वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| ३४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रावर्तत महायुद्धं प्रमथासुरयोरथ।<br>ततोऽमरगणश्रेष्ठो विष्णुश्चक्रगदाधरः॥ ९८<br>निजघानासुरबलं शङ्करप्रियकाम्यया।<br>शार्ङ्गचापच्युतैर्बाणैः संस्यूता दानवर्षभाः॥ ९९<br>पञ्च षट् सप्त चाष्टौ वा ब्रध्नपादैर्घना इव।<br>गदया कांश्चिदवधीच्चक्रेणान्याञ् जनार्दनः॥ १००<br>खड्गेन च चकर्तान्यान् दृष्ट्यान्यान् भस्मसाद् व्यधात्।<br>हलेनाकृष्य चैवान्यान् मुसलेन व्यचूर्णयत्॥ १०१ | लड़ाई होने लगी। उसके बाद अमरगणोंमें श्रेष्ठ चक्र एवं गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान् शंकरका प्रिय करनेकी इच्छासे असुर-सेनाका संहार करने लगे। शार्ङ्ग नामक धनुषसे निकले हुए बाणोंसे पाँच-पाँच, छः-छः, सात-सात, आठ-आठ श्रेष्ठ दानव उसी प्रकार विदीर्ण होने लगे जैसे सूर्यकी किरणोंसे 'घन' (अन्धकार) विदीर्ण हो जाते हैं। जनार्दनने कुछको गदासे तथा कुछको चक्रसे मार डाला। किन्हींको तलवारसे काट डाला और किन्हींको देखकर ही भस्म कर दिया तथा कुछ असुरोंको हलद्वारा खींचकर मूसलसे चूर्ण-विचूर्ण कर दिया॥ ९८—१०१॥ |
| गरुडः पक्षपाताभ्यां तुण्डेनाप्युरसाऽहनत्।<br>स चादिपुरुषो धाता पुराणः प्रपितामहः॥ १०२<br>भ्रामयन् विपुलं पद्ममभ्यषिञ्चत वारिणा।<br>संस्पृष्टा ब्रह्मतोयेन सर्वतीर्थमयेन हि॥ १०३<br>गणामरगणाश्चासन् नवनागशताधिकाः।<br>दानवास्तेन तोयेन संस्पृष्टाश्चाघहारिणा॥ १०४<br>सवाहनाः क्षयं जग्मुः कुलिशेनेव पर्वताः।<br>दृष्ट्वा ब्रह्महरी युद्धे घातयन्तौ महासुरान्॥ १०५<br>शतक्रतुश्च दुद्राव प्रगृह्य कुलिशं बली।<br>तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलो दानवसत्तमः॥ १०६<br>मुक्त्वा देवं गदापाणिं विमानस्थं च पद्मजम्।<br>शक्रमेवाद्रवद् योद्धुं मुष्टिमुद्यम्य नारद।<br>बलवान् दानवपतिरजेयो देवदानवैः॥ १०७ | गरुड़ने अपने दोनों डैनोंकी मारसे चोंच तथा छातीके बलसे अनेक दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया। पुरातन आदिपुरुष धाता प्रपितामहने विशाल कमलको घुमाते हुए सभी (देवगणों)-को जलसे अभिषिञ्चित किया। सर्वतीर्थरूप ब्रह्म जलका स्पर्श होनेसे गण तथा देवतालोग नौजवान हाथियोंसे भी अधिक पराक्रमवाले हो गये। और सौ, पाप दूर करनेवाले उस जलके स्पर्शके प्रभावसे सवारीके साथ दानव ऐसे नष्ट होने लगे जैसे वज्रसे पर्वत नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मा और विष्णुको संग्राममें महासुरोंको मारते देखकर (उत्साहमें आकर) बलशाली इन्द्र भी अपना वज्र लेकर दौड़ पड़े। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] नारदजी! उन्हें आते देखकर देवों तथा दानवोंसे अजेय शक्तिशाली श्रेष्ठ दानवपति बल, गदाधर विष्णु और विमानारूढ़ ब्रह्मासे लड़ना छोड़कर मुट्ठी तानकर इन्द्रसे ही युद्ध करनेके लिये दौड़ पड़ा॥ १०२—१०७॥ |
| तमापतन्तं त्रिदशेश्वरस्तु<br>दोष्णां सहस्रेण यथाबलेन।<br>वज्रं परिभ्राम्य बलस्य मूर्ध्नि<br>चिक्षेप हे मूढ हतोऽस्युदीर्य॥ १०८ | उसे आते देखकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने हजारों भुजाओंसे अपनी शक्तिभर वज्रको घुमाते हुए उसे बलके सिरपर 'हे मूढ! अब तुम मारे गये'—कहकर फेंक दिया। |
| स तस्य मूर्ध्नि प्रवरोऽपि वज्रो<br>जगाम तूर्णं हि सहस्रधा मुने।<br>बलोऽद्रवद् देवपतिश्च भीतः<br>पराङ्मुखोऽभूत् समरान्महर्षे॥ १०९ | मुने! वह श्रेष्ठ वज्र भी उसके सिरपर शीघ्र ही हजारों टुकड़ोंमें टूक-टूक हो गया। (फिर) बल (इन्द्रकी ओर) दौड़ा। महर्षे! देवराज भयभीत होकर युद्धसे विमुख हो गये—भाग गये। |
| तं चापि जम्भो विमुखं निरीक्ष्य<br>भूत्वाऽग्रतः प्राह न युक्तमेतत्।<br>तिष्ठस्व राजाऽसि चराचरस्य<br>न राजधर्मे गदितं पलायनम्॥ ११० | उन्हें विमुख होकर भागते देख जम्भने आगे आकर कहा कि यह उचित नहीं है। रुकिये; आप समस्त स्थावर-जङ्गमके राजा हैं। राजधर्ममें लड़ाईके मैदानसे भागनेका नियम नहीं है। |