वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ६९ ] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| शम्भुनामाऽसुरपतिः स ब्रह्माणमयोधयत्।<br>महौजसं कुजम्भश्च विष्णुं दैत्यान्तकारिणम्॥ ५३<br>विवस्वन्तं रणे शाल्वो वरुणं त्रिशिरास्तथा।<br>द्विमूर्धा पवनं सोमं राहुर्मित्रं विरूपधृक्॥ ५४<br>अष्टौ ये वसवः ख्याता धराद्यास्ते महासुरान्।<br>अष्टावेव महेष्वासान् वारयामासुराहवे॥ ५५<br>सरभः शलभः पाकः पुरोऽथ विपृथुः पृथुः।<br>वातापी चेल्वलश्चैव नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः॥ ५६<br>विश्वेदेवगणान् सर्वान् विष्वक्सेनपुरोगमान्।<br>एक एव रणे रौद्रः कालनेमिर्महासुरः॥ ५७ | शम्भु नामका असुरराज ब्रह्मासे लड़ने लगा और कुजम्भ दैत्योंका अन्त करनेवाले महान् ओजस्वी विष्णुसे युद्ध करने लगा। शाल्व सूर्यसे, त्रिशिरा वरुणसे, द्विमूर्धा पवनसे, राहु सोमसे और विरूपधृक् मित्रसे लड़ने लगा। धरादि नामसे विख्यात आठ वसुओंने सरभ, शलभ, पाक, पुर, विपृथु, पृथु, वातापी और इल्वल—इन आठ महान् धनुर्धारी असुरोंको युद्धमें लड़कर (पीछे) हटा दिया। ये असुर भाँति-भाँतिके शस्त्र और अस्त्र लेकर लड़ने लगे। कालनेमि नामका भयंकर महासुर युद्धमें अकेला ही विष्वक्सेन आदि विश्वेदेव गणोंसे युद्ध करने लगा॥ ५३—५७॥ |
| एकादशैव ये रुद्रास्तानेकोऽपि रणोत्कटः।<br>योधयामास तेजस्वी विद्युन्माली महासुरः॥ ५८<br>द्वावश्विनौ च नरको भास्करानेव शम्बरः।<br>साध्यान् मरुद्गणांश्चैव निवातकवचादयः॥ ५९<br>एवं द्वन्द्वसहस्त्राणि प्रमथामरदानवैः।<br>कृतानि च सुराब्दानां दशतीः षण्महामुने॥ ६०<br>यदा न शकिता योद्धुं दैवतैरमरारयः।<br>तदा मायां समाश्रित्य ग्रसन्तः क्रमशोडव्ययान्॥ ६१ | रणमें उत्कट तेजवाले विद्युन्माली नामके महासुरने अकेले ही एकादश रुद्रोंका (डटकर) सामना किया। नरकने दोनों अश्विनीकुमारोंसे, शम्बरने (द्वादश) भास्करोंसे एवं निवातकवचादिने साध्यों तथा मरुद्गणोंसे युद्ध किया। महामुने! इस प्रकार आठ दिव्य वर्षोंतक प्रमथों एवं दानवोंके हजारोंकी संख्यामें दो-दो लड़ाके वीर आपसमें द्वन्द्वयुद्ध करते रहे। जब असुरगण इस प्रकार देवोंसे युद्ध करनेमें समर्थहीन हो गये, तब उन लोगोंने मायाका सहारा लेकर देवोंको क्रमशः निगलना प्रारम्भ कर दिया॥ ५८—६१॥ |
| ततोऽभवच्छैलपृष्ठं प्रावृडभ्रसमप्रभैः।<br>आवृतं वर्जितं सर्वैः प्रमथैरमरैरपि॥ ६२<br>दृष्ट्वा शून्यं गिरिप्रस्थं ग्रस्तांश्च प्रमथामरान्।<br>क्रोधादुत्पादयामास रुद्रो जृम्भायिकां वशी॥ ६३<br>तया स्पृष्टा दनुसुता अलसा मन्दभाषिणः।<br>वदनं विकृतं कृत्वा मुक्तशस्त्रं विजृम्भिरे॥ ६४<br>जृम्भमाणेषु च तदा दानवेषु गणेश्वराः।<br>सुराश्च निर्ययुस्तूर्णं दैत्यदेहेभ्य आकुलाः॥ ६५ | उसके बाद सारे प्रमथों और देवोंसे रहित पर्वत वर्षाकालीन मेघके समान दानवोंसे ढक गया। पर्वतप्रान्तको शून्य और प्रमथों तथा देवोंको ग्रसित हुआ देखकर विजितेन्द्रिय रुद्रने क्रोधसे जृम्भायिकाको उत्पन्न किया। उसके स्पर्श करनेपर अस्त्रोंको छोड़कर धीरे-धीरे बोलते हुए आलस्यसे पूर्ण दानव मुखको विवर्ण बनाकर जँभाई लेने लगे। दानवोंके जँभाई लेते समय आकुल होकर गणेश्वर एवं देवतालोग दैत्योंकी देहसे अविलम्ब बाहर निकल गये॥ ६२—६५॥ |
| मेघप्रभेभ्यो दैत्येभ्यो निर्गच्छन्तोऽमरोत्तमाः।<br>शोभन्ते पद्मपत्राक्षा मेघेभ्य इव विद्युततः॥ ६६<br>गणामरेषु च समं निर्गतेषु तपोधन।<br>अयुध्यन्त महात्मानो भूय एवातिकोपिताः॥ ६७ | मेघके समान दैत्योंके शरीरसे बाहर निकल रहे कमलके सदृश आँखोंवाले श्रेष्ठ देवगण बादलसे निकलनेवाली बिजलीकी भाँति शोभित हो रहे थे। तपोधन! गणों और देवोंके बाहर आ जानेपर वे महान् (दैत्य) |
| ३३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तु देवैः सगणैः दानवाः शर्वपालितैः ।<br>पराजीयन्त संग्रामे भूयो भूयस्त्वहर्निशम् ॥ ६८<br><br>ततस्त्रिनेत्रः स्वां संध्यां सप्ताब्दशतिके गते ।<br>कालेऽभ्युपासत तदा सोऽष्टादशभुजोऽव्ययः ॥ ६९ | अत्यन्त कुपित होकर युद्ध करने लगे। उसके बाद शम्भुसे पालित गणों एवं देवोंने युद्धमें दानवोंको दिन-रात बारम्बार हराया। उसके बाद सात सौ वर्षोंका समय बीत जानेपर अठारह भुजाओंवाले अविनाशी त्र्यम्बक शंकर अपनी नित्यक्रियाकी सन्ध्या करने लगे॥ ६८–६९॥ |
| संस्पृश्यापः सरस्वत्यां स्नात्वा च विधिना हरः ।<br>कृतार्थो भक्तिमान् मूर्ध्ना पुष्पाञ्जलिमुपाक्षिपत् ॥ ७०<br><br>ततो ननाम शिरसा ततश्चक्रे प्रदक्षिणम् ।<br>हिरण्यगर्भेत्यादित्यमुपतस्थे जजाप ह ॥ ७१<br><br>त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु सम्यगुच्चार्य शूलधृक् ।<br>ननर्त भावगम्भीरं दोर्दण्डं भ्रामयन् बलात् ॥ ७२<br><br>परिनृत्यति देवेशे गणाश्चैवामरास्तथा ।<br>नृत्यन्ते भावसंयुक्ता हरस्यानुविलासिनः ॥ ७३ | उन भक्तिमान् शंकरने जलका स्पर्शकर (आचमनकर) विधिपूर्वक सरस्वतीमें स्नान किया। वे कृतार्थ हो गये। उन्होंने पुष्पाञ्जलि सिरसे लगाकर समर्पित की। उसके बाद उन्होंने सिर झुकाकर प्रणाम एवं उसके पश्चात् प्रदक्षिणा कर 'हिरण्यगर्भ' इत्यादि मन्त्रसे सूर्यकी वन्दना की और जप किया। उसके बाद 'त्वष्ट्रे नमो नमस्तेऽस्तु' इसका स्पष्टरूपसे उच्चारण कर शूलपाणि शंकर बलपूर्वक अपना बाहुदण्ड घुमाते हुए भाव-गम्भीर होकर नाचने लगे। देवेश्वरके नाचनेपर उनके अनुगामी गण और देवता भी (वैसे ही) भाव-विभोर होकर नाचने लगे॥ ७०–७३॥ |
| सन्ध्यामुपास्य देवेशः परिनृत्य यथेच्छया ।<br>युद्धाय दानवैः सार्द्धं मतिं भूयः समादधे ॥ ७४<br><br>ततोऽमरगणैः सर्वैस्त्रिनेत्रभुजपालितैः ।<br>दानवा निर्जिताः सर्वे बलिभिर्भयवर्जितैः ॥ ७५<br><br>स्वबलं निर्जितं दृष्ट्वा मत्वाऽजेयं च शङ्करम् ।<br>अन्धकः सुन्दमाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥ ७६<br><br>सुन्द भ्राताऽसि मे वीर विश्वास्यः सर्ववस्तुषु ।<br>तद्ददाम्यद्य यद्वाक्यं तच्छ्रुत्वा यत्क्षमं कुरु ॥ ७७ | सन्ध्योपासन करके इच्छानुकूल नृत्य करनेके बाद शंकरने फिर दानवोंसे संग्राम करनेका विचार किया। फिर तो शंकरकी भुजाओंसे रक्षित बलशाली और निर्भय सम्पूर्ण देवताओंने सारे दानवोंको जीत लिया। अपनी सेनाको पराजित देखकर तथा महादेवको पराजित करनेमें कठिनाई जान करके अन्धकने सुन्दको बुलाकर यह वचन कहा—वीर सुन्द! तुम मेरे भाई हो और सभी विषयोंमें तुम मेरे विश्वासी हो। इसलिये आज मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे सुनकर यथाशक्ति उसे पूर्ण करो॥ ७४–७७॥ |
| दुर्जयोऽसौ रणपटुर्धर्मात्मा कारणान्तरैः ।<br>समासते हि हृदये पद्माक्षी शैलनन्दिनी ॥ ७८<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छामो यत्रास्ते चारुहासिनी ।<br>तत्रैनां मोहयिष्यामि हररूपेण दानव ॥ ७९<br><br>भवान् भवस्यानुचरो भव नन्दी गणेश्वरः ।<br>ततो गत्वाऽथ भुक्त्वा तां जेष्यामि प्रमथान् सुरान् ॥ ८०<br><br>इत्येवमुक्ते वचने बाढं सुन्दोऽभ्यभाषत ।<br>समजायत शैलादिरन्धकः शङ्करोऽप्यभूत् ॥ ८१ | किन्हीं मुख्य कारणोंसे युद्ध करनेमें परम चतुर ये धर्मात्मा दुर्जय हैं। मेरे हृदयमें कमलनयनी पार्वती बसी हुई है। अतः उठो; हम वहाँ चलें, जहाँ वह मधुर मुसकानवाली स्थित है। दानव! वहाँ मैं शंकरका रूप धारण करके उसे मुग्ध कर दूँगा (भुलावेमें डाल दूँगा)। तुम शंकरका अनुचर गणेश्वर नन्दी बनो। तब वहाँ पहुँच करके और उसका सुख भोगकर प्रमथों एवं देवोंको जीतूँगा। ऐसा कहनेपर सुन्दने कहा—ठीक है। उसके बाद वह शैलादि (नन्दी) बन गया और अन्धक शिव बन गया॥ ७८–८१॥ |
| नन्दिरुद्रौ ततो भूत्वा महासुरचमूपती ।<br>सम्प्राप्तौ मन्दरगिरिं प्रहारैः क्षतविग्रहौ ॥ ८२ | उसके बाद महासुर (अन्धक) और सेनापति (सुन्द) शस्त्रास्त्रोंकी मारसे अधिक घायल हुए शरीरवाले रुद्र और नन्दीका रूप धारण कर मन्दरगिरिपर पहुँचे। |
| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३३९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| हस्तमालम्ब्य सुन्दस्य अन्धको हरमन्दिरम्।<br>विवेश निर्विशङ्केन चित्तेनासुरसत्तमः ॥ ८३<br>ततो गिरिसुता दूरादायान्तं वीक्ष्य चान्धकम्।<br>महेश्वरवपुश्छन्नं प्रहारैर्जर्जरच्छविम् ॥ ८४<br>सुन्दं शैलादिरूपस्थमवष्टभ्याविशत् ततः।<br>तं दृष्ट्वा मालिनीं प्राह सुयशां विजयां जयाम् ॥ ८५ | असुरश्रेष्ठ अन्धक सुन्दका हाथ पकड़कर निडर होकर महादेवके मन्दिरमें घुस गया। उसके बाद शैलादि नन्दीके रूपमें स्थित सुन्दको पकड़कर मारोंसे जर्जर महादेवके शरीरमें छिपे अन्धकको दूरसे आते देखकर पार्वतीजीने यशस्विनी मालिनी, विजया तथा जयासे कहा— ॥ ८२–८५ ॥ |
| जये पश्यस्व देवस्य मदर्थे विग्रहं कृतम्।<br>शत्रुभिर्दानववरैस्तदुत्तिष्ठस्व सत्वरम् ॥ ८६<br>घृतमानय पौराणं बीजिकां लवणं दधि।<br>व्रणभङ्गं करिष्यामि स्वयमेव पिनाकिनः ॥ ८७<br>कुरुष्व शीघ्रं सुयशे स्वभर्तुर्व्रणनाशनम्।<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं समुत्थाय वरासनात् ॥ ८८<br>अभ्युद्ययौ तदा भक्त्या मन्यमाना वृषध्वजम्।<br>शूलपाणेस्ततः स्थित्वा रूपं चिह्नानि यत्नतः ॥ ८९<br>अन्विषेष ततो ब्रह्मन्नोभौ पार्श्वस्थितौ वृषौ।<br>सा ज्ञात्वा दानवं रौद्रं मायाच्छादितविग्रहम् ॥ ९० | जये! देखो, मेरे स्वामीके शरीरको मेरे लिये दानव-शत्रुओंने किस प्रकार जर्जरित कर डाला है। इसलिये अविलम्ब उठो। पुराना घी, बीजिका, लवण और दही ले आओ। पिनाक धारण करनेवाले शंकरके घावोंको मैं स्वयं ही भरूँगी। यशस्विनि! शीघ्र अपने स्वामीके घावोंको भरो—ऐसा कहते हुए आसनसे उठकर उसे वृषध्वज शंकर समझती हुई वे भक्तिपूर्वक उसके पास गयीं। उसके बाद खड़ी होकर वे शंकरके रूप एवं चिह्नोंको भलीभाँति देखने लगीं। ब्रह्मन्! उन्होंने देखा कि उसकी बगलमें स्थित दोनों वृष नहीं हैं। इसलिये उन्हें यह मालूम हो गया कि यह मायासे छिपे शरीरवाला भयानक दानव है॥ ८६–९० ॥ |
