रकी शरणमें गयी॥ ६१—६६॥ |
<div align="center">॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अड़सठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६८॥
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अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश [ ३३३
उनहत्तरवाँ अध्याय
शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि-दानव-युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ-देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव-वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य-देव और इन्द्र-जम्भ-युद्ध, मातलिक जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ-कुजम्भ-वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः स्वसैन्यमालक्ष्य निहतं प्रमथैरथ।<br>अन्धकोऽभ्येत्य शुक्रं तु इदं वचनमब्रवीत्॥ १<br>भगवंस्त्वां समाश्रित्य वयं बाधाम देवताः।<br>अथान्यानपि विप्रर्षे गन्धर्वासुरकिन्नरान्॥ २<br>तदियं पश्य भगवन् मया गुप्ता वरूथिनी।<br>अनाथेव यथा नारी प्रमथैरपि काल्यते॥ ३<br>कुजम्भाद्याश्च निहता भ्रातरो मम भार्गव।<br>अक्षयाः प्रमथाश्चामी कुरुक्षेत्रफलं यथा॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) उसके बाद अन्धकने अपनी सेनाको प्रमथोंद्वारा मारी गयी जान करके शुक्राचार्यके निकट जाकर यह वचन कहा—'भगवन्! विप्रर्षे! हम आपके ही बलपर देवता, गन्धर्व, असुर, किन्नर एवं अन्य प्राणियोंको बाधित (पराभूत) करते हैं। परंतु भगवन्! आप देखिये कि मेरे द्वारा संरक्षित (हमारी) यह सेना अनाथिनी नारी-सी होकर प्रमथोंद्वारा कालके मुखमें भेजी जा रही है। भार्गव! कुजम्भ आदि मेरे भाई तो मारे गये और ये प्रमथगण (अब तक) कुरुक्षेत्रतीर्थके फलके सदृश अक्षय बने हुए हैं॥ १—४॥ |
| तस्मात् कुरुष्व श्रेयो नो न जयेम यथा परैः।<br>जयेम च परान् युद्धे तथा त्वं कर्तुमर्हसि॥ ५<br>शुक्रोऽन्धकवचः श्रुत्वा सान्त्वयन् परमाद्भुतम्।<br>वचनं प्राह देवर्षे ब्रह्मर्षिर्दानवेश्वरम्।<br>त्वद्धितार्थं यतिष्यामि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ६<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं विद्यां संजीवनीं कविः।<br>आवर्तयामास तदा विधानेन शुचिव्रतः॥ ७<br>तस्यामावर्त्यमानायां विद्यायामसुरेश्वराः।<br>ये हताः प्रथमं युद्धे दानवास्ते समुत्थिताः॥ ८ | अतः आप हमलोगोंके लिये कल्याणका विधान करें, जिससे हमलोग शत्रुओंके द्वारा जीते न जायें और ऐसा भी उपाय करें जिससे हमलोग युद्धमें दूसरोंको जीत सकें। देवर्षे! ब्रह्मर्षि शुक्राचार्यने अन्धककी बातको सुनकर दानवेश्वरको आश्वासन देते हुए उससे कहा—मैं तुम्हारे कल्याणके लिये उद्योग करूँगा और तुम्हारा प्रिय करूँगा। ऐसा कहकर पवित्र व्रतवाले शुक्राचार्यने विधानके अनुसार संजीवनी विद्याको प्रकट किया। उस विद्याके प्रकट होनेपर युद्धमें पहले मारे गये (सभी) असुरेश्वर और दानव जी उठे॥ ५—८॥ |
| कुजम्भादिषु दैत्येषु भूय एवोत्थितेष्वथ।<br>युद्धायाभ्यागतेष्वेव नन्दी शङ्करमब्रवीत्॥ ९<br>महादेव वचो मह्यं शृणु त्वं परमाद्भुतम्।<br>अविचिन्त्यमसह्यं च मृतानां जीवनं पुनः॥ १०<br>ये हताः प्रमथैर्दैत्या यथाशक्त्या रणाजिरे।<br>ते समुज्जीविता भूयो भार्गवेणाथ विद्यया॥ ११<br>तदिदं तैर्महादेव महत्कर्मकृतं रणे।<br>संजातं स्वल्पमेवेश शुक्रविद्याबलाश्रयात्॥ १२ | उसके बाद कुजम्भ आदि दैत्योंके फिर उठ खड़े होने तथा युद्ध करनेके लिये उपस्थित होनेपर नन्दीने शंकरसे कहा—महादेव! आप मेरा अत्यन्त अद्भुत वचन सुनिये। मरे हुए लोगोंका फिर भी जी उठना कल्पनासे परे तथा असहनीय है। संग्राममें प्रमथोंने जिन दैत्योंको बलपूर्वक मारा था, उन्हें भार्गवने संजीवनी विद्याद्वारा पुनः जीवित कर दिया। अतः हे महादेव! हे ईश! उन सभीने युद्धमें जो उत्कृष्ट कार्य किया था, वह शुक्रकी विद्याके बलसे महत्त्वहीन हो गया है—सबपर पानी फिर गया है॥ ९—१२॥ |
| ३३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| इत्येवमुक्ते वचने नन्दिना कुलनन्दिना।<br>प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थसाधनमुत्तमम्॥ १३<br>गच्छ शुक्रं गणपते ममान्तिकमुपानय।<br>अहं तं संयमिष्यामि यथायोगं समेत्य हि॥ १४<br>इत्येवमुक्तो रुद्रेण नन्दी गणपतिस्ततः।<br>समाजगाम दैत्यानां चमूं शुक्रजिघृक्षया॥ १५<br>तं ददर्शासुरश्रेष्ठो बलवान् हयकन्धरः।<br>संरुरोध तदा मार्गं सिंहस्येव पशुर्वने॥ १६<br>समुपेत्याहनन्नन्दी वज्रेण शतपर्वणा।<br>स पपाताथ निःसंज्ञो ययौ नन्दी ततस्त्वरन्॥ १७ | कुलको आनन्द देनेवाले नन्दीके इस प्रकार कहनेपर महादेवने स्नेहपूर्वक स्वार्थसिद्ध करनेवाला उत्तम वचन कहा—गणपते! तुम जाओ और शुक्रको मेरे समीप लिवा लाओ। (फिर तो) मैं उन्हें पाकर योगक्रियासे संयमित कर दूँगा। रुद्रके ऐसा कहनेपर गणपति नन्दी शुक्राचार्यको पकड़ लानेकी कामनासे दैत्योंकी सेनामें गये। हयकन्धर नामके बलवान् श्रेष्ठ असुरने उन्हें सेनामें आते हुए देखा और जिस प्रकार साधारण पशु (दुस्साहससे) वनमें सिंहका मार्ग रोक दे, उसी प्रकार उनके मार्गको उसने रोका। नन्दीने समीप जाकर शतपर्व (वज्र)-से उसे मारा और वह अचेत होकर गिर पड़ा। उसके बाद नन्दी तुरंत वहाँसे चल दिये॥ १३—१७॥ | | ततः कुजम्भो जम्भश्च बलो वृत्रस्त्वयःशिराः।<br>पञ्च दानवशार्दूला नन्दिनं समुपाद्रवन्॥ १८<br>तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयह्लादपुरोगमाः।<br>नानाप्रहरणा युद्धे गणनाथमभिद्रवन्॥ १९<br>ततो गणनामाधिपं कुट्यमानं महाबलैः।<br>समपश्यन्त देवास्तं पितामहपुरोगमाः॥ २०<br>तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा प्राह शक्रपुरोगमान्।<br>साहाय्यं क्रियतां शम्भोरेतदन्तरमुत्तमम्॥ २१ | उसके बाद कुजम्भ, जम्भ, बल, वृत्र और अयःशिरा नामके पाँच श्रेष्ठ दानव नन्दीकी ओर दौड़े। इसी प्रकार युद्धमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवाले मय एवं ह्लाद आदि दानवश्रेष्ठोंने भी नन्दीका पीछा किया। फिर पितामहादि देवोंने महाबली दानवोंके द्वारा कूटे जा रहे गणाधिपको देखा। भगवान् ब्रह्माने उसे देखकर इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—आपलोग इस उत्तम (उपयुक्त) अवसरपर शम्भुकी सहायता करें॥ १८—२१॥ | | पितामहोक्तं वचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात्॥ २२<br>तेषामापततां वेगः प्रमथानां बले बभौ।<br>आपगानां महावेगं पतन्तीनां महार्णवे॥ २३<br>ततो हलहलाशब्दः समजायत चोभयोः।<br>बलयोर्घोरसंकाशो सुरप्रमथयोरथ॥ २४<br>तमन्तरमुपागम्य नन्दी संगृह्य वेगवान्।<br>रथाद् भार्गवमाक्रामत् सिंहः क्षुद्रं मृगं यथा॥ २५<br>तमादाय हराभ्याशमागमद् गणनायकः।<br>निपात्य रक्षिणः सर्वानथ शुक्रं न्यवेदयत्॥ २६<br>तमानीतं कविं शर्वः प्राक्षिपद् वदने प्रभुः।<br>भार्गवं त्वावृततनुं जठरे स न्यवेशयत्॥ २७<br>स शम्भुना कविश्रेष्ठो ग्रस्तो जठरमास्थितः।<br>तुष्टाव भगवन्तं तं मुनिर्वाग्भिरथादरात्॥ २८ | पितामहके कहे हुए वचनको सुनकर इन्द्र आदि देवता आकाशमार्गसे जल्दी ही शिवकी सेनामें आ गये। समुद्रमें जाती हुई नदियोंके महावेगके सदृश प्रमथोंकी सेनामें (आकाशसे) आते हुए देवताओंका वेग सुशोभित हुआ। उसके बाद प्रमथों और असुरों—दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें भीषण ‘हलहला’ शब्द उत्पन्न हुआ। उसी समय अवसर पाकर तीव्र गतिवाले नन्दी, जिस प्रकार सिंह क्षुद्र मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार भार्गवको लेकर रथसे भाग चले। गणनायक उन्हें लेकर सभी रक्षा करनेवालोंको मारते हुए शंकरके पास पहुँच गये। शुक्राचार्यको उन्होंने उनके निकट निवेदित कर दिया। समर्थ शंकरने लाये गये उन शुक्रको अपने मुखमें फेंका और अक्षुण्ण शरीरवाले भार्गवको अपने उदरमें (ज्यों-का-त्यों) रख लिया। शम्भुसे ग्रस्त होकर उनके उदरमें स्थित हुए वे मुनिश्रेष्ठ शुक्र प्रेमपूर्वक उन भगवान्की स्तुति करने लगे॥ २२—२८॥ |
७०- अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व, देवादिकोंका भेजना, अर्द्धकुसुमसे पार्वतीका प्राकट्य और अन्धकद्वारा उनकी स्तुति
| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३५ |
