वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 354, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 354
३४४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो निशेरुरत्युग्राः शरा बर्हिणवाससः।<br>ब्रह्मेशविष्णुनामाङ्काः सूदयन्तोऽसुरान् रणे॥ १५२ | देवोंको मनसे नमस्कार करके उन्होंने प्रत्यञ्चा चढ़ाकर बाण संधान किया। उससे ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वरके नामोंसे अंकित मोरके पंख लगे हुए अत्यन्त भयंकर बाण निकले और असुरोंका संहार करने लगे॥ १४९—१५२॥ |
| आकाशं विदिशः पृथ्वीं दिशश्च स शरोत्करैः।<br>सहस्राक्षोऽतिपटुभिश्छादयामास नारद॥ १५३<br>गजो विद्धो हयो भिन्नः पृथिव्यां पतितो रथः।<br>महामात्रो धरां प्राप्तः सद्यः सीदच्छरातुरः॥ १५४<br>पदातिः पतितो भूम्यां शक्रमार्गणताडितः।<br>हतप्रधानभूयिष्ठं बलं तदभवद् रिपोः॥ १५५<br>तं शक्रबाणाभिहतं दुरासदं<br>सैन्यं समालक्ष्य तदा कुजम्भः।<br>जम्भासुरश्चापि सुरेशमव्ययं<br>प्रजग्मतुर्गृह्य गदे सुघोरे॥ १५६ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] नारदजी! उन इन्द्रने बड़ी चतुराईसे बाणोंकी बौछारसे आकाश, पृथ्वी, दिशाओं एवं विदिशाओंको छा (भर) दिया। हाथी बुरी तरह बिंध गये, घोड़े विदीर्ण हो गये, रथ पृथ्वीपर गिर पड़े एवं हाथीका संचालक (महावत) बाणोंसे व्याकुल होकर कराहता हुआ धरतीपर गिर गया। इन्द्रके बाणोंसे घायल हुए पैदल युद्ध करनेवाले वीर भूमिपर गिर पड़े। (इस प्रकार) शत्रु की उस सेनाके बहुतेरे प्रधान (वीर) मारे गये। उस दुर्धर्ष (अपराजेय) सेनाको इन्द्रके बाणोंसे मारी जाती हुई देखकर असुर कुजम्भ और जम्भ भयानक गदाओंको लेकर अविनाशी सुरेन्द्रकी ओर तेजीसे बढ़ चले॥ १५३—१५६॥ |
| तावापतन्तौ भगवान् निरीक्ष्य<br>सुदर्शनेनारिविनाशनेन ।<br>विष्णुः कुजम्भं निजघान वेगात्<br>स स्यन्दनाद् गामगमद् गतासुः॥ १५७<br>तस्मिन् हते भ्रातरि माधवेन<br>जम्भस्ततः क्रोधवशं जगाम।<br>क्रोधान्वितः शक्रमुपाद्रवद् रणे<br>सिंहं यथैणोऽतिविपन्नबुद्धिः॥ १५८<br>तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य शक्र-<br>स्त्यक्त्वैव चापं सशरं महात्मा।<br>जग्राह शक्तिं यमदण्डकल्पां<br>तामग्निदत्तां रिपवे ससर्ज॥ १५९<br>शक्तिं सघण्टां कृतनिःस्वनां वै<br>दृष्ट्वा पतन्तीं गदया जघान।<br>गदां च कृत्वा सहसैव भस्मसाद्<br>बिभेद जम्भं हृदये च तूर्णम्॥ १६०<br>शक्त्या स भिन्नो हृदये सुरारिः<br>पपात भूम्यां विगतासुरेव।<br>तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं<br>दैत्यास्तु भीता विमुखा बभूवुः॥ १६१<br>जम्भे हते दैत्यबले च भग्ने<br>गणास्तु हृष्टा हरिमर्चयन्तः।<br>वीर्यं प्रशंसन्ति शतक्रतोश्च<br>स गोत्रभिच्छर्वमुपेत्य तस्थौ॥ १६२ | भगवान् विष्णुने उन दोनों (कुजम्भ और जम्भ)-को शीघ्रतासे सामने आते देखकर शत्रु-संहारक सुदर्शनचक्रसे कुजम्भको मारा। वह प्राणहीन होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके द्वारा भाईके मारे जानेपर जम्भ क्रुद्ध हो गया। कुपित होकर वह युद्धमें इन्द्रकी ओर ऐसे दौड़ा, जैसे विचारशक्ति नष्ट हो जानेपर मृग सिंहकी ओर दौड़ता है। उसे आते देखकर महात्मा इन्द्रने धनुष-बाणको छोड़ अग्निद्वारा प्रदत्त यमदण्डके समान शक्तिको लेकर उसे शत्रु की ओर फेंका। घण्टासे घनघनाती हुई उस शक्तिको देखकर (जम्भने) उसपर बल लगाकर गदासे वार किया। (उस शक्तिने) गदाको एकाएक भस्मकर शीघ्र ही जम्भका हृदय (भी) विदीर्ण कर दिया। शक्तिसे हृदयके विदीर्ण हो जानेपर वह देवशत्रु असुर जम्भ प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे मरा और भूमिपर गिरा देख करके दैत्यगण डरकर पीठ दिखाकर भाग गये। जम्भके मारे जाने एवं दैत्यसेनाके हार जानेपर सभी गण हरिका अर्चन एवं इन्द्रके पराक्रमका गुणगान करने लगे। (फिर) वे इन्द्र शंकरके निकट जाकर खड़े हो गये॥ १५७—१६२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६९॥