वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७० ] अन्धकका शिव-शूलसे भेदन, भैरवादिकी उत्पत्ति, अन्धककृत शिवस्तुति, अन्धकका भृङ्गित्त्व ३५१
| ततस्तान् प्राह भगवान् सम्परिष्वज्य देवताः।<br>गच्छध्वं स्वानि धिष्ण्यानि भुङ्ग्ध्वं त्रिदिवं सुखम्॥ ७७<br><br>सहस्राक्षोऽपि संयातु पर्वतं मलयं शुभम्।<br>तत्र स्वकार्यं कृत्वैव पश्चाद् यातु त्रिविष्टपम्॥ ७८<br><br>इत्येवमुक्त्वा त्रिदशान् समाभाष्य व्यसर्जयत्।<br>पितामहं नमस्कृत्य परिष्वज्य जनार्दनम्।<br>ते विसृष्टा महेशेन सुरा जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ७९ | करने लगे। उसके बाद भगवान् शंकरने उन देवोंको गले लगाकर कहा—देवताओ! आपलोग अपने-अपने स्थानको जाइये और स्वर्ग-सुखका उपभोग कीजिये। इन्द्र भी सुखद मलयपर्वतपर जायें तथा वहाँ अपना काम समाप्त करके ही स्वर्ग चले जायें। ऐसा कहकर देवोंसे वार्तालाप कर देवोंको विदा कर दिया। महेशने पितामहको नमस्कार तथा जनार्दनको गले लगाकर उन सभीको विदा कर दिया। (महेशसे विदा किये गये) वे देवगण स्वर्गको चले गये॥ ७६—७९॥ |
| महेन्द्रो मलयं गत्वा कृत्वा कार्यं दिवं गतः।<br>गतेषु शक्रप्राग्येषु देवेषु भगवाञ्छिवः॥ ८०<br><br>विसर्जयामास गणाननुमान्य यथार्हतः।<br>गणाश्च शङ्करं दृष्ट्वा स्वं स्वं वाहनमास्थिताः॥ ८१<br><br>जग्मुस्ते शुभलोकानि महाभोगानि नारद।<br>यत्र कामदुघा गावः सर्वकामफलद्रुमाः॥ ८२<br><br>नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो हृदाः पायसकर्दमाः।<br>स्वां स्वां गतिं प्रयातेषु प्रमथेषु महेश्वरः॥ ८३<br><br>समादायान्धकं हस्ते सनन्दिः शैलमभ्यगात्।<br>द्वाभ्यां वर्षसहस्राभ्यां पुनरागाद्धरो गृहम्॥ ८४<br><br>ददृशे च गिरेः पुत्रीं श्वेतार्ककुसुमस्थिताम्।<br>समायातं निरीक्ष्यैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ८५<br><br>त्यक्त्वाऽर्कपुष्पं निर्गत्य सखीस्ताः समुपाह्वयत्।<br>समाहूताश्च देव्या ता जयाद्यास्तूर्णमागमन्॥ ८६ | महेन्द्र भी मलयाचलपर जा करके (अपना) कार्य सम्पन्नकर स्वर्ग चले गये। शिवने इन्द्र आदि देवोंके चले जानेपर गणोंको यथायोग्य सम्मानित कर विदा कर दिया। [पुलस्त्यजी कहते हैं कि] नारदजी! गण भी शंकरका दर्शन कर अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो विशाल भोगसे सम्पन्न उन सुखद लोकोंको चले गये, जहाँकी गौएँ इच्छित वस्तु प्रदान करनेवाली थीं, वृक्ष समस्त कर्मरूपी फलोंके दाता थे, नदियाँ अमृतकी धारा बहानेवाली थीं और सरोवर दूधके पङ्कसे भरे थे। महेश्वर प्रमथोंके अपने-अपने स्थानपर चले जानेपर अन्धकका हाथ पकड़कर (उसे साथ लिये हुए) नन्दीसहित पर्वतपर चले गये। (वे) शंकर दो हजार वर्षोंके बाद फिर अपने घर लौटे। उन्होंने सफेद अर्क (आक या मन्दार)-के फूलमें स्थित गिरिजाको देखा। पार्वती समस्त चिह्नोंसे युक्त शंकरको आया हुआ देखते ही अर्कके फूलको छोड़कर बाहर निकल आयीं और उन्होंने (अपनी जयादि) सखियोंको पुकारा। पुकारी गयीं वे जया आदि सभी देवियाँ शीघ्र वहाँ चली आयीं॥ ८०—८६॥ |
| ताभिः परिवृता तस्थौ हरदर्शनलालसा।<br>ततस्त्रिनेत्रो गिरिशां दृष्ट्वा प्रेक्ष्य च दानवम्॥ ८७<br><br>नन्दिनं च तथा हर्षादालिलिङ्गे गिरेः सुताम्।<br>अथोवाचैष दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः॥ ८८<br><br>पश्यस्व प्रणतिं यातं स्वसुतं चारुहासिनि।<br>इत्युच्चार्यान्धकं चैव पुत्र एहीति सत्वरम्॥ ८९ | उन (अपनी सहेली जयादि देवियों)-से घिरी हुई पार्वतीजी शिवके दर्शनकी अभिलाषासे (प्रतीक्षामें) खड़ी रहीं। त्रिनेत्रधारी शंकरने गिरिजाको देखकर दानव एवं नन्दीके ऊपर भी दृष्टिपात किया; फिर प्रसन्नतापूर्वक गिरिसुताको गले लगा लिया। उसके बाद उन्होंने कहा—देवि! मैंने अन्धकको तुम्हारा दास बना लिया है। चारुहासिनि! प्रणाम कर रहे अपने पुत्रको देखो। ऐसा कहनेके बाद उन्होंने कहा—पुत्र! |