वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३५ |
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| शुक्र उवाच<br>वरदाय नमस्तुभ्यं हराय गुणशालिने।<br>शङ्कराय महेशाय त्र्यम्बकाय नमो नमः॥ २९<br>जीवनाय नमस्तुभ्यं लोकनाथ वृषाकपे।<br>मदनाग्ने कालशत्रो वामदेवाय ते नमः॥ ३०<br>स्थाणवे विश्वरूपाय वामनाय सदागते।<br>महादेवाय शर्वाय ईश्वराय नमो नमः॥ ३१<br>त्रिनयन हर भव शङ्कर उमापते जीमूतकेतो<br>गुहागृहश्मशाननिरत भूतिविलेपन शूलपाणे पशुपते<br>गोपते तत्पुरुषसत्तम नमो नमस्ते।<br>इत्थं स्तुतः कविवरेण हरोऽथ भक्त्या<br>प्रीतो वरं वरय दद्मि तवेत्युवाच।<br>स प्राह देववर देहि वरं ममाद्य<br>यद्वै तवैव जठरात् प्रतिनिर्गमोऽस्तु ॥ ३२<br>ततो हरोऽक्षीणि तदा निरुध्य<br>प्राह द्विजेन्द्राद्य विनिर्गमस्व।<br>इत्युक्तमात्रो विभुना चचार<br>देवोदरे भार्गवपुङ्गवस्तु ॥ ३३ | शुक्रने कहा— प्रभो ! गुणसे सम्पन्न आप वरदानी हरको नमस्कार है। शंकर, महेश, त्रिनेत्रको बार-बार नमस्कार है। लोकोंके स्वामिन् ! वृषाकपे ! आप जीवनस्वरूपको नमस्कार है। हे कामदेवके लिये अग्निस্বরূপ ! कालशत्रो ! आप वामदेवको नमस्कार है। स्थाणु, विश्वरूप, वामन, सदागति, महादेव, शर्व और ईश्वर ! आपको बार-बार नमस्कार है। हे त्रिनयन ! हे हर ! हे भव ! हे शङ्कर ! हे उमापते ! हे जीमूतकेतो ! हे गुहागृह ! हे श्मशाननिरत ! हे भूतिविलेपन ! हे शूलपाणे ! हे पशुपते ! हे गोपते ! हे श्रेष्ठ परमपुरुष ! आपको बार-बार नमस्कार है। इस प्रकार कविवर (शुक्राचार्य)-के भक्तिपूर्वक स्तुति करनेपर शंकरने कहा—मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। तुम वर माँगो; मैं तुम्हें वर दूँगा। उन्होंने कहा—हे देववर ! इस समय मुझे यही वर दीजिये कि मैं पुनः आपके उदरसे बाहर निकलूँ। उसके बाद शंकरने नेत्रोंको बंदकर कहा—हे द्विजेन्द्र ! अब तुम बाहर निकल जाओ ! (परंतु) शंकरके इस प्रकार कहनेपर भी वे भार्गवश्रेष्ठ शुक्राचार्य उनके उदरमें विचरण करने लगे ॥ २९—३३ ॥ |
| परिभ्रमन् ददर्शाथ शम्भोरेवोदरे कविः।<br>भुवनार्णवपातालान् वृतान् स्थावरजङ्गमैः ॥ ३४<br>आदित्यान् वसवो रुद्रान् विश्वेदेवान् गणांस्तथा।<br>यक्षान् किंपुरुषाद्यादीन् गन्धर्वाप्सरसां गणान् ॥ ३५<br>मुनीन् मनुजसाध्यांश्च पशुकीटपिपीलिकान्।<br>वृक्षगुल्मान् गिरीन् वल्ल्यः फलमूलौषधानि च॥ ३६<br>स्थलस्थांश्च जलस्थांश्चानिनिमिषान्निमिषानपि।<br>चतुष्पदान् सद्विपदान् स्थावराञ् जङ्गमानपि ॥ ३७<br>अव्यक्तांश्चैव व्यक्तांश्च सगुणान्निर्गुणानपि।<br>स दृष्ट्वा कौतुकाविष्टः परिबभ्राम भार्गवः।<br>तत्रासतो भार्गवस्य दिव्यः संवत्सरो गतः ॥ ३८<br>न चान्तमलभद् ब्रह्मंस्ततः श्रान्तोऽभवत् कविः।<br>स श्रान्तं वीक्ष्य चात्मानं नालभन्निर्गमं वशी।<br>भक्तिनम्रो महादेवं शरणं समुपागमत् ॥ ३९ | (भगवान् शंकरके उदरमें) विचरण करते हुए शुक्राचार्यने शंकरके ही उदरमें चराचर प्राणियोंसे व्याप्त सारा जगत्, समुद्र एवं पातालोंको देखा। आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, विश्वेदेवों, गणों, यक्षों, किम्पुरुषों, गन्धर्वों, अप्सराओं, मुनियों, मनुष्यों, साध्यों, पशुओं, कीटों, पिपीलिकाओं, वृक्षों, गुल्मों, पर्वतों, लताओं, फलों, मूलों, ओषधियों, स्थलपर रहनेवालों, जलमें रहनेवालों, अनिमिषों, निमिषों, चतुष्पदों, द्विपदों, स्थावरों, जङ्गमों, अव्यक्तों, व्यक्तों, सगुणों एवं निर्गुणोंको देखते हुए कुतूहलवश (उसी उदरमें ही) भार्गव चारों ओर घूमने लगे। भृगुवंशी शुक्राचार्यको वहाँ इस प्रकार रहते हुए एक दिव्य वर्ष बीत गया। परंतु ब्रह्मन्! शुक्रको अन्त नहीं मिला और वे थक गये। स्वयंको थका हुआ देखकर और बाहर निकलनेका मार्ग न पाकर आत्माको वशमें करनेवाले वे भक्तिसे नम्र होकर महादेवकी शरणमें आ गये॥ ३४—३९॥ |