वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६९] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३४३
| तं दृष्ट्वा देवताः पूज्य भार्यां चाद्भुतदर्शनाम्।<br>प्राह तत्त्वं न विन्दामि यत् पृच्छामि वदस्व तत्॥ १३८<br><br>बालस्यास्य द्वितीयस्य के भविष्यद्गुणा वद।<br>भाग्यानि चास्य यच्चोक्तं कर्म तत् कथयाधुना॥ १३९ | बालक पड़े हुए हैं। उन्हें देखकर उसने देवताओंकी पूजा करनेके बाद अपनी अद्भुत ज्ञानमती पत्नीसे कहा—मैं इसका रहस्य नहीं समझता। अतः मैं जो पूछता हूँ उसे बतलाओ। यह बतलाओ कि इस दूसरे बालकमें कौन-से गुण होंगे? उसके भाग्यों एवं कर्मोंको भी तुम अभी बतलाओ॥ १३६—१३९॥ |
| साऽब्रवीन्नाद्य ते वक्ष्ये वदिष्यामि पुनः प्रभो।<br>सोऽब्रवीद् वद मेऽद्यैव नोचेन्नाश्नामि भोजनम्॥ १४०<br><br>सा प्राह श्रूयतां ब्रह्मन् वदिष्ये वचनं हितम्।<br>कातरेणाद्य यत्पृष्टं भव्यः कारुरयं किल॥ १४१<br><br>इत्युक्तवति वाक्ये तु बाल एव त्वचेतनः।<br>जगाम साह्यं शक्रस्य कर्तुं सौत्यविशारदः॥ १४२<br><br>तं व्रजन्तं हि गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः।<br>ज्ञात्वेन्द्रस्यैव साहाय्ये तेजसा समवर्धयन्॥ १४३ | पत्नीने कहा—स्वामिन्! मैं तुम्हें आज नहीं बतलाऊँगी। फिर कभी दूसरे समय बतलाऊँगी। उन्होंने कहा—आज ही मुझे बताओ; अन्यथा मैं भोजन नहीं करूँगा। उसने कहा—ब्रह्मन्! आप सुनिये, आपने आर्त्ततासे जो पूछा है उस हितकर बातको मैं कहती हूँ। यह (बालक) निश्चय ही कारु (शिल्पी) होगा। ऐसा कहनेपर अज्ञान (अवस्थामें) होते हुए भी वह सूत-कर्ममें कुशल बालक इन्द्रकी सहायताके लिये गया। विश्वावसु आदि गन्धर्वोंने उस बालकको इन्द्रकी सहायताके लिये जाते हुए जानकर उसके तेजको बढ़ा दिया॥ १४०—१४३॥ |
| गन्धर्वतेजसा युक्तः शिशुः शक्रं समेत्य हि।<br>प्रोवाचैह्येहि देवेश प्रियो यन्ता भवामि ते॥ १४४<br><br>तच्छ्रुत्वास्य हरिः प्राह कस्य पुत्रोऽसि बालक।<br>संयन्ताऽसि कथं चाश्वान् संशयः प्रतिभाति मे॥ १४५<br><br>सोऽब्रवीदृषितेजोत्थं क्ष्माभवं विद्धि वासव।<br>गन्धर्वतेजसा युक्तं वाजियानविशारदम्॥ १४६<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवाञ्छक्रः खं भेजे योगिनां वरः।<br>स चापि विप्रतनयो मातलिर्नामविश्रुतः॥ १४७<br><br>ततोऽधिरूढस्तु रथं शक्रस्त्रिदशपुङ्गवः।<br>रश्मीन् शमीकतनयो मातलिः प्रगृहीतवान्॥ १४८ | गन्धर्वोंके तेजसे परिपूर्ण होकर बालकने इन्द्रके निकट जाकर कहा—देवेश! आइये, आइये! मैं आपका प्रिय सारथि बनूँगा। उसे सुनकर इन्द्रने कहा—हे बालक! तुम किसके पुत्र हो? तुम घोड़ोंको कैसे संयमित करोगे? इस विषयमें मुझे संदेह हो रहा है। उसने कहा—वासव! मुझे ऋषिके तेजसे बल-वैभवमें बढ़े, भूमिसे उत्पन्न एवं गन्धर्वोंके तेजसे युक्त अश्वयानमें पारंगत समझो। यह सुनकर योगिश्रेष्ठ भगवान् इन्द्र आकाशमें चले गये। मातलि नामसे विख्यात वह ब्राह्मणपुत्र भी आकाशमें चला गया। उसके बाद देवश्रेष्ठ इन्द्र रथपर चढ़ गये और शमीकपुत्र मातलिने प्रग्रह (लगाम) पकड़ लिया॥ १४४—१४८॥ |
| ततो मन्दरमागम्य विवेश रिपुवाहिनीम्।<br>प्रविशन् ददृशे श्रीमान् पतितं कार्मुकं महत्॥ १४९<br><br>सशरं पञ्चवर्णाभं सितरक्तासितारुणम्।<br>पाण्डुच्छायं सुरश्रेष्ठस्तं जग्राह समार्गणम्॥ १५०<br><br>ततस्तु मनसा देवान् रजःसत्त्वतमोमयान्।<br>नमस्कृत्य शरं चापे साधिज्ये विनियोजयत्॥ १५१ | उसके बाद मन्दरगिरिपर पहुँचकर वे (इन्द्र) शत्रुसेनामें प्रविष्ट हो गये। प्रवेश करते समय सुरश्रेष्ठ श्रीमान् (इन्द्र)-ने बाणयुक्त, सफेद, लाल, काला, उषाकालीन लालिमावाले एवं सफेद रंगसे मिले पीले रंगवाले—पाँचरंगे—एक महान् धनुषको पड़ा हुआ देखा और बाणके साथ ही उसे उठा लिया। उसके बाद रजःसत्त्वमोमय—त्रिगुणमय—(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) |