| अपयानं तदा चक्रे गिरिराजसुता मुने।<br>देव्याश्चिन्तितमाज्ञाय सुन्दं त्यक्त्वान्धकोऽसुरः ॥ ९१<br>समाद्रवत वेगेन हरकान्तां विभावरीम्।<br>समाद्रवत दैतेयो येन मार्गेण साऽगमत् ॥ ९२<br>अपस्कारान्तरं भञ्जन् पादप्लुतिभिराकुलः।<br>तमापतन्तं दृष्ट्वैव गिरिजा प्राद्रवद् भयात् ॥ ९३<br>गृहं त्यक्त्वा ह्युपवनं सखीभिः सहिता तदा।<br>तत्राप्यनुजगामासौ मदान्धो मुनिपुङ्गव ॥ ९४<br>तथापि न शशापैनं तपसो गोपनाय तु।<br>तद्भयादाविशद् गौरी श्वेतार्ककुसुमं शुचि ॥ ९५ | मुने! उसके बाद गिरिराजकी कन्या भाग चलीं। देवीके विचारको समझकर अन्धकासुर सुन्दको छोड़कर शीघ्रतापूर्वक शंकरप्रिया विभावरीके पीछे उसी रास्तेसे दौड़ा, जिससे वे गयी थीं। चरणके चपेटोंसे राहकी रुकावटोंको चूर-चूर करते हुए वह अधीरतापूर्वक दौड़ पड़ा। उसे आते देखकर गिरितनया भयसे (और) भाग चलीं। मुनिवर! उसके बाद देवी सखियोंके साथ घर छोड़कर उपवनमें चली गयीं। वहाँ भी मदान्ध (अन्धक)-ने उनका पीछा किया। इतनेपर भी अपने तपकी रक्षाके लिये उन्होंने उसे शाप नहीं दिया। किंतु गौरी स्वयं उसके डरसे पवित्र सफेद अर्कके फूलमें छिप गयीं ॥ ९१–९५ ॥ |
| विजयाद्या महागुल्मे सम्प्रयाता लयं मुने।<br>नष्टायामथ पार्वत्यां भूयो हैरण्यलोचनिः ॥ ९६<br>सुन्दं हस्ते समादाय स्वसैन्यं पुनरागमत्।<br>अन्धके पुनरायाते स्वबलं मुनिसत्तम ॥ ९७ | मुने! विजया आदि भी घनी झाड़ियोंमें छिप गयीं। उसके बाद पार्वतीके अदृश्य हो जानेपर हिरण्याक्षका पुत्र (अन्धक) सुन्दका हाथ पकड़कर पुनः अपनी सेनामें वापस आ गया। मुनिसत्तम! अन्धकके अपनी सेनामें पुनः लौट आनेपर प्रमथों और असुरोंमें घमासान |
| ३४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रावर्तत महायुद्धं प्रमथासुरयोरथ।<br>ततोऽमरगणश्रेष्ठो विष्णुश्चक्रगदाधरः॥ ९८<br>निजघानासुरबलं शङ्करप्रियकाम्यया।<br>शार्ङ्गचापच्युतैर्बाणैः संस्यूता दानवर्षभाः॥ ९९<br>पञ्च षट् सप्त चाष्टौ वा ब्रध्नपादैर्घना इव।<br>गदया कांश्चिदवधीच्चक्रेणान्याञ् जनार्दनः॥ १००<br>खड्गेन च चकर्तान्यान् दृष्ट्यान्यान् भस्मसाद् व्यधात्।<br>हलेनाकृष्य चैवान्यान् मुसलेन व्यचूर्णयत्॥ १०१ | लड़ाई होने लगी। उसके बाद अमरगणोंमें श्रेष्ठ चक्र एवं गदा धारण करनेवाले विष्णुभगवान् शंकरका प्रिय करनेकी इच्छासे असुर-सेनाका संहार करने लगे। शार्ङ्ग नामक धनुषसे निकले हुए बाणोंसे पाँच-पाँच, छः-छः, सात-सात, आठ-आठ श्रेष्ठ दानव उसी प्रकार विदीर्ण होने लगे जैसे सूर्यकी किरणोंसे 'घन' (अन्धकार) विदीर्ण हो जाते हैं। जनार्दनने कुछको गदासे तथा कुछको चक्रसे मार डाला। किन्हींको तलवारसे काट डाला और किन्हींको देखकर ही भस्म कर दिया तथा कुछ असुरोंको हलद्वारा खींचकर मूसलसे चूर्ण-विचूर्ण कर दिया॥ ९८—१०१॥ |
| गरुडः पक्षपाताभ्यां तुण्डेनाप्युरसाऽहनत्।<br>स चादिपुरुषो धाता पुराणः प्रपितामहः॥ १०२<br>भ्रामयन् विपुलं पद्ममभ्यषिञ्चत वारिणा।<br>संस्पृष्टा ब्रह्मतोयेन सर्वतीर्थमयेन हि॥ १०३<br>गणामरगणाश्चासन् नवनागशताधिकाः।<br>दानवास्तेन तोयेन संस्पृष्टाश्चाघहारिणा॥ १०४<br>सवाहनाः क्षयं जग्मुः कुलिशेनेव पर्वताः।<br>दृष्ट्वा ब्रह्महरी युद्धे घातयन्तौ महासुरान्॥ १०५<br>शतक्रतुश्च दुद्राव प्रगृह्य कुलिशं बली।<br>तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलो दानवसत्तमः॥ १०६<br>मुक्त्वा देवं गदापाणिं विमानस्थं च पद्मजम्।<br>शक्रमेवाद्रवद् योद्धुं मुष्टिमुद्यम्य नारद।<br>बलवान् दानवपतिरजेयो देवदानवैः॥ १०७ | गरुड़ने अपने दोनों डैनोंकी मारसे चोंच तथा छातीके बलसे अनेक दैत्योंको मौतके घाट उतार दिया। पुरातन आदिपुरुष धाता प्रपितामहने विशाल कमलको घुमाते हुए सभी (देवगणों)-को जलसे अभिषिञ्चित किया। सर्वतीर्थरूप ब्रह्म जलका स्पर्श होनेसे गण तथा देवतालोग नौजवान हाथियोंसे भी अधिक पराक्रमवाले हो गये। और सौ, पाप दूर करनेवाले उस जलके स्पर्शके प्रभावसे सवारीके साथ दानव ऐसे नष्ट होने लगे जैसे वज्रसे पर्वत नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मा और विष्णुको संग्राममें महासुरोंको मारते देखकर (उत्साहमें आकर) बलशाली इन्द्र भी अपना वज्र लेकर दौड़ पड़े। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] नारदजी! उन्हें आते देखकर देवों तथा दानवोंसे अजेय शक्तिशाली श्रेष्ठ दानवपति बल, गदाधर विष्णु और विमानारूढ़ ब्रह्मासे लड़ना छोड़कर मुट्ठी तानकर इन्द्रसे ही युद्ध करनेके लिये दौड़ पड़ा॥ १०२—१०७॥ |
| तमापतन्तं त्रिदशेश्वरस्तु<br>दोष्णां सहस्रेण यथाबलेन।<br>वज्रं परिभ्राम्य बलस्य मूर्ध्नि<br>चिक्षेप हे मूढ हतोऽस्युदीर्य॥ १०८ | उसे आते देखकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने हजारों भुजाओंसे अपनी शक्तिभर वज्रको घुमाते हुए उसे बलके सिरपर 'हे मूढ! अब तुम मारे गये'—कहकर फेंक दिया। |
| स तस्य मूर्ध्नि प्रवरोऽपि वज्रो<br>जगाम तूर्णं हि सहस्रधा मुने।<br>बलोऽद्रवद् देवपतिश्च भीतः<br>पराङ्मुखोऽभूत् समरान्महर्षे॥ १०९ | मुने! वह श्रेष्ठ वज्र भी उसके सिरपर शीघ्र ही हजारों टुकड़ोंमें टूक-टूक हो गया। (फिर) बल (इन्द्रकी ओर) दौड़ा। महर्षे! देवराज भयभीत होकर युद्धसे विमुख हो गये—भाग गये। |
| तं चापि जम्भो विमुखं निरीक्ष्य<br>भूत्वाऽग्रतः प्राह न युक्तमेतत्।<br>तिष्ठस्व राजाऽसि चराचरस्य<br>न राजधर्मे गदितं पलायनम्॥ ११० | उन्हें विमुख होकर भागते देख जम्भने आगे आकर कहा कि यह उचित नहीं है। रुकिये; आप समस्त स्थावर-जङ्गमके राजा हैं। राजधर्ममें लड़ाईके मैदानसे भागनेका नियम नहीं है। |
| अध्याय ६९ ] | शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश | ३४१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सहस्राक्षो जम्भवाक्यं निशम्य<br>भीतस्तूर्णं विष्णुमागान्महर्षे।<br>उपेत्याह श्रूयतां वाक्यमीश<br>त्वं मे नाथो भूतभव्येश विष्णो॥ १११<br>जम्भस्तर्जयतेऽत्यर्थं मां निरायुधमीक्ष्य हि।<br>आयुधं देहि भगवन् त्वामहं शरणं गतः॥ ११२<br><br>तमुवाच हरिः शक्रं त्यक्त्वा दर्पं व्रजाधुना।<br>प्रार्थयस्वायुधं वह्निं स ते दास्यत्यसंशयम्॥ ११३<br><br>जनार्दनवचः श्रुत्वा शक्रस्त्वरितविक्रमः।<br>शरणं पावकमगादिदं चोवाच नारद॥ ११४ | महर्षे! जम्भका वचन सुनकर भयभीत होकर इन्द्र जल्दीसे विष्णुके समीप चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने कहा—हे ईश! आप मेरी बात सुनें। हे भूत तथा भव्यके स्वामी विष्णो! आप मेरे स्वामी हैं॥ १०८—१११॥<br><br>जम्भ मुझे शस्त्रास्त्रसे रहित देखकर बहुत अधिक ललकार रहा है। भगवन्! आप मुझे आयुध दें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। विष्णुने इन्द्रसे कहा—इस समय (अपने पदके) अहंकारको छोड़कर तुम अग्निदेवके पास जाओ और उनसे आयुधके लिये प्रार्थना करो। वे निस्सन्देह तुम्हें आयुध प्रदान करेंगे। नारदजी! जनार्दनकी बात सुनकर तीव्र गतिवाले इन्द्र अग्निकी शरणमें चले गये और उनसे उन्होंने कहा— ॥ ११२—११४॥ |
| शक्र उवाच<br>निघ्नतो मे बलं वज्रं कृशानो शतधा गतम्।<br>एष चाहूयते जम्भस्तस्माद्देह्यायुधं मम॥ ११५ | इन्द्रने कहा—अग्निदेव! बलको मारनेमें मेरा वज्र सैकड़ों टुकड़े हो गया; यह जम्भ मुझे ललकार रहा है। अतः आप मुझे आयुध प्रदान करें॥ ११५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>तमाह भगवान् वह्निः प्रीतोऽस्मि तव वासव।<br>यत्त्वं दर्पं परित्यज्य मामेव शरणं गतः॥ ११६<br><br>इत्युच्चार्य स्वशक्त्यास्तु शक्तिं निष्क्रम्य भावतः।<br>प्रादादिन्द्राय भगवान् रोचमानो दिवं गतः॥ ११७<br><br>तामादाय तदा शक्तिं शतघण्टां सुदारुणाम्।<br>प्रत्युद्ययौ तदा जम्भं हन्तुकामोऽरिमर्दनः॥ ११८<br><br>तेनातियशसा दैत्यः सहसैवाभिसंवृतः।<br>क्रोधं चक्रे तदा जम्भो निजघान गजाधिपम्॥ ११९ | पुलस्त्यजी बोले—भगवन्! अग्निदेवने उनसे कहा—वासव! मैं आपके ऊपर प्रसन्न हूँ; क्योंकि आप अहंकार छोड़कर मेरी शरणमें आये हैं। ऐसा कहनेके बाद प्रकाशयुक्त भगवान् अग्निदेवने भावपूर्वक अपनी शक्तिसे एक दूसरी शक्ति निकालकर उसे इन्द्रको दे दिया और वे स्वर्ग चले गये। शत्रुकां मर्दन करनेवाले इन्द्र सैकड़ों घण्टाओंसे युक्त उस भीषण शक्तिको लेकर जम्भको मारनेके लिये चले गये। उन अत्यन्त यशस्वीके सहसा पीछा करनेपर जम्भने कोपपूर्वक गजाधिप (ऐरावत)-पर वार कर दिया॥ ११६—११९॥ |
| जम्भमुष्टिनिपातेन भग्नकुम्भकटो गजः।<br>निपपात यथा शैलः शक्रवज्रहतः पुरा॥ १२०<br><br>पतमानाद् द्विपेन्द्रात्तु शक्रश्चाप्लुत्य वेगवान्।<br>त्यक्त्वैव मन्दरगिरिं पपात वसुधातले॥ १२१<br><br>पतमानं हरिं सिद्धाश्चारणाश्च तदाऽब्रुवन्।<br>मा मा शक्र पतस्वाद्य भूतले तिष्ठ वासव॥ १२२<br><br>स तेषां वचनं श्रुत्वा योगी तस्थौ क्षणं तदा।<br>प्राह चैतान् कथं योत्स्ये अपत्रः शत्रुभिः सहः॥ १२३ | जम्भकी मुट्ठीके आघातसे हाथीका कुम्भस्थल विदीर्ण हो गया। उसके बाद वह इस प्रकार गिर पड़ा जैसे पूर्वकालमें इन्द्रके वज्रसे आहत होकर पर्वत गिरता था। इन्द्र गिरते हुए गजेन्द्रसे वेगपूर्वक उछले और मन्दर-पर्वतको भी छोड़कर पृथ्वकी ओर नीचे गिर पड़े। उसके बाद गिरते हुए इन्द्रसे सिद्धों एवं चारणोंने कहा—इन्द्र! आप पृथ्वीपर न गिरें। आप रुकें। उनकी बात सुनकर योगी इन्द्र उस समय क्षणभरके लिये रुक गये और बोले—मैं बिना वाहनके इन शत्रुओंसे कैसे लडूंगा?॥ १२०—१२३॥ |
