वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| इत्येवमुक्ते वचने नन्दिना कुलनन्दिना।<br>प्रत्युवाच प्रभुः प्रीत्या स्वार्थसाधनमुत्तमम्॥ १३<br>गच्छ शुक्रं गणपते ममान्तिकमुपानय।<br>अहं तं संयमिष्यामि यथायोगं समेत्य हि॥ १४<br>इत्येवमुक्तो रुद्रेण नन्दी गणपतिस्ततः।<br>समाजगाम दैत्यानां चमूं शुक्रजिघृक्षया॥ १५<br>तं ददर्शासुरश्रेष्ठो बलवान् हयकन्धरः।<br>संरुरोध तदा मार्गं सिंहस्येव पशुर्वने॥ १६<br>समुपेत्याहनन्नन्दी वज्रेण शतपर्वणा।<br>स पपाताथ निःसंज्ञो ययौ नन्दी ततस्त्वरन्॥ १७ | कुलको आनन्द देनेवाले नन्दीके इस प्रकार कहनेपर महादेवने स्नेहपूर्वक स्वार्थसिद्ध करनेवाला उत्तम वचन कहा—गणपते! तुम जाओ और शुक्रको मेरे समीप लिवा लाओ। (फिर तो) मैं उन्हें पाकर योगक्रियासे संयमित कर दूँगा। रुद्रके ऐसा कहनेपर गणपति नन्दी शुक्राचार्यको पकड़ लानेकी कामनासे दैत्योंकी सेनामें गये। हयकन्धर नामके बलवान् श्रेष्ठ असुरने उन्हें सेनामें आते हुए देखा और जिस प्रकार साधारण पशु (दुस्साहससे) वनमें सिंहका मार्ग रोक दे, उसी प्रकार उनके मार्गको उसने रोका। नन्दीने समीप जाकर शतपर्व (वज्र)-से उसे मारा और वह अचेत होकर गिर पड़ा। उसके बाद नन्दी तुरंत वहाँसे चल दिये॥ १३—१७॥ | | ततः कुजम्भो जम्भश्च बलो वृत्रस्त्वयःशिराः।<br>पञ्च दानवशार्दूला नन्दिनं समुपाद्रवन्॥ १८<br>तथाऽन्ये दानवश्रेष्ठा मयह्लादपुरोगमाः।<br>नानाप्रहरणा युद्धे गणनाथमभिद्रवन्॥ १९<br>ततो गणनामाधिपं कुट्यमानं महाबलैः।<br>समपश्यन्त देवास्तं पितामहपुरोगमाः॥ २०<br>तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा प्राह शक्रपुरोगमान्।<br>साहाय्यं क्रियतां शम्भोरेतदन्तरमुत्तमम्॥ २१ | उसके बाद कुजम्भ, जम्भ, बल, वृत्र और अयःशिरा नामके पाँच श्रेष्ठ दानव नन्दीकी ओर दौड़े। इसी प्रकार युद्धमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवाले मय एवं ह्लाद आदि दानवश्रेष्ठोंने भी नन्दीका पीछा किया। फिर पितामहादि देवोंने महाबली दानवोंके द्वारा कूटे जा रहे गणाधिपको देखा। भगवान् ब्रह्माने उसे देखकर इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—आपलोग इस उत्तम (उपयुक्त) अवसरपर शम्भुकी सहायता करें॥ १८—२१॥ | | पितामहोक्तं वचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः।<br>समापतन्त वेगेन शिवसैन्यमथाम्बरात्॥ २२<br>तेषामापततां वेगः प्रमथानां बले बभौ।<br>आपगानां महावेगं पतन्तीनां महार्णवे॥ २३<br>ततो हलहलाशब्दः समजायत चोभयोः।<br>बलयोर्घोरसंकाशो सुरप्रमथयोरथ॥ २४<br>तमन्तरमुपागम्य नन्दी संगृह्य वेगवान्।<br>रथाद् भार्गवमाक्रामत् सिंहः क्षुद्रं मृगं यथा॥ २५<br>तमादाय हराभ्याशमागमद् गणनायकः।<br>निपात्य रक्षिणः सर्वानथ शुक्रं न्यवेदयत्॥ २६<br>तमानीतं कविं शर्वः प्राक्षिपद् वदने प्रभुः।<br>भार्गवं त्वावृततनुं जठरे स न्यवेशयत्॥ २७<br>स शम्भुना कविश्रेष्ठो ग्रस्तो जठरमास्थितः।<br>तुष्टाव भगवन्तं तं मुनिर्वाग्भिरथादरात्॥ २८ | पितामहके कहे हुए वचनको सुनकर इन्द्र आदि देवता आकाशमार्गसे जल्दी ही शिवकी सेनामें आ गये। समुद्रमें जाती हुई नदियोंके महावेगके सदृश प्रमथोंकी सेनामें (आकाशसे) आते हुए देवताओंका वेग सुशोभित हुआ। उसके बाद प्रमथों और असुरों—दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें भीषण ‘हलहला’ शब्द उत्पन्न हुआ। उसी समय अवसर पाकर तीव्र गतिवाले नन्दी, जिस प्रकार सिंह क्षुद्र मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार भार्गवको लेकर रथसे भाग चले। गणनायक उन्हें लेकर सभी रक्षा करनेवालोंको मारते हुए शंकरके पास पहुँच गये। शुक्राचार्यको उन्होंने उनके निकट निवेदित कर दिया। समर्थ शंकरने लाये गये उन शुक्रको अपने मुखमें फेंका और अक्षुण्ण शरीरवाले भार्गवको अपने उदरमें (ज्यों-का-त्यों) रख लिया। शम्भुसे ग्रस्त होकर उनके उदरमें स्थित हुए वे मुनिश्रेष्ठ शुक्र प्रेमपूर्वक उन भगवान्की स्तुति करने लगे॥ २२—२८॥ |