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| शुक्र उवाच<br>वरदाय नमस्तुभ्यं हराय गुणशालिने।<br>शङ्कराय महेशाय त्र्यम्बकाय नमो नमः॥ २९<br>जीवनाय नमस्तुभ्यं लोकनाथ वृषाकपे।<br>मदनाग्ने कालशत्रो वामदेवाय ते नमः॥ ३०<br>स्थाणवे विश्वरूपाय वामनाय सदागते।<br>महादेवाय शर्वाय ईश्वराय नमो नमः॥ ३१<br>त्रिनयन हर भव शङ्कर उमापते जीमूतकेतो<br>गुहागृहश्मशाननिरत भूतिविलेपन शूलपाणे पशुपते<br>गोपते तत्पुरुषसत्तम नमो नमस्ते।<br>इत्थं स्तुतः कविवरेण हरोऽथ भक्त्या<br>प्रीतो वरं वरय दद्मि तवेत्युवाच।<br>स प्राह देववर देहि वरं ममाद्य<br>यद्वै तवैव जठरात् प्रतिनिर्गमोऽस्तु ॥ ३२<br>ततो हरोऽक्षीणि तदा निरुध्य<br>प्राह द्विजेन्द्राद्य विनिर्गमस्व।<br>इत्युक्तमात्रो विभुना चचार<br>देवोदरे भार्गवपुङ्गवस्तु ॥ ३३ | शुक्रने कहा— प्रभो ! गुणसे सम्पन्न आप वरदानी हरको नमस्कार है। शंकर, महेश, त्रिनेत्रको बार-बार नमस्कार है। लोकोंके स्वामिन् ! वृषाकपे ! आप जीवनस्वरूपको नमस्कार है। हे कामदेवके लिये अग्निस্বরূপ ! कालशत्रो ! आप वामदेवको नमस्कार है। स्थाणु, विश्वरूप, वामन, सदागति, महादेव, शर्व और ईश्वर ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे त्रिनयन ! हे हर ! हे भव ! हे शङ्कर ! हे उमापते ! हे जीमूतकेतो ! हे गुहागृह ! हे श्मशाननिरत ! हे भूतिविलेपन ! हे शूलपाणे ! हे पशुपते ! हे गोपते ! हे श्रेष्ठ परमपुरुष ! आपको बार-बार नमस्कार है। इस प्रकार कविवर (शुक्राचार्य)-के भक्तिपूर्वक स्तुति करनेपर शंकरने कहा—मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम वर माँगो; मैं तुम्हें वर दूँगा। उन्होंने कहा—हे देववर ! इस समय मुझे यही वर दीजिये कि मैं पुनः आपके उदरसे बाहर निकलूँ। उसके बाद शंकरने नेत्रोंको बंदकर कहा—हे द्विजेन्द्र ! अब तुम बाहर निकल जाओ ! (परंतु) शंकरके इस प्रकार कहनेपर भी वे भार्गवश्रेष्ठ शुक्राचार्य उनके उदरमें विचरण करने लगे ॥ २९—३३ ॥ |
| परिभ्रमन् ददर्शाथ शम्भोरेवोदरे कविः।<br>भुवनार्णवपातालान् वृतान् स्थावरजङ्गमैः ॥ ३४<br>आदित्यान् वसवो रुद्रान् विश्वेदेवान् गणांस्तथा।<br>यक्षान् किंपुरुषाद्यादीन् गन्धर्वाप्सरसां गणान् ॥ ३५<br>मुनीन् मनुजसाध्यांश्च पशुकीटपिपीलिकान्।<br>वृक्षगुल्मान् गिरीन् वल्ल्यः फलमूलौषधानि च॥ ३६<br>स्थलस्थांश्च जलस्थांश्चानिनिमिषान्निमिषानपि।<br>चतुष्पदान् सद्विपदान् स्थावराञ् जङ्गमानपि ॥ ३७<br>अव्यक्तांश्चैव व्यक्तांश्च सगुणान्निर्गुणानपि।<br>स दृष्ट्वा कौतुकाविष्टः परिबभ्राम भार्गवः।<br>तत्रासतो भार्गवस्य दिव्यः संवत्सरो गतः ॥ ३८<br>न चान्तमलभद् ब्रह्मंस्ततः श्रान्तोऽभवत् कविः।<br>स श्रान्तं वीक्ष्य चात्मानं नालभन्निर्गमं वशी।<br>भक्तिनम्रो महादेवं शरणं समुपागमत् ॥ ३९ | (भगवान् शंकरके उदरमें) विचरण करते हुए शुक्राचार्यने शंकरके ही उदरमें चराचर प्राणियोंसे व्याप्त सारा जगत्, समुद्र एवं पातालोंको देखा। आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, गणों, यक्षों, किम्पुरुषों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मुनियों, मनुष्यों, साध्यों, पशुओं, कीटों, पिपीलिकाओं, वृक्षों, गुल्मों, पर्वतों, लताओं, फलों, मूलों, ओषधियों, स्थलपर रहनेवालों, जलमें रहनेवालों, अनिमिषों, निमिषों, चतुष्पदों, द्विपदों, स्थावरों, जङ्गमों, अव्यक्तों, व्यक्तों, सगुणों एवं निर्गुणोंको देखते हुए कुतूहलवश (उसी उदरमें ही) भार्गव चारों ओर घूमने लगे। भृगुवंशी शुक्राचार्यको वहाँ इस प्रकार रहते हुए एक दिव्य वर्ष बीत गया। परंतु ब्रह्मन्! शुक्रको अन्त नहीं मिला और वे थक गये। स्वयंको थका हुआ देखकर और बाहर निकलनेका मार्ग न पाकर आत्माको वशमें करनेवाले वे भक्तिसे नम्र होकर महादेवकी शरणमें आ गये॥ ३४—३९॥ |
| ३३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
|---|
| शुक्र उवाच<br>विश्वरूप महारूप विश्वरूपाक्षसूत्रधृक्।<br>सहस्राक्ष महादेव त्वामहं शरणं गतः॥ ४०<br>नमोऽस्तु ते शङ्कर शर्व शम्भो<br>सहस्रनेत्राङ्घ्रिभुजङ्गभूषण ।<br>दृष्ट्वैव सर्वान् भुवनांस्तवोदरे<br>श्रान्तो भवन्तं शरणं प्रपन्नः॥ ४१<br>इत्येवमुक्ते वचने महात्मा<br>शम्भुर्वचः प्राह ततो विहस्य।<br>निर्गच्छ पुत्रोऽसि ममाधुना त्वं<br>शिश्नेन भो भार्गववंशचन्द्र॥ ४२<br>नाम्ना तु शुक्रेति चराचरास्त्वां<br>स्तोष्यन्ति नैवात्र विचारमन्यत्।<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् मुमोच<br>शिश्नेन शुक्रं स च निर्जगाम॥ ४३<br>विनिर्गतो भार्गववंशचन्द्रः<br>शुक्रत्वमापद्य महानुभावः।<br>प्रणम्य शम्भुं स जगाम तूर्णं<br>महासुराणां बलमुत्तमौजाः॥ ४४ | शुक्रने कहा— हे विश्वरूप! हे महारूप! हे विश्वरूपाक्ष! हे सूत्रधारिन्! हे सहस्राक्ष! हे महादेव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शङ्कर! हे शर्व! हे शम्भो! हे सहस्रनेत्राङ्घ्रि! हे भुजङ्गभूषण! आपके उदरमें सभी भुवनोंको देखते-देखते थककर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकारके वचन कहनेपर महात्मा शम्भुने हँसकर यह वचन कहा—अब तुम मेरे पुत्र हो गये हो। इसलिये हे भार्गववंशके चन्द्र! मेरे शिश्नसे बाहर निकलो। अब समस्त चराचर जगत् तुम्हारी स्तुति शुक्रके नामसे करेगा। इसमें किसी अन्य प्रकारके विचारका स्थान नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्ने शिश्न-मार्गसे शुक्रको मुक्त कर दिया और वे बाहर निकल आये। शुक्रत्व प्राप्तकर बाहर निकले ओजस्वी महानुभाव भार्गववंशचन्द्र शम्भुको प्रणामकर शीघ्र महासुरोंकी सेनामें चले गये॥ ४०—४४॥ | | भार्गवे पुनरायाते दानवा मुदिताभवन्।<br>पुनर्युद्धाय विदधुर्मतिं सह गणेश्वरैः॥ ४५<br>गणेश्वरास्तानसुरान् सहामरगणैरथ।<br>युयुधुः संकुलं युद्धं सर्व एव जयेप्सवः॥ ४६<br>ततोऽसुरगणानां च देवतानां च युध्यताम्।<br>द्वन्द्वयुद्धं समभवद् घोररूपं तपोधन॥ ४७<br>अन्धको नन्दिनं युद्धे शङ्कुकर्णं त्वयःशिराः।<br>कुम्भध्वजं बलिर्धीमान् नन्दिषेणं विरोचनः॥ ४८ | शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर दानव प्रसन्न हो गये। उन्होंने गणेश्वरोंके साथ फिर युद्ध करनेका विचार किया। उसके बाद देवताओंसहित विजयकी कामनावाले सभी गणेश्वरोंने उन असुरोंसे भयंकर युद्ध किया। हे तपोधन! उसके बाद युद्ध करनेमें लगे हुए असुरगणों एवं देवताओंमें भयानक द्वन्द्वयुद्ध हुआ। अन्धक नन्दीके साथ, अयःशिरा शंकुकर्णके साथ, बुद्धिमान् बलि कुम्भध्वजके साथ एवं विरोचन नन्दिषेणके साथ भिड़ गये॥ ४५—४८॥ | | अश्वग्रीवो विशाखं च शाखो वृत्रमयोधयत्।<br>बाणस्तथा नैगमेयं बलं राक्षसपुङ्गवः॥ ४९<br>विनायको महावीर्यः परश्वधधरो रणे।<br>संक्रुद्धो राक्षसश्रेष्ठं तुहुण्डं समयोधयत्।<br>दुर्योधनश्च बलिनं घण्टाकर्णमयोधयत्॥ ५०<br>हस्ती च कुण्डजठरं ह्रादो वीरं घटोदरम्।<br>एते हि बलिनां श्रेष्ठा दानवाः प्रमथास्तथा।<br>संयोधयन्ति देवर्षे दिव्याब्दानां शतानि षट्॥ ५१<br>शतक्रतुमथायान्तं वज्रपाणिमभिस्थितम्।<br>वारयामास बलवाञ् जम्भो नाम महासुरः॥ ५२ | अश्वग्रीव विशाखके साथ और शाख वृत्रके साथ, बाण नैगमेयके साथ और राक्षसपुंगव बलके साथ लड़ने लगा। युद्धमें कुपित होकर परशु धारण करनेवाले महापराक्रमी विनायक राक्षसश्रेष्ठ तुहुण्डके साथ भिड़ गये और दुर्योधन बलशाली घण्टाकर्णके साथ युद्ध करने लगा। हस्ती कुण्डजठरके साथ और ह्राद वीर घटोदरसे लड़ने लगा। देवर्षे! बलवानोंमें श्रेष्ठ ये सभी दानव एवं प्रमथगण आपसमें छः सौ दिव्य वर्षोंतक संग्राम करते रहे। जम्भ नामके बलशाली असुरने सामने आ रहे वज्रपाणि इन्द्रको रोक लिया॥ ४९—५२॥ |
अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३७
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| शम्भुनामाऽसुरपतिः स ब्रह्माणमयोधयत्।<br>महौजसं कुजम्भश्च विष्णुं दैत्यान्तकारिणम्॥ ५३<br>विवस्वन्तं रणे शाल्वो वरुणं त्रिशिरास्तथा।<br>द्विमूर्धा पवनं सोमं राहुर्मित्रं विरूपधृक्॥ ५४<br>अष्टौ ये वसवः ख्याता धराद्यास्ते महासुरान्।<br>अष्टावेव महेष्वासान् वारयामासुराहवे॥ ५५<br>सरभः शलभः पाकः पुरोऽथ विपृथुः पृथुः।<br>वातापी चेल्वलश्चैव नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः॥ ५६<br>विश्वेदेवगणान् सर्वान् विष्वक्सेनपुरोगमान्।<br>एक एव रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः॥ ५७ | शम्भु नामका असुरराज ब्रह्मासे लड़ने लगा और कुजम्भ दैत्योंका अन्त करनेवाले महान् ओजस्वी विष्णुसे युद्ध करने लगा। शाल्व सूर्यसे, त्रिशिरा वरुणसे, द्विमूर्धा पवनसे, राहु सोमसे और विरूपधृक् मित्रसे लड़ने लगा। धरादि नामसे विख्यात आठ वसुओंने सरभ, शलभ, पाक, पुर, विपृथु, पृथु, वातापी और इल्वल—इन आठ महान् धनुर्धारी असुरोंको युद्धमें लड़कर (पीछे) हटा दिया। ये असुर भाँति-भाँतिके शस्त्र और अस्त्र लेकर लड़ने लगे। कालनेमि नामका भयंकर महासुर युद्धमें अकेला ही विष्वक्सेन आदि विश्वेदेव गणोंसे युद्ध करने लगा॥ ५३—५७॥ |
