वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७१ ] * इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा * ३५३
एकहत्तरवाँ अध्याय
इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, उनका 'पाकशासन' और 'गोत्रभिद्' होनेका हेतु; मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा
| नारद उवाच<br>मलयेऽपि महेन्द्रेण यत्कृतं ब्राह्मणर्षभ।<br>निष्पादितं स्वकं कार्यं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ १<br><br>पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां यन्महेन्द्रेण मलये पर्वतोत्तमे।<br>कृतं लोकहितं ब्रह्मन्नात्मनश्च तथा हितम्॥ २<br>अन्धासुरस्यानुचरा मयतारपुरोगमाः।<br>ते निर्जिताः सुरगणैः पातालगमनोत्सुकाः॥ ३<br>ददृशुर्मलयं शैलं सिद्धाध्युषितकन्दरम्।<br>लतावितानसंछन्नं मत्तसत्त्वसमाकुलम्॥ ४<br>चन्दनैरुरगाक्रान्तैः सुशीतैरभिसेवितम्।<br>माधवीकुसुमामोदं ऋष्यर्चितहरं गिरिम्॥ ५<br>तं दृष्ट्वा शीतलच्छायं श्रान्ता व्यायामकर्षिताः।<br>मयतारपुरोगास्ते निवासं समरोचयन्॥ ६<br>तेषु तत्रोपविष्टेषु प्राणतृप्तिप्रदोऽनिलः।<br>विवाति शीतः शनकैर्दक्षिणो गन्धसंयुतः॥ ७<br>तत्रैव च रतिं चक्रुः सर्व एव महासुराः।<br>कुर्वन्तो लोकसम्पूज्ये विद्वेषं देवतागणे॥ ८<br>ताञ्ज्ञात्वा शङ्करः शक्रं प्रेषयन्मलयेऽसुरान्।<br>स चापि ददृशे गच्छन् पथि गोमातरं हरिः॥ ९<br>तस्याः प्रदक्षिणां कृत्वा दृष्ट्वा शैलं च सुप्रभम्।<br>ददृशे दानवान् सर्वान् संहृष्टान् भोगसंयुतान्॥ १०<br><br>अथाजुहाव बलहा सर्वानैव महासुरान्।<br>ते चाप्याययुरव्यग्रा विकिरन्तः शरोत्करान्॥ ११<br><br>तानागतान् बाणजालैः रथस्थोऽद्भुतदर्शनः।<br>छादयामास विप्रर्षे गिरीन् वृष्ट्या यथा घनः॥ १२<br><br>ततो बाणैरवच्छाद्य मयादीन् दानवान् हरिः।<br>पाकं जघान तीक्ष्णाग्रैर्मार्गणैः कङ्कवाससैः॥ १३ | नारदने कहा— द्विजश्रेष्ठ! महेन्द्रने मलयपर्वतपर भी अपना जो कार्य पूरा किया उसे आप मुझसे कहिये॥ १॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले— ब्रह्मन्! महेन्द्रने श्रेष्ठ मलयपर्वतपर जगत्के हित तथा अपने कल्याणके लिये जो कार्य किया था, उसे सुनिये। मय, तार आदि अन्धकासुरके अनुचर दैत्य देवताओंसे पराजित होकर पाताललोकमें जानेके लिये अत्यन्त उत्सुक होने लगे। उन लोगोंने सिद्धोंसे भरे कन्दराओंवाले तथा लतासमूहसे ढके, आमोदभरे प्राणियोंसे व्याप्त, साँपोंसे घिरे सुशीतल चन्दनसे युक्त तथा सुगन्धित माधवी लताके फूलोंकी सुगन्धिसे पूर्ण ऋषियोंद्वारा पूजित शंकरके मलयगिरिको देखा॥ २—५॥<br><br>परिश्रमसे थके-माँदे तथा शक्तिहीन मय, तार आदि दानवोंने शीतल छायावाले उस पर्वतको देखकर वहाँ निवास करनेकी इच्छा की। उन लोगोंके वहाँ ठहर जानेपर प्राणोंको संतुष्टि प्रदान करनेवाली सुगन्धसे पूर्ण तथा शीतल दक्षिणी हवा मन्द-मन्द बहने लगी। जगत्-पूज्य देवताओंसे शत्रुता करते हुए सभी श्रेष्ठ दैत्य सुखसे वहीं रहने लगे। शंकरने उन असुरोंको मलयपर्वतपर रहते हुए जानकर इन्द्रको वहाँ भेजा। मार्गमें जाते हुए इन्द्रने गोमाताको देखा॥ ६—९॥<br><br>उसकी प्रदक्षिणा करनेके बाद उन्होंने सुकान्तिसे सम्पन्न पर्वतपर भोगसे संयुत तथा हर्षित सभी दानवोंको देखा। उसके बाद इन्द्रने सभी महासुरोंको ललकारा। वे भी बिना किसी हिचकके बाणोंकी वर्षा करते हुए आ गये। विप्रर्षे! रथपर बैठे हुए अद्भुत दिखायी पड़नेवाले इन्द्रने आये हुए उन दानवोंको बाणोंके समूहोंसे इस प्रकार ढक दिया जिस प्रकार बादल जलकी वर्षासे पर्वतोंको ढक देता है। उसके बाद इन्द्रने मय आदि दानवोंको बाणोंसे ढककर कङ्क पक्षीके पंख लगे तेज-नुकीली धारवाले बाणोंसे पाक नामके दानवका वध कर दिया॥ १०—१३॥ |