वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| शम्भुनामाऽसुरपतिः स ब्रह्माणमयोधयत्।<br>महौजसं कुजम्भश्च विष्णुं दैत्यान्तकारिणम्॥ ५३<br>विवस्वन्तं रणे शाल्वो वरुणं त्रिशिरास्तथा।<br>द्विमूर्धा पवनं सोमं राहुर्मित्रं विरूपधृक्॥ ५४<br>अष्टौ ये वसवः ख्याता धराद्यास्ते महासुरान्।<br>अष्टावेव महेष्वासान् वारयामासुराहवे॥ ५५<br>सरभः शलभः पाकः पुरोऽथ विपृथुः पृथुः।<br>वातापी चेल्वलश्चैव नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः॥ ५६<br>विश्वेदेवगणान् सर्वान् विष्वक्सेनपुरोगमान्।<br>एक एव रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः॥ ५७ | शम्भु नामका असुरराज ब्रह्मासे लड़ने लगा और कुजम्भ दैत्योंका अन्त करनेवाले महान् ओजस्वी विष्णुसे युद्ध करने लगा। शाल्व सूर्यसे, त्रिशिरा वरुणसे, द्विमूर्धा पवनसे, राहु सोमसे और विरूपधृक् मित्रसे लड़ने लगा। धरादि नामसे विख्यात आठ वसुओंने सरभ, शलभ, पाक, पुर, विपृथु, पृथु, वातापी और इल्वल—इन आठ महान् धनुर्धारी असुरोंको युद्धमें लड़कर (पीछे) हटा दिया। ये असुर भाँति-भाँतिके शस्त्र और अस्त्र लेकर लड़ने लगे। कालनेमि नामका भयंकर महासुर युद्धमें अकेला ही विष्वक्सेन आदि विश्वेदेव गणोंसे युद्ध करने लगा॥ ५३—५७॥ |
| एकादशैव ये रुद्रास्तानेकोऽपि रणोत्कटः।<br>योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः॥ ५८<br>द्वावश्विनौ च नरको भास्करानेव शम्बरः।<br>साध्यान् मरुद्गणांश्चैव निवातकवचादयः॥ ५९<br>एवं द्वन्द्वसहस्त्राणि प्रमथामरदानवैः।<br>कृतानि च सुराब्दानां दशतीः षण्महामुने॥ ६०<br>यदा न शकिता योद्धुं दैवतैरमरारयः।<br>तदा मायां समाश्रित्य ग्रसन्तः क्रमशोडव्ययान्॥ ६१ | रणमें उत्कट तेजवाले विद्युन्माली नामके महासुरने अकेले ही एकादश रुद्रोंका (डटकर) सामना किया। नरकने दोनों अश्विनीकुमारोंसे, शम्बरने (द्वादश) भास्करोंसे एवं निवातकवचादिने साध्यों तथा मरुद्गणोंसे युद्ध किया। महामुने! इस प्रकार आठ दिव्य वर्षोंतक प्रमथों एवं दानवोंके हजारोंकी संख्यामें दो-दो लड़ाके वीर आपसमें द्वन्द्वयुद्ध करते रहे। जब असुरगण इस प्रकार देवोंसे युद्ध करनेमें समर्थहीन हो गये, तब उन लोगोंने मायाका सहारा लेकर देवोंको क्रमशः निगलना प्रारम्भ कर दिया॥ ५८—६१॥ |
| ततोऽभवच्छैलपृष्ठं प्रावृडभ्रसमप्रभैः।<br>आवृतं वर्जितं सर्वैः प्रमथैरमरैरपि॥ ६२<br>दृष्ट्वा शून्यं गिरिप्रस्थं ग्रस्तांश्च प्रमथामरान्।<br>क्रोधादुत्पादयामास रुद्रो जृम्भायिकां वशी॥ ६३<br>तया स्पृष्टा दनुसुता अलसा मन्दभाषिणः।<br>वदनं विकृतं कृत्वा मुक्तशस्त्रं विजृम्भिरे॥ ६४<br>जृम्भमाणेषु च तदा दानवेषु गणेश्वराः।<br>सुराश्च निर्ययुस्तूर्णं दैत्यदेहेभ्य आकुलाः॥ ६५ | उसके बाद सारे प्रमथों और देवोंसे रहित पर्वत वर्षाकालीन मेघके समान दानवोंसे ढक गया। पर्वतप्रान्तको शून्य और प्रमथों तथा देवोंको ग्रसित हुआ देखकर विजितेन्द्रिय रुद्रने क्रोधसे जृम्भायिकाको उत्पन्न किया। उसके स्पर्श करनेपर अस्त्रोंको छोड़कर धीरे-धीरे बोलते हुए आलस्यसे पूर्ण दानव मुखको विवर्ण बनाकर जँभाई लेने लगे। दानवोंके जँभाई लेते समय आकुल होकर गणेश्वर एवं देवतालोग दैत्योंकी देहसे अविलम्ब बाहर निकल गये॥ ६२—६५॥ |
| मेघप्रभेभ्यो दैत्येभ्यो निर्गच्छन्तोऽमरोत्तमाः।<br>शोभन्ते पद्मपत्राक्षा मेघेभ्य इव विद्युततः॥ ६६<br>गणामरेषु च समं निर्गतेषु तपोधन।<br>अयुध्यन्त महात्मानो भूय एवातिकोपिताः॥ ६७ | मेघके समान दैत्योंके शरीरसे बाहर निकल रहे कमलके सदृश आँखोंवाले श्रेष्ठ देवगण बादलसे निकलनेवाली बिजलीकी भाँति शोभित हो रहे थे। तपोधन! गणों और देवोंके बाहर आ जानेपर वे महान् (दैत्य) |