भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७०

| व्रजस्व शरणं मातुरेशा श्रेयस्करी तव।<br>इत्युक्तो विभुना नन्दी अन्धकश्च गणेश्वरः ॥ ९०<br><br>समागम्याम्बिकापादौ ववन्दतुरुभावपि।<br>अन्धकोऽपि तदा गौरीं भक्तिनम्रो महामुने।<br>स्तुतिं चक्रे महापुण्यां पापघ्नीं श्रुतिसम्मिताम् ॥ ९१ | शीघ्र यहाँ आओ। अपनी इस माताकी शरणमें जाओ! ये तुम्हारा कल्याण करेंगी। प्रभुके इस प्रकार कहनेपर गणेश्वर नन्दी एवं अन्धक दोनोंने जाकर अम्बिकाके चरणोंमें प्रणाम किया। महामुने ! उसके बाद श्रद्धापूर्वक नम्र होकर अन्धकने गौरीकी पाप नाश करनेवाली एवं अत्यन्त पवित्र वेद-सम्मत स्तुति की ॥ ८७-९१ ॥ | | अन्धक उवाच<br>ॐ नमस्ये भवानीं भूतभव्यप्रियां लोकधात्रीं जनित्रीं स्कन्दमातरं महादेवप्रियां धारिणीं स्यन्दिनीं चेतनां त्रैलोक्यमातरं धरित्रीं देवमातरमथेज्यां श्रुतिं स्मृतिं दयां लज्जां कान्तिमग्र्यामसूयां मतिं सदापावनीं दैत्यसैन्यक्षयकरीं महामायां वैजयन्तीं सुशुभां कालरात्रिं गोविन्दभगिनीं शैलराजपुत्रीं सर्वदेवार्ार्चितां सर्वभूतार्चितां विद्यां सरस्वतीं त्रिनयनमहिषीं नमस्यामि मृडानीं शरण्यां शरणमुपागतोऽहं नमो नमस्ते ॥<br><br>इत्थं स्तुता सान्धकेन परितुष्टा विभावरी।<br>प्राह पुत्र प्रसन्नाऽस्मि वृणुष्व वरमुत्तमम् ॥ ९२ | अन्धकने कहा— ॐ मैं भवानीको प्रणाम करता हूँ। मैं भूतभव्य—शङ्करकी प्रिया, लोकधात्री, जनित्री, कार्तिकेयकी जननी, महादेवकी प्रिया, लोकोंको धारण करनेवाली, स्यन्दिनी, चेतना, त्रैलोक्यजननी, धरित्री, देवमाता, इज्या, श्रुति, स्मृति, दया, लज्जा, श्रेष्ठ कान्ति, अग्र्या, असूया, मति, सदापावनी, दैत्योंकी सेनाओंका विनाश करनेवाली, महामाया वैजयन्ती, अत्यन्त शोभावाली, कालरात्रि, गोविन्दभगिनी, शैलराजपुत्री, सर्वदेवोंसे पूजित, सर्वभूतोंसे पूजित, विद्या, सरस्वती, शंकरकी महारानीको प्रणाम करता हूँ। मैं शरणागतोंकी रक्षा करनेवाली मृडानीकी शरणमें आया हूँ। (देवि!) आपको बार-बार प्रणाम है। अन्धकके इस प्रकार स्तुति करनेपर भवानीने प्रसन्न होकर कहा—पुत्र! मैं प्रसन्न हूँ। तुम उत्तम वर माँगो ॥ ९२ ॥ | | भृङ्गिरुवाच<br>पापं प्रशममायातु त्रिविधं मम पार्वति।<br>तथेश्वरे च सततं भक्तिरस्तु ममाम्बिके ॥ ९३ | भृङ्गीने कहा— पार्वति! अम्बिके! मेरे त्रिविध—मानसिक, कायिक, वाचिक पाप दूर हो जायँ एवं भगवान् शिवमें मेरी भक्ति सदा बनी रहे ॥ ९३ ॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>बाढमित्यब्रवीद् गौरी हिरण्याक्षसुतं ततः।<br>स चास्ते पूजयञ्छर्वं गणानामधिपोऽभवत् ॥ ९४<br><br>एवं पुरा दानवसत्तमं तं<br>महेश्वरेणाथ विरूपदृष्ट्या।<br>कृत्वैव रूपं भयदं च भैरवं<br>भृङ्गित्त्वमीशेन कृतं स्वभक्त्या ॥ ९५<br><br>एतत् तवोक्तं हरकीर्तिवर्धनं<br>पुण्यं पवित्रं शुभदं महर्षे।<br>संकीर्तनीयं द्विजसत्तमेषु<br>धर्मयुरारोग्यधनैषिणा सदा ॥ ९६ | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद गौरीने हिरण्याक्षके पुत्र अन्धकसे कहा—ऐसा ही हो। वह वहाँ रहकर शिवकी पूजा करते हुए गणाधिप हो गया। इस प्रकार पहले समयमें महेश्वरने उस दानवश्रेष्ठको अपनी विरूपदृष्टिसे भयदायक भीषण रूप प्रदानकर अपनी भक्तिसे 'भृङ्गी' बना दिया। महर्षे (नारदजी)! मैंने आपसे शिवकी कीर्तिको बढ़ानेवाला यह पुण्य पवित्र एवं शुभद आख्यान कहा। धर्म, आयु, आरोग्य एवं धनको चाहनेवालोंको श्रेष्ठ द्विजातियोंमें इसका कीर्तन सदा करना चाहिये ॥ ९४-९६ ॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ७० ॥