| ३४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ ] |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तमूचुर्देवगन्धर्वा मा विषादं व्रजेश्वर।<br>युध्यस्व त्वं समारुह्य प्रेषयिष्याम यद् रथम्॥ १२४<br>इत्येवमुक्त्वा विपुलं रथं स्वस्तिकलक्षणम्।<br>वानरध्वजसंयुक्तं हरिभिर्हरिभिर्युतम्॥ १२५<br>शुद्धजाम्बूनदमयं किङ्किणीजालमण्डितम्।<br>शक्राय प्रेषयामासुर्विश्वावसुपुरोगमाः॥ १२६<br>तमागतमुदीक्ष्याथ हीनं सारथिना हरिः।<br>प्राह योत्स्ये कथं युद्धे संयमिष्ये कथं हयान्॥ १२७ | देवताओं और गन्धर्वोंने उत्तर दिया—हे ईश्वर (इन्द्र)! आप चिन्तित न हों। हमलोग जो रथ भेज रहे हैं उसपर चढ़कर आप युद्ध करें। ऐसा कहकर विश्वावसु आदिने स्वस्तिकके आकारवाले कपिध्वजसे युक्त हरितवर्णके अश्वोंसे जुते शुद्ध स्वर्णसे बनाये गये तथा किंकिणीजालसे मण्डित विशाल रथ इन्द्रके लिये भेज दिया। इन्द्र सारथिसे रहित उस रथको देखकर बोले—मैं युद्धमें कैसे लडूंगा और कैसे घोड़ोंको संयत करूँगा—दोनों काम एक साथ कैसे होंगे?॥ १२४–१२७॥ |
| यदि कश्चिद्धि सारथ्यं करिष्यति ममाधुना।<br>ततोऽहं घातये शत्रून् नान्यथेति कथंचन॥ १२८<br>ततोऽब्रुवंस्ते गन्धर्वा नास्माकं सारथिर्विभो।<br>विद्यते स्वयमेवाश्वांस्त्वं संयन्तुमिहार्हसि॥ १२९<br>इत्येवमुक्ते भगवांस्त्यक्त्वा स्यन्दनमुत्तमम्।<br>क्ष्मातलं निपपातैव परिभ्रष्टस्रगम्बरः॥ १३०<br>चलनमौलिर्मुक्तकचः परिभ्रष्टायुधाङ्गदः।<br>पतमानं सहस्राक्षं दृष्ट्वा भूः समकम्पत॥ १३१ | इस समय मेरे सारथिका काम यदि कोई करे तो मैं शत्रुओंका नाश कर सकता हूँ; अन्य किसी प्रकार नहीं। उसके बाद गन्धर्वोंने कहा—विभो! हमारे पास कोई सारथि नहीं है। आप स्वयं घोड़ोंको नियन्त्रित कर सकते हैं। ऐसा कहनेपर भगवान् इन्द्र उत्तम रथको छोड़कर अस्त-व्यस्त हुए माल्य और वस्त्रोंके साथ पृथ्वीपर गिर गये। (पृथ्वीपर गिरते समय इन्द्रका) सिर काँप रहा था, उनके बाल बिखर गये थे और उनके आयुध तथा बाजूबंद नीचे गिर पड़े थे। इन्द्रको गिरते देख पृथ्वी काँपने लगी॥ १२८–१३१॥ |
| पृथिव्यां कम्पमानायां शमीकर्षेस्तपस्विनी।<br>भार्याऽब्रवीत् प्रभो बालं बहिः कुरु यथासुखम्॥ १३२<br>स तु शीलावचः श्रुत्वा किमर्थमिति चाब्रवीत्।<br>सा चाह श्रूयतां नाथ दैवज्ञपरिभाषितम्॥ १३३<br>यदेयं कम्पते भूमिस्तदा प्रक्षिप्यते बहिः।<br>यद्वाह्यतो मुनिश्रेष्ठ तद् भवेद् द्विगुणं मुने॥ १३४<br>एतद्वाक्यं तदा श्रुत्वा बालमादाय पुत्रकम्।<br>निराशङ्को बहिः शीघ्रं प्राक्षिपत् क्ष्मातले द्विजः॥ १३५ | पृथ्वीके काँपनेपर शमीक ऋषिकी तपस्विनी पत्नीने कहा—'प्रभो! बालकको सँभालकर बाहर ले जाइये। उन्होंने शीलाकी बात सुनकर कहा—क्यों? उसने कहा—हे नाथ! सुनिये, ज्योतिषियोंका कहना है कि इस भूमिके काँपनेपर वस्तुएँ बाहर निकाल दी जाती हैं; क्योंकि मुनिश्रेष्ठ! उस समय बाहरमें रखी हुई वस्तु दुगुनी हो जाती है। इस वाक्यको सुनकर उस समय ब्राह्मणने अपने बालक पुत्रको लेकर निःशंक हो पृथ्वीपर बाहर रख दिया'॥ १३२–१३५॥ |
| भूयो गोयुगलार्थाय प्रविष्टो भार्यया द्विजः।<br>निवारितो गता वेला अर्द्धहानिर्भविष्यति॥ १३६ | फिर दो गायोंके लिये भीतर प्रविष्ट होनेपर पत्नीने ब्राह्मणको निवारित करते हुए कहा—समय बीत चुका है; अब इस समय आधे भागकी हानि हो जायगी। |
| इत्येवमुक्ते देवर्षेर्बहिर्निर्गम्य वेगवान्।<br>ददर्श बालद्वितयं समरूपमवस्थितम्॥ १३७ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] देवर्षे! ऐसा कहनेपर (ब्राह्मणने) शीघ्रतासे बाहर निकलकर देखा कि समान आकारके दो |
७१- इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका 'पाकशासन' और 'गोत्रभिद्' होनेका हेतु; मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा
अध्याय ६९] शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, दैत्योंका नाश ३४३
| तं दृष्ट्वा देवताः पूज्य भार्यां चाद्भुतदर्शनाम्।<br>प्राह तत्त्वं न विन्दामि यत् पृच्छामि वदस्व तत्॥ १३८<br><br>बालस्यास्य द्वितीयस्य के भविष्यद्गुणा वद।<br>भाग्यानि चास्य यच्चोक्तं कर्म तत् कथयाधुना॥ १३९ | बालक पड़े हुए हैं। उन्हें देखकर उसने देवताओंकी पूजा करनेके बाद अपनी अद्भुत ज्ञानमती पत्नीसे कहा—मैं इसका रहस्य नहीं समझता। अतः मैं जो पूछता हूँ उसे बतलाओ। यह बतलाओ कि इस दूसरे बालकमें कौन-से गुण होंगे? उसके भाग्यों एवं कर्मोंको भी तुम अभी बतलाओ॥ १३६—१३९॥ |
| साऽब्रवीन्नाद्य ते वक्ष्ये वदिष्यामि पुनः प्रभो।<br>सोऽब्रवीद् वद मेऽद्यैव नोचेन्नाश्नामि भोजनम्॥ १४०<br><br>सा प्राह श्रूयतां ब्रह्मन् वदिष्ये वचनं हितम्।<br>कातरेणाद्य यत्पृष्टं भव्यः कारुरयं किल॥ १४१<br><br>इत्युक्तवति वाक्ये तु बाल एव त्वचेतनः।<br>जगाम साह्यं शक्रस्य कर्तुं सौत्यविशारदः॥ १४२<br><br>तं व्रजन्तं हि गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः।<br>ज्ञात्वेन्द्रस्यैव साहाय्ये तेजसा समवर्धयन्॥ १४३ | पत्नीने कहा—स्वामिन्! मैं तुम्हें आज नहीं बतलाऊँगी। फिर कभी दूसरे समय बतलाऊँगी। उन्होंने कहा—आज ही मुझे बताओ; अन्यथा मैं भोजन नहीं करूँगा। उसने कहा—ब्रह्मन्! आप सुनिये, आपने आर्त्ततासे जो पूछा है उस हितकर बातको मैं कहती हूँ। यह (बालक) निश्चय ही कारु (शिल्पी) होगा। ऐसा कहनेपर अज्ञान (अवस्थामें) होते हुए भी वह सूत-कर्ममें कुशल बालक इन्द्रकी सहायताके लिये गया। विश्वावसु आदि गन्धर्वोंने उस बालकको इन्द्रकी सहायताके लिये जाते हुए जानकर उसके तेजको बढ़ा दिया॥ १४०—१४३॥ |
| गन्धर्वतेजसा युक्तः शिशुः शक्रं समेत्य हि।<br>प्रोवाचैह्येहि देवेश प्रियो यन्ता भवामि ते॥ १४४<br><br>तच्छ्रुत्वास्य हरिः प्राह कस्य पुत्रोऽसि बालक।<br>संयन्ताऽसि कथं चाश्वान् संशयः प्रतिभाति मे॥ १४५<br><br>सोऽब्रवीदृषितेजोत्थं क्ष्माभवं विद्धि वासव।<br>गन्धर्वतेजसा युक्तं वाजियानविशारदम्॥ १४६<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवाञ्छक्रः खं भेजे योगिनां वरः।<br>स चापि विप्रतनयो मातलिर्नामविश्रुतः॥ १४७<br><br>ततोऽधिरूढस्तु रथं शक्रस्त्रिदशपुङ्गवः।<br>रश्मीन् शमीकतनयो मातलिः प्रगृहीतवान्॥ १४८ | गन्धर्वोंके तेजसे परिपूर्ण होकर बालकने इन्द्रके निकट जाकर कहा—देवेश! आइये, आइये! मैं आपका प्रिय सारथि बनूँगा। उसे सुनकर इन्द्रने कहा—हे बालक! तुम किसके पुत्र हो? तुम घोड़ोंको कैसे संयमित करोगे? इस विषयमें मुझे संदेह हो रहा है। उसने कहा—वासव! मुझे ऋषिके तेजसे बल-वैभवमें बढ़े, भूमिसे उत्पन्न एवं गन्धर्वोंके तेजसे युक्त अश्वयानमें पारंगत समझो। यह सुनकर योगिश्रेष्ठ भगवान् इन्द्र आकाशमें चले गये। मातलि नामसे विख्यात वह ब्राह्मणपुत्र भी आकाशमें चला गया। उसके बाद देवश्रेष्ठ इन्द्र रथपर चढ़ गये और शमीकपुत्र मातलिने प्रग्रह (लगाम) पकड़ लिया॥ १४४—१४८॥ |
| ततो मन्दरमागम्य विवेश रिपुवाहिनीम्।<br>प्रविशन् ददृशे श्रीमान् पतितं कार्मुकं महत्॥ १४९<br><br>सशरं पञ्चवर्णाभं सितरक्तासितारुणम्।<br>पाण्डुच्छायं सुरश्रेष्ठस्तं जग्राह समार्गणम्॥ १५०<br><br>ततस्तु मनसा देवान् रजःसत्त्वतमोमयान्।<br>नमस्कृत्य शरं चापे साधिज्ये विनियोजयत्॥ १५१ | उसके बाद मन्दरगिरिपर पहुँचकर वे (इन्द्र) शत्रुसेनामें प्रविष्ट हो गये। प्रवेश करते समय सुरश्रेष्ठ श्रीमान् (इन्द्र)-ने बाणयुक्त, सफेद, लाल, काला, उषाकालीन लालिमावाले एवं सफेद रंगसे मिले पीले रंगवाले—पाँचरंगे—एक महान् धनुषको पड़ा हुआ देखा और बाणके साथ ही उसे उठा लिया। उसके बाद रजःसत्त्वमोमय—त्रिगुणमय—(ब्रह्मा, विष्णु और महेश) |
३४४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततो निशेरुरत्युग्राः शरा बर्हिणवाससः।<br>ब्रह्मेशविष्णुनामाङ्काः सूदयन्तोऽसुरान् रणे॥ १५२ | देवोंको मनसे नमस्कार करके उन्होंने प्रत्यञ्चा चढ़ाकर बाण संधान किया। उससे ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वरके नामोंसे अंकित मोरके पंख लगे हुए अत्यन्त भयंकर बाण निकले और असुरोंका संहार करने लगे॥ १४९—१५२॥ |
| आकाशं विदिशः पृथ्वीं दिशश्च स शरोत्करैः।<br>सहस्राक्षोऽतिपटुभिश्छादयामास नारद॥ १५३<br>गजो विद्धो हयो भिन्नः पृथिव्यां पतितो रथः।<br>महामात्रो धरां प्राप्तः सद्यः सीदच्छरातुरः॥ १५४<br>पदातिः पतितो भूम्यां शक्रमार्गणताडितः।<br>हतप्रधानभूयिष्ठं बलं तदभवद् रिपोः॥ १५५<br>तं शक्रबाणाभिहतं दुरासदं<br>सैन्यं समालक्ष्य तदा कुजम्भः।<br>जम्भासुरश्चापि सुरेशमव्ययं<br>प्रजग्मतुर्गृह्य गदे सुघोरे॥ १५६ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] नारदजी! उन इन्द्रने बड़ी चतुराईसे बाणोंकी बौछारसे आकाश, पृथ्वी, दिशाओं एवं विदिशाओंको छा (भर) दिया। हाथी बुरी तरह बिंध गये, घोड़े विदीर्ण हो गये, रथ पृथ्वीपर गिर पड़े एवं हाथीका संचालक (महावत) बाणोंसे व्याकुल होकर कराहता हुआ धरतीपर गिर गया। इन्द्रके बाणोंसे घायल हुए पैदल युद्ध करनेवाले वीर भूमिपर गिर पड़े। (इस प्रकार) शत्रु की उस सेनाके बहुतेरे प्रधान (वीर) मारे गये। उस दुर्धर्ष (अपराजेय) सेनाको इन्द्रके बाणोंसे मारी जाती हुई देखकर असुर कुजम्भ और जम्भ भयानक गदाओंको लेकर अविनाशी सुरेन्द्रकी ओर तेजीसे बढ़ चले॥ १५३—१५६॥ |
