वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 352, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 352
| ३४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ ] |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमूचुर्देवगन्धर्वा मा विषादं व्रजेश्वर।<br>युध्यस्व त्वं समारुह्य प्रेषयिष्याम यद् रथम्॥ १२४<br>इत्येवमुक्त्वा विपुलं रथं स्वस्तिकलक्षणम्।<br>वानरध्वजसंयुक्तं हरिभिर्हरिभिर्युतम्॥ १२५<br>शुद्धजाम्बूनदमयं किङ्किणीजालमण्डितम्।<br>शक्राय प्रेषयामासुर्विश्वावसुपुरोगमाः॥ १२६<br>तमागतमुदीक्ष्याथ हीनं सारथिना हरिः।<br>प्राह योत्स्ये कथं युद्धे संयमिष्ये कथं हयान्॥ १२७ | देवताओं और गन्धर्वोंने उत्तर दिया—हे ईश्वर (इन्द्र)! आप चिन्तित न हों। हमलोग जो रथ भेज रहे हैं उसपर चढ़कर आप युद्ध करें। ऐसा कहकर विश्वावसु आदिने स्वस्तिकके आकारवाले कपिध्वजसे युक्त हरितवर्णके अश्वोंसे जुते शुद्ध स्वर्णसे बनाये गये तथा किंकिणीजालसे मण्डित विशाल रथ इन्द्रके लिये भेज दिया। इन्द्र सारथिसे रहित उस रथको देखकर बोले—मैं युद्धमें कैसे लडूंगा और कैसे घोड़ोंको संयत करूँगा—दोनों काम एक साथ कैसे होंगे?॥ १२४–१२७॥ |
| यदि कश्चिद्धि सारथ्यं करिष्यति ममाधुना।<br>ततोऽहं घातये शत्रून् नान्यथेति कथंचन॥ १२८<br>ततोऽब्रुवंस्ते गन्धर्वा नास्माकं सारथिर्विभो।<br>विद्यते स्वयमेवाश्वांस्त्वं संयन्तुमिहार्हसि॥ १२९<br>इत्येवमुक्ते भगवांस्त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम्।<br>क्ष्मातलं निपपातैव परिभ्रष्टस्रगम्बरः॥ १३०<br>चलनमौलिर्मुक्तकचः परिभ्रष्टायुधाङ्गदः।<br>पतमानं सहस्राक्षं दृष्ट्वा भूः समकम्पत॥ १३१ | इस समय मेरे सारथिका काम यदि कोई करे तो मैं शत्रुओंका नाश कर सकता हूँ; अन्य किसी प्रकार नहीं। उसके बाद गन्धर्वोंने कहा—विभो! हमारे पास कोई सारथि नहीं है। आप स्वयं घोड़ोंको नियन्त्रित कर सकते हैं। ऐसा कहनेपर भगवान् इन्द्र उत्तम रथको छोड़कर अस्त-व्यस्त हुए माल्य और वस्त्रोंके साथ पृथ्वीपर गिर गये। (पृथ्वीपर गिरते समय इन्द्रका) सिर काँप रहा था, उनके बाल बिखर गये थे और उनके आयुध तथा बाजूबंद नीचे गिर पड़े थे। इन्द्रको गिरते देख पृथ्वी काँपने लगी॥ १२८–१३१॥ |
| पृथिव्यां कम्पमानायां शमीकर्षेस्तपस्विनी।<br>भार्याऽब्रवीत् प्रभो बालं बहिः कुरु यथासुखम्॥ १३२<br>स तु शीलावचः श्रुत्वा किमर्थमिति चाब्रवीत्।<br>सा चाह श्रूयतां नाथ दैवज्ञपरिभाषितम्॥ १३३<br>यदेयं कम्पते भूमिस्तदा प्रक्षिप्यते बहिः।<br>यद्वाह्यतो मुनिश्रेष्ठ तद् भवेद् द्विगुणं मुने॥ १३४<br>एतद्वाक्यं तदा श्रुत्वा बालमादाय पुत्रकम्।<br>निराशङ्को बहिः शीघ्रं प्राक्षिपत् क्ष्मातले द्विजः॥ १३५ | पृथ्वीके काँपनेपर शमीक ऋषिकी तपस्विनी पत्नीने कहा—'प्रभो! बालकको सँभालकर बाहर ले जाइये। उन्होंने शीलाकी बात सुनकर कहा—क्यों? उसने कहा—हे नाथ! सुनिये, ज्योतिषियोंका कहना है कि इस भूमिके काँपनेपर वस्तुएँ बाहर निकाल दी जाती हैं; क्योंकि मुनिश्रेष्ठ! उस समय बाहरमें रखी हुई वस्तु दुगुनी हो जाती है। इस वाक्यको सुनकर उस समय ब्राह्मणने अपने बालक पुत्रको लेकर निःशंक हो पृथ्वीपर बाहर रख दिया'॥ १३२–१३५॥ |
| भूयो गोयुगलार्थाय प्रविष्टो भार्यया द्विजः।<br>निवारितो गता वेला अर्द्धहानिर्भविष्यति॥ १३६ | फिर दो गायोंके लिये भीतर प्रविष्ट होनेपर पत्नीने ब्राह्मणको निवारित करते हुए कहा—समय बीत चुका है; अब इस समय आधे भागकी हानि हो जायगी। |
| इत्येवमुक्ते देवर्षेर्बहिर्निर्गम्य वेगवान्।<br>ददर्श बालद्वितयं समरूपमवस्थितम्॥ १३७ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] देवर्षे! ऐसा कहनेपर (ब्राह्मणने) शीघ्रतासे बाहर निकलकर देखा कि समान आकारके दो |