वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हस्तमालम्ब्य सुन्दस्य अन्धको हरमन्दिरम्।<br>विवेश निर्विशङ्केन चित्तेनासुरसत्तमः ॥ ८३<br>ततो गिरिसुता दूरादायान्तं वीक्ष्य चान्धकम्।<br>महेश्वरवपुश्छन्नं प्रहारैर्जर्जरच्छविम् ॥ ८४<br>सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशत् ततः।<br>तं दृष्ट्वा मालिनीं प्राह सुयशां विजयां जयाम् ॥ ८५ | असुरश्रेष्ठ अन्धक सुन्दका हाथ पकड़कर निडर होकर महादेवके मन्दिरमें घुस गया। उसके बाद शैलादि नन्दीके रूपमें स्थित सुन्दको पकड़कर मारोंसे जर्जर महादेवके शरीरमें छिपे अन्धकको दूरसे आते देखकर पार्वतीजीने यशस्विनी मालिनी, विजया तथा जयासे कहा— ॥ ८२–८५ ॥ |
| जये पश्यस्व देवस्य मदर्थे विग्रहं कृतम्।<br>शत्रुभिर्दानववरैस्तदुत्तिष्ठस्व सत्वरम् ॥ ८६<br>घृतमानय पौराणं बीजिकां लवणं दधि।<br>व्रणभङ्गं करिष्यामि स्वयमेव पिनाकिनः ॥ ८७<br>कुरुष्व शीघ्रं सुयशे स्वभर्तुर्व्रणनाशनम्।<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं समुत्थाय वरासनात् ॥ ८८<br>अभ्युद्ययौ तदा भक्त्या मन्यमाना वृषध्वजम्।<br>शूलपाणेस्ततः स्थित्वा रूपं चिह्नानि यत्नतः ॥ ८९<br>अन्विषेष ततो ब्रह्मन्नोभौ पार्श्वस्थितौ वृषौ।<br>सा ज्ञात्वा दानवं रौद्रं मायाच्छादितविग्रहम् ॥ ९० | जये! देखो, मेरे स्वामीके शरीरको मेरे लिये दानव-शत्रुओंने किस प्रकार जर्जरित कर डाला है। इसलिये अविलम्ब उठो। पुराना घी, बीजिका, लवण और दही ले आओ। पिनाक धारण करनेवाले शंकरके घावोंको मैं स्वयं ही भरूँगी। यशस्विनि! शीघ्र अपने स्वामीके घावोंको भरो—ऐसा कहते हुए आसनसे उठकर उसे वृषध्वज शंकर समझती हुई वे भक्तिपूर्वक उसके पास गयीं। उसके बाद खड़ी होकर वे शंकरके रूप एवं चिह्नोंको भलीभाँति देखने लगीं। ब्रह्मन्! उन्होंने देखा कि उसकी बगलमें स्थित दोनों वृष नहीं हैं। इसलिये उन्हें यह मालूम हो गया कि यह मायासे छिपे शरीरवाला भयानक दानव है॥ ८६–९० ॥ |
| अपयानं तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने।<br>देव्याश्चिन्तितमाज्ञाय सुन्दं त्यक्त्वान्धकोऽसुरः ॥ ९१<br>समाद्रवत वेगेन हरकान्तां विभावरीम्।<br>समाद्रवत दैतेयो येन मार्गेण साऽगमत् ॥ ९२<br>अपस्कारान्तरं भञ्जन् पादप्लुतिभिराकुलः।<br>तमापतन्तं दृष्ट्वैव गिरिजा प्राद्रवद् भयात् ॥ ९३<br>गृहं त्यक्त्वा ह्युपवनं सखीभिः सहिता तदा।<br>तत्राप्यनुजगामासौ मदान्धो मुनिपुङ्गव ॥ ९४<br>तथापि न शशापैनं तपसो गोपनाय तु।<br>तद्भयादाविशद् गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥ ९५ | मुने! उसके बाद गिरिराजकी कन्या भाग चलीं। देवीके विचारको समझकर अन्धकासुर सुन्दको छोड़कर शीघ्रतापूर्वक शंकरप्रिया विभावरीके पीछे उसी रास्तेसे दौड़ा, जिससे वे गयी थीं। चरणके चपेटोंसे राहकी रुकावटोंको चूर-चूर करते हुए वह अधीरतापूर्वक दौड़ पड़ा। उसे आते देखकर गिरितनया भयसे (और) भाग चलीं। मुनिवर! उसके बाद देवी सखियोंके साथ घर छोड़कर उपवनमें चली गयीं। वहाँ भी मदान्ध (अन्धक)-ने उनका पीछा किया। इतनेपर भी अपने तपकी रक्षाके लिये उन्होंने उसे शाप नहीं दिया। किंतु गौरी स्वयं उसके डरसे पवित्र सफेद अर्कके फूलमें छिप गयीं ॥ ९१–९५ ॥ |
| विजयाद्या महागुल्मे सम्प्रयाता लयं मुने।<br>नष्टायामथ पार्वत्यां भूयो हैरण्यलोचनिः ॥ ९६<br>सुन्दं हस्ते समादाय स्वसैन्यं पुनरागमत्।<br>अन्धके पुनरायाते स्वबलं मुनिसत्तम ॥ ९७ | मुने! विजया आदि भी घनी झाड़ियोंमें छिप गयीं। उसके बाद पार्वतीके अदृश्य हो जानेपर हिरण्याक्षका पुत्र (अन्धक) सुन्दका हाथ पकड़कर पुनः अपनी सेनामें वापस आ गया। मुनिसत्तम! अन्धकके अपनी सेनामें पुनः लौट आनेपर प्रमथों और असुरोंमें घमासान |