| तावापतन्तौ भगवान् निरीक्ष्य<br>सुदर्शनेनारिविनाशनेन ।<br>विष्णुः कुजम्भं निजघान वेगात्<br>स स्यन्दनाद् गामगमद् गतासुः॥ १५७<br>तस्मिन् हते भ्रातरि माधवेन<br>जम्भस्ततः क्रोधवशं जगाम।<br>क्रोधान्वितः शक्रमुपाद्रवद् रणे<br>सिंहं यथैणोऽतिविपन्नबुद्धिः॥ १५८<br>तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य शक्र-<br>स्त्यक्त्वैव चापं सशरं महात्मा।<br>जग्राह शक्तिं यमदण्डकल्पां<br>तामग्निदत्तां रिपवे ससर्ज॥ १५९<br>शक्तिं सघण्टां कृतनिःस्वनां वै<br>दृष्ट्वा पतन्तीं गदया जघान।<br>गदां च कृत्वा सहसैव भस्मसाद्<br>बिभेद जम्भं हृदये च तूर्णम्॥ १६०<br>शक्त्या स भिन्नो हृदये सुरारिः<br>पपात भूम्यां विगतासुरेव।<br>तं वीक्ष्य भूमौ पतितं विसंज्ञं<br>दैत्यास्तु भीता विमुखा बभूवुः॥ १६१<br>जम्भे हते दैत्यबले च भग्ने<br>गणास्तु हृष्टा हरिमर्चयन्तः।<br>वीर्यं प्रशंसन्ति शतक्रतोश्च<br>स गोत्रभिच्छर्वमुपेत्य तस्थौ॥ १६२ | भगवान् विष्णुने उन दोनों (कुजम्भ और जम्भ)-को शीघ्रतासे सामने आते देखकर शत्रु-संहारक सुदर्शनचक्रसे कुजम्भको मारा। वह प्राणहीन होकर रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा। लक्ष्मीपति श्रीविष्णुके द्वारा भाईके मारे जानेपर जम्भ क्रुद्ध हो गया। कुपित होकर वह युद्धमें इन्द्रकी ओर ऐसे दौड़ा, जैसे विचारशक्ति नष्ट हो जानेपर मृग सिंहकी ओर दौड़ता है। उसे आते देखकर महात्मा इन्द्रने धनुष-बाणको छोड़ अग्निद्वारा प्रदत्त यमदण्डके समान शक्तिको लेकर उसे शत्रु की ओर फेंका। घण्टासे घनघनाती हुई उस शक्तिको देखकर (जम्भने) उसपर बल लगाकर गदासे वार किया। (उस शक्तिने) गदाको एकाएक भस्मकर शीघ्र ही जम्भका हृदय (भी) विदीर्ण कर दिया। शक्तिसे हृदयके विदीर्ण हो जानेपर वह देवशत्रु असुर जम्भ प्राणहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसे मरा और भूमिपर गिरा देख करके दैत्यगण डरकर पीठ दिखाकर भाग गये। जम्भके मारे जाने एवं दैत्यसेनाके हार जानेपर सभी गण हरिका अर्चन एवं इन्द्रके पराक्रमका गुणगान करने लगे। (फिर) वे इन्द्र शंकरके निकट जाकर खड़े हो गये॥ १५७—१६२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें उनहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६९॥
अध्याय ७० ] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४५
सत्तरवाँ अध्याय
अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व, देवादिकोंका भेजना, अर्द्धकुसुमसे पार्वतीका प्राकट्य और अन्धकद्वारा उनकी स्तुति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>तस्मिंस्तदा दैत्यबले च भग्ने<br>शुक्रोऽब्रवीदन्धकमासुरेन्द्रम् ।<br>एह्येति वीराद्य गृहं महासुर<br>योत्स्याम भूयो हरमेत्य शैलम्॥ १<br>तमुवाचान्धको ब्रह्मन् न सम्यग्भवतोदितम्।<br>रणान्नैवापयास्यामि कुलं व्यपदिशन् स्वयम्॥ २<br>पश्य त्वं द्विजशार्दूल मम वीर्यं सुदुर्धरम्।<br>देवदानवगन्धर्वान् जेष्ये सेन्द्रमहेश्वरम्॥ ३<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः।<br>समाश्वास्याब्रवीच्छम्भुं सारथिं मधुराक्षरम्॥ ४ | पुलस्त्यजी बोले— उस समय दैत्यसेनाके हार जानेपर शुक्रने असुरोंके स्वामी अन्धकसे कहा—वीर महासुर! इस समय घर चलो। फिर पर्वतपर आकर शंकरसे युद्ध करेंगे। अन्धकने उनसे कहा—ब्रह्मन्! आपने उचित बात नहीं कही। अपने कुलको कलंकित करते हुए मैं युद्धसे नहीं भागूँगा। द्विजश्रेष्ठ! मेरा अत्यन्त प्रबल पराक्रम तो देखिये। मैं (उस पराक्रमसे) इन्द्र और महेश्वरके सहित सभी देवों और दानवों तथा गन्धर्वोंको जीत लूँगा। ऐसा वचन कहकर हिरण्याक्ष-पुत्र अन्धकने शम्भु (नामक) सारथिसे मीठी वाणीमें अच्छी तरह आश्वस्त करते हुए कहा—॥ १-४॥ |
| सारथे वाहय रथं हराभ्याशं महाबल।<br>यावन्निहन्मि बाणौघैः प्रमथामरवाहिनीम्॥ ५<br>इत्यन्धकवचः श्रुत्वा सारथिस्तुरगांस्तदा।<br>कृष्णवर्णान् महावेगान् कशयाऽभ्याहनन्मुने॥ ६<br>ते यत्नतोऽपि तुरगाः प्रेर्यमाणा हरं प्रति।<br>जघनेष्ववसीदन्तः कृच्छ्रेणोहुश्च तं रथम्॥ ७<br>वहन्तस्तुरगा दैत्यं प्राप्ताः प्रमथवाहिनीम्।<br>संवत्सरेण साग्रेण वायुवेगसमा अपि॥ ८ | महाबलशाली सारथे! तुम रथको महादेवके (सामने) सामने ले चलो। मैं बाणोंकी वर्षासे प्रमथों एवं देवोंकी सेनाको मार भगाऊँगा। मुने! अन्धकके वचनको सुनकर सारथिने (अपने रथके) काले रंगके तीव्रगामी घोड़ोंको कोड़ेसे मारा। शंकरकी ओर चेष्टापूर्वक चलाये जाते हुए भी वे घोड़े जाँघोंमें कष्टका अनुभव करते हुए कठिनाईसे उस रथको खींच रहे थे। दैत्यको ढोनेवाले वे घोड़े वायुके वेगके समान होनेपर भी एक वर्षसे भी अधिक समयमें प्रमथोंकी सेनामें पहुँच सके॥ ५-८॥ |
| ततः कार्मुकमानम्य बाणजालैर्गणेश्वरान्।<br>सुरान् संछादयामास सेन्द्रोपेन्द्रमहेश्वरान्॥ ९<br>बाणैश्छादितमीक्ष्यैव बलं त्रैलोक्यरक्षिता।<br>सुरान् प्रोवाच भगवांश्र्चक्रपाणिर्जनार्दनः॥ १० | उसके बाद (अन्धकने) धनुषको झुकाकर बाणसमूहोंसे गणेश्वरों एवं इन्द्र, विष्णु और महेश्वरके साथ सभी देवोंको ढक दिया। (पूरी) सेनाको बाणोंसे ढकी देखकर तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले चक्रपाणि भगवान् जनार्दनने देवोंसे कहा—॥ ९-१०॥ |
| विष्णुरुवाच<br>किं तिष्ठध्वं सुरश्रेष्ठा हतेनानेन वै जयः।<br>तस्मान्मद्वचनं शीघ्रं क्रियतां वै जयेप्सवः॥ ११<br>शात्यन्तामस्य तुरगाः समं रथकुटुम्बिना।<br>भज्यतां स्यन्दनश्चापि विरथः क्रियतां रिपुः॥ १२ | विष्णुने कहा— सुरश्रेष्ठो! आपलोग व्यर्थमें क्यों बैठे हैं? इसके मारे जानेसे ही विजय होगी। इसलिये विजयकी अभिलाषा रखकर आपलोग शीघ्र मेरे कहनेके अनुसार कार्य करें। (पहले) रथके सारथिके साथ इस (अन्धक)-के घोड़ोंको मार डालें एवं रथको तोड़कर |
७२- स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| ३४६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
|---|
| विरथं तु कृतं पश्चादेनं धक्ष्यति शङ्करः।<br>नोपेक्ष्यः शत्रुरुद्दिष्टो देवाचार्येण देवताः॥ १३<br><br>इत्येवमुक्ताः प्रमथा वासुदेवेन सामराः।<br>चक्रुवेगं सहेन्द्रेण समं चक्रधरेण च॥ १४ | शत्रुको बिना रथका कर दें। बिना रथका करनेके बाद तो शंकर इसे भस्म कर देंगे। देवो! देवताओंके आचार्य बृहस्पतिने कहा है कि शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र एवं विष्णुसहित प्रमथों तथा देवोंने शीघ्रतासे चढ़ाई कर दी॥ ११-१४॥ | | तुरगाणां सहस्रं तु मेघाभानां जनार्दनः।<br>निमिषान्तरमात्रेण गदया विनिपोथयत्॥ १५<br><br>हताश्वात् स्यन्दनात् स्कन्दः प्रगृह्य रथसारथिम्।<br>शक्त्या विभिन्नहृदयं गतासुं व्यसृजद् भुवि॥ १६<br><br>विनायकाद्याः प्रमथाः समं शक्रेण दैवतैः।<br>सध्वजाक्षं रथं तूर्णमभञ्जन्त तपोधनाः॥ १७<br><br>सहसा स महातेजा विरथस्त्यज्य कार्मुकम्।<br>गदामादाय बलवानभिदुद्राव दैवतान्॥ १८ | जनार्दन (विष्णु)-ने क्षणमात्रमें ही अपनी (कौमोदकी) गदासे बादल-जैसे काले रंगवाले हजारों घोड़ोंको मार डाला। स्कन्दने मारे गये घोड़ोंवाले रथसे सारथिको खींचकर शक्तिसे उसके हृदयको विदीर्ण कर दिया और प्राणहीन हो जानेपर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया। इन्द्र आदि देवताओंके साथ तपोधन विनायक प्रभृति प्रमथोंने शीघ्र ध्वजा और पहिये तथा धुरेके साथ रथको तोड़ डाला। (जब) महातेजस्वी पराक्रमी (अन्धक)-ने बिना रथके हो जानेपर धनुषको छोड़ दिया और गदा लेकर वह देवताओंकी ओर दौड़ पड़ा - ॥ १५-१८॥ | | पदान्यष्टौ ततो गत्वा मेघगम्भीरया गिरा।<br>स्थित्वा प्रोवाच दैत्येन्द्रो महादेवं स हेतुमत्॥ १९<br><br>भिक्षो भवान् सहानीकस्त्वसहायोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>तथाऽपि त्वां विजेष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ २०<br><br>तद्वाक्यं शङ्करः श्रुत्वा सेन्द्रान्सुरगणांस्तदा।<br>ब्रह्मणा सहितान् सर्वान् स्वशरीरे न्यवेशयत्॥ २१<br><br>शरीरस्थांस्तान् प्रमथान् कृत्वा देवांश्च शङ्करः।<br>प्राह एह्येहि दुष्टात्मन् अहमेकोऽपि संस्थितः॥ २२ | तब दैत्येन्द्रने आठ पग चलकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें महादेवसे अपना अभीष्ट वचन कहा- भिक्षुक! यद्यपि इस समय तुम सेनावाले हो और मैं असहाय हूँ, फिर भी मैं तुमको जीत लूँगा। आज मेरी शक्ति देखो। उसका वचन सुनकर शंकरने इन्द्र और ब्रह्माके साथ सभी देवताओंको अपने शरीरमें निवेशित कर लिया - छिपा लिया। उन प्रमथों एवं देवोंको अपने शरीरमें छिपानेके बाद शंकरने कहा- दुष्टात्मन्! आओ, आओ! मैं अकेला रहनेपर भी (तुमसे लड़नेके लिये) खड़ा हूँ॥ १९-२२॥ | | तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सर्व्वामरगणक्षयम्।<br>दैत्यः शङ्करमभ्यागाद् गदामादाय वेगवान्॥ २३<br><br>तमापतन्तं भगवान् दृष्ट्वा त्यक्त्वा वृषोत्तमम्।<br>शूलपाणिर्गिरिप्रस्थे पदातिः प्रत्यतिष्ठत॥ २४<br><br>वेगेनैवापतन्तं च बिभेदोरसि भैरवः।<br>दारुणं सुमहद् रूपं कृत्वा त्रैलोक्यभीषणम्॥ २५<br><br>दंष्ट्राकरालं रविकोटिसंनिभं मृगारिचर्माभिवृतं जटाधरम्।<br>भुजङ्गहारामलकण्ठकन्दरं विंशार्धबाहुं सषडर्धलोचनम्॥ २६ | समस्त देवगणोंसे संहार किये जाते उस महान् आश्चर्यको देखकर वह दैत्य गदा लेकर शीघ्रतासे शंकरके पास चला गया। भगवान् शूलपाणि उसे आते देख अपने श्रेष्ठ वृषभ (नन्दी)-को छोड़कर पर्वतपर पैरोंके बल खड़े हो गये। भैरवने तीनों लोकोंको डरा देनेवाला अत्यन्त भयानक रूप धारण करके तेजीसे आ रहे उस (अन्धक)-का हृदय विदीर्ण कर दिया। (उस समय शंकरका रूप) भयानक दाढ़ोंवाले करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, बाघम्बर पहने, जटासे सुशोभित, सर्पके हारसे अलंकृत ग्रीवावाला तथा दस भुजा और तीन नयनोंसे युक्त था॥ २३-२६॥ |
अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एतादृशेन रूपेण भगवान् भूतभावनः।<br>बिभेद शत्रुं शूलेन शुभदः शाश्वतः शिवः ॥ २७<br>सशूलं भैरवं गृह्य भिन्नेप्युरसि दानवः।<br>विजहारातिवेगेन क्रोशमात्रं महामुने ॥ २८<br>ततः कथंचिद् भगवान् संस्तभ्यात्मानमात्मना।<br>तूर्णमुत्पाटयामास शूलेन सगदं रिपुम् ॥ २९<br>दैत्याधिपस्त्वपि गदां हरमूर्ध्नि न्यपातयत्।<br>कराभ्यां गृह्य शूलं च समुत्पतत दानवः ॥ ३० | ऐसे लक्षणोंसे संयुक्त मङ्गलदाता, शाश्वत, भूतभावन भगवान् शिवने शूलसे शत्रुको विदीर्ण कर दिया। महामुने ! हृदयके विदीर्ण हो जानेपर भी दानव शूलके साथ भैरवको पकड़कर एक कोसतक उन्हें खींच ले गया। तब भगवान्ने किसी प्रकार अपनेसे अपनेको रोककर गदा लिये हुए शत्रुको अपने शूलसे तुरंत मारा। दैत्योंके स्वामी (अन्धक)-ने भी शंकरके सिरपर गदाका वार किया और शूलको दोनों हाथोंसे पकड़कर ऊपर उछल गया ॥ २७—३० ॥ |
| संस्थितः स महायोगी सर्वाधारः प्रजापतिः।<br>गदापातक्षताद् भूरि चतुर्थाऽसृगथापतत् ॥ ३१<br>पूर्वधारारसमुद्भूतो भैरवोऽग्निसमप्रभः।<br>विद्याराजेति विख्यातः पद्ममालाविभूषितः ॥ ३२<br>तथा दक्षिणधारोत्थो भैरवः प्रेतमण्डितः।<br>कालराजेति विख्यातः कृष्णाञ्जनसमप्रभः ॥ ३३<br>अथ प्रतीचीधारोत्थो भैरवः पत्रभूषितः।<br>अतसीकुसुमप्रख्यः कामराजेति विश्रुतः ॥ ३४ | सबके आधारस्वरूप महायोगी वे प्रजापति शंकरजी खड़े रहे; परंतु इसके बाद गदाके आघातसे हुए चोटसे (चारों दिशाकी) चार धाराओंमें बहुत अधिक रक्त प्रवाहित होने लग गया। पूर्व दिशाकी धारासे अग्निके समान प्रभाववाले, कमलकी मालासे सुशोभित 'विद्याराज' नामसे प्रसिद्ध भैरव उत्पन्न हुए। दक्षिण दिशाकी धारासे प्रेतसे मण्डित काले अञ्जनके समान प्रभाववाले 'कालराज' नामसे प्रसिद्ध भैरव उत्पन्न हुए। उसके बाद पश्चिम दिशाकी धारासे अलसीके फूलके समान पत्रसे शोभित 'कामराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए ॥ ३१—३४ ॥ |
| उदग्धाराभवश्चान्यो भैरवः शूलभूषितः।<br>सोमराजेति विख्यातश्चक्रमालाविभूषितः ॥ ३५<br>क्षतस्य रुधिराज्जातो भैरवः शूलभूषितः।<br>स्वच्छन्दराजो विख्यात इन्द्रायुधसमप्रभः ॥ ३६<br>भूमिस्थाद् रुधिराज्जातो भैरवः शूलभूषितः।<br>ख्यातो ललितराजेति सौभाञ्जनसमप्रभः ॥ ३७<br>एवं हि सप्तरूपोऽसौ कथ्यते भैरवो मुने।<br>विघ्नराजोऽष्टमः प्रोक्तो भैरवाष्टकमुच्यते ॥ ३८ | उत्तर दिशाकी धारासे चक्रमालासे सुशोभित (एवं) शूल लिये 'सोमराज' नामसे प्रसिद्ध अन्य भैरव उत्पन्न हुए। घावके रक्तसे इन्द्रधनुषके समान चमकवाले (एवं) शूल लिये 'स्वच्छन्दराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए। पृथ्वीपर गिरे हुए रक्तसे सौभाञ्जन (सहिजन)-के समान (एवं) शूल लिये शोभायुक्त 'ललितराज' नामसे विख्यात भैरव उत्पन्न हुए। मुने ! इस प्रकार इन भैरवका सात रूप कहा जाता है। 'विघ्नराज' आठवें भैरव हैं। इन्हें भैरवाष्टक (आठों भैरव) कहा जाता है ॥ ३५—३८ ॥ |
| एवं महात्मना दैत्यः शूलप्रोतो महासुरः।<br>छत्रवद् धारितो ब्रह्मन् भैरवेण त्रिशूलिना ॥ ३९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं—] ब्रह्मन् ! इस प्रकार त्रिशूल धारण करनेवाले महात्मा भैरवने शूलसे विद्ध हुए महासुर दैत्यको छातेकी भाँति ऊपर उठा लिया। ब्रह्मन् ! |
| तस्यासृगुल्बणं ब्रह्मञ्छूलभेदादवापतत्।<br>येनाकण्ठं महादेवो निमग्नः सप्तमूर्तिमान् ॥ ४०<br>ततः स्वेदोऽभवद् भूरि श्रमजः शङ्करस्य तु।<br>ललाटफलके तस्माज्जाता कन्याऽसृगाप्लुता ॥ ४१ | शूलसे विद्ध होनेके कारण उसका बहुत अधिक रक्त गिरा। उससे सात मूर्तिवाले महादेव गलेतक लहू-लुहान हो गये। परिश्रम करनेके कारण शंकरके पूरे ललाटपर बहुत अधिक पसीना आ गया। उससे खूनसे लथपथ |
| ३४८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| यद्भूम्यां न्यपतद् विप्र स्वेदबिन्दुः शिवाननात् ।<br>तस्मादङ्गारपुञ्जाभो बालकः समजायत ॥ ४२<br>स बालस्तृषितोऽत्यर्थं पपौ रुधिरमान्धकम् ।<br>कन्या चोत्कृत्य संजातमसृग्विलिलिहेऽद्भुता ॥ ४३ | एक कन्या उत्पन्न हुई। विप्र! शिवके मुखसे भूमिपर गिरे पसीनोंकी बूँदोंसे अंगारे-जैसी कान्तिवाला एक बालक उत्पन्न हुआ॥ ३९—४२॥<br>अत्यन्त प्यासा वह बालक अन्धकका रक्त पीने लगा और अद्भुत कन्या भी काटकर उत्पन्न हुए रक्तको चाटने लगी। उसके बाद भैरवका रूप धारण करनेवाले वरदानी शंकरने प्रातःकालके सूर्यके समान कान्तिवाली उस कन्यासे जगत्-कल्याणकारी महान् वचन कहा— | | ततस्तामाह बालार्कप्रभां भैरवमूर्तिमान् ।<br>शङ्करो वरदो लोके श्रेयोऽर्थाय वचो महत् ॥ ४४<br>त्वां पूजयिष्यन्ति सुरा ऋषयः पितरोरगाः ।<br>यक्षविद्याधराश्चैव मानवाश्च शुभङ्करि ॥ ४५<br>त्वां स्तोष्यन्ति सदा देवि बलिपुष्पोत्करैः करैः ।<br>चर्चिकेति शुभं नाम यस्माद् रुधिरचर्चिता ॥ ४६ | शुभकारिणि! देवता, ऋषि, पितर, सर्पादि, यक्ष, विद्याधर एवं मानव तुम्हारी पूजा करेंगे। देवि! (वे लोग) बलि एवं पुष्पाञ्जलिसे तुम्हारी स्तुति करेंगे। यतः तुम रक्तसे चर्चित (लथपथ) हो, अतः तुम्हारा शुभ नाम 'चर्चिका' होगा॥ ४३—४६॥ | | इत्येवमुक्ता वरदेन चर्चिका<br>भूतानुजाता हरिचर्मवासिनी ।<br>महीं समन्ताद् विचचार सुन्दरी<br>स्थानं गता हिङ्गुलताद्रिमुत्तमम् ॥ ४७<br>तस्यां गतायां वरदः कुजस्य<br>प्रादाद् वरं सर्ववरोत्तमं यत् ।<br>ग्रहाधिपत्यं जगतां शुभाशुभं<br>भविष्यति त्वद्वशगं महात्मन् ॥ ४८ | वरदानी शंकरके ऐसा कहनेपर व्याघ्रचर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाली और सब भूतोंके बाद उत्पन्न हुई सुन्दरी चर्चिका पृथ्वीपर चारों ओर विचरती हुई इंगुरके रंगवाले उत्तम पर्वतपर चली गयी। उसके (वहाँ) चले जानेपर वरदानी शंकरने कुज (मंगल)को सर्वश्रेष्ठ वर दिया। (उन्होंने कहा—) महात्मन्! तुम ग्रहोंके स्वामी बनोगे तथा संसारका शुभ और अशुभ तुम्हारे अधीन होगा। | | हरोऽन्धकं वर्षसहस्त्रमात्रं<br>दिव्यं स्वनेत्रार्कहुताशनेन ।<br>चकार संशुष्कतनुं त्वशोणितं<br>त्वगस्थिशेषं भगवान् स भैरवः ॥ ४९<br>तत्राग्निना नेत्रभवेन शुद्धः<br>स मुक्तपापोऽसुरराड् बभूव ।<br>ततः प्रजानां बहुरूपमीशं<br>नाथं हि सर्वस्य चराचरस्य ॥ ५०<br>ज्ञात्वा स सर्वेश्वरमीशमव्ययं<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं वरेण्यम् ।<br>सर्वैः सुराद्यैर्नतमीड्यमाद्यं<br>ततोऽन्धकः स्तोत्रमिदं चकार ॥ ५१ | उन भैरव-रूपधारी भगवान् शिवने अपने अग्नि और सूर्यरूपी नेत्रोंसे एक हजार दिव्य वर्षोंतक अन्धकके शरीरको सुखाकर रक्तरहित कर हड्डी तथा चाम शेष रखकर कंकाल बना दिया। शंकरके नेत्रसे उत्पन्न अग्निद्वारा शुद्ध होनेके कारण वह असुरराज पापसे छूट गया। उसके बाद अनेक रूप धारण करके प्रजाओंका नियमन करनेवाले, समस्त चर और अचरके स्वामी, सर्वेश्वर, अविनाशी ईश, त्रैलोक्यपति, वरदानी, वरेण्य, सभी सुरादिकोंद्वारा विनयपूर्वक स्तुति करनेयोग्य एवं सबके आदिमें रहनेवाले शंकरको वास्तवरूपमें जानकर अन्धकने यह स्तुति की—॥ ४७—५१॥ | | अन्धक उवाच<br>नमोऽस्तु ते भैरव भीममूर्ते<br>त्रिलोकगोप्त्रे शितशूलधारिणे ।<br>विंशार्द्धबाहो भुजगेशहार<br>त्रिनेत्र मां पाहि विपन्नबुद्धिम् ॥ ५२<br>जयस्व सर्वेश्वर विश्वमूर्ते<br>सुरासुरैर्वन्दितपादपीठ ।<br>त्रैलोक्यमातुर्गुरवे वृषाङ्क<br>भीतः शरण्यं शरणागतोऽस्मि ॥ ५३ | अन्धकने कहा— हे विशालकाय भैरव! हे त्रिलोककी रक्षा करनेवाले! हे तीक्ष्ण शूल धारण करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे दस भुजाओंवाले तथा नागेशका हार धारण करनेवाले त्रिनेत्र! आप मुझ नष्टमतिकी रक्षा करें। हे देवों तथा असुरोंसे वन्दित पादपीठवाले विश्वमूर्ति सर्वेश्वर! आपकी जय हो। हे त्रिलोक-जननीके स्वामी वृषाङ्क! मैं भयभीत होकर आप शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें आया हूँ। |
अध्याय ७०] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३४९
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| त्वां नाथ देवाः शिवमीरयन्ति<br>सिद्धा हरं स्थाणुं महर्षयश्च।<br>भीमं च यक्षा मनुजा महेश्वरं<br>भूताश्च भूताधिपमाममन्ति॥ ५४<br>निशाचरा उग्रमुपार्चयन्ति<br>भवेति पुण्याः पितरो नमन्ति।<br>दासोऽस्मि तुभ्यं हर पाहि मां<br>पापक्षयं मे कुरु लोकनाथ॥ ५५ | हे नाथ! देवता आपको शिव (मङ्गलमय) कहते हैं। सिद्धलोग आपको हर (पापहारी), महर्षिलोग स्थाणु (अचल), यक्षलोग भीम, मनुष्य महेश्वर और भूत भूताधिपति मानते हैं। निशाचर उग्र नामसे आपकी अर्चना करते हैं तथा पुण्यात्मा पितृगण भव नामसे आपको नमस्कार करते हैं। हे हर! मैं आपका दास हूँ, आप मेरी रक्षा करें। हे लोकनाथ! मेरे पापोंका आप विनाश कीजिये॥ ५२-५५॥ |