| एकादशैव ये रुद्रास्तानेकोऽपि रणोत्कटः।<br>योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः॥ ५८<br>द्वावश्विनौ च नरको भास्करानेव शम्बरः।<br>साध्यान् मरुद्गणांश्चैव निवातकवचादयः॥ ५९<br>एवं द्वन्द्वसहस्त्राणि प्रमथामरदानवैः।<br>कृतानि च सुराब्दानां दशतीः षण्महामुने॥ ६०<br>यदा न शकिता योद्धुं दैवतैरमरारयः।<br>तदा मायां समाश्रित्य ग्रसन्तः क्रमशोडव्ययान्॥ ६१ | रणमें उत्कट तेजवाले विद्युन्माली नामके महासुरने अकेले ही एकादश रुद्रोंका (डटकर) सामना किया। नरकने दोनों अश्विनीकुमारोंसे, शम्बरने (द्वादश) भास्करोंसे एवं निवातकवचादिने साध्यों तथा मरुद्गणोंसे युद्ध किया। महामुने! इस प्रकार आठ दिव्य वर्षोंतक प्रमथों एवं दानवोंके हजारोंकी संख्यामें दो-दो लड़ाके वीर आपसमें द्वन्द्वयुद्ध करते रहे। जब असुरगण इस प्रकार देवोंसे युद्ध करनेमें समर्थहीन हो गये, तब उन लोगोंने मायाका सहारा लेकर देवोंको क्रमशः निगलना प्रारम्भ कर दिया॥ ५८—६१॥ |
| ततोऽभवच्छैलपृष्ठं प्रावृडभ्रसमप्रभैः।<br>आवृतं वर्जितं सर्वैः प्रमथैरमरैरपि॥ ६२<br>दृष्ट्वा शून्यं गिरिप्रस्थं ग्रस्तांश्च प्रमथामरान्।<br>क्रोधादुत्पादयामास रुद्रो जृम्भायिकां वशी॥ ६३<br>तया स्पृष्टा दनुसुता अलसा मन्दभाषिणः।<br>वदनं विकृतं कृत्वा मुक्तशस्त्रं विजृम्भिरे॥ ६४<br>जृम्भमाणेषु च तदा दानवेषु गणेश्वराः।<br>सुराश्च निर्ययुस्तूर्णं दैत्यदेहेभ्य आकुलाः॥ ६५ | उसके बाद सारे प्रमथों और देवोंसे रहित पर्वत वर्षाकालीन मेघके समान दानवोंसे ढक गया। पर्वतप्रान्तको शून्य और प्रमथों तथा देवोंको ग्रसित हुआ देखकर विजितेन्द्रिय रुद्रने क्रोधसे जृम्भायिकाको उत्पन्न किया। उसके स्पर्श करनेपर अस्त्रोंको छोड़कर धीरे-धीरे बोलते हुए आलस्यसे पूर्ण दानव मुखको विवर्ण बनाकर जँभाई लेने लगे। दानवोंके जँभाई लेते समय आकुल होकर गणेश्वर एवं देवतालोग दैत्योंकी देहसे अविलम्ब बाहर निकल गये॥ ६२—६५॥ |
| मेघप्रभेभ्यो दैत्येभ्यो निर्गच्छन्तोऽमरोत्तमाः।<br>शोभन्ते पद्मपत्राक्षा मेघेभ्य इव विद्युततः॥ ६६<br>गणामरेषु च समं निर्गतेषु तपोधन।<br>अयुध्यन्त महात्मानो भूय एवातिकोपिताः॥ ६७ | मेघके समान दैत्योंके शरीरसे बाहर निकल रहे कमलके सदृश आँखोंवाले श्रेष्ठ देवगण बादलसे निकलनेवाली बिजलीकी भाँति शोभित हो रहे थे। तपोधन! गणों और देवोंके बाहर आ जानेपर वे महान् (दैत्य) |
| ३३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततस्तु देवैः सगणैः दानवाः शर्वपालितैः ।<br>पराजीयन्त संग्रामे भूयो भूयस्त्वहर्निशम् ॥ ६८<br><br>ततस्त्रिनेत्रः स्वां संध्यां सप्ताब्दशतिके गते ।<br>कालेऽभ्युपासत तदा सोऽष्टादशभुजोऽव्ययः ॥ ६९ | अत्यन्त कुपित होकर युद्ध करने लगे। उसके बाद शम्भुसे पालित गणों एवं देवोंने युद्धमें दानवोंको दिन-रात बारम्बार हराया। उसके बाद सात सौ वर्षोंका समय बीत जानेपर अठारह भुजाओंवाले अविनाशी त्र्यम्बक शंकर अपनी नित्यक्रियाकी सन्ध्या करने लगे॥ ६८–६९॥ |
| संस्पृश्यापः सरस्वत्यां स्नात्वा च विधिना हरः ।<br>कृतार्थो भक्तिमान् मूर्ध्ना पुष्पाञ्जलिमुपाक्षिपत् ॥ ७०<br><br>ततो ननाम शिरसा ततश्चक्रे प्रदक्षिणम् ।<br>हिरण्यगर्भेत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ॥ ७१<br><br>त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् ।<br>ननर्त भावगम्भीरं दोर्दण्डं भ्रामयन् बलात् ॥ ७२<br><br>परिनृत्यति देवेशे गणाश्चैवामरास्तथा ।<br>नृत्यन्ते भावसंयुक्ता हरस्यानुविलासिनः ॥ ७३ | उन भक्तिमान् शंकरने जलका स्पर्शकर (आचमनकर) विधिपूर्वक सरस्वतीमें स्नान किया। वे कृतार्थ हो गये। उन्होंने पुष्पाञ्जलि सिरसे लगाकर समर्पित की। उसके बाद उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम एवं उसके पश्चात् प्रदक्षिणा कर 'हिरण्यगर्भ' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यकी वन्दना की और जप किया। उसके बाद 'त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु' इसका स्पष्टरूपसे उच्चारण कर शूलपाणि शंकर बलपूर्वक अपना बाहुदण्ड घुमाते हुए भाव-गम्भीर होकर नाचने लगे। देवेश्वरके नाचनेपर उनके अनुगामी गण और देवता भी (वैसे ही) भाव-विभोर होकर नाचने लगे॥ ७०–७३॥ |
| सन्ध्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया ।<br>युद्धाय दानवैः सार्द्धं मतिं भूयः समादधे ॥ ७४<br><br>ततोऽमरगणैः सर्वैस्त्रिनेत्रभुजपालितैः ।<br>दानवा निर्जिताः सर्वे बलिभिर्भयवर्जितैः ॥ ७५<br><br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा मत्वाऽजेयं च शङ्करम् ।<br>अन्धकः सुन्दमाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७६<br><br>सुन्द भ्राताऽसि मे वीर विश्वास्यः सर्ववस्तुषु ।<br>तद्ददाम्यद्य यद्वाक्यं तच्छ्रुत्वा यत्क्षमं कुरु ॥ ७७ | सन्ध्योपासन करके इच्छानुकूल नृत्य करनेके बाद शंकरने फिर दानवोंसे संग्राम करनेका विचार किया। फिर तो शंकरकी भुजाओंसे रक्षित बलशाली और निर्भय सम्पूर्ण देवताओंने सारे दानवोंको जीत लिया। अपनी सेनाको पराजित देखकर तथा महादेवको पराजित करनेमें कठिनाई जान करके अन्धकने सुन्दको बुलाकर यह वचन कहा—वीर सुन्द! तुम मेरे भाई हो और सभी विषयोंमें तुम मेरे विश्वासी हो। इसलिये आज मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे सुनकर यथाशक्ति उसे पूर्ण करो॥ ७४–७७॥ |
| दुर्जयोऽसौ रणपटुर्धर्मात्मा कारणान्तरैः ।<br>समासते हि हृदये पद्माक्षी शैलनन्दिनी ॥ ७८<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छामो यत्रास्ते चारुहासिनी ।<br>तत्रैनां मोहयिष्यामि हररूपेण दानव ॥ ७९<br><br>भवान् भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः ।<br>ततो गत्वाऽथ भुक्त्वा तां जेष्यामि प्रमथान् सुरान् ॥ ८०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने बाढं सुन्दोऽभ्यभाषत ।<br>समजायत शैलादिरन्धकः शङ्करोऽप्यभूत् ॥ ८१ | किन्हीं मुख्य कारणोंसे युद्ध करनेमें परम चतुर ये धर्मात्मा दुर्जय हैं। मेरे हृदयमें कमलनयनी पार्वती बसी हुई है। अतः उठो; हम वहाँ चलें, जहाँ वह मधुर मुसकानवाली स्थित है। दानव! वहाँ मैं शंकरका रूप धारण करके उसे मुग्ध कर दूँगा (भुलावेमें डाल दूँगा)। तुम शंकरका अनुचर गणेश्वर नन्दी बनो। तब वहाँ पहुँच करके और उसका सुख भोगकर प्रमथों एवं देवोंको जीतूँगा। ऐसा कहनेपर सुन्दने कहा—ठीक है। उसके बाद वह शैलादि (नन्दी) बन गया और अन्धक शिव बन गया॥ ७८–८१॥ |
| नन्दिरुद्रौ ततो भूत्वा महासुरचमूपती ।<br>सम्प्राप्तौ मन्दरगिरिं प्रहारैः क्षतविग्रहौ ॥ ८२ | उसके बाद महासुर (अन्धक) और सेनापति (सुन्द) शस्त्रास्त्रोंकी मारसे अधिक घायल हुए शरीरवाले रुद्र और नन्दीका रूप धारण कर मन्दरगिरिपर पहुँचे। |
| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हस्तमालम्ब्य सुन्दस्य अन्धको हरमन्दिरम्।<br>विवेश निर्विशङ्केन चित्तेनासुरसत्तमः ॥ ८३<br>ततो गिरिसुता दूरादायान्तं वीक्ष्य चान्धकम्।<br>महेश्वरवपुश्छन्नं प्रहारैर्जर्जरच्छविम् ॥ ८४<br>सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशत् ततः।<br>तं दृष्ट्वा मालिनीं प्राह सुयशां विजयां जयाम् ॥ ८५ | असुरश्रेष्ठ अन्धक सुन्दका हाथ पकड़कर निडर होकर महादेवके मन्दिरमें घुस गया। उसके बाद शैलादि नन्दीके रूपमें स्थित सुन्दको पकड़कर मारोंसे जर्जर महादेवके शरीरमें छिपे अन्धकको दूरसे आते देखकर पार्वतीजीने यशस्विनी मालिनी, विजया तथा जयासे कहा— ॥ ८२–८५ ॥ |
| जये पश्यस्व देवस्य मदर्थे विग्रहं कृतम्।<br>शत्रुभिर्दानववरैस्तदुत्तिष्ठस्व सत्वरम् ॥ ८६<br>घृतमानय पौराणं बीजिकां लवणं दधि।<br>व्रणभङ्गं करिष्यामि स्वयमेव पिनाकिनः ॥ ८७<br>कुरुष्व शीघ्रं सुयशे स्वभर्तुर्व्रणनाशनम्।<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं समुत्थाय वरासनात् ॥ ८८<br>अभ्युद्ययौ तदा भक्त्या मन्यमाना वृषध्वजम्।<br>शूलपाणेस्ततः स्थित्वा रूपं चिह्नानि यत्नतः ॥ ८९<br>अन्विषेष ततो ब्रह्मन्नोभौ पार्श्वस्थितौ वृषौ।<br>सा ज्ञात्वा दानवं रौद्रं मायाच्छादितविग्रहम् ॥ ९० | जये! देखो, मेरे स्वामीके शरीरको मेरे लिये दानव-शत्रुओंने किस प्रकार जर्जरित कर डाला है। इसलिये अविलम्ब उठो। पुराना घी, बीजिका, लवण और दही ले आओ। पिनाक धारण करनेवाले शंकरके घावोंको मैं स्वयं ही भरूँगी। यशस्विनि! शीघ्र अपने स्वामीके घावोंको भरो—ऐसा कहते हुए आसनसे उठकर उसे वृषध्वज शंकर समझती हुई वे भक्तिपूर्वक उसके पास गयीं। उसके बाद खड़ी होकर वे शंकरके रूप एवं चिह्नोंको भलीभाँति देखने लगीं। ब्रह्मन्! उन्होंने देखा कि उसकी बगलमें स्थित दोनों वृष नहीं हैं। इसलिये उन्हें यह मालूम हो गया कि यह मायासे छिपे शरीरवाला भयानक दानव है॥ ८६–९० ॥ |
