भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 351
अध्याय ६९ ]शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश३४१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सहस्राक्षो जम्भवाक्यं निशम्य<br>भीतस्तूर्णं विष्णुमागान्महर्षे।<br>उपेत्याह श्रूयतां वाक्यमीश<br>त्वं मे नाथो भूतभव्येश विष्णो॥ १११<br>जम्भस्तर्जयतेऽत्यर्थं मां निरायुधमीक्ष्य हि।<br>आयुधं देहि भगवन् त्वामहं शरणं गतः॥ ११२<br><br>तमुवाच हरिः शक्रं त्यक्त्वा दर्पं व्रजाधुना।<br>प्रार्थयस्वायुधं वह्निं स ते दास्यत्यसंशयम्॥ ११३<br><br>जनार्दनवचः श्रुत्वा शक्रस्त्वरितविक्रमः।<br>शरणं पावकमगादिदं चोवाच नारद॥ ११४महर्षे! जम्भका वचन सुनकर भयभीत होकर इन्द्र जल्दीसे विष्णुके समीप चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने कहा—हे ईश! आप मेरी बात सुनें। हे भूत तथा भव्यके स्वामी विष्णो! आप मेरे स्वामी हैं॥ १०८—१११॥<br><br>जम्भ मुझे शस्त्रास्त्रसे रहित देखकर बहुत अधिक ललकार रहा है। भगवन्! आप मुझे आयुध दें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। विष्णुने इन्द्रसे कहा—इस समय (अपने पदके) अहंकारको छोड़कर तुम अग्निदेवके पास जाओ और उनसे आयुधके लिये प्रार्थना करो। वे निस्सन्देह तुम्हें आयुध प्रदान करेंगे। नारदजी! जनार्दनकी बात सुनकर तीव्र गतिवाले इन्द्र अग्निकी शरणमें चले गये और उनसे उन्होंने कहा— ॥ ११२—११४॥
शक्र उवाच<br>निघ्नतो मे बलं वज्रं कृशानो शतधा गतम्।<br>एष चाहूयते जम्भस्तस्माद्देह्यायुधं मम॥ ११५इन्द्रने कहा—अग्निदेव! बलको मारनेमें मेरा वज्र सैकड़ों टुकड़े हो गया; यह जम्भ मुझे ललकार रहा है। अतः आप मुझे आयुध प्रदान करें॥ ११५॥
पुलस्त्य उवाच<br>तमाह भगवान् वह्निः प्रीतोऽस्मि तव वासव।<br>यत्त्वं दर्पं परित्यज्य मामेव शरणं गतः॥ ११६<br><br>इत्युच्चार्य स्वशक्त्यास्तु शक्तिं निष्क्रम्य भावतः।<br>प्रादादिन्द्राय भगवान् रोचमानो दिवं गतः॥ ११७<br><br>तामादाय तदा शक्तिं शतघण्टां सुदारुणाम्।<br>प्रत्युद्ययौ तदा जम्भं हन्तुकामोऽरिमर्दनः॥ ११८<br><br>तेनातियशसा दैत्यः सहसैवाभिसंवृतः।<br>क्रोधं चक्रे तदा जम्भो निजघान गजाधिपम्॥ ११९पुलस्त्यजी बोले—भगवन्! अग्निदेवने उनसे कहा—वासव! मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ; क्योंकि आप अहंकार छोड़कर मेरी शरणमें आये हैं। ऐसा कहनेके बाद प्रकाशयुक्त भगवान् अग्निदेवने भावपूर्वक अपनी शक्तिसे एक दूसरी शक्ति निकालकर उसे इन्द्रको दे दिया और वे स्वर्ग चले गये। शत्रुकां मर्दन करनेवाले इन्द्र सैकड़ों घण्टाओंसे युक्त उस भीषण शक्तिको लेकर जम्भको मारनेके लिये चले गये। उन अत्यन्त यशस्वीके सहसा पीछा करनेपर जम्भने कोपपूर्वक गजाधिप (ऐरावत)-पर वार कर दिया॥ ११६—११९॥
जम्भमुष्टिनिपातेन भग्नकुम्भकटो गजः।<br>निपपात यथा शैलः शक्रवज्रहतः पुरा॥ १२०<br><br>पतमानाद् द्विपेन्द्रात्तु शक्रश्चाप्लुत्य वेगवान्।<br>त्यक्त्वैव मन्दरगिरिं पपात वसुधातले॥ १२१<br><br>पतमानं हरिं सिद्धाश्चारणाश्च तदाऽब्रुवन्।<br>मा मा शक्र पतस्वाद्य भूतले तिष्ठ वासव॥ १२२<br><br>स तेषां वचनं श्रुत्वा योगी तस्थौ क्षणं तदा।<br>प्राह चैतान् कथं योत्स्ये अपत्रः शत्रुभिः सहः॥ १२३जम्भकी मुट्ठीके आघातसे हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण हो गया। उसके बाद वह इस प्रकार गिर पड़ा जैसे पूर्वकालमें इन्द्रके वज्रसे आहत होकर पर्वत गिरता था। इन्द्र गिरते हुए गजेन्द्रसे वेगपूर्वक उछले और मन्दर-पर्वतको भी छोड़कर पृथ्वकी ओर नीचे गिर पड़े। उसके बाद गिरते हुए इन्द्रसे सिद्धों एवं चारणोंने कहा—इन्द्र! आप पृथ्वीपर न गिरें। आप रुकें। उनकी बात सुनकर योगी इन्द्र उस समय क्षणभरके लिये रुक गये और बोले—मैं बिना वाहनके इन शत्रुओंसे कैसे लडूंगा?॥ १२०—१२३॥