| भवांस्त्रिदेवस्त्रियुगस्त्रिधर्मा<br>त्रिपुष्करश्चासि विभो त्रिनेत्र।<br>त्रय्यारुणिस्त्रिश्रुतिरव्ययात्मन्<br>पुनीहि मां त्वां शरणं गतोऽस्मि॥ ५६<br>त्रिणाचिकेतस्त्रिपदप्रतिष्ठः<br>षडङ्गवित् त्वं विषयेष्वलुब्धः।<br>त्रैलोक्यनाथोऽसि पुनीहि शम्भो<br>दासोऽस्मि भीतः शरणागतस्ते॥ ५७<br>कृतं महच्छङ्कर तेऽपराधं<br>मया महाभूतपते गिरीश।<br>कामारिणा निर्जितमानसेन<br>प्रसादये त्वां शिरसा नतोऽस्मि॥ ५८<br>पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसम्भवः।<br>त्राहि मां देव ईशान सर्वपापहरो भव॥ ५९ | हे सर्वसमर्थ त्रिनेत्र! आप त्रिदेव, त्रियुग, त्रिधर्मा तथा त्रिपुष्कर हैं। हे अव्ययात्मन्! आप त्रय्यारुणि तथा त्रिश्रुति हैं। आप मुझे पवित्र करें। मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप त्रिणाचिकेत, त्रिपदप्रतिष्ठ (स्वर्ग, मर्त्य, पातालरूप तीनों पदोंपर प्रतिष्ठित) षडङ्गवित् (वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—इन छह अङ्गोंके जाननेवाले), विषयोंके प्रति अनासक्त तथा तीनों लोकोंके स्वामी हैं। हे शम्भो! आप मुझे पवित्र करें। मैं आपका दास हूँ। भयभीत होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। हे शंकर! हे महाभूतपते! हे गिरीश! कामरूपी शत्रुने मेरे मनको जीत लिया था, इसलिये मैंने आपका महान् अपराध किया है। मैं आपको सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। मैं पापी, पापकर्मा, पापात्मा तथा पापसे उत्पन्न हूँ। हे देव ईशान! हे समस्त पापोंको हरण करनेवाले महादेव! आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ५६-५९॥ |
| मा मे क्रुध्यस्व देवेश त्वया चैतादृशोऽस्म्यहम्।<br>सृष्टः पापसमाचारो मे प्रसन्नो भवेश्वर॥ ६० | देवेश! आप मेरे ऊपर कुपित न हों। आपने ही मुझे इस प्रकारके पापका आचरण करनेवाला बनाया है। ईश्वर! मेरे ऊपर प्रसन्न होइये। |
| त्वं कर्ता चैव धाता च त्वं जयस्त्वं महाजयः।<br>त्वं मङ्गल्यस्त्वमोंकारस्त्वमीशानो ध्रुवोऽव्ययः॥ ६१ | आप सृष्टि तथा पालन-पोषण करनेवाले हैं। आप ही जय और आप ही महाजय हैं। आप मङ्गलमय हैं। आप ओंकार हैं। आप ही ईशान, अव्यय तथा ध्रुव हैं। |
| त्वं ब्रह्मा सृष्टिकृन्नाथास्त्वं विष्णुस्त्वं महेश्वरः।<br>त्वमिन्द्रस्त्वं वषट्कारो धर्मस्त्वं च सुरोत्तमः॥ ६२ | आप सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा तथा (सब कुछ करनेमें) समर्थ हैं। आप विष्णु और महेश्वर हैं। आप इन्द्र हैं, आप वषट्कार हैं, आप धर्म तथा देवोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। |
| सूक्ष्मस्त्वं व्यक्तरूपस्त्वं त्वमव्यक्तस्त्वमीश्वरः।<br>त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम्॥ ६३ | आप (कठिनतासे देखे जाने योग्य) सूक्ष्म हैं, आप (प्रतीतिका विषय होनेसे) व्यक्तरूप हैं, आप अप्रकटरहस्य—अव्यक्त हैं, आप ईश्वर हैं, आपसे ही यह चर-अचर जगत् व्याप्त (ओतप्रोत या ढका) है। |
| ३५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० | | :--- | :--- |
| त्वमादिरन्तो मध्यश्च त्वमनादिः सहस्रपात्।<br>विजयस्त्वं सहस्राक्षो विरूपाक्षो महाभुजः॥६४<br><br>अनन्तः सर्वगो व्यापी हंसः प्राणाधिपोऽच्युतः।<br>गीर्वाणपतिरव्यग्रो रुद्रः पशुपतिः शिवः॥६५<br><br>त्रैविद्यस्त्वं जितक्रोधो जितारिर्विजितेन्द्रियः।<br>जयश्च शूलपाणिस्त्वं त्राहि मां शरणागतम्॥६६ | आप आदि, मध्य एवं अन्त हैं, (साथ ही) आप आदि-रहित एवं हजारों पैरोंवाले सहस्रपात् हैं। आप विजय हैं। आप हजारों आँखोंवाले, विरूप आँखवाले एवं बड़ी भुजावाले हैं। आप अन्तसे रहित, सर्वगत, व्यापी, हंस, प्राणोंके स्वामी (सदा स्वस्वरूपमें स्थित) अच्युत, देवाधिदेव, शान्त, रुद्र, पशुपति एवं शिव हैं। आप तीनों वेदोंके जाननेवाले, क्रोधको जीत लेनेवाले, शत्रुओंको विजित करनेवाले, इन्द्रियजयी, जय एवं शूलपाणि हैं। आप मुझ शरणागतकी रक्षा करें॥६०-६६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं महेश्वरो ब्रह्मन् स्तुतो दैत्याधिपेन तु।<br>प्रीतियुक्तः पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षिमुवाच ह॥६७<br><br>सिद्धोऽसि दानवपते परितुष्टोऽस्मि तेऽन्धक।<br>वरं वरय भद्रं ते यमिच्छसि विनाऽम्बिकाम्॥६८ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मन्! दैत्योंके स्वामी अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर लालिमा लिये भूरे रंगकी आँखवाले महेश्वरने प्रसन्न होकर हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—दानवपति अन्धक! तुम सिद्ध हो गये हो; मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अम्बिकाके सिवाय तुम जो चाहो, वह वर माँगो। तुम्हारा कल्याण हो॥६७-६८॥ | | अन्धक उवाच<br>अम्बिका जननी मह्यं भगवांस्त्र्यम्बकः पिता।<br>वन्दामि चरणौ मातुर्वन्दनीया ममाम्बिका॥६९<br><br>वरदोऽसि यदीश न तद् यातु विलयं मम।<br>शारीरं मानसं वाग्जं दुष्कृतं दुर्विचिन्तितम्॥७०<br><br>तथा मे दानवो भावो व्यपयातु महेश्वर।<br>स्थिराऽस्तु त्वयि भक्तिस्तु वरमेतत् प्रयच्छ मे॥७१ | अन्धकने (विनीत भावसे) कहा—अम्बिका मेरी माता और आप त्र्यम्बक मेरे पिता हैं। अम्बिका मेरी वन्दनीया हैं। मैं उन माताके चरणोंकी वन्दना करता हूँ। ईशान! यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरे शरीरसम्बन्धी, मनसम्बन्धी एवं वचनसम्बन्धी पाप तथा नीच विचार नष्ट हो जायें। महेश्वर! मेरा दानवीय विचार भी दूर हो जाय एवं आपमें मेरी अटल भक्ति हो जाय—मुझे यही वर दीजिये॥६९-७१॥ | | महादेव उवाच<br>एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम्।<br>मुक्तोऽसि दैत्यभावाच्च भृङ्गी गणपतिर्भव॥७२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वरदः शूलाग्रादवतार्य तम्।<br>निर्मार्ज्य निजहस्तेन चक्रे निर्व्रणमन्धकम्॥७३<br><br>ततः स्वदेहतो देवान् ब्रह्मादीनाजुहाव सः।<br>ते निश्चेरुर्महात्मानो नमस्यन्तस्त्रिलोचनम्॥७४<br><br>गणान् सनन्दीनाहूय संनिवेश्य तदाग्रतः।<br>भृङ्गिनं दर्शयामास धुवं नैषोऽन्धकेति हि॥७५ | (भगवान्) महादेवने कहा—दैत्येन्द्र! ऐसा ही हो। तुम्हारे पाप नष्ट हो जायँ। तुम दानवीय विचारसे मुक्त हो गये। अब तुम भृङ्गी नामके गणपति हो गये। इस प्रकार कहकर वरदानी महादेवने उस अन्धकको शूलकी नोकसे उतारा और अपने हाथसे सहलाकर बिना घावका कर दिया। उसके बाद उन्होंने अपने शरीरमें स्थित ब्रह्मादि देवोंका आह्वान किया। वे सभी महान् देवगण त्र्यम्बक शिवको नमस्कार करते हुए बाहर निकले। नन्दीके साथ गणोंको बुलाकर और सामने बैठाकर भृङ्गीको दिखलाते हुए उन्होंने कहा—निश्चय ही यह अन्धक (पहले-जैसा) नहीं रह गया है॥७२-७५॥ | | तं दृष्ट्वा दानवपतिं संशुष्कपिशितं रिपुम्।<br>गणाधिपत्यमापन्नं प्रशंसुर्वृषध्वजम्॥७६ | उस सूखे हुए मांसवाले शत्रु दानवपतिको गणाधिप हुआ देखकर वे सभी वृषध्वज (शंकर) की प्रशंसा |
अध्याय ७० ] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३५१
| ततस्तान् प्राह भगवान् सम्परिष्वज्य देवताः।<br>गच्छध्वं स्वानि धिष्ण्यानि भुङ्ग्ध्वं त्रिदिवं सुखम्॥ ७७<br><br>सहस्राक्षोऽपि संयातु पर्वतं मलयं शुभम्।<br>तत्र स्वकार्यं कृत्वैव पश्चाद् यातु त्रिविष्टपम्॥ ७८<br><br>इत्येवमुक्त्वा त्रिदशान् समाभाष्य व्यसर्जयत्।<br>पितामहं नमस्कृत्य परिष्वज्य जनार्दनम्।<br>ते विसृष्टा महेशेन सुरा जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ७९ | करने लगे। उसके बाद भगवान् शंकरने उन देवोंको गले लगाकर कहा—देवताओ! आपलोग अपने-अपने स्थानको जाइये और स्वर्ग-सुखका उपभोग कीजिये। इन्द्र भी सुखद मलयपर्वतपर जायें तथा वहाँ अपना काम समाप्त करके ही स्वर्ग चले जायें। ऐसा कहकर देवोंसे वार्तालाप कर देवोंको विदा कर दिया। महेशने पितामहको नमस्कार तथा जनार्दनको गले लगाकर उन सभीको विदा कर दिया। (महेशसे विदा किये गये) वे देवगण स्वर्गको चले गये॥ ७६—७९॥ |
| महेन्द्रो मलयं गत्वा कृत्वा कार्यं दिवं गतः।<br>गतेषु शक्रप्राग्येषु देवेषु भगवाञ्छिवः॥ ८०<br><br>विसर्जयामास गणाननुमान्य यथार्हतः।<br>गणाश्च शङ्करं दृष्ट्वा स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ८१<br><br>जग्मुस्ते शुभलोकानि महाभोगानि नारद।<br>यत्र कामदुघा गावः सर्वकामफलद्रुमाः॥ ८२<br><br>नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो हृदाः पायसकर्दमाः।<br>स्वां स्वां गतिं प्रयातेषु प्रमथेषु महेश्वरः॥ ८३<br><br>समादायान्धकं हस्ते सनन्दिः शैलमभ्यगात्।<br>द्वाभ्यां वर्षसहस्राभ्यां पुनरागाद्धरो गृहम्॥ ८४<br><br>ददृशे च गिरेः पुत्रीं श्वेतार्ककुसुमस्थिताम्।<br>समायातं निरीक्ष्यैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ८५<br><br>त्यक्त्वाऽर्कपुष्पं निर्गत्य सखीस्ताः समुपाह्वयत्।<br>समाहूताश्च देव्या ता जयाद्यास्तूर्णमागमन्॥ ८६ | महेन्द्र भी मलयाचलपर जा करके (अपना) कार्य सम्पन्नकर स्वर्ग चले गये। शिवने इन्द्र आदि देवोंके चले जानेपर गणोंको यथायोग्य सम्मानित कर विदा कर दिया। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! गण भी शंकरका दर्शन कर अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो विशाल भोगसे सम्पन्न उन सुखद लोकोंको चले गये, जहाँकी गौएँ इच्छित वस्तु प्रदान करनेवाली थीं, वृक्ष समस्त कर्मरूपी फलोंके दाता थे, नदियाँ अमृतकी धारा बहानेवाली थीं और सरोवर दूधके पङ्कसे भरे थे। महेश्वर प्रमथोंके अपने-अपने स्थानपर चले जानेपर अन्धकका हाथ पकड़कर (उसे साथ लिये हुए) नन्दीसहित पर्वतपर चले गये। (वे) शंकर दो हजार वर्षोंके बाद फिर अपने घर लौटे। उन्होंने सफेद अर्क (आक या मन्दार)-के फूलमें स्थित गिरिजाको देखा। पार्वती समस्त चिह्नोंसे युक्त शंकरको आया हुआ देखते ही अर्कके फूलको छोड़कर बाहर निकल आयीं और उन्होंने (अपनी जयादि) सखियोंको पुकारा। पुकारी गयीं वे जया आदि सभी देवियाँ शीघ्र वहाँ चली आयीं॥ ८०—८६॥ |