| अपयानं तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने।<br>देव्याश्चिन्तितमाज्ञाय सुन्दं त्यक्त्वान्धकोऽसुरः ॥ ९१<br>समाद्रवत वेगेन हरकान्तां विभावरीम्।<br>समाद्रवत दैतेयो येन मार्गेण साऽगमत् ॥ ९२<br>अपस्कारान्तरं भञ्जन् पादप्लुतिभिराकुलः।<br>तमापतन्तं दृष्ट्वैव गिरिजा प्राद्रवद् भयात् ॥ ९३<br>गृहं त्यक्त्वा ह्युपवनं सखीभिः सहिता तदा।<br>तत्राप्यनुजगामासौ मदान्धो मुनिपुङ्गव ॥ ९४<br>तथापि न शशापैनं तपसो गोपनाय तु।<br>तद्भयादाविशद् गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥ ९५ | मुने! उसके बाद गिरिराजकी कन्या भाग चलीं। देवीके विचारको समझकर अन्धकासुर सुन्दको छोड़कर शीघ्रतापूर्वक शंकरप्रिया विभावरीके पीछे उसी रास्तेसे दौड़ा, जिससे वे गयी थीं। चरणके चपेटोंसे राहकी रुकावटोंको चूर-चूर करते हुए वह अधीरतापूर्वक दौड़ पड़ा। उसे आते देखकर गिरितनया भयसे (और) भाग चलीं। मुनिवर! उसके बाद देवी सखियोंके साथ घर छोड़कर उपवनमें चली गयीं। वहाँ भी मदान्ध (अन्धक)-ने उनका पीछा किया। इतनेपर भी अपने तपकी रक्षाके लिये उन्होंने उसे शाप नहीं दिया। किंतु गौरी स्वयं उसके डरसे पवित्र सफेद अर्कके फूलमें छिप गयीं ॥ ९१–९५ ॥ |
| विजयाद्या महागुल्मे सम्प्रयाता लयं मुने।<br>नष्टायामथ पार्वत्यां भूयो हैरण्यलोचनिः ॥ ९६<br>सुन्दं हस्ते समादाय स्वसैन्यं पुनरागमत्।<br>अन्धके पुनरायाते स्वबलं मुनिसत्तम ॥ ९७ | मुने! विजया आदि भी घनी झाड़ियोंमें छिप गयीं। उसके बाद पार्वतीके अदृश्य हो जानेपर हिरण्याक्षका पुत्र (अन्धक) सुन्दका हाथ पकड़कर पुनः अपनी सेनामें वापस आ गया। मुनिसत्तम! अन्धकके अपनी सेनामें पुनः लौट आनेपर प्रमथों और असुरोंमें घमासान |
| ३४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रावर्तत महायुद्धं प्रमथासुरयोरथ।<br>ततोऽमरगणश्रेष्ठो विष्णुश्चक्रगदाधरः॥ ९८<br>निजघानासुरबलं शङ्करप्रियकाम्यया।<br>शार्ङ्गचापच्युतैर्बाणैः संस्यूता दानवर्षभाः॥ ९९<br>पञ्च षट् सप्त चाष्टौ वा ब्रध्नपादैर्घना इव।<br>गदया कांश्चिदवधीच्चक्रेणान्याञ् जनार्दनः॥ १००<br>खड्गेन च चकर्तान्यान् दृष्ट्यान्यान् भस्मसाद् व्यधात्।<br>हलेनाकृष्य चैवान्यान् मुसलेन व्यचूर्णयत्॥ १०१ | लड़ाई होने लगी। उसके बाद अमरगणोंमें श्रेष्ठ चक्र एवं गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान् शंकरका प्रिय करनेकी इच्छासे असुर-सेनाका संहार करने लगे। शार्ङ्ग नामक धनुषसे निकले हुए बाणोंसे पाँच-पाँच, छः-छः, सात-सात, आठ-आठ श्रेष्ठ दानव उसी प्रकार विदीर्ण होने लगे जैसे सूर्यकी किरणोंसे 'घन' (अन्धकार) विदीर्ण हो जाते हैं। जनार्दनने कुछको गदासे तथा कुछको चक्रसे मार डाला। किन्हींको तलवारसे काट डाला और किन्हींको देखकर ही भस्म कर दिया तथा कुछ असुरोंको हलद्वारा खींचकर मूसलसे चूर्ण-विचूर्ण कर दिया॥ ९८—१०१॥ |
| गरुडः पक्षपाताभ्यां तुण्डेनाप्युरसाऽहनत्।<br>स चादिपुरुषो धाता पुराणः प्रपितामहः॥ १०२<br>भ्रामयन् विपुलं पद्ममभ्यषिञ्चत वारिणा।<br>संस्पृष्टा ब्रह्मतोयेन सर्वतीर्थमयेन हि॥ १०३<br>गणामरगणाश्चासन् नवनागशताधिकाः।<br>दानवास्तेन तोयेन संस्पृष्टाश्चाघहारिणा॥ १०४<br>सवाहनाः क्षयं जग्मुः कुलिशेनेव पर्वताः।<br>दृष्ट्वा ब्रह्महरी युद्धे घातयन्तौ महासुरान्॥ १०५<br>शतक्रतुश्च दुद्राव प्रगृह्य कुलिशं बली।<br>तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलो दानवसत्तमः॥ १०६<br>मुक्त्वा देवं गदापाणिं विमानस्थं च पद्मजम्।<br>शक्रमेवाद्रवद् योद्धुं मुष्टिमुद्यम्य नारद।<br>बलवान् दानवपतिरजेयो देवदानवैः॥ १०७ | गरुड़ने अपने दोनों डैनोंकी मारसे चोंच तथा छातीके बलसे अनेक दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया। पुरातन आदिपुरुष धाता प्रपितामहने विशाल कमलको घुमाते हुए सभी (देवगणों)-को जलसे अभिषिञ्चित किया। सर्वतीर्थरूप ब्रह्म जलका स्पर्श होनेसे गण तथा देवतालोग नौजवान हाथियोंसे भी अधिक पराक्रमवाले हो गये। और सौ, पाप दूर करनेवाले उस जलके स्पर्शके प्रभावसे सवारीके साथ दानव ऐसे नष्ट होने लगे जैसे वज्रसे पर्वत नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मा और विष्णुको संग्राममें महासुरोंको मारते देखकर (उत्साहमें आकर) बलशाली इन्द्र भी अपना वज्र लेकर दौड़ पड़े। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] नारदजी! उन्हें आते देखकर देवों तथा दानवोंसे अजेय शक्तिशाली श्रेष्ठ दानवपति बल, गदाधर विष्णु और विमानारूढ़ ब्रह्मासे लड़ना छोड़कर मुट्ठी तानकर इन्द्रसे ही युद्ध करनेके लिये दौड़ पड़ा॥ १०२—१०७॥ |
| तमापतन्तं त्रिदशेश्वरस्तु<br>दोष्णां सहस्रेण यथाबलेन।<br>वज्रं परिभ्राम्य बलस्य मूर्ध्नि<br>चिक्षेप हे मूढ हतोऽस्युदीर्य॥ १०८ | उसे आते देखकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने हजारों भुजाओंसे अपनी शक्तिभर वज्रको घुमाते हुए उसे बलके सिरपर 'हे मूढ! अब तुम मारे गये'—कहकर फेंक दिया। |
| स तस्य मूर्ध्नि प्रवरोऽपि वज्रो<br>जगाम तूर्णं हि सहस्रधा मुने।<br>बलोऽद्रवद् देवपतिश्च भीतः<br>पराङ्मुखोऽभूत् समरान्महर्षे॥ १०९ | मुने! वह श्रेष्ठ वज्र भी उसके सिरपर शीघ्र ही हजारों टुकड़ोंमें टूक-टूक हो गया। (फिर) बल (इन्द्रकी ओर) दौड़ा। महर्षे! देवराज भयभीत होकर युद्धसे विमुख हो गये—भाग गये। |
| तं चापि जम्भो विमुखं निरीक्ष्य<br>भूत्वाऽग्रतः प्राह न युक्तमेतत्।<br>तिष्ठस्व राजाऽसि चराचरस्य<br>न राजधर्मे गदितं पलायनम्॥ ११० | उन्हें विमुख होकर भागते देख जम्भने आगे आकर कहा कि यह उचित नहीं है। रुकिये; आप समस्त स्थावर-जङ्गमके राजा हैं। राजधर्ममें लड़ाईके मैदानसे भागनेका नियम नहीं है। |
| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३४१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सहस्राक्षो जम्भवाक्यं निशम्य<br>भीतस्तूर्णं विष्णुमागान्महर्षे।<br>उपेत्याह श्रूयतां वाक्यमीश<br>त्वं मे नाथो भूतभव्येश विष्णो॥ १११<br>जम्भस्तर्जयतेऽत्यर्थं मां निरायुधमीक्ष्य हि।<br>आयुधं देहि भगवन् त्वामहं शरणं गतः॥ ११२<br><br>तमुवाच हरिः शक्रं त्यक्त्वा दर्पं व्रजाधुना।<br>प्रार्थयस्वायुधं वह्निं स ते दास्यत्यसंशयम्॥ ११३<br><br>जनार्दनवचः श्रुत्वा शक्रस्त्वरितविक्रमः।<br>शरणं पावकमगादिदं चोवाच नारद॥ ११४ | महर्षे! जम्भका वचन सुनकर भयभीत होकर इन्द्र जल्दीसे विष्णुके समीप चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने कहा—हे ईश! आप मेरी बात सुनें। हे भूत तथा भव्यके स्वामी विष्णो! आप मेरे स्वामी हैं॥ १०८—१११॥<br><br>जम्भ मुझे शस्त्रास्त्रसे रहित देखकर बहुत अधिक ललकार रहा है। भगवन्! आप मुझे आयुध दें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। विष्णुने इन्द्रसे कहा—इस समय (अपने पदके) अहंकारको छोड़कर तुम अग्निदेवके पास जाओ और उनसे आयुधके लिये प्रार्थना करो। वे निस्सन्देह तुम्हें आयुध प्रदान करेंगे। नारदजी! जनार्दनकी बात सुनकर तीव्र गतिवाले इन्द्र अग्निकी शरणमें चले गये और उनसे उन्होंने कहा— ॥ ११२—११४॥ |
| शक्र उवाच<br>निघ्नतो मे बलं वज्रं कृशानो शतधा गतम्।<br>एष चाहूयते जम्भस्तस्माद्देह्यायुधं मम॥ ११५ | इन्द्रने कहा—अग्निदेव! बलको मारनेमें मेरा वज्र सैकड़ों टुकड़े हो गया; यह जम्भ मुझे ललकार रहा है। अतः आप मुझे आयुध प्रदान करें॥ ११५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तमाह भगवान् वह्निः प्रीतोऽस्मि तव वासव।<br>यत्त्वं दर्पं परित्यज्य मामेव शरणं गतः॥ ११६<br><br>इत्युच्चार्य स्वशक्त्यास्तु शक्तिं निष्क्रम्य भावतः।<br>प्रादादिन्द्राय भगवान् रोचमानो दिवं गतः॥ ११७<br><br>तामादाय तदा शक्तिं शतघण्टां सुदारुणाम्।<br>प्रत्युद्ययौ तदा जम्भं हन्तुकामोऽरिमर्दनः॥ ११८<br><br>तेनातियशसा दैत्यः सहसैवाभिसंवृतः।<br>क्रोधं चक्रे तदा जम्भो निजघान गजाधिपम्॥ ११९ | पुलस्त्यजी बोले—भगवन्! अग्निदेवने उनसे कहा—वासव! मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ; क्योंकि आप अहंकार छोड़कर मेरी शरणमें आये हैं। ऐसा कहनेके बाद प्रकाशयुक्त भगवान् अग्निदेवने भावपूर्वक अपनी शक्तिसे एक दूसरी शक्ति निकालकर उसे इन्द्रको दे दिया और वे स्वर्ग चले गये। शत्रुकां मर्दन करनेवाले इन्द्र सैकड़ों घण्टाओंसे युक्त उस भीषण शक्तिको लेकर जम्भको मारनेके लिये चले गये। उन अत्यन्त यशस्वीके सहसा पीछा करनेपर जम्भने कोपपूर्वक गजाधिप (ऐरावत)-पर वार कर दिया॥ ११६—११९॥ |
| जम्भमुष्टिनिपातेन भग्नकुम्भकटो गजः।<br>निपपात यथा शैलः शक्रवज्रहतः पुरा॥ १२०<br><br>पतमानाद् द्विपेन्द्रात्तु शक्रश्चाप्लुत्य वेगवान्।<br>त्यक्त्वैव मन्दरगिरिं पपात वसुधातले॥ १२१<br><br>पतमानं हरिं सिद्धाश्चारणाश्च तदाऽब्रुवन्।<br>मा मा शक्र पतस्वाद्य भूतले तिष्ठ वासव॥ १२२<br><br>स तेषां वचनं श्रुत्वा योगी तस्थौ क्षणं तदा।<br>प्राह चैतान् कथं योत्स्ये अपत्रः शत्रुभिः सहः॥ १२३ | जम्भकी मुट्ठीके आघातसे हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण हो गया। उसके बाद वह इस प्रकार गिर पड़ा जैसे पूर्वकालमें इन्द्रके वज्रसे आहत होकर पर्वत गिरता था। इन्द्र गिरते हुए गजेन्द्रसे वेगपूर्वक उछले और मन्दर-पर्वतको भी छोड़कर पृथ्वकी ओर नीचे गिर पड़े। उसके बाद गिरते हुए इन्द्रसे सिद्धों एवं चारणोंने कहा—इन्द्र! आप पृथ्वीपर न गिरें। आप रुकें। उनकी बात सुनकर योगी इन्द्र उस समय क्षणभरके लिये रुक गये और बोले—मैं बिना वाहनके इन शत्रुओंसे कैसे लडूंगा?॥ १२०—१२३॥ |
