भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६१

| शुक्र उवाच<br>विश्वरूप महारूप विश्वरूपाक्षसूत्रधृक्।<br>सहस्राक्ष महादेव त्वामहं शरणं गतः॥ ४०<br>नमोऽस्तु ते शङ्कर शर्व शम्भो<br>सहस्रनेत्राङ्घ्रिभुजङ्गभूषण ।<br>दृष्ट्वैव सर्वान् भुवनांस्तवोदरे<br>श्रान्तो भवन्तं शरणं प्रपन्नः॥ ४१<br>इत्येवमुक्ते वचने महात्मा<br>शम्भुर्वचः प्राह ततो विहस्य।<br>निर्गच्छ पुत्रोऽसि ममाधुना त्वं<br>शिश्नेन भो भार्गववंशचन्द्र॥ ४२<br>नाम्ना तु शुक्रेति चराचरास्त्वां<br>स्तोष्यन्ति नैवात्र विचारमन्यत्।<br>इत्येवमुक्त्वा भगवान् मुमोच<br>शिश्नेन शुक्रं स च निर्जगाम॥ ४३<br>विनिर्गतो भार्गववंशचन्द्रः<br>शुक्रत्वमापद्य महानुभावः।<br>प्रणम्य शम्भुं स जगाम तूर्णं<br>महासुराणां बलमुत्तमौजाः॥ ४४ | शुक्रने कहा— हे विश्वरूप! हे महारूप! हे विश्वरूपाक्ष! हे सूत्रधारिन्! हे सहस्राक्ष! हे महादेव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शङ्कर! हे शर्व! हे शम्भो! हे सहस्रनेत्राङ्घ्रि! हे भुजङ्गभूषण! आपके उदरमें सभी भुवनोंको देखते-देखते थककर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। इस प्रकारके वचन कहनेपर महात्मा शम्भुने हँसकर यह वचन कहा—अब तुम मेरे पुत्र हो गये हो। इसलिये हे भार्गववंशके चन्द्र! मेरे शिश्नसे बाहर निकलो। अब समस्त चराचर जगत् तुम्हारी स्तुति शुक्रके नामसे करेगा। इसमें किसी अन्य प्रकारके विचारका स्थान नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्‌ने शिश्न-मार्गसे शुक्रको मुक्त कर दिया और वे बाहर निकल आये। शुक्रत्व प्राप्तकर बाहर निकले ओजस्वी महानुभाव भार्गववंशचन्द्र शम्भुको प्रणामकर शीघ्र महासुरोंकी सेनामें चले गये॥ ४०—४४॥ | | भार्गवे पुनरायाते दानवा मुदिताभवन्।<br>पुनर्युद्धाय विदधुर्मतिं सह गणेश्वरैः॥ ४५<br>गणेश्वरास्तानसुरान् सहामरगणैरथ।<br>युयुधुः संकुलं युद्धं सर्व एव जयेप्सवः॥ ४६<br>ततोऽसुरगणानां च देवतानां च युध्यताम्।<br>द्वन्द्वयुद्धं समभवद् घोररूपं तपोधन॥ ४७<br>अन्धको नन्दिनं युद्धे शङ्कुकर्णं त्वयःशिराः।<br>कुम्भध्वजं बलिर्धीमान् नन्दिषेणं विरोचनः॥ ४८ | शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर दानव प्रसन्न हो गये। उन्होंने गणेश्वरोंके साथ फिर युद्ध करनेका विचार किया। उसके बाद देवताओंसहित विजयकी कामनावाले सभी गणेश्वरोंने उन असुरोंसे भयंकर युद्ध किया। हे तपोधन! उसके बाद युद्ध करनेमें लगे हुए असुरगणों एवं देवताओंमें भयानक द्वन्द्वयुद्ध हुआ। अन्धक नन्दीके साथ, अयःशिरा शंकुकर्णके साथ, बुद्धिमान् बलि कुम्भध्वजके साथ एवं विरोचन नन्दिषेणके साथ भिड़ गये॥ ४५—४८॥ | | अश्वग्रीवो विशाखं च शाखो वृत्रमयोधयत्।<br>बाणस्तथा नैगमेयं बलं राक्षसपुङ्गवः॥ ४९<br>विनायको महावीर्यः परश्वधधरो रणे।<br>संक्रुद्धो राक्षसश्रेष्ठं तुहुण्डं समयोधयत्।<br>दुर्योधनश्च बलिनं घण्टाकर्णमयोधयत्॥ ५०<br>हस्ती च कुण्डजठरं ह्रादो वीरं घटोदरम्।<br>एते हि बलिनां श्रेष्ठा दानवाः प्रमथास्तथा।<br>संयोधयन्ति देवर्षे दिव्याब्दानां शतानि षट्॥ ५१<br>शतक्रतुमथायान्तं वज्रपाणिमभिस्थितम्।<br>वारयामास बलवाञ् जम्भो नाम महासुरः॥ ५२ | अश्वग्रीव विशाखके साथ और शाख वृत्रके साथ, बाण नैगमेयके साथ और राक्षसपुंगव बलके साथ लड़ने लगा। युद्धमें कुपित होकर परशु धारण करनेवाले महापराक्रमी विनायक राक्षसश्रेष्ठ तुहुण्डके साथ भिड़ गये और दुर्योधन बलशाली घण्टाकर्णके साथ युद्ध करने लगा। हस्ती कुण्डजठरके साथ और ह्राद वीर घटोदरसे लड़ने लगा। देवर्षे! बलवानोंमें श्रेष्ठ ये सभी दानव एवं प्रमथगण आपसमें छः सौ दिव्य वर्षोंतक संग्राम करते रहे। जम्भ नामके बलशाली असुरने सामने आ रहे वज्रपाणि इन्द्रको रोक लिया॥ ४९—५२॥ |