| ताभिः परिवृता तस्थौ हरदर्शनलालसा।<br>ततस्त्रिनेत्रो गिरिशां दृष्ट्वा प्रेक्ष्य च दानवम्॥ ८७<br><br>नन्दिनं च तथा हर्षादालिलिङ्गे गिरेः सुताम्।<br>अथोवाचैष दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः॥ ८८<br><br>पश्यस्व प्रणतिं यातं स्वसुतं चारुहासिनि।<br>इत्युच्चार्यान्धकं चैव पुत्र एहीति सत्वरम्॥ ८९ | उन (अपनी सहेली जयादि देवियों)-से घिरी हुई पार्वतीजी शिवके दर्शनकी अभिलाषासे (प्रतीक्षामें) खड़ी रहीं। त्रिनेत्रधारी शंकरने गिरिजाको देखकर दानव एवं नन्दीके ऊपर भी दृष्टिपात किया; फिर प्रसन्नतापूर्वक गिरिसुताको गले लगा लिया। उसके बाद उन्होंने कहा—देवि! मैंने अन्धकको तुम्हारा दास बना लिया है। चारुहासिनि! प्रणाम कर रहे अपने पुत्रको देखो। ऐसा कहनेके बाद उन्होंने कहा—पुत्र! |
७३- बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध, कालनेमिके साथ विष्णुभगवान्का युद्ध और कालनेमिका वध
| ३५२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७० |
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| व्रजस्व शरणं मातुरेशा श्रेयस्करी तव।<br>इत्युक्तो विभुना नन्दी अन्धकश्च गणेश्वरः ॥ ९०<br><br>समागम्याम्बिकापादौ ववन्दतुरुभावपि।<br>अन्धकोऽपि तदा गौरीं भक्तिनम्रो महामुने।<br>स्तुतिं चक्रे महापुण्यां पापघ्नीं श्रुतिसम्मिताम् ॥ ९१ | शीघ्र यहाँ आओ। अपनी इस माताकी शरणमें जाओ! ये तुम्हारा कल्याण करेंगी। प्रभुके इस प्रकार कहनेपर गणेश्वर नन्दी एवं अन्धक दोनोंने जाकर अम्बिकाके चरणोंमें प्रणाम किया। महामुने ! उसके बाद श्रद्धापूर्वक नम्र होकर अन्धकने गौरीकी पाप नाश करनेवाली एवं अत्यन्त पवित्र वेद-सम्मत स्तुति की ॥ ८७-९१ ॥ | | अन्धक उवाच<br>ॐ नमस्ये भवानीं भूतभव्यप्रियां लोकधात्रीं जनित्रीं स्कन्दमातरं महादेवप्रियां धारिणीं स्यन्दिनीं चेतनां त्रैलोक्यमातरं धरित्रीं देवमातरमथेज्यां श्रुतिं स्मृतिं दयां लज्जां कान्तिमग्र्यामसूयां मतिं सदापावनीं दैत्यसैन्यक्षयकरीं महामायां वैजयन्तीं सुशुभां कालरात्रिं गोविन्दभगिनीं शैलराजपुत्रीं सर्वदेवार्ार्चितां सर्वभूतार्चितां विद्यां सरस्वतीं त्रिनयनमहिषीं नमस्यामि मृडानीं शरण्यां शरणमुपागतोऽहं नमो नमस्ते ॥<br><br>इत्थं स्तुता सान्धकेन परितुष्टा विभावरी।<br>प्राह पुत्र प्रसन्नाऽस्मि वृणुष्व वरमुत्तमम् ॥ ९२ | अन्धकने कहा— ॐ मैं भवानीको प्रणाम करता हूँ। मैं भूतभव्य—शङ्करकी प्रिया, लोकधात्री, जनित्री, कार्तिकेयकी जननी, महादेवकी प्रिया, लोकोंको धारण करनेवाली, स्यन्दिनी, चेतना, त्रैलोक्यजननी, धरित्री, देवमाता, इज्या, श्रुति, स्मृति, दया, लज्जा, श्रेष्ठ कान्ति, अग्र्या, असूया, मति, सदापावनी, दैत्योंकी सेनाओंका विनाश करनेवाली, महामाया वैजयन्ती, अत्यन्त शोभावाली, कालरात्रि, गोविन्दभगिनी, शैलराजपुत्री, सर्वदेवोंसे पूजित, सर्वभूतोंसे पूजित, विद्या, सरस्वती, शंकरकी महारानीको प्रणाम करता हूँ। मैं शरणागतोंकी रक्षा करनेवाली मृडानीकी शरणमें आया हूँ। (देवि!) आपको बार-बार प्रणाम है। अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर भवानीने प्रसन्न होकर कहा—पुत्र! मैं प्रसन्न हूँ। तुम उत्तम वर माँगो ॥ ९२ ॥ | | भृङ्गिरुवाच<br>पापं प्रशममायातु त्रिविधं मम पार्वति।<br>तथेश्वरे च सततं भक्तिरस्तु ममाम्बिके ॥ ९३ | भृङ्गीने कहा— पार्वति! अम्बिके! मेरे त्रिविध—मानसिक, कायिक, वाचिक पाप दूर हो जायँ एवं भगवान् शिवमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ॥ ९३ ॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>बाढमित्यब्रवीद् गौरी हिरण्याक्षसुतं ततः।<br>स चास्ते पूजयञ्छर्वं गणानामधिपोऽभवत् ॥ ९४<br><br>एवं पुरा दानवसत्तमं तं<br>महेश्वरेणाथ विरूपदृष्ट्या।<br>कृत्वैव रूपं भयदं च भैरवं<br>भृङ्गित्त्वमीशेन कृतं स्वभक्त्या ॥ ९५<br><br>एतत् तवोक्तं हरकीर्तिवर्धनं<br>पुण्यं पवित्रं शुभदं महर्षे।<br>संकीर्तनीयं द्विजसत्तमेषु<br>धर्मयुरारोग्यधनैषिणा सदा ॥ ९६ | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद गौरीने हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—ऐसा ही हो। वह वहाँ रहकर शिवकी पूजा करते हुए गणाधिप हो गया। इस प्रकार पहले समयमें महेश्वरने उस दानवश्रेष्ठको अपनी विरूपदृष्टिसे भयदायक भीषण रूप प्रदानकर अपनी भक्तिसे 'भृङ्गी' बना दिया। महर्षे (नारदजी)! मैंने आपसे शिवकी कीर्तिको बढ़ानेवाला यह पुण्य पवित्र एवं शुभद आख्यान कहा। धर्म, आयु, आरोग्य एवं धनको चाहनेवालोंको श्रेष्ठ द्विजातियोंमें इसका कीर्तन सदा करना चाहिये ॥ ९४-९६ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७० ॥
अध्याय ७१ ] * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * ३५३
एकहत्तरवाँ अध्याय
इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका 'पाकशासन' और 'गोत्रभिद्' होनेका हेतु; मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा
| नारद उवाच<br>मलयेऽपि महेन्द्रेण यत्कृतं ब्राह्मणर्षभ।<br>निष्पादितं स्वकं कार्यं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १<br><br>पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां यन्महेन्द्रेण मलये पर्वतोत्तमे।<br>कृतं लोकहितं ब्रह्मन्नात्मनश्च तथा हितम्॥ २<br>अन्धासुरस्यानुचरा मयतारपुरोगमाः।<br>ते निर्जिताः सुरगणैः पातालगमनोत्सुकाः॥ ३<br>ददृशुर्मलयं शैलं सिद्धाध्युषितकन्दरम्।<br>लतावितानसंछन्नं मत्तसत्त्वसमाकुलम्॥ ४<br>चन्दनैरुरगाक्रान्तैः सुशीतैरभिसेवितम्।<br>माधवीकुसुमामोदं ऋष्यर्चितहरं गिरिम्॥ ५<br>तं दृष्ट्वा शीतलच्छायं श्रान्ता व्यायामकर्षिताः।<br>मयतारपुरोगास्ते निवासं समरोचयन्॥ ६<br>तेषु तत्रोपविष्टेषु प्राणतृप्तिप्रदोऽनिलः।<br>विवाति शीतः शनकैर्दक्षिणो गन्धसंयुतः॥ ७<br>तत्रैव च रतिं चक्रुः सर्व एव महासुराः।<br>कुर्वन्तो लोकसम्पूज्ये विद्वेषं देवतागणे॥ ८<br>ताञ्ज्ञात्वा शङ्करः शक्रं प्रेषयन्मलयेऽसुरान्।<br>स चापि ददृशे गच्छन् पथि गोमातरं हरिः॥ ९<br>तस्याः प्रदक्षिणां कृत्वा दृष्ट्वा शैलं च सुप्रभम्।<br>ददृशे दानवान् सर्वान् संहृष्टान् भोगसंयुतान्॥ १०<br><br>अथाजुहाव बलहा सर्वानैव महासुरान्।<br>ते चाप्याययुरव्यग्रा विकिरन्तः शरोत्करान्॥ ११<br><br>तानागतान् बाणजालैः रथस्थोऽद्भुतदर्शनः।<br>छादयामास विप्रर्षे गिरीन् वृष्ट्या यथा घनः॥ १२<br><br>ततो बाणैरवच्छाद्य मयादीन् दानवान् हरिः।<br>पाकं जघान तीक्ष्णाग्रैर्मार्गणैः कङ्कवाससैः॥ १३ | नारदने कहा— द्विजश्रेष्ठ! महेन्द्रने मलयपर्वतपर भी अपना जो कार्य पूरा किया उसे आप मुझसे कहिये॥ १॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! महेन्द्रने श्रेष्ठ मलयपर्वतपर जगत्के हित तथा अपने कल्याणके लिये जो कार्य किया था, उसे सुनिये। मय, तार आदि अन्धकासुरके अनुचर दैत्य देवताओंसे पराजित होकर पाताललोकमें जानेके लिये अत्यन्त उत्सुक होने लगे। उन लोगोंने सिद्धोंसे भरे कन्दराओंवाले तथा लतासमूहसे ढके, आमोदभरे प्राणियोंसे व्याप्त, साँपोंसे घिरे सुशीतल चन्दनसे युक्त तथा सुगन्धित माधवी लताके फूलोंकी सुगन्धिसे पूर्ण ऋषियोंद्वारा पूजित शंकरके मलयगिरिको देखा॥ २—५॥<br><br>परिश्रमसे थके-माँदे तथा शक्तिहीन मय, तार आदि दानवोंने शीतल छायावाले उस पर्वतको देखकर वहाँ निवास करनेकी इच्छा की। उन लोगोंके वहाँ ठहर जानेपर प्राणोंको संतुष्टि प्रदान करनेवाली सुगन्धसे पूर्ण तथा शीतल दक्षिणी हवा मन्द-मन्द बहने लगी। जगत्-पूज्य देवताओंसे शत्रुता करते हुए सभी श्रेष्ठ दैत्य सुखसे वहीं रहने लगे। शंकरने उन असुरोंको मलयपर्वतपर रहते हुए जानकर इन्द्रको वहाँ भेजा। मार्गमें जाते हुए इन्द्रने गोमाताको देखा॥ ६—९॥<br><br>उसकी प्रदक्षिणा करनेके बाद उन्होंने सुकान्तिसे सम्पन्न पर्वतपर भोगसे संयुत तथा हर्षित सभी दानवोंको देखा। उसके बाद इन्द्रने सभी महासुरोंको ललकारा। वे भी बिना किसी हिचकके बाणोंकी वर्षा करते हुए आ गये। विप्रर्षे! रथपर बैठे हुए अद्भुत दिखायी पड़नेवाले इन्द्रने आये हुए उन दानवोंको बाणोंके समूहोंसे इस प्रकार ढक दिया जिस प्रकार बादल जलकी वर्षासे पर्वतोंको ढक देता है। उसके बाद इन्द्रने मय आदि दानवोंको बाणोंसे ढककर कङ्क पक्षीके पंख लगे तेज-नुकीली धारवाले बाणोंसे पाक नामके दानवका वध कर दिया॥ १०—१३॥ |
| ३५४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र नाम विभुर्लेभे शासनत्वात् शरैर्दृढैः।<br>पाकशासनतां शक्रः सर्वामरपतिर्विभुः॥ १४<br>तथाऽन्यं पुरनामानं बाणासुरसुतं शरैः।<br>सुपुङ्खैर्दारयामास ततोऽभूत् स पुरन्दरः॥ १५<br>हत्वेत्थं समरेऽजैषीद् गोत्रभिद् दानवं बलम्।<br>तच्चापि विजितं ब्रह्मन् रसातलमुपागमत्॥ १६<br>एतदर्थं सहस्राक्षः प्रेषितो मलयाचलम्।<br>त्र्यम्बकेन मुनिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ १७ | मजबूत बाणोंसे पाकको दण्डित (शासित) करनेके कारण सभी अमरोंके पति विभु इन्द्रको पाकशासनताकी प्राप्ति हुई। इसी प्रकार उन्होंने सुन्दर पंख लगे बाणोंसे दूसरे पुर नामक बाणासुरके पुत्रका (भी) वध कर दिया। इसीसे वे पुरन्दर हुए। ब्रह्मन्! इस प्रकार उन दानवोंका नाश कर इन्द्रने युद्धमें दानव-सेनाको जीत लिया। हारा हुआ वह दानवोंका सेना-समूह रसातलमें चला गया। मुनिश्रेष्ठ! इसीलिये शंकरने इन्द्रको मलयपर्वतपर भेजा था। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १४-१७॥ |