| ३४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ ] |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तमूचुर्देवगन्धर्वा मा विषादं व्रजेश्वर।<br>युध्यस्व त्वं समारुह्य प्रेषयिष्याम यद् रथम्॥ १२४<br>इत्येवमुक्त्वा विपुलं रथं स्वस्तिकलक्षणम्।<br>वानरध्वजसंयुक्तं हरिभिर्हरिभिर्युतम्॥ १२५<br>शुद्धजाम्बूनदमयं किङ्किणीजालमण्डितम्।<br>शक्राय प्रेषयामासुर्विश्वावसुपुरोगमाः॥ १२६<br>तमागतमुदीक्ष्याथ हीनं सारथिना हरिः।<br>प्राह योत्स्ये कथं युद्धे संयमिष्ये कथं हयान्॥ १२७ | देवताओं और गन्धर्वोंने उत्तर दिया—हे ईश्वर (इन्द्र)! आप चिन्तित न हों। हमलोग जो रथ भेज रहे हैं उसपर चढ़कर आप युद्ध करें। ऐसा कहकर विश्वावसु आदिने स्वस्तिकके आकारवाले कपिध्वजसे युक्त हरितवर्णके अश्वोंसे जुते शुद्ध स्वर्णसे बनाये गये तथा किंकिणीजालसे मण्डित विशाल रथ इन्द्रके लिये भेज दिया। इन्द्र सारथिसे रहित उस रथको देखकर बोले—मैं युद्धमें कैसे लडूंगा और कैसे घोड़ोंको संयत करूँगा—दोनों काम एक साथ कैसे होंगे?॥ १२४–१२७॥ |
| यदि कश्चिद्धि सारथ्यं करिष्यति ममाधुना।<br>ततोऽहं घातये शत्रून् नान्यथेति कथंचन॥ १२८<br>ततोऽब्रुवंस्ते गन्धर्वा नास्माकं सारथिर्विभो।<br>विद्यते स्वयमेवाश्वांस्त्वं संयन्तुमिहार्हसि॥ १२९<br>इत्येवमुक्ते भगवांस्त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम्।<br>क्ष्मातलं निपपातैव परिभ्रष्टस्रगम्बरः॥ १३०<br>चलनमौलिर्मुक्तकचः परिभ्रष्टायुधाङ्गदः।<br>पतमानं सहस्राक्षं दृष्ट्वा भूः समकम्पत॥ १३१ | इस समय मेरे सारथिका काम यदि कोई करे तो मैं शत्रुओंका नाश कर सकता हूँ; अन्य किसी प्रकार नहीं। उसके बाद गन्धर्वोंने कहा—विभो! हमारे पास कोई सारथि नहीं है। आप स्वयं घोड़ोंको नियन्त्रित कर सकते हैं। ऐसा कहनेपर भगवान् इन्द्र उत्तम रथको छोड़कर अस्त-व्यस्त हुए माल्य और वस्त्रोंके साथ पृथ्वीपर गिर गये। (पृथ्वीपर गिरते समय इन्द्रका) सिर काँप रहा था, उनके बाल बिखर गये थे और उनके आयुध तथा बाजूबंद नीचे गिर पड़े थे। इन्द्रको गिरते देख पृथ्वी काँपने लगी॥ १२८–१३१॥ |
| पृथिव्यां कम्पमानायां शमीकर्षेस्तपस्विनी।<br>भार्याऽब्रवीत् प्रभो बालं बहिः कुरु यथासुखम्॥ १३२<br>स तु शीलावचः श्रुत्वा किमर्थमिति चाब्रवीत्।<br>सा चाह श्रूयतां नाथ दैवज्ञपरिभाषितम्॥ १३३<br>यदेयं कम्पते भूमिस्तदा प्रक्षिप्यते बहिः।<br>यद्वाह्यतो मुनिश्रेष्ठ तद् भवेद् द्विगुणं मुने॥ १३४<br>एतद्वाक्यं तदा श्रुत्वा बालमादाय पुत्रकम्।<br>निराशङ्को बहिः शीघ्रं प्राक्षिपत् क्ष्मातले द्विजः॥ १३५ | पृथ्वीके काँपनेपर शमीक ऋषिकी तपस्विनी पत्नीने कहा—'प्रभो! बालकको सँभालकर बाहर ले जाइये। उन्होंने शीलाकी बात सुनकर कहा—क्यों? उसने कहा—हे नाथ! सुनिये, ज्योतिषियोंका कहना है कि इस भूमिके काँपनेपर वस्तुएँ बाहर निकाल दी जाती हैं; क्योंकि मुनिश्रेष्ठ! उस समय बाहरमें रखी हुई वस्तु दुगुनी हो जाती है। इस वाक्यको सुनकर उस समय ब्राह्मणने अपने बालक पुत्रको लेकर निःशंक हो पृथ्वीपर बाहर रख दिया'॥ १३२–१३५॥ |
| भूयो गोयुगलार्थाय प्रविष्टो भार्यया द्विजः।<br>निवारितो गता वेला अर्द्धहानिर्भविष्यति॥ १३६ | फिर दो गायोंके लिये भीतर प्रविष्ट होनेपर पत्नीने ब्राह्मणको निवारित करते हुए कहा—समय बीत चुका है; अब इस समय आधे भागकी हानि हो जायगी। |
| इत्येवमुक्ते देवर्षेर्बहिर्निर्गम्य वेगवान्।<br>ददर्श बालद्वितयं समरूपमवस्थितम्॥ १३७ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] देवर्षे! ऐसा कहनेपर (ब्राह्मणने) शीघ्रतासे बाहर निकलकर देखा कि समान आकारके दो |
७१- इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका 'पाकशासन' और 'गोत्रभिद्' होनेका हेतु; मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा
अध्याय ६९] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३४३
| तं दृष्ट्वा देवताः पूज्य भार्यां चाद्भुतदर्शनाम्।<br>प्राह तत्त्वं न विन्दामि यत् पृच्छामि वदस्व तत्॥ १३८<br><br>बालस्यास्य द्वितीयस्य के भविष्यद्गुणा वद।<br>भाग्यानि चास्य यच्चोक्तं कर्म तत् कथयाधुना॥ १३९ | बालक पड़े हुए हैं। उन्हें देखकर उसने देवताओंकी पूजा करनेके बाद अपनी अद्भुत ज्ञानमती पत्नीसे कहा—मैं इसका रहस्य नहीं समझता। अतः मैं जो पूछता हूँ उसे बतलाओ। यह बतलाओ कि इस दूसरे बालकमें कौन-से गुण होंगे? उसके भाग्यों एवं कर्मोंको भी तुम अभी बतलाओ॥ १३६—१३९॥ |
| साऽब्रवीन्नाद्य ते वक्ष्ये वदिष्यामि पुनः प्रभो।<br>सोऽब्रवीद् वद मेऽद्यैव नोचेन्नाश्नामि भोजनम्॥ १४०<br><br>सा प्राह श्रूयतां ब्रह्मन् वदिष्ये वचनं हितम्।<br>कातरेणाद्य यत्पृष्टं भव्यः कारुरयं किल॥ १४१<br><br>इत्युक्तवति वाक्ये तु बाल एव त्वचेतनः।<br>जगाम साह्यं शक्रस्य कर्तुं सौत्यविशारदः॥ १४२<br><br>तं व्रजन्तं हि गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः।<br>ज्ञात्वेन्द्रस्यैव साहाय्ये तेजसा समवर्धयन्॥ १४३ | पत्नीने कहा—स्वामिन्! मैं तुम्हें आज नहीं बतलाऊँगी। फिर कभी दूसरे समय बतलाऊँगी। उन्होंने कहा—आज ही मुझे बताओ; अन्यथा मैं भोजन नहीं करूँगा। उसने कहा—ब्रह्मन्! आप सुनिये, आपने आर्त्ततासे जो पूछा है उस हितकर बातको मैं कहती हूँ। यह (बालक) निश्चय ही कारु (शिल्पी) होगा। ऐसा कहनेपर अज्ञान (अवस्थामें) होते हुए भी वह सूत-कर्ममें कुशल बालक इन्द्रकी सहायताके लिये गया। विश्वावसु आदि गन्धर्वोंने उस बालकको इन्द्रकी सहायताके लिये जाते हुए जानकर उसके तेजको बढ़ा दिया॥ १४०—१४३॥ |
| गन्धर्वतेजसा युक्तः शिशुः शक्रं समेत्य हि।<br>प्रोवाचैह्येहि देवेश प्रियो यन्ता भवामि ते॥ १४४<br><br>तच्छ्रुत्वास्य हरिः प्राह कस्य पुत्रोऽसि बालक।<br>संयन्ताऽसि कथं चाश्वान् संशयः प्रतिभाति मे॥ १४५<br><br>सोऽब्रवीदृषितेजोत्थं क्ष्माभवं विद्धि वासव।<br>गन्धर्वतेजसा युक्तं वाजियानविशारदम्॥ १४६<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवाञ्छक्रः खं भेजे योगिनां वरः।<br>स चापि विप्रतनयो मातलिर्नामविश्रुतः॥ १४७<br><br>ततोऽधिरूढस्तु रथं शक्रस्त्रिदशपुङ्गवः।<br>रश्मीन् शमीकतनयो मातलिः प्रगृहीतवान्॥ १४८ | गन्धर्वोंके तेजसे परिपूर्ण होकर बालकने इन्द्रके निकट जाकर कहा—देवेश! आइये, आइये! मैं आपका प्रिय सारथि बनूँगा। उसे सुनकर इन्द्रने कहा—हे बालक! तुम किसके पुत्र हो? तुम घोड़ोंको कैसे संयमित करोगे? इस विषयमें मुझे संदेह हो रहा है। उसने कहा—वासव! मुझे ऋषिके तेजसे बल-वैभवमें बढ़े, भूमिसे उत्पन्न एवं गन्धर्वोंके तेजसे युक्त अश्वयानमें पारंगत समझो। यह सुनकर योगिश्रेष्ठ भगवान् इन्द्र आकाशमें चले गये। मातलि नामसे विख्यात वह ब्राह्मणपुत्र भी आकाशमें चला गया। उसके बाद देवश्रेष्ठ इन्द्र रथपर चढ़ गये और शमीकपुत्र मातलिने प्रग्रह (लगाम) पकड़ लिया॥ १४४—१४८॥ |
| ततो मन्दरमागम्य विवेश रिपुवाहिनीम्।<br>प्रविशन् ददृशे श्रीमान् पतितं कार्मुकं महत्॥ १४९<br><br>सशरं पञ्चवर्णाभं सितरक्तासितारुणम्।<br>पाण्डुच्छायं सुरश्रेष्ठस्तं जग्राह समार्गणम्॥ १५०<br><br>ततस्तु मनसा देवान् रजःसत्त्वतमोमयान्।<br>नमस्कृत्य शरं चापे साधिज्ये विनियोजयत्॥ १५१ | उसके बाद मन्दरगिरिपर पहुँचकर वे (इन्द्र) शत्रुसेनामें प्रविष्ट हो गये। प्रवेश करते समय सुरश्रेष्ठ श्रीमान् (इन्द्र)-ने बाणयुक्त, सफेद, लाल, काला, उषाकालीन लालिमावाले एवं सफेद रंगसे मिले पीले रंगवाले—पाँचरंगे—एक महान् धनुषको पड़ा हुआ देखा और बाणके साथ ही उसे उठा लिया। उसके बाद रजःसत्त्वमोमय—त्रिगुणमय—(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) |
३४४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततो निशेरुरत्युग्राः शरा बर्हिणवाससः।<br>ब्रह्मेशविष्णुनामाङ्काः सूदयन्तोऽसुरान् रणे॥ १५२ | देवोंको मनसे नमस्कार करके उन्होंने प्रत्यञ्चा चढ़ाकर बाण संधान किया। उससे ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वरके नामोंसे अंकित मोरके पंख लगे हुए अत्यन्त भयंकर बाण निकले और असुरोंका संहार करने लगे॥ १४९—१५२॥ |
