वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| ३३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तु देवैः सगणैः दानवाः शर्वपालितैः ।<br>पराजीयन्त संग्रामे भूयो भूयस्त्वहर्निशम् ॥ ६८<br><br>ततस्त्रिनेत्रः स्वां संध्यां सप्ताब्दशतिके गते ।<br>कालेऽभ्युपासत तदा सोऽष्टादशभुजोऽव्ययः ॥ ६९ | अत्यन्त कुपित होकर युद्ध करने लगे। उसके बाद शम्भुसे पालित गणों एवं देवोंने युद्धमें दानवोंको दिन-रात बारम्बार हराया। उसके बाद सात सौ वर्षोंका समय बीत जानेपर अठारह भुजाओंवाले अविनाशी त्र्यम्बक शंकर अपनी नित्यक्रियाकी सन्ध्या करने लगे॥ ६८–६९॥ |
| संस्पृश्यापः सरस्वत्यां स्नात्वा च विधिना हरः ।<br>कृतार्थो भक्तिमान् मूर्ध्ना पुष्पाञ्जलिमुपाक्षिपत् ॥ ७०<br><br>ततो ननाम शिरसा ततश्चक्रे प्रदक्षिणम् ।<br>हिरण्यगर्भेत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ॥ ७१<br><br>त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् ।<br>ननर्त भावगम्भीरं दोर्दण्डं भ्रामयन् बलात् ॥ ७२<br><br>परिनृत्यति देवेशे गणाश्चैवामरास्तथा ।<br>नृत्यन्ते भावसंयुक्ता हरस्यानुविलासिनः ॥ ७३ | उन भक्तिमान् शंकरने जलका स्पर्शकर (आचमनकर) विधिपूर्वक सरस्वतीमें स्नान किया। वे कृतार्थ हो गये। उन्होंने पुष्पाञ्जलि सिरसे लगाकर समर्पित की। उसके बाद उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम एवं उसके पश्चात् प्रदक्षिणा कर 'हिरण्यगर्भ' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यकी वन्दना की और जप किया। उसके बाद 'त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु' इसका स्पष्टरूपसे उच्चारण कर शूलपाणि शंकर बलपूर्वक अपना बाहुदण्ड घुमाते हुए भाव-गम्भीर होकर नाचने लगे। देवेश्वरके नाचनेपर उनके अनुगामी गण और देवता भी (वैसे ही) भाव-विभोर होकर नाचने लगे॥ ७०–७३॥ |
| सन्ध्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया ।<br>युद्धाय दानवैः सार्द्धं मतिं भूयः समादधे ॥ ७४<br><br>ततोऽमरगणैः सर्वैस्त्रिनेत्रभुजपालितैः ।<br>दानवा निर्जिताः सर्वे बलिभिर्भयवर्जितैः ॥ ७५<br><br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा मत्वाऽजेयं च शङ्करम् ।<br>अन्धकः सुन्दमाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७६<br><br>सुन्द भ्राताऽसि मे वीर विश्वास्यः सर्ववस्तुषु ।<br>तद्ददाम्यद्य यद्वाक्यं तच्छ्रुत्वा यत्क्षमं कुरु ॥ ७७ | सन्ध्योपासन करके इच्छानुकूल नृत्य करनेके बाद शंकरने फिर दानवोंसे संग्राम करनेका विचार किया। फिर तो शंकरकी भुजाओंसे रक्षित बलशाली और निर्भय सम्पूर्ण देवताओंने सारे दानवोंको जीत लिया। अपनी सेनाको पराजित देखकर तथा महादेवको पराजित करनेमें कठिनाई जान करके अन्धकने सुन्दको बुलाकर यह वचन कहा—वीर सुन्द! तुम मेरे भाई हो और सभी विषयोंमें तुम मेरे विश्वासी हो। इसलिये आज मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे सुनकर यथाशक्ति उसे पूर्ण करो॥ ७४–७७॥ |
| दुर्जयोऽसौ रणपटुर्धर्मात्मा कारणान्तरैः ।<br>समासते हि हृदये पद्माक्षी शैलनन्दिनी ॥ ७८<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छामो यत्रास्ते चारुहासिनी ।<br>तत्रैनां मोहयिष्यामि हररूपेण दानव ॥ ७९<br><br>भवान् भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः ।<br>ततो गत्वाऽथ भुक्त्वा तां जेष्यामि प्रमथान् सुरान् ॥ ८०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने बाढं सुन्दोऽभ्यभाषत ।<br>समजायत शैलादिरन्धकः शङ्करोऽप्यभूत् ॥ ८१ | किन्हीं मुख्य कारणोंसे युद्ध करनेमें परम चतुर ये धर्मात्मा दुर्जय हैं। मेरे हृदयमें कमलनयनी पार्वती बसी हुई है। अतः उठो; हम वहाँ चलें, जहाँ वह मधुर मुसकानवाली स्थित है। दानव! वहाँ मैं शंकरका रूप धारण करके उसे मुग्ध कर दूँगा (भुलावेमें डाल दूँगा)। तुम शंकरका अनुचर गणेश्वर नन्दी बनो। तब वहाँ पहुँच करके और उसका सुख भोगकर प्रमथों एवं देवोंको जीतूँगा। ऐसा कहनेपर सुन्दने कहा—ठीक है। उसके बाद वह शैलादि (नन्दी) बन गया और अन्धक शिव बन गया॥ ७८–८१॥ |
| नन्दिरुद्रौ ततो भूत्वा महासुरचमूपती ।<br>सम्प्राप्तौ मन्दरगिरिं प्रहारैः क्षतविग्रहौ ॥ ८२ | उसके बाद महासुर (अन्धक) और सेनापति (सुन्द) शस्त्रास्त्रोंकी मारसे अधिक घायल हुए शरीरवाले रुद्र और नन्दीका रूप धारण कर मन्दरगिरिपर पहुँचे। |