| नारद उवाच<br>किमर्थं दैवतपतिर्गोत्रभित् कथ्यते हरिः।<br>एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि सम्परिवर्तते॥ १८ | नारदने कहा (पूछा)— ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें यह संदेह है कि देवपति (इन्द्र)-को गोत्रभिद् क्यों कहा जाता है॥ १८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां गोत्रभिच्छक्रः कीर्तितो हि यथा मया।<br>हते हिरण्यकशिपौ यच्चकारारिमर्दनः॥ १९<br>दितिर्विनष्टपुत्रा कश्यपं प्राह नारद।<br>विभो नाथोऽसि मे देहि शक्रहन्तारमात्मजम्॥ २०<br>कश्यपस्तामुवाचाथ यदि त्वमसितेक्षणे।<br>शौचाचारसमायुक्ता स्थास्यसे दशतीर्दश॥ २१<br>संवत्सराणां दिव्यानां ततस्त्रैलोक्यनायकम्।<br>जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शत्रुघ्नं नान्यथा प्रिये॥ २२ | पुलस्त्यजी बोले— मैंने इन्द्रको गोत्रभिद् जैसे कहा तथा हिरण्यकशिपुके मार दिये जानेपर शत्रुमर्दन इन्द्रने जो किया? आप (सब) सुनें। नारदजी! पुत्रकी मृत्यु हो जानेपर दितिने कश्यपसे कहा—प्रभो! आप मेरे पति हैं, मुझे इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र दीजिये। कश्यपने उससे कहा—असितनयने! यदि तुम सौ दिव्य वर्षोंतक पवित्र आचरण करोगी तो तुम तीनों लोकोंका मार्गदर्शक एवं शत्रुसंहारकारी पुत्र उत्पन्न करोगी। प्रिये! इसके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ १९-२२॥ |
| इत्येवमुक्ता सा भर्त्रा दितिर्नियममास्थिता।<br>गर्भाधानमृषिः कृत्वा जगामोदयपर्वतम्॥ २३<br>गते तस्मिन् मुनिश्रेष्ठे सहस्त्राक्षोऽपि सत्वरम्।<br>तमाश्रममुपागम्य दितिं वचनमब्रवीत्॥ २४<br>करिष्याम्यनुशुश्रूषां भवत्या यदि मन्यसे।<br>बाढमित्यब्रवीद् देवी भाविकर्मप्रचोदिता॥ २५<br>समिदाहरणादीनि तस्याश्चक्रे पुरन्दरः।<br>विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेषी भुजङ्गवत्॥ २६ | पतिके ऐसा कहनेपर दितिने नियमका निर्वाह करना प्रारम्भ कर दिया। कश्यप ऋषि गर्भाधान करके उदयगिरिपर चले गये। उन मुनिश्रेष्ठके उदयगिरिपर चले जानेके पश्चात् इन्द्रने शीघ्रतासे उस आश्रममें जाकर दितिसे यह वचन कहा—यदि आप अनुमति प्रदान करें तो मैं आपकी सेवा करूँ। भवितव्यतासे प्रेरित होकर देवीने कहा—ठीक है। विनीत बना हुआ इन्द्र अपने कार्यकी सिद्धिके लिये बिल खोजनेवाले सर्पकी भाँति अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उस (दिति)-के लिये लकड़ी आदि लानेका कार्य करने लगे॥ २३-२६॥ |
| एकदा सा तपोयुक्ता शौचे महति संस्थिता।<br>दशवर्षशतान्ते तु शिरःस्नाता तपस्विनी॥ २७ | एक हजार वर्ष बीत जानेपर मनोयोगसे पवित्रताका पालन करनेमें लगी हुई वह तपस्विनी एक दिन सिरसे स्नान करनेके बाद बालोंको खोले हुए अपने घुटनोंपर |
| अध्याय ७१ ] | * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * | ३५५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तकेशा निजं शिरः।<br>सुष्वाप केशप्रान्तैस्तु संश्लिष्टचरणाऽभवत् ॥ २८<br><br>तमन्तरमशौचस्य ज्ञात्वा वेदः सहस्रदृक्।<br>विवेश मातुरुदरं नासारन्ध्रेण नारद ॥ २९<br><br>प्रविश्य जठरं क्रुद्धो दैत्यमातुः पुरन्दरः।<br>ददर्शोर्ध्वमुखं बालं कटिन्यस्तकरं महत् ॥ ३० | सिर रखकर सो गयी। उसके बालोंके ऊपरी भाग (लटककर) पैरोंसे लग गये। नारदजी! सहस्राक्ष इन्द्रदेव अपवित्रताके लिये उस अवसरको (उपयुक्त) जानकर नासिकाके छिद्रसे माताके उदरमें प्रवेश कर गये। इन्द्रने दैत्यमाताकी विशाल कोखमें प्रवेश कर कमरपर हाथ रखे ऊपरको मुख किये हुए एक बालकको देखा॥ २७-३०॥ |
| तस्यैवास्तेऽथ ददृशे पेशीं मांसस्य वासवः।<br>शुद्धस्फटिकसंकाशां कराभ्यां जगृहेऽथ ताम् ॥ ३१<br><br>ततः कोपसमाध्मातो मांसपेशीं शतक्रतुः।<br>कराभ्यां मर्दयामास ततः सा कठिनाऽभवत् ॥ ३२<br><br>ऊर्ध्वेनार्धं च ववृधे त्वधोऽध ववृधे तथा।<br>शतपर्वाऽथ कुलिशः संजातो मांसपेशितः ॥ ३३<br><br>तेनैव गर्भं दितिजां वज्रेण शतपर्वणा।<br>चिच्छेद सप्तधा ब्रह्मन् स रुरोद च विस्वरम् ॥ ३४ | इन्द्रने उस बालकके मुँहमें एक शुद्ध स्फटिकके समान मांसपेशी देखी। इन्होंने उस मांसपेशीको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया। उसके बाद क्रोधकी आगसे संतप्त हुए शतक्रतुने अपने दोनों हाथोंसे उस मांसपेशीको मसल दिया जिससे वह कठोर हो गयी (अब वह पिण्डके रूपमें हो गयी)। उस पिण्डका आधा भाग ऊपरकी ओर और आधा भाग नीचेकी ओर बढ़ गया। इस प्रकार उस मांसपेशीसे सौ पोरोंवाला वज्र बन गया। ब्रह्मन्! (इन्द्रने) उन्हीं पोरोंवाले वज्रसे दितिके द्वारा धारण किये हुए गर्भको सात भागोंमें काट डाला। फिर वह गर्भमें रहनेवाला बालक बिलखते स्वरमें रोने लगा॥ ३१-३४॥ |
| ततोऽप्यबुध्यत दितिर्जानाच्चक्रचेष्टितम्।<br>शुश्राव वाचं पुत्रस्य रुदमानस्य नारद ॥ ३५<br><br>शक्रोऽपि प्राह मा मूढ रुदस्वेति सुघर्घरम्।<br>इत्येवमुक्त्वा चैकैकं भूयश्चिच्छेद सप्तधा ॥ ३६<br><br>ते जाता मरुतो नाम देवभूत्याः शतक्रतोः।<br>मातुरेवापचारेण चलन्ते ते पुरस्कृताः ॥ ३७<br><br>ततः सकुलिशः शक्रो निर्गम्य जठरात् तदा।<br>दितिं कृताञ्जलिपुटः प्राह भीतस्तु शापतः ॥ ३८<br><br>ममास्ति नापराधोऽयं यच्छस्तस्तनयस्तव।<br>तवैवापनयाच्छस्तस्तन्मे न क्रोद्धुमर्हसि ॥ ३९ | [पुलस्त्यजी कहते हैं-] नारदजी! उसके बाद दिति जग गयी और उसने इन्द्रकी की हुई चेष्टाको जान लिया। उसने रोते हुए पुत्रकी वाणी सुनी। इन्द्रने भी कहा-मूर्ख! घर्घर शब्दसे मत रोओ। ऐसा कहकर उन्होंने प्रत्येक टुकड़ेको पुनः सात-सात टुकड़ोंमें काट डाला। वे (कटे हुए टुकड़े) इन्द्रके मरुत् नामके देवभूत्य हो गये। माताके ही अनुचित कार्य करनेके कारण वे आगे चलते हैं। उसके बाद वज्र लिये हुए इन्द्रने जठरसे बाहर आकर एवं शापसे भयभीत होकर हाथ जोड़कर दितिसे कहा-आपके पुत्रको जो मैंने काटा है इसमें मेरा अपराध नहीं है। आपके ही अपचरण (पवित्रताका पालन न करने)-से वह काटा गया। अतः मेरे ऊपर आपको कुपित नहीं होना चाहिये॥ ३५-३९॥ |
| दितिरुवाच<br>न तवात्रापराधोऽस्ति मन्ये दिष्टमिदं पुरा।<br>सम्पूर्णे त्वपि काले वै याऽशौचत्वमुपागता ॥ ४० | दितिने कहा- इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैं इसे पूर्वनियोजित मानती हूँ। इसीसे समय पूरा होनेपर भी मैंने अपवित्रताका आचरण कर दिया॥ ४० ॥ |
७४- बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना, बलिको प्रह्लादका उपदेश
| ३५६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७२ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा तान् बालान् परिसान्त्व्य दितिः स्वयम्।<br>देवराज्ञा सहैतांस्तु प्रेषयामास भामिनी॥ ४१<br>एवं पुरा स्वानपि सोदरान् स<br>गर्भस्थितानुज्जरितुं भयार्तः।<br>बिभेद वज्रेण ततः स गोत्रभित्<br>ख्यातो महर्षे भगवान् महेन्द्रः॥ ४२ | पुलस्त्यजी बोले— भामिनी दितिने ऐसा कहनेके बाद उन बालकोंको सान्त्वना देकर उन्हें देवराजके साथ ही भेज दिया। महर्षे! इस प्रकार पूर्वकालमें भयार्त होकर महेन्द्रने गर्भस्थित अपने ही सहोदरोंके विनाशके लिये उन्हें वज्रद्वारा काट दिया। इसीसे वे 'गोत्रभित्' नामसे प्रसिद्ध हो गये॥ ४१-४२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥
बहत्तरवाँ अध्याय
स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन
| नारद उवाच<br>यदमी भवता प्रोक्ता मरुतो दितिजोत्तमाः।<br>तत् केन पूर्वमासन् वै मरुन्मार्गेण कथ्यताम्॥ १<br><br>पूर्वमन्वन्तरेष्वेव समतीतेषु सत्तम।<br>के त्वासन् वायुमार्गस्थास्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २ | नारदजीने कहा— (पुलस्त्यजी!) आपने दितिसे उत्पन्न उत्तम मरुद्गणोंका जो वर्णन किया उसके विषयमें यह कहिये कि पहले वे मरुत् किस मार्गमें अवस्थित थे; सत्तम! आप मुझे विशेषरूपसे यह बतलाइये कि पूर्व मन्वन्तरके बीत जानेपर कौन (मरुत्) वायुमार्गमें स्थित थे?॥ १-२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां पूर्वमरुतामुत्पत्तिं कथयामि ते।<br>स्वायम्भुवं समारभ्य यावन्मन्वन्तरं त्विदम्॥ ३<br><br>स्वायम्भुवस्य पुत्रोऽभून्मनोर्नाम प्रियव्रतः।<br>तस्यासीत् सवनो नाम पुत्रस्त्रैलोक्यपूजितः॥ ४<br><br>स चानपत्यो देवर्षे नृपः प्रेतगतिं गतः।<br>ततोऽरूदत् तस्य पत्नी सुदेवा शोकविह्वला॥ ५<br><br>न ददाति तदा दग्धुं समालिङ्ग्य स्थिता पतिम्।<br>नाथ नाथेति बहुशो विलपन्ती त्वनाथवत्॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्वायम्भुव मन्वन्तरसे लेकर इस मन्वन्तरतकके पहलेतकके मरुद्गणोंकी उत्पत्ति आपसे कहता हूँ, उसे सुनिये—स्वायम्भुव मनुके पुत्रका नाम प्रियव्रत था। तीनों लोकोंमें सत्कार प्राप्त सवन उन प्रियव्रतके पुत्र थे। देवर्षे! वे राजा पुत्रहीन ही मृत्युको प्राप्त हो गये। उसके बाद उनकी सुदेवा नामकी पत्नी शोकसे विह्वल होकर रोने लगी। उसने उस मृत-शरीरको दाह-संस्कार करनेके लिये नहीं दिया। पतिके गलेसे लिपटी हुई वह 'हा नाथ, हा नाथ' कहती हुई असहायकी भाँति अत्यधिक विलाप करने लगी॥ ३-६॥ |
| तामन्तरिक्षादशरीरिणी वाक्<br>प्रोवाच मा राजपत्नीह रोदीः। | उस समय आकाशसे अशरीरिणीवाणीने उससे |