| आकाशं विदिशः पृथ्वीं दिशश्च स शरोत्करैः।<br>सहस्राक्षोऽतिपटुभिश्छादयामास नारद॥ १५३<br>गजो विद्धो हयो भिन्नः पृथिव्यां पतितो रथः।<br>महामात्रो धरां प्राप्तः सद्यः सीदच्छरातुरः॥ १५४<br>पदातिः पतितो भूम्यां शक्रमार्गणताडितः।<br>हतप्रधानभूयिष्ठं बलं तदभवद् रिपोः॥ १५५<br>तं शक्रबाणाभिहतं दुरासदं<br>सैन्यं समालक्ष्य तदा कुजम्भः।<br>जम्भासुरश्चापि सुरेशमव्ययं<br>प्रजग्मतुर्गृह्य गदे सुघोरे॥ १५६ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] नारदजी! उन इन्द्रने बड़ी चतुराईसे बाणोंकी बौछारसे आकाश, पृथ्वी, दिशाओं एवं विदिशाओंको छा (भर) दिया। हाथी बुरी तरह बिंध गये, घोड़े विदीर्ण हो गये, रथ पृथ्वीपर गिर पड़े एवं हाथीका संचालक (महावत) बाणोंसे व्याकुल होकर कराहता हुआ धरतीपर गिर गया। इन्द्रके बाणोंसे घायल हुए पैदल युद्ध करनेवाले वीर भूमिपर गिर पड़े। (इस प्रकार) शत्रु की उस सेनाके बहुतेरे प्रधान (वीर) मारे गये। उस दुर्धर्ष (अपराजेय) सेनाको इन्द्रके बाणोंसे मारी जाती हुई देखकर असुर कुजम्भ और जम्भ भयानक गदाओंको लेकर अविनाशी सुरेन्द्रकी ओर तेजीसे बढ़ चले॥ १५३—१५६॥ |
| तावापतन्तौ भगवान् निरीक्ष्य<br>सुदर्शनेनारिविनाशनेन ।<br>विष्णुः कुजम्भं निजघान वेगात्<br>स स्यन्दनाद् गामगमद् गतासुः॥ १५७<br>तस्मिन् हते भ्रातरि माधवेन<br>जम्भस्ततः क्रोधवशं जगाम।<br>क्रोधान्वितः शक्रमुपाद्रवद् रणे<br>सिंहं यथैणोऽतिविपन्नबुद्धिः॥ १५८<br>तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य शक्र-<br>स्त्यक्त्वैव चापं सशरं महात्मा।<br>जग्राह शक्तिं यमदण्डकल्पां<br>तामग्निदत्तां रिपवे ससर्ज॥ १५९<br>शक्तिं सघण्टां कृतनिःस्वनां वै<br>दृष्ट्वा पतन्तीं गदया जघान।<br>गदां च कृत्वा सहसैव भस्मसाद्<br>बिभेद जम्भं हृदये च तूर्णम्॥ १६०<br>शक्त्या स भिन्नो हृदये सुरारिः<br>पपात भूम्यां विगतासुरेव।<br>तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं<br>दैत्यास्तु भीता विमुखा बभूवुः॥ १६१<br>जम्भे हते दैत्यबले च भग्ने<br>गणास्तु हृष्टा हरिमर्चयन्तः।<br>वीर्यं प्रशंसन्ति शतक्रतोश्च<br>स गोत्रभिच्छर्वमुपेत्य तस्थौ॥ १६२ | भगवान् विष्णुने उन दोनों (कुजम्भ और जम्भ)-को शीघ्रतासे सामने आते देखकर शत्रु-संहारक सुदर्शनचक्रसे कुजम्भको मारा। वह प्राणहीन होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके द्वारा भाईके मारे जानेपर जम्भ क्रुद्ध हो गया। कुपित होकर वह युद्धमें इन्द्रकी ओर ऐसे दौड़ा, जैसे विचारशक्ति नष्ट हो जानेपर मृग सिंहकी ओर दौड़ता है। उसे आते देखकर महात्मा इन्द्रने धनुष-बाणको छोड़ अग्निद्वारा प्रदत्त यमदण्डके समान शक्तिको लेकर उसे शत्रु की ओर फेंका। घण्टासे घनघनाती हुई उस शक्तिको देखकर (जम्भने) उसपर बल लगाकर गदासे वार किया। (उस शक्तिने) गदाको एकाएक भस्मकर शीघ्र ही जम्भका हृदय (भी) विदीर्ण कर दिया। शक्तिसे हृदयके विदीर्ण हो जानेपर वह देवशत्रु असुर जम्भ प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे मरा और भूमिपर गिरा देख करके दैत्यगण डरकर पीठ दिखाकर भाग गये। जम्भके मारे जाने एवं दैत्यसेनाके हार जानेपर सभी गण हरिका अर्चन एवं इन्द्रके पराक्रमका गुणगान करने लगे। (फिर) वे इन्द्र शंकरके निकट जाकर खड़े हो गये॥ १५७—१६२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६९॥
अध्याय ७० ] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४५
सत्तरवाँ अध्याय
अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व, देवादिकोंका भेजना, अर्द्धकुसुमसे पार्वतीका प्राकट्य और अन्धकद्वारा उनकी स्तुति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>तस्मिंस्तदा दैत्यबले च भग्ने<br>शुक्रोऽब्रवीदन्धकमासुरेन्द्रम् ।<br>एह्येति वीराद्य गृहं महासुर<br>योत्स्याम भूयो हरमेत्य शैलम्॥ १<br>तमुवाचान्धको ब्रह्मन् न सम्यग्भवतोदितम्।<br>रणान्नैवापयास्यामि कुलं व्यपदिशन् स्वयम्॥ २<br>पश्य त्वं द्विजशार्दूल मम वीर्यं सुदुर्धरम्।<br>देवदानवगन्धर्वान् जेष्ये सेन्द्रमहेश्वरम्॥ ३<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>समाश्वास्याब्रवीच्छम्भुं सारथिं मधुराक्षरम्॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले— उस समय दैत्यसेनाके हार जानेपर शुक्रने असुरोंके स्वामी अन्धकसे कहा—वीर महासुर! इस समय घर चलो। फिर पर्वतपर आकर शंकरसे युद्ध करेंगे। अन्धकने उनसे कहा—ब्रह्मन्! आपने उचित बात नहीं कही। अपने कुलको कलंकित करते हुए मैं युद्धसे नहीं भागूँगा। द्विजश्रेष्ठ! मेरा अत्यन्त प्रबल पराक्रम तो देखिये। मैं (उस पराक्रमसे) इन्द्र और महेश्वरके सहित सभी देवों और दानवों तथा गन्धर्वोंको जीत लूँगा। ऐसा वचन कहकर हिरण्याक्ष-पुत्र अन्धकने शम्भु (नामक) सारथिसे मीठी वाणीमें अच्छी तरह आश्वस्त करते हुए कहा—॥ १-४॥ |
| सारथे वाहय रथं हराभ्याशं महाबल।<br>यावन्निहन्मि बाणौघैः प्रमथामरवाहिनीम्॥ ५<br>इत्यन्धकवचः श्रुत्वा सारथिस्तुरगांस्तदा।<br>कृष्णवर्णान् महावेगान् कशयाऽभ्याहनन्मुने॥ ६<br>ते यत्नतोऽपि तुरगाः प्रेर्यमाणा हरं प्रति।<br>जघनेष्ववसीदन्तः कृच्छ्रेणोहुश्च तं रथम्॥ ७<br>वहन्तस्तुरगा दैत्यं प्राप्ताः प्रमथवाहिनीम्।<br>संवत्सरेण साग्रेण वायुवेगसमा अपि॥ ८ | महाबलशाली सारथे! तुम रथको महादेवके (सामने) सामने ले चलो। मैं बाणोंकी वर्षासे प्रमथों एवं देवोंकी सेनाको मार भगाऊँगा। मुने! अन्धकके वचनको सुनकर सारथिने (अपने रथके) काले रंगके तीव्रगामी घोड़ोंको कोड़ेसे मारा। शंकरकी ओर चेष्टापूर्वक चलाये जाते हुए भी वे घोड़े जाँघोंमें कष्टका अनुभव करते हुए कठिनाईसे उस रथको खींच रहे थे। दैत्यको ढोनेवाले वे घोड़े वायुके वेगके समान होनेपर भी एक वर्षसे भी अधिक समयमें प्रमथोंकी सेनामें पहुँच सके॥ ५-८॥ |
| ततः कार्मुकमानम्य बाणजालैर्गणेश्वरान्।<br>सुरान् संछादयामास सेन्द्रोपेन्द्रमहेश्वरान्॥ ९<br>बाणैश्छादितमीक्ष्यैव बलं त्रैलोक्यरक्षिता।<br>सुरान् प्रोवाच भगवांश्र्चक्रपाणिर्जनार्दनः॥ १० | उसके बाद (अन्धकने) धनुषको झुकाकर बाणसमूहोंसे गणेश्वरों एवं इन्द्र, विष्णु और महेश्वरके साथ सभी देवोंको ढक दिया। (पूरी) सेनाको बाणोंसे ढकी देखकर तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले चक्रपाणि भगवान् जनार्दनने देवोंसे कहा—॥ ९-१०॥ |
| विष्णुरुवाच<br>किं तिष्ठध्वं सुरश्रेष्ठा हतेनानेन वै जयः।<br>तस्मान्मद्वचनं शीघ्रं क्रियतां वै जयेप्सवः॥ ११<br>शात्यन्तामस्य तुरगाः समं रथकुटुम्बिना।<br>भज्यतां स्यन्दनश्चापि विरथः क्रियतां रिपुः॥ १२ | विष्णुने कहा— सुरश्रेष्ठो! आपलोग व्यर्थमें क्यों बैठे हैं? इसके मारे जानेसे ही विजय होगी। इसलिये विजयकी अभिलाषा रखकर आपलोग शीघ्र मेरे कहनेके अनुसार कार्य करें। (पहले) रथके सारथिके साथ इस (अन्धक)-के घोड़ोंको मार डालें एवं रथको तोड़कर |
७२- स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| ३४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| विरथं तु कृतं पश्चादेनं धक्ष्यति शङ्करः।<br>नोपेक्ष्यः शत्रुरुद्दिष्टो देवाचार्येण देवताः॥ १३<br><br>इत्येवमुक्ताः प्रमथा वासुदेवेन सामराः।<br>चक्रुवेगं सहेन्द्रेण समं चक्रधरेण च॥ १४ | शत्रुको बिना रथका कर दें। बिना रथका करनेके बाद तो शंकर इसे भस्म कर देंगे। देवो! देवताओंके आचार्य बृहस्पतिने कहा है कि शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र एवं विष्णुसहित प्रमथों तथा देवोंने शीघ्रतासे चढ़ाई कर दी॥ ११-१४॥ | | तुरगाणां सहस्रं तु मेघाभानां जनार्दनः।<br>निमिषान्तरमात्रेण गदया विनिपोथयत्॥ १५<br><br>हताश्वात् स्यन्दनात् स्कन्दः प्रगृह्य रथसारथिम्।<br>शक्त्या विभिन्नहृदयं गतासुं व्यसृजद् भुवि॥ १६<br><br>विनायकाद्याः प्रमथाः समं शक्रेण दैवतैः।<br>सध्वजाक्षं रथं तूर्णमभञ्जन्त तपोधनाः॥ १७<br><br>सहसा स महातेजा विरथस्त्यज्य कार्मुकम्।<br>गदामादाय बलवानभिदुद्राव दैवतान्॥ १८ | जनार्दन (विष्णु)-ने क्षणमात्रमें ही अपनी (कौमोदकी) गदासे बादल-जैसे काले रंगवाले हजारों घोड़ोंको मार डाला। स्कन्दने मारे गये घोड़ोंवाले रथसे सारथिको खींचकर शक्तिसे उसके हृदयको विदीर्ण कर दिया और प्राणहीन हो जानेपर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया। इन्द्र आदि देवताओंके साथ तपोधन विनायक प्रभृति प्रमथोंने शीघ्र ध्वजा और पहिये तथा धुरेके साथ रथको तोड़ डाला। (जब) महातेजस्वी पराक्रमी (अन्धक)-ने बिना रथके हो जानेपर धनुषको छोड़ दिया और गदा लेकर वह देवताओंकी ओर दौड़ पड़ा - ॥ १५-१८॥ | | पदान्यष्टौ ततो गत्वा मेघगम्भीरया गिरा।<br>स्थित्वा प्रोवाच दैत्येन्द्रो महादेवं स हेतुमत्॥ १९<br><br>भिक्षो भवान् सहानीकस्त्वसहायोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>तथाऽपि त्वां विजेष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ २०<br><br>तद्वाक्यं शङ्करः श्रुत्वा सेन्द्रान्सुरगणांस्तदा।<br>ब्रह्मणा सहितान् सर्वान् स्वशरीरे न्यवेशयत्॥ २१<br><br>शरीरस्थांस्तान् प्रमथान् कृत्वा देवांश्च शङ्करः।<br>प्राह एह्येहि दुष्टात्मन् अहमेकोऽपि संस्थितः॥ २२ | तब दैत्येन्द्रने आठ पग चलकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें महादेवसे अपना अभीष्ट वचन कहा- भिक्षुक! यद्यपि इस समय तुम सेनावाले हो और मैं असहाय हूँ, फिर भी मैं तुमको जीत लूँगा। आज मेरी शक्ति देखो। उसका वचन सुनकर शंकरने इन्द्र और ब्रह्माके साथ सभी देवताओंको अपने शरीरमें निवेशित कर लिया - छिपा लिया। उन प्रमथों एवं देवोंको अपने शरीरमें छिपानेके बाद शंकरने कहा- दुष्टात्मन्! आओ, आओ! मैं अकेला रहनेपर भी (तुमसे लड़नेके लिये) खड़ा हूँ॥ १९-२२॥ | | तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सर्व्वामरगणक्षयम्।<br>दैत्यः शङ्करमभ्यागाद् गदामादाय वेगवान्॥ २३<br><br>तमापतन्तं भगवान् दृष्ट्वा त्यक्त्वा वृषोत्तमम्।<br>शूलपाणिर्गिरिप्रस्थे पदातिः प्रत्यतिष्ठत॥ २४<br><br>वेगेनैवापतन्तं च बिभेदोरसि भैरवः।<br>दारुणं सुमहद् रूपं कृत्वा त्रैलोक्यभीषणम्॥ २५<br><br>दंष्ट्राकरालं रविकोटिसंनिभं मृगारिचर्माभिवृतं जटाधरम्।<br>भुजङ्गहारामलकण्ठकन्दरं विंशार्धबाहुं सषडर्धलोचनम्॥ २६ | समस्त देवगणोंसे संहार किये जाते उस महान् आश्चर्यको देखकर वह दैत्य गदा लेकर शीघ्रतासे शंकरके पास चला गया। भगवान् शूलपाणि उसे आते देख अपने श्रेष्ठ वृषभ (नन्दी)-को छोड़कर पर्वतपर पैरोंके बल खड़े हो गये। भैरवने तीनों लोकोंको डरा देनेवाला अत्यन्त भयानक रूप धारण करके तेजीसे आ रहे उस (अन्धक)-का हृदय विदीर्ण कर दिया। (उस समय शंकरका रूप) भयानक दाढ़ोंवाले करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, बाघम्बर पहने, जटासे सुशोभित, सर्पके हारसे अलंकृत ग्रीवावाला तथा दस भुजा और तीन नयनोंसे युक्त था॥ २३-२६॥ |
अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतादृशेन रूपेण भगवान् भूतभावनः।<br>बिभेद शत्रुं शूलेन शुभदः शाश्वतः शिवः ॥ २७<br>सशूलं भैरवं गृह्य भिन्नेप्युरसि दानवः।<br>विजहारातिवेगेन क्रोशमात्रं महामुने ॥ २८<br>ततः कथंचिद् भगवान् संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>तूर्णमुत्पाटयामास शूलेन सगदं रिपुम् ॥ २९<br>दैत्याधिपस्त्वपि गदां हरमूर्ध्नि न्यपातयत्।<br>कराभ्यां गृह्य शूलं च समुत्पतत दानवः ॥ ३० | ऐसे लक्षणोंसे संयुक्त मङ्गलदाता, शाश्वत, भूतभावन भगवान् शिवने शूलसे शत्रुको विदीर्ण कर दिया। महामुने ! हृदयके विदीर्ण हो जानेपर भी दानव शूलके साथ भैरवको पकड़कर एक कोसतक उन्हें खींच ले गया। तब भगवान्ने किसी प्रकार अपनेसे अपनेको रोककर गदा लिये हुए शत्रुको अपने शूलसे तुरंत मारा। दैत्योंके स्वामी (अन्धक)-ने भी शंकरके सिरपर गदाका वार किया और शूलको दोनों हाथोंसे पकड़कर ऊपर उछल गया ॥ २७—३० ॥ |
| संस्थितः स महायोगी सर्वाधारः प्रजापतिः।<br>गदापातक्षताद् भूरि चतुर्थाऽसृगथापतत् ॥ ३१<br>पूर्वधारारसमुद्भूतो भैरवोऽग्निसमप्रभः।<br>विद्याराजेति विख्यातः पद्ममालाविभूषितः ॥ ३२<br>तथा दक्षिणधारोत्थो भैरवः प्रेतमण्डितः।<br>कालराजेति विख्यातः कृष्णाञ्जनसमप्रभः ॥ ३३<br>अथ प्रतीचीधारोत्थो भैरवः पत्रभूषितः।<br>अतसीकुसुमप्रख्यः कामराजेति विश्रुतः ॥ ३४ | सबके आधारस्वरूप महायोगी वे प्रजापति शंकरजी खड़े रहे; परंतु इसके बाद गदाके आघातसे हुए चोटसे (चारों दिशाकी) चार धाराओंमें बहुत अधिक रक्त प्रवाहित होने लग गया। पूर्व दिशाकी धारासे अग्निके समान प्रभाववाले, कमलकी मालासे सुशोभित 'विद्याराज' नामसे प्रसिद्ध भैरव उत्पन्न हुए। दक्षिण दिशाकी धारासे प्रेतसे मण्डित काले अञ्जनके समान प्रभाववाले 'कालराज' नामसे प्रसिद्ध भैरव उत्पन्न हुए। उसके बाद पश्चिम दिशाकी धारासे अलसीके फूलके समान पत्रसे शोभित 'कामराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए ॥ ३१—३४ ॥ |
| उदग्धाराभवश्चान्यो भैरवः शूलभूषितः।<br>सोमराजेति विख्यातश्चक्रमालाविभूषितः ॥ ३५<br>क्षतस्य रुधिराज्जातो भैरवः शूलभूषितः।<br>स्वच्छन्दराजो विख्यात इन्द्रायुधसमप्रभः ॥ ३६<br>भूमिस्थाद् रुधिराज्जातो भैरवः शूलभूषितः।<br>ख्यातो ललितराजेति सौभाञ्जनसमप्रभः ॥ ३७<br>एवं हि सप्तरूपोऽसौ कथ्यते भैरवो मुने।<br>विघ्नराजोऽष्टमः प्रोक्तो भैरवाष्टकमुच्यते ॥ ३८ | उत्तर दिशाकी धारासे चक्रमालासे सुशोभित (एवं) शूल लिये 'सोमराज' नामसे प्रसिद्ध अन्य भैरव उत्पन्न हुए। घावके रक्तसे इन्द्रधनुषके समान चमकवाले (एवं) शूल लिये 'स्वच्छन्दराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए। पृथ्वीपर गिरे हुए रक्तसे सौभाञ्जन (सहिजन)-के समान (एवं) शूल लिये शोभायुक्त 'ललितराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए। मुने ! इस प्रकार इन भैरवका सात रूप कहा जाता है। 'विघ्नराज' आठवें भैरव हैं। इन्हें भैरवाष्टक (आठों भैरव) कहा जाता है ॥ ३५—३८ ॥ |
| एवं महात्मना दैत्यः शूलप्रोतो महासुरः।<br>छत्रवद् धारितो ब्रह्मन् भैरवेण त्रिशूलिना ॥ ३९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] ब्रह्मन् ! इस प्रकार त्रिशूल धारण करनेवाले महात्मा भैरवने शूलसे विद्ध हुए महासुर दैत्यको छातेकी भाँति ऊपर उठा लिया। ब्रह्मन् ! |
| तस्यासृगुल्बणं ब्रह्मञ्छूलभेदादवापतत्।<br>येनाकण्ठं महादेवो निमग्नः सप्तमूर्तिमान् ॥ ४०<br>ततः स्वेदोऽभवद् भूरि श्रमजः शङ्करस्य तु।<br>ललाटफलके तस्माज्जाता कन्याऽसृगाप्लुता ॥ ४१ | शूलसे विद्ध होनेके कारण उसका बहुत अधिक रक्त गिरा। उससे सात मूर्तिवाले महादेव गलेतक लहू-लुहान हो गये। परिश्रम करनेके कारण शंकरके पूरे ललाटपर बहुत अधिक पसीना आ गया। उससे खूनसे लथपथ |
| ३४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| यद्भूम्यां न्यपतद् विप्र स्वेदबिन्दुः शिवाननात् ।<br>तस्मादङ्गारपुञ्जाभो बालकः समजायत ॥ ४२<br>स बालस्तृषितोऽत्यर्थं पपौ रुधिरमान्धकम् ।<br>कन्या चोत्कृत्य संजातमसृग्विलिलिहेऽद्भुता ॥ ४३ | एक कन्या उत्पन्न हुई। विप्र! शिवके मुखसे भूमिपर गिरे पसीनोंकी बूँदोंसे अंगारे-जैसी कान्तिवाला एक बालक उत्पन्न हुआ॥ ३९—४२॥<br>अत्यन्त प्यासा वह बालक अन्धकका रक्त पीने लगा और अद्भुत कन्या भी काटकर उत्पन्न हुए रक्तको चाटने लगी। उसके बाद भैरवका रूप धारण करनेवाले वरदानी शंकरने प्रातःकालके सूर्यके समान कान्तिवाली उस कन्यासे जगत्-कल्याणकारी महान् वचन कहा— | | ततस्तामाह बालार्कप्रभां भैरवमूर्तिमान् ।<br>शङ्करो वरदो लोके श्रेयोऽर्थाय वचो महत् ॥ ४४<br>त्वां पूजयिष्यन्ति सुरा ऋषयः पितरोरगाः ।<br>यक्षविद्याधराश्चैव मानवाश्च शुभङ्करि ॥ ४५<br>त्वां स्तोष्यन्ति सदा देवि बलिपुष्पोत्करैः करैः ।<br>चर्चिकेति शुभं नाम यस्माद् रुधिरचर्चिता ॥ ४६ | शुभकारिणि! देवता, ऋषि, पितर, सर्पादि, यक्ष, विद्याधर एवं मानव तुम्हारी पूजा करेंगे। देवि! (वे लोग) बलि एवं पुष्पाञ्जलिसे तुम्हारी स्तुति करेंगे। यतः तुम रक्तसे चर्चित (लथपथ) हो, अतः तुम्हारा शुभ नाम 'चर्चिका' होगा॥ ४३—४६॥ | | इत्येवमुक्ता वरदेन चर्चिका<br>भूतानुजाता हरिचर्मवासिनी ।<br>महीं समन्ताद् विचचार सुन्दरी<br>स्थानं गता हिङ्गुलताद्रिमुत्तमम् ॥ ४७<br>तस्यां गतायां वरदः कुजस्य<br>प्रादाद् वरं सर्ववरोत्तमं यत् ।<br>ग्रहाधिपत्यं जगतां शुभाशुभं<br>भविष्यति त्वद्वशगं महात्मन् ॥ ४८ | वरदानी शंकरके ऐसा कहनेपर व्याघ्रचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली और सब भूतोंके बाद उत्पन्न हुई सुन्दरी चर्चिका पृथ्वीपर चारों ओर विचरती हुई इंगुरके रंगवाले उत्तम पर्वतपर चली गयी। उसके (वहाँ) चले जानेपर वरदानी शंकरने कुज (मंगल)को सर्वश्रेष्ठ वर दिया। (उन्होंने कहा—) महात्मन्! तुम ग्रहोंके स्वामी बनोगे तथा संसारका शुभ और अशुभ तुम्हारे अधीन होगा। | | हरोऽन्धकं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>दिव्यं स्वनेत्रार्कहुताशनेन ।<br>चकार संशुष्कतनुं त्वशोणितं<br>त्वगस्थिशेषं भगवान् स भैरवः ॥ ४९<br>तत्राग्निना नेत्रभवेन शुद्धः<br>स मुक्तपापोऽसुरराड् बभूव ।<br>ततः प्रजानां बहुरूपमीशं<br>नाथं हि सर्वस्य चराचरस्य ॥ ५०<br>ज्ञात्वा स सर्वेश्वरमीशमव्ययं<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं वरेण्यम् ।<br>सर्वैः सुराद्यैर्नतमीड्यमाद्यं<br>ततोऽन्धकः स्तोत्रमिदं चकार ॥ ५१ | उन भैरव-रूपधारी भगवान् शिवने अपने अग्नि और सूर्यरूपी नेत्रोंसे एक हजार दिव्य वर्षोंतक अन्धकके शरीरको सुखाकर रक्तरहित कर हड्डी तथा चाम शेष रखकर कंकाल बना दिया। शंकरके नेत्रसे उत्पन्न अग्निद्वारा शुद्ध होनेके कारण वह असुरराज पापसे छूट गया। उसके बाद अनेक रूप धारण करके प्रजाओंका नियमन करनेवाले, समस्त चर और अचरके स्वामी, सर्वेश्वर, अविनाशी ईश, त्रैलोक्यपति, वरदानी, वरेण्य, सभी सुरादिकोंद्वारा विनयपूर्वक स्तुति करनेयोग्य एवं सबके आदिमें रहनेवाले शंकरको वास्तवरूपमें जानकर अन्धकने यह स्तुति की—॥ ४७—५१॥ | | अन्धक उवाच<br>नमोऽस्तु ते भैरव भीममूर्ते<br>त्रिलोकगोप्त्रे शितशूलधारिणे ।<br>विंशार्द्धबाहो भुजगेशहार<br>त्रिनेत्र मां पाहि विपन्नबुद्धिम् ॥ ५२<br>जयस्व सर्वेश्वर विश्वमूर्ते<br>सुरासुरैर्वन्दितपादपीठ ।<br>त्रैलोक्यमातुर्गुरवे वृषाङ्क<br>भीतः शरण्यं शरणागतोऽस्मि ॥ ५३ | अन्धकने कहा— हे विशालकाय भैरव! हे त्रिलोककी रक्षा करनेवाले! हे तीक्ष्ण शूल धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे दस भुजाओंवाले तथा नागेशका हार धारण करनेवाले त्रिनेत्र! आप मुझ नष्टमतिकी रक्षा करें। हे देवों तथा असुरोंसे वन्दित पादपीठवाले विश्वमूर्ति सर्वेश्वर! आपकी जय हो। हे त्रिलोक-जननीके स्वामी वृषाङ्क! मैं भयभीत होकर आप शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें आया हूँ। |
अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्वां नाथ देवाः शिवमीरयन्ति<br>सिद्धा हरं स्थाणुं महर्षयश्च।<br>भीमं च यक्षा मनुजा महेश्वरं<br>भूताश्च भूताधिपमाममन्ति॥ ५४<br>निशाचरा उग्रमुपार्चयन्ति<br>भवेति पुण्याः पितरो नमन्ति।<br>दासोऽस्मि तुभ्यं हर पाहि मां<br>पापक्षयं मे कुरु लोकनाथ॥ ५५ | हे नाथ! देवता आपको शिव (मङ्गलमय) कहते हैं। सिद्धलोग आपको हर (पापहारी), महर्षिलोग स्थाणु (अचल), यक्षलोग भीम, मनुष्य महेश्वर और भूत भूताधिपति मानते हैं। निशाचर उग्र नामसे आपकी अर्चना करते हैं तथा पुण्यात्मा पितृगण भव नामसे आपको नमस्कार करते हैं। हे हर! मैं आपका दास हूँ, आप मेरी रक्षा करें। हे लोकनाथ! मेरे पापोंका आप विनाश कीजिये॥ ५२-५५॥ |
| भवांस्त्रिदेवस्त्रियुगस्त्रिधर्मा<br>त्रिपुष्करश्चासि विभो त्रिनेत्र।<br>त्रय्यारुणिस्त्रिश्रुतिरव्ययात्मन्<br>पुनीहि मां त्वां शरणं गतोऽस्मि॥ ५६<br>त्रिणाचिकेतस्त्रिपदप्रतिष्ठः<br>षडङ्गवित् त्वं विषयेष्वलुब्धः।<br>त्रैलोक्यनाथोऽसि पुनीहि शम्भो<br>दासोऽस्मि भीतः शरणागतस्ते॥ ५७<br>कृतं महच्छङ्कर तेऽपराधं<br>मया महाभूतपते गिरीश।<br>कामारिणा निर्जितमानसेन<br>प्रसादये त्वां शिरसा नतोऽस्मि॥ ५८<br>पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भवः।<br>त्राहि मां देव ईशान सर्वपापहरो भव॥ ५९ | हे सर्वसमर्थ त्रिनेत्र! आप त्रिदेव, त्रियुग, त्रिधर्मा तथा त्रिपुष्कर हैं। हे अव्ययात्मन्! आप त्रय्यारुणि तथा त्रिश्रुति हैं। आप मुझे पवित्र करें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप त्रिणाचिकेत, त्रिपदप्रतिष्ठ (स्वर्ग, मर्त्य, पातालरूप तीनों पदोंपर प्रतिष्ठित) षडङ्गवित् (वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—इन छह अङ्गोंके जाननेवाले), विषयोंके प्रति अनासक्त तथा तीनों लोकोंके स्वामी हैं। हे शम्भो! आप मुझे पवित्र करें। मैं आपका दास हूँ। भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शंकर! हे महाभूतपते! हे गिरीश! कामरूपी शत्रुने मेरे मनको जीत लिया था, इसलिये मैंने आपका महान् अपराध किया है। मैं आपको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मैं पापी, पापकर्मा, पापात्मा तथा पापसे उत्पन्न हूँ। हे देव ईशान! हे समस्त पापोंको हरण करनेवाले महादेव! आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ५६-५९॥ |
| मा मे क्रुध्यस्व देवेश त्वया चैतादृशोऽस्म्यहम्।<br>सृष्टः पापसमाचारो मे प्रसन्नो भवेश्वर॥ ६० | देवेश! आप मेरे ऊपर कुपित न हों। आपने ही मुझे इस प्रकारके पापका आचरण करनेवाला बनाया है। ईश्वर! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। |
| त्वं कर्ता चैव धाता च त्वं जयस्त्वं महाजयः।<br>त्वं मङ्गल्यस्त्वमोंकारस्त्वमीशानो ध्रुवोऽव्ययः॥ ६१ | आप सृष्टि तथा पालन-पोषण करनेवाले हैं। आप ही जय और आप ही महाजय हैं। आप मङ्गलमय हैं। आप ओंकार हैं। आप ही ईशान, अव्यय तथा ध्रुव हैं। |
| त्वं ब्रह्मा सृष्टिकृन्नाथास्त्वं विष्णुस्त्वं महेश्वरः।<br>त्वमिन्द्रस्त्वं वषट्कारो धर्मस्त्वं च सुरोत्तमः॥ ६२ | आप सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा तथा (सब कुछ करनेमें) समर्थ हैं। आप विष्णु और महेश्वर हैं। आप इन्द्र हैं, आप वषट्कार हैं, आप धर्म तथा देवोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। |
| सूक्ष्मस्त्वं व्यक्तरूपस्त्वं त्वमव्यक्तस्त्वमीश्वरः।<br>त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम्॥ ६३ | आप (कठिनतासे देखे जाने योग्य) सूक्ष्म हैं, आप (प्रतीतिका विषय होनेसे) व्यक्तरूप हैं, आप अप्रकटरहस्य—अव्यक्त हैं, आप ईश्वर हैं, आपसे ही यह चर-अचर जगत् व्याप्त (ओतप्रोत या ढका) है। |
| ३५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० | | :--- | :--- |
| त्वमादिरन्तो मध्यश्च त्वमनादिः सहस्रपात्।<br>विजयस्त्वं सहस्राक्षो विरूपाक्षो महाभुजः॥६४<br><br>अनन्तः सर्वगो व्यापी हंसः प्राणाधिपोऽच्युतः।<br>गीर्वाणपतिरव्यग्रो रुद्रः पशुपतिः शिवः॥६५<br><br>त्रैविद्यस्त्वं जितक्रोधो जितारिर्विजितेन्द्रियः।<br>जयश्च शूलपाणिस्त्वं त्राहि मां शरणागतम्॥६६ | आप आदि, मध्य एवं अन्त हैं, (साथ ही) आप आदि-रहित एवं हजारों पैरोंवाले सहस्रपात् हैं। आप विजय हैं। आप हजारों आँखोंवाले, विरूप आँखवाले एवं बड़ी भुजावाले हैं। आप अन्तसे रहित, सर्वगत, व्यापी, हंस, प्राणोंके स्वामी (सदा स्वस्वरूपमें स्थित) अच्युत, देवाधिदेव, शान्त, रुद्र, पशुपति एवं शिव हैं। आप तीनों वेदोंके जाननेवाले, क्रोधको जीत लेनेवाले, शत्रुओंको विजित करनेवाले, इन्द्रियजयी, जय एवं शूलपाणि हैं। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥६०-६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं महेश्वरो ब्रह्मन् स्तुतो दैत्याधिपेन तु।<br>प्रीतियुक्तः पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षिमुवाच ह॥६७<br><br>सिद्धोऽसि दानवपते परितुष्टोऽस्मि तेऽन्धक।<br>वरं वरय भद्रं ते यमिच्छसि विनाऽम्बिकाम्॥६८ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मन्! दैत्योंके स्वामी अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर लालिमा लिये भूरे रंगकी आँखवाले महेश्वरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—दानवपति अन्धक! तुम सिद्ध हो गये हो; मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अम्बिकाके सिवाय तुम जो चाहो, वह वर माँगो। तुम्हारा कल्याण हो॥६७-६८॥ | | अन्धक उवाच<br>अम्बिका जननी मह्यं भगवांस्त्र्यम्बकः पिता।<br>वन्दामि चरणौ मातुर्वन्दनीया ममाम्बिका॥६९<br><br>वरदोऽसि यदीश न तद् यातु विलयं मम।<br>शारीरं मानसं वाग्जं दुष्कृतं दुर्विचिन्तितम्॥७०<br><br>तथा मे दानवो भावो व्यपयातु महेश्वर।<br>स्थिराऽस्तु त्वयि भक्तिस्तु वरमेतत् प्रयच्छ मे॥७१ | अन्धकने (विनीत भावसे) कहा—अम्बिका मेरी माता और आप त्र्यम्बक मेरे पिता हैं। अम्बिका मेरी वन्दनीया हैं। मैं उन माताके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। ईशान! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरे शरीरसम्बन्धी, मनसम्बन्धी एवं वचनसम्बन्धी पाप तथा नीच विचार नष्ट हो जायें। महेश्वर! मेरा दानवीय विचार भी दूर हो जाय एवं आपमें मेरी अटल भक्ति हो जाय—मुझे यही वर दीजिये॥६९-७१॥ | | महादेव उवाच<br>एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम्।<br>मुक्तोऽसि दैत्यभावाच्च भृङ्गी गणपतिर्भव॥७२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वरदः शूलाग्रादवतार्य तम्।<br>निर्मार्ज्य निजहस्तेन चक्रे निर्व्रणमन्धकम्॥७३<br><br>ततः स्वदेहतो देवान् ब्रह्मादीनाजुहाव सः।<br>ते निश्चेरुर्महात्मानो नमस्यन्तस्त्रिलोचनम्॥७४<br><br>गणान् सनन्दीनाहूय संनिवेश्य तदाग्रतः।<br>भृङ्गिनं दर्शयामास धुवं नैषोऽन्धकेति हि॥७५ | (भगवान्) महादेवने कहा—दैत्येन्द्र! ऐसा ही हो। तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँ। तुम दानवीय विचारसे मुक्त हो गये। अब तुम भृङ्गी नामके गणपति हो गये। इस प्रकार कहकर वरदानी महादेवने उस अन्धकको शूलकी नोकसे उतारा और अपने हाथसे सहलाकर बिना घावका कर दिया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीरमें स्थित ब्रह्मादि देवोंका आह्वान किया। वे सभी महान् देवगण त्र्यम्बक शिवको नमस्कार करते हुए बाहर निकले। नन्दीके साथ गणोंको बुलाकर और सामने बैठाकर भृङ्गीको दिखलाते हुए उन्होंने कहा—निश्चय ही यह अन्धक (पहले-जैसा) नहीं रह गया है॥७२-७५॥ | | तं दृष्ट्वा दानवपतिं संशुष्कपिशितं रिपुम्।<br>गणाधिपत्यमापन्नं प्रशंसुर्वृषध्वजम्॥७६ | उस सूखे हुए मांसवाले शत्रु दानवपतिको गणाधिप हुआ देखकर वे सभी वृषध्वज (शंकर) की